सूरह : आले-इमरान | 121– 129

                    


क़ुरआन की आयात पर ग़ौर-ओ-फ़िक्र

सूरह: आल-ए-इमरान | 121 – 129




[3: 121]: जब तुम सुबह को अपने घर से निकले और मुसलमानों को जंग के मक़ामात पर तैनात किया और अल्लाह सुनने वाला, जानने वाला है।


[3: 122]: जब तुममें से दो जमाअतों ने इरादा किया कि हिम्मत हार दें और अल्लाह इन दोनों जमाअतों पर मददगार था। और मुसलमानों को चाहिए कि अल्लाह पर ही भरोसा करें।


[3: 123]: और अल्लाह तुम्हारी मदद कर चुका है बद्र में जबकि तुम कमज़ोर थे। पस अल्लाह से डरो ताकि तुम शुक्रगुज़ार रहो।


[3: 124]: जब तुम मुसलमानों से कह रहे थे कि क्या तुम्हारे लिए काफ़ी नहीं कि तुम्हारा रब तीन हज़ार फ़रिश्ते उतार कर तुम्हारी मदद करे।


[3: 125]: अगर तुम सब्र करो और अल्लाह से डरो और दुश्मन तुम्हारे ऊपर अचानक आ पहुंचे तो तुम्हारा रब पांच हज़ार निशान किए हुए फ़रिश्तों से तुम्हारी मदद करेगा।


[3: 126]: और यह अल्लाह ने इसलिए किया ताकि तुम्हारे लिए ख़ुशख़बरी हो और तुम्हारे दिल इससे मुतमइन हो जाएं और मदद सिर्फ़ अल्लाह ही की तरफ़ से है जो ज़बरदस्त है, हिक्मत वाला है,


[3: 127]: ताकि अल्लाह मुंकिरों के एक हिस्से को काट दे या उन्हें ज़लील कर दे कि वे नाकाम लौट जाएं।


[3: 128]: तुम्हें इस मामले में कोई दख़ल नहीं। अल्लाह इनकी तौबा क़ुबूल करे या उन्हें अज़ाब दे, क्योंकि वे ज़ालिम हैं।


[3: 129]: और अल्लाह ही के इख़्तियार में है जो कुछ आसमान में है और जो कुछ ज़मीन में है। वह जिसे चाहे बख़्श दे और जिसे चाहे अज़ाब दे और अल्लाह ग़फ़ूर व रहीम है।




यह बहुत अहम बात है कि क़ुरआन को समझते वक़्त कुछ आयात को "दावत के मिशन" के नज़रिए से समझा जाए। 


सूरह आले-इमरान की आयात (121–129) का मुताला इसी नज़र से किया जाए तो इसमें दावत की राह में पेश आने वाले मुश्किल मरहलों की गहरी रहनुमाई मिलती है। 

इसमें सबसे पहली बात यह समझ में आती है कि दावत की तहरीक जब आगे बढ़ती हैतो कभी-कभी ऐसे नाज़ुक और मुश्किल हालात सामने आते हैंजहाँ दा’ईयान-ए-हक़ (सत्य की ओर बुलाने वाले) को सख़्त विरोध और ख़तरों का सामना करना पड़ता है। 


ऐसे मौक़ों परजान और मिशन की हिफाज़त के लिए कभी-कभी दिफ़ा’ई (रक्षात्मक) क़दम उठाने की भी ज़रूरत पड़ती है। लेकिन याद रहेयह क़दम सबसे आख़िरी विकल्प और मजबूरी का होता है — जब अमन की सारी कोशिशें नाकाम हो जाएं और कोई रास्ता न बचेतभी इसका हुक्म मिलता है।   


 

जंग-ए-बद्र और जंग-ए-उहद का ज़िक्र हम अक्सर तफ़सीरों में पढ़ते आए हैंऔर आज जिन आयात का मुताला किया जा रहा हैवह भी इन्हीं हालात से जुड़ी हैं,

मगर समझने की अहम बात यह है कि क़ुरआन इन जंगों को सिर्फ़ सैन्य घटनाओं के तौर पर नहींबल्कि दावत की तहरीक (सत्य की ओर बुलाने की तहरीक) के नाज़ुक पड़ावों के रूप में पेश कर रहा है।

 


जंग-ए-बद्र पहले हो चुकी थी, और अब जंग-ए-उहद के लिए मुसलमान रवाना हो चुके हैंऔर रणनीति (strategy) बन रही हैलेकिन साथ ही साथ क़ुरआन उस वक़्त दा’ईयों की नफ़्सियात (साइकोलॉजी) को भी संवार रहा है और उनकी रहनुमाई कर रहा है।



[3: 121]: जब तुम सुबह को अपने घर से निकले और मुसलमानों को जंग के मक़ामात पर तैनात किया और अल्लाह सुनने वालाजानने वाला है।


[3: 122]: जब तुममें से दो जमाअतों ने इरादा किया कि हिम्मत हार दें और अल्लाह इन दोनों जमाअतों पर मददगार था। और मुसलमानों को चाहिए कि अल्लाह पर ही भरोसा करें।




क़ुरआन की यह आयात [3: 121–122] हमें दावत के रास्ते की पहली बड़ी सीख देती हैं — अल्लाह अपने बंदों के काम को देख रहा है, उनकी बातों को सुन रहा है और उनके दिलों के हाल (नफ़्सियात) से अच्छी तरह वाक़िफ़ है।


 

जब दा’ईयान-ए-हक़ (सत्य की ओर बुलाने वाले) किसी मिशन के लिए निकलें, तो उन्हें अपनी तादाद, ताक़त या हिम्मत को बहुत ज़्यादा फ़ौक़ियत (अहमियत) नहीं देनी चाहिए। असल चीज़ यह है कि उनका भरोसा और उनकी नीयत कैसी है। अल्लाह इस बात से पूरी तरह वाक़िफ़ (जानकार) है कि वे किस नफ़्सियात और विश्वास के साथ आगे बढ़ रहे हैं।

 

अगर तादाद ज़्यादा होने की वजह से यह वहम हो जाए कि अब जीत आसान है, तो यही नफ़्सियाती कमज़ोरी है। क़ुरआन में अल्लाह तआला इसी नफ़्सियाती कमज़ोरी की तरफ़ इशारा करते है। 

जैसे ही यह नफ़्सियात (साइकोलॉजी) पैदा होती है, वैसे ही गिरोह के अंदर से एक हिस्सा अलग हो जाता है, और पूरी जमाअत के अंदर पस्त-हिम्मती आ जाती है। 

 

दा’ईयान-ए-हक़ को इस पहलू से गाइडेंस दी जा रही है कि चाहे तुम्हारी तादाद कम हो या ज़्यादा— तुम्हारी नफ़्सियात मज़बूत होनी चाहिए — तुममे का एक आदमी भी अगर अल्लाह के दीन के लिए खड़ा रहे, और बाक़ी सारे लोग छोड़कर चले जाएँ, तब भी अल्लाह काफ़ी है कि वह तुम अकेले से ही दीन का काम ले ले।  

 

इसीलिए आगे अल्लाह तआला फ़रमाते हैं:

 

व अलल्लाहि फलयतवक्कलिल मोमिनून

 

और मुसलमानों को चाहिए कि अल्लाह पर ही भरोसा करें। (3: 122)


 

यही वह नफ़्सियात है जो दा'वत के मिशन को गिरने नहीं देती — बल्कि उसे हर हाल में थामे रखती है, सब्र, भरोसा और यक़ीन से भर देती है, और अल्लाह के वादों पर मुतमइन कर देती है।




[3: 123]: और अल्लाह तुम्हारी मदद कर चुका है बद्र में जबकि तुम कमज़ोर थे। पस अल्लाह से डरो ताकि तुम शुक्रगुज़ार रहो।




इस आयत में अल्लाह तआला फ़रमाते हैं:


पस अल्लाह से डरो ताकि तुम शुक्रगुज़ार रहो। [3:123]


फ-इत्तक़ुल्लाह ला'अल्लकुम तशकुरून [3:123]

 

आयत के इस हिस्से का मूल मक़सददो बातें हैं:


1.  फ-इत्तक़ुल्लाह (अल्लाह से डरो)


2.  ला'अल्लकुम तशकुरून 

(ताकि तुम शुक्रगुज़ार बने रहो. ताकि तुम शुक्र में जीने वाले बन जाओ)

 

अल्लाह से डरने का मतलब है कि हमारा दिल पूरी तरह अल्लाह-रुख़ि (God-oriented) हो जाए — हम मुख़्लिस (निष्ठावान) बन जाएंहर distraction से निकलकर पूरी लगन के साथ सिर्फ़ अल्लाह को अपना एकमात्र फ़िक्र और मक़सद (Sole Concern) बना लें।

 

जिस आदमी के अन्दर यह नफ़्सियात पैदा हो जाएगी वह हर चीज़ में अल्लाह की कारीगरी और उसकी करिश्माई ताक़त को देखेगा। वो हर वाक़िए को एक "शुक्र का आइटम" बनाएगा — हर छोटी-बड़ी बात को देखकर कहेगा: "ख़ुदायाये तो तेरा करम है। मैं तेरा शुक्र अदा करता हूँ।" 


मिसाल के तौर परजब हम इस आयत पर ग़ौर करते हैं –


और अल्लाह तुम्हारी मदद कर चुका है बद्र में जबकि तुम कमज़ोर थे।[3:123], तो इसमें शुक्र का एक बेहद अहम पहलू नज़र आता है।

 

यानीअल्लाह तआला बद्र के हवाले से मोमिनीन को याद दिला रहे हैं कि ग़ौर करो जब तुम बद्र के मैदान में थे — उस वक़्त तुम्हारी हालत क्या थीतुम कितने कमज़ोर थेतुम्हारे पास न तो ज़्यादा सामान थान ही तादाद। मगर फिर भी अल्लाह ने तुम्हारी नुसरत (मदद) की — और वही मदद तुम्हारी फ़तह का सबब बनी।

 

यह कोई साधारण याद दिलाना नहीं हैबल्कि एक शुक्र का पहलू है। अल्लाह तआला चाह रहे हैं कि मोमिनीन गुज़रे हुए हालात पर ग़ौर करेंऔर अपनी गुज़री हुई ज़िंदगी को देख कर शुक्र की रूह से भर जाएं — हर मुश्किलहर मोड़हर परेशानी को याद करें — उनमें अल्लाह की मदद और रहमत को पहचानेंऔर उन्हें अल्लाह के शुक्र का आइटम (रिफरेन्स) बनाएं।

 

इस तरहये आयत हमें सीधा रास्ता दिखा रही है कि गुज़रे हुए हालात को सिर्फ़ याद मत करो — बल्कि उन्हें अल्लाह की शुक्रगुज़ारी और भरोसे का ज़रिया बना लो।

 

यही वो दूसरी बड़ी सीख है जो इस मुताले से हमें मिल रही है।







[3: 124]: जब तुम मुसलमानों से कह रहे थे कि क्या तुम्हारे लिए काफ़ी नहीं कि तुम्हारा रब तीन हज़ार फ़रिश्ते उतार कर तुम्हारी मदद करे।


[3: 125]: अगर तुम सब्र करो और अल्लाह से डरो और दुश्मन तुम्हारे ऊपर अचानक आ पहुंचे तो तुम्हारा रब पांच हज़ार निशान किए हुए फ़रिश्तों से तुम्हारी मदद करेगा।


[3: 126]: और यह अल्लाह ने इसलिए किया ताकि तुम्हारे लिए ख़ुशख़बरी हो और तुम्हारे दिल इससे मुतमइन हो जाएं और मदद सिर्फ़ अल्लाह ही की तरफ़ से है जो ज़बरदस्त हैहिक्मत वाला है,


 


अल्लाह की मदद कैसे आती है?

 

सबसे बड़ी तसल्ली जो मोमिनीन के दिलों को मजबूत करती है, वो होती है अल्लाह की मदद। ऐसा ही मंज़र सूरह आले-इमरान की आयात [3:124–126] में बयान हुआ है। 

 

एक बेहद मुश्किल हालात में नबी-ए-करीम (सल्ल०) ने अपने साथियों से एक बात कही — जो क़ुरआन में इस तरह आई है:

 

जब तुम मुसलमानों से कह रहे थे कि क्या तुम्हारे लिए काफ़ी नहीं कि तुम्हारा रब तीन हज़ार फ़रिश्ते उतार कर तुम्हारी मदद करे।” (आले-इमरान 3:124) 

 

और फिर अगली आयत में अल्लाह तआला ने फ़रमाया:

 

अगर तुम सब्र करो और अल्लाह से डरो और दुश्मन तुम्हारे ऊपर अचानक आ पहुंचे तो तुम्हारा रब पांच हज़ार निशान किए हुए फ़रिश्तों से तुम्हारी मदद करेगा।”

(आले-इमरान 3:125) 

 

यानि मदद का वादा सब्र और तक़्वा के साथ जुड़ा हुआ है। ये कोई मामूली शर्त नहीं — बल्कि मोमिन की सच्चाई और इख़लास की पहचान है।

 

 

 

तफ़सीरी रिवायतों में इन फ़रिश्तों की तादाद (तीन हज़ार या पाँच हज़ार) का ज़िक्र, बद्र और कभी उहद के साथ जोड़ा जाता है। दोनों तरह की बातों से ये समझा जा सकता है कि अल्लाह की मदद किस तरह आती है।

 

लेकिन एक बहुत अहम बात अगली आयत में बताई गई है — जो इस पूरी चर्चा का असल निचोड़ है:

 

और यह अल्लाह ने इसलिए किया ताकि तुम्हारे लिए ख़ुशख़बरी हो और तुम्हारे दिल इससे मुतमइन हो जाएं और मदद सिर्फ़ अल्लाह ही की तरफ़ से है जो ज़बरदस्त है, हिक्मत वाला है।” (3:126)

 

'वमा जअलहु अल्लाहु इल्ला बुशरा लकुम व लितत्मइन्ना क़ुलूबुकुम बिही, वमा अन-नस्रु इल्ला मिन इंदि अल्लाहिल अज़ीज़िल हकीम' (आले-इमरान 3:126) 

 

 

अल्लाह तआला हमें ताक़ीद के साथ एक बुनियादी सच्चाई समझा रहे हैं कि मदद का कोई भी ज़रिया — चाहे वह फ़रिश्ते हों या कोई और — असल चीज़ नहीं है। असल बात यह है कि मदद का मालिक सिर्फ़ अल्लाह है।  

 

फ़रिश्तों का ज़िक्र — ये सब सिर्फ़ एक "बुशरा" (ख़ुशख़बरी) है —जो हमारे दिलों को सुकून देने के लिए बताई गई है।

 

असल मदद तो अल्लाह की तरफ़ से ही थी — है — और हमेशा रहेगी। 

 

इसीलिए एक सच्चे मोमिन को यह नहीं सोचना चाहिए कि — मदद किस रास्ते से आएगी, कितनी होगी या कब पहुंचेगी — बल्कि उसकी नज़र सीधे अल्लाह की ज़ात पर होनी चाहिए — क्योंकि वही अपनी बेपनाह क़ुदरत और हिक्मत से जानता है कि मदद कब, किस तरह और किस शक्ल में भेजनी है। हमारी अक़्ल तो वहाँ तक सोच भी नहीं सकती जहाँ से अल्लाह मदद करता है।

 

मगर शर्त ये है कि — हम सब्र करें, और अल्लाह का तक़्वा अख्तियार करें।








[3: 127]: ताकि अल्लाह मुंकिरों के एक हिस्से को काट दे या उन्हें ज़लील कर दे कि वे नाकाम लौट जाएं।


लियक़्तआ तरफ़न मिनल्लज़ीना कफ़रू औ यकबिताहुम फयन्क़लिबू ख़ाइबीन (3:127)



 

यह आयत [3:127] हमें अल्लाह तआला के उस हिकमत भरे उसूल से वाक़िफ़ कराती है जो वह अपने दीन के लिए अपनाता है। 


अगर इस आयत को "दावत" की निगाह से देखा जाएतो अल्लाह की हिकमत और उसूलऔर भी ज़्यादा स्पष्ट हो जाती है।

 

जब हक़ की तरफ़ बुलाने वाले लोग (दा’ईयान-ए-हक़) सब्र के साथ लोगों को लगातार अल्लाह की राह की तरफ़ बुलाते हैं — तो इसका असर धीरे-धीरे विरोध करने वालों के दिलों पर दिखने लगता है। 


जो लोग शुरू में सख़्त विरोधी होते हैंउनमें से कुछ के दिलो में नरमी आने लगती है। कुछ लोग हक़ को पूरी तरह क़ुबूल कर लेते हैंजबकि ऐसा भी होता है कि भले ही कुछ लोग अल्लाह का पैग़ाम क़ुबूल न करेंमगर दा'ई के ख़िलाफ़ उनकी मुख़ालिफ़त कम हो जाती हैवे सरकशी और आक्रामक-विरोध से दूर हो जाते हैं।

 

यही है वह "काटना" है जिसका ज़िक्र इस आयत में है —  "लियक़्तआ तरफ़न" — यानी अल्लाह मुख़ालिफ़ ताक़तों के एक हिस्से को या तो ईमान की तरफ मोड़ देता है या मुख़ालिफ़त से हटा देता है। 


यह दावत की पहली कामयाबी है — जिससे दीन के ख़िलाफ़ उठने वाली ताक़त अपने आप कमजोर हो जाती है।

 

लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जो हक़ को दबाने की कोशिश में ज़्यादा ज़िद पर उतर आते हैंसरकश और ज़्यादा हमलावर हो जाते हैं। ऐसे लोगों के लिए अल्लाह का दूसरा निज़ाम काम करता है —


"... औ यकबिताहुम फयन्क़लिबू ख़ाइबीन"  


यानी अल्लाह ऐसे सरकश लोगों को ज़लील करता हैउनकी साज़िशों को ख़ाइब (नाकाम) कर देता है और आख़िरकार उन्हें मायूसी के साथ लौटना पड़ता है। 

 

इस पूरी हिकमत में हमारे लिए एक अहम सबक़ छुपा है — कि सच्चाई (हक़) की मुख़ालिफ़त को मिटाने का सही तरीक़ा यह नहीं कि विरोधियों को जबरन ख़ामोश किया जाएबल्कि उनके बीच सब्र के साथ दावत का सिलसिला जारी रखा जाए —ताकि वे सच्चाई को समझेंनर्म पड़ेंऔर मुख़ालिफ़त का ज़ोर ख़ुद-ब-ख़ुद टूट जाए।








[3: 128]: तुम्हें इस मामले में कोई दख़ल नहीं। अल्लाह इनकी तौबा क़ुबूल करे या उन्हें अज़ाब देक्योंकि वे ज़ालिम हैं।


[3: 129]: और अल्लाह ही के इख़्तियार में है जो कुछ आसमान में है और जो कुछ ज़मीन में है। वह जिसे चाहे बख़्श दे और जिसे चाहे अज़ाब दे और अल्लाह ग़फ़ूर व रहीम है।




तफ़सीरी रिवायतों के मुताबिक़, जंगे उहद में जब अल्लाह के रसूल (सल्ल०) के दाँत शहीद हो गए, और आपके चेहरे से ख़ून बह रहा था। उस मुश्किल घड़ी और दर्द के आलम में आपने कहा:


यह क़ौम कैसे नजात पाएगी, जो अपने नबी के साथ ऐसा सुलूक करती है ?" 

 

इस वाक़िए के संदर्भ में तफ़सीर के उलेमा लिखते हैं कि उस वक़्त शायद इसी वजह से अल्लाह तआला ने नबी (सल्ल०) को एक अहम हक़ीक़त की तरफ़ तवज्जो दिलाई।

 

क़ुरआन में अल्लाह तआला ने फ़रमाया:


लैस लक मिनल अम्रि शय-उन (3:128)


तुम्हें इस मामले में कोई दख़ल नहीं। 


यानी — ये सोचना आपका काम नहीं है। हिदायत देना, तौबा क़ुबूल करना या अजाब देना— यह इख़्तियार (अधिकारक्षेत्र) सिर्फ़ अल्लाह का है। न तो नबी और न ही कोई और, ये फ़ैसला कर सकता है किसे नजात मिलेगी और किसे नहीं। ये पूरी तरह अल्लाह के डोमेन (ज्ञान और अधिकार क्षेत्र) की बात है। 

 

और अगली आयत में यह बात और वाज़ेह कर दी:


और अल्लाह ही के इख़्तियार में है जो कुछ आसमान में है और जो कुछ ज़मीन में है। वह जिसे चाहे बख़्श दे और जिसे चाहे अज़ाब दे और अल्लाह ग़फ़ूर व रहीम है।[3: 129]


व-लिल्लाहि मा फ़िस्समावाति व-मा फिल अर्ज़, यग़फ़िरु लिमन यशाउ व युअज़्ज़िबु मन यशाउ, वल्लाहु ग़फ़ूरुर रहीम। (3: 129) 

 

ये आयात दावत की हिकमत,अल्लाह की हाकिमिय्यत और उसकी बेपनाह रहमत को बेहतरीन अंदाज़ में सामने लाती है। 

 

इन आयात के ज़रिए अल्लाह तआला यह समझाते हैं कि पूरे कायनात का मालिक और हर फ़ैसले का हाकिम सिर्फ़ वही है। इसलिए किसी इंसान को यह हक़ नहीं कि वह किसी और के बारे में ये कहे कि "ये जहन्नमी है" या "वो जन्नती है"। ये सिर्फ़ और सिर्फ़ अल्लाह के डोमेन की बात है — और वही ग़फूर है, वही रहीम है। 

 

यह आयत हक़ की दावत देने वालों को सिखाती है कि उनका काम बस अल्लाह का पैग़ाम लोगों तक पहुँचा देना है — हिदायत देना, किसी की तौबा क़बूल करना या सज़ा देना — यह सब अल्लाह के इख़्तियार (Domain) में है। 

 

इसलिए दा'ई को चाहिए कि वह अल्लाह पर भरोसा रखें और यह यक़ीन करे कि कुल अख़्तियार और हर फ़ैसला उसी ज़ात का है, जो ज़मीन और आसमान की हर चीज़ पर क़ुदरत रखता है, जो बार-बार माफ़ करने वाला और बे-इंतिहा रहमत का मालिक है।


Note: क़ुरआन मुताला पर एक दा’ई के बयान का सारांश। 





ये आयतें उहुद की जंग (3 हिजरी) के बाद नाज़िल हुईं। उहुद की जंग में दुश्मनों की तादात तीन हज़ार थी। मुसलमानों की तरफ़ से एक हज़ार आदमी मुक़ाबले के लिए निकले थे। मगर रास्ते में अब्दुल्लाह बिन उबइ अपने तीन सौ साथियों को लेकर अलग हो गया । 

इस वाक़ये से कुछ अंसारी (मूल मदीना वासी) मुसलमानों में पस्त हिम्मती पैदा हो गयी मगर अल्लाह के रसूल मुहम्मद (सल्ल०) ने याद दिलाया कि हम अपने भरोसे पर नहीं बल्कि अल्लाह के भरोसे पर निकले हैं। तो अल्लाह ने इस हक़ीक़त को समझने के लिए इन मुसलमानों के सीने खोल दिये ।

 

मोमिन के अंदर अगर हालात की शिद्दत से वक़्ती कमज़ोरी पैदा हो जाए तो ऐसे वक़्त में अल्लाह उसे तंहा छोड़ नहीं देता बल्कि उसका मददगार बनकर दुबारा उसे ईमान की हालत पर जमा देता है ।

 

अल्लाह की यही मदद इज्तिमाई (सामूहिक) सतह पर इस तरह हुई कि उहुद की लड़ाई में मुसलमानों की एक कमज़ोरी से फ़ायदा उठा कर दुश्मन उनके ऊपर ग़ालिब आ गये।

अब दुश्मन फ़ौज के लिए पूरा मौक़ा था कि वह शिकस्त के बाद मुसलमानों की ताक़त को पूरी तरह कुचल डालें। मगर फ़ौजी तारीख़ का यह हैरतअंगेज़ वाक़या है कि दुश्मन फ़ौज फ़तह के बावजूद जंग का मैदान छोड़कर वापस चली गई।

 

यह अल्लाह की ख़ुसूसी मदद थी कि उसने दुश्मन के रुख़ को ‘मदीना’ के बजाए ‘मक्का’ की तरफ़ मोड़ दिया। यहां तक कि जो मग़लूब (परास्त) थे उन्हीं ने ग़ालिब आने वालों का पीछा किया।

 

मोमिन का मिज़ाज यह होना चाहिए कि वह तादाद या असबाब (संसाधनों) की कमी से न घबराए ।

 

तादाद कम हो तो यक़ीन करे कि अल्लाह अपने फ़रिश्तों को भेजकर तादाद की कमी पूरी कर देगा ।

 

सामान कम हो तो वह भरोसा रखे कि अल्लाह अपनी तरफ़ से ऐसी सूरतें पैदा करेगा जो उसके लिए सामान की कमी की तलाफ़ी बन जाए ।

 

कामयाबी का दारोमदार माद्दी असबाब पर नहीं बल्कि सब्र और तक़वा पर है ।

 

जो लोग अल्लाह से डरें और अल्लाह पर भरोसा रखें उनके हक़ में अल्लाह की मदद की दो सूरतें हैं । एकउनके विरोधियों के एक हिस्से को काट लेना । दूसरेविरोधियों को शिकस्त दे कर उन्हें परास्त करना ।

 

पहली कामयाबी दावत की राह से आती है। प्रतिपक्ष के जिन लोगों में अल्लाह कुछ ज़िंदगी पाता है उनके ऊपर दीन की सच्चाई को रोशन कर देता हैवे बातिल (असत्य) की सफ़ को छोड़कर हक़ की सफ़ में शामिल हो जाते हैं और इस तरह प्रतिपक्ष की कमज़ोरी और अहले ईमान की क़ुव्वत का सबब बनते हैं ।

 

दूसरी सूरत में अल्लाह अहले ईमान को क़ुव्वत और हौसला देता है और उनकी ख़ुसूसी मदद करके उन्हें प्रतिपक्ष पर ग़ालिब कर देता है।

 



और  पढ़ें →




Post a Comment

Previous Post Next Post