सूरह : आले-इमरान | 118 – 120

क़ुरआन की आयात पर ग़ौर-ओ-फ़िक्र

सूरह: आल-ए-इमरान || 118 – 120




[3: 118]: ऐ ईमान वालो, अपने ग़ैर को अपना राज़दार न बनाओ, वे तुम्हें नुक़्सान पहुंचाने में कोई कमी नहीं करते। उन्हें ख़ुशी होती है तुम जितनी तकलीफ़ पाओ। उनकी अदावत उनकी ज़बान से निकल पड़ती है जो उनके दिलों में है वह इससे भी सख़्त है, हमने तुम्हारे लिए निशानियां खोल कर ज़ाहिर कर दीं हैं अगर तुम अक़्ल रखते हो।


[3: 119]: तुम उनसे मुहब्बत रखते हो मगर वे तुमसे मुहब्बत नहीं रखते। हालांकि तुम सब आसमानी किताबों को मानते हो। और वे जब तुमसे मिलते हैं तो कहते हैं कि हम ईमान लाए और जब आपस में मिलते हैं तो तुम पर ग़ुस्से से उंगलियां काटते हैं। कहो कि तुम अपने ग़ुस्से में मर जाओ। बेशक अल्लाह दिलों की बात को जानता है।


[3: 120]: अगर तुम्हें कोई अच्छी हालत पेश आती है तो उन्हें रंज होता है और अगर तुम पर कोई मुसीबत आती है तो वे इससे ख़ुश होते हैं। अगर तुम सब्र करो और अल्लाह से डरो तो उनकी कोई तदबीर तुम्हें कोई नुक़्सान न पहुंचा सकेगी। जो कुछ वे कर रहे हैं सब अल्लाह के बस में है।






क़ुरआन  को समझने का एक उसूल यह है कि कुछ आयतों को "दावत के मिशन" के हवाले से समझा जाना चाहिए।

 

अब उस समय की परिस्थिति को समझें जब रसूलुल्लाह (सल्ल) के वक़्त में दीन की दावत की एक जद्दोजहद शुरू हुई है। आपके साथ सहाबा की एक छोटी-सी जमाअत जमा हो गईजो दिन-रात इस कोशिश में लगे हुए हैं कि अल्लाह का यह दीन हर दिल तक कैसे पहुंचे।

लेकिन इस मिशन को रोकने के लिए कई गिरोह — कुछ यहूदी और ईसाई (अहले-किताब), मुशरिकीन और उन मुशरिकीन गिरोहों में कुछ ऐसे जो आक्रमक क़िस्म के इंकारी हैंऔर मुनाफ़िक़ीन (दिखावटी मुसलमान) जिनके दिलों में निफ़ाक़ (दुश्मनी,मुनाफिक़त) छुपा हुआ है। ये सभी नबी (सल्ल०) और सहाबा की कोशिशों को नाकाम करने के लिए साज़िशें कर रहे हैं।

 

मुसलमान उसी अस्ल ख़ुदाई दीन पर ईमान लाए थेजो पहले के नबियों के ज़रिए अहले-किताब (यहूद) को मिला था। 

असल हक़ीक़त के लिहाज़ से दोनों का दीन एक थालेकिन यहूदी मुसलमानों के इतने दुश्मन बन गए कि मुसलमान अपनी सारी अच्छाइयों के बावजूद उनकी नज़र में इंसानी हमदर्दी के भी हक़दार न रहे। इसकी वजह यह थी कि यहूदियों ने अपने नबियों के नाम पर एक मनगढ़ंत दीन बना लिया थाजिसके ज़रिए वे लोगों पर क़यादत (नेतृत्व) और बड़प्पन का मक़ाम हासिल किए हुए थे।

 

अल्लाह के दीन में सारी तवज्जोह सिर्फ़ अल्लाह की तरफ़ होती हैजबकि ख़ुदसाख़्ता (बनावटी) दीन में लोगों की तवज्जोह उन शख़्सियतों की तरफ़ हो जाती हैजिन्होंने उसे गढ़ा। ऐसे लोग सच्चे दीन को इसलिए बर्दाश्त नहीं कर पातेक्योंकि उन्हें नज़र आता है कि सच्चा दीन उन्हें उनके अज़्मत (महानता) के मक़ाम से हटा रही है।    

ऐसे हालात में मुसलमान अपनी सादगी और फ़ितरत पर होने की वजह से सबके सामने अपने दावती योजनाएं खुलकर बता देते थे। इससे मिशन को नुक़्सान पहुँचाने वाले लोग इन बातों का फ़ायदा उठाकर नुक़्सान पहुँचाने की कोशिश करते।

 

मुहम्मद रसूलुल्लाह (सल्ल.) सिर्फ़ एक दाई (दावत देने वाले) नहीं थे। आपने फ़रमाया था, "मैं सिर्फ़  दाई नहींबल्कि माहि भी हूँ।" यानी आप सिर्फ़ दीन का पैग़ाम लेकर नहीं आएबल्कि पूरा सिस्टम को इस तरह बरपा करने वाले हैं कि दीन का इक्माल (पूरा करना) या इस्तेहकाम (स्थायित्व व मज़बूती) हमेशा के लिए क़ायम हो जाए. इस मिशन में सहाबा पूरी ताक़त और वफ़ादारी से आपके साथ थे। और ऐसे वक़्त में जो पेचीदगियाँआस-पास के हालात और माहौल में थीं वो भी बिल्कुल साफ़ नज़र आ रही हैं.





ऐ ईमान वालोंअपने ग़ैर को अपना राज़दार न बनाओवे तुम्हें नुक़्सान पहुंचाने में कोई कमी नहीं करते। उन्हें ख़ुशी होती है तुम जितनी तकलीफ़ पाओ। उनकी अदावत उनकी ज़बान से निकल पड़ती है जो उनके दिलों में है वह इससे भी सख़्त हैहमने तुम्हारे लिए निशानियां खोल कर ज़ाहिर कर दीं हैं अगर तुम अक़्ल रखते हो। [3: 118] 




अब इस आयत को अगर हम दावती मिशन के नज़रिए से देखेंतो अल्लाह तआलारसूलुल्लाह (सल्ल०) और उनकी जमात को हिदायत दे रहे हैं — कि आप लोग जान लें कि किस तरह का काम किया जा रहा है,  लोग इस मिशन के बारे में किस अंदाज़ में सोच रहे हैंऔर दावती मिशन के काम को अंजाम देते वक़्त किस तरह की एहतियात (सावधानी) बरतने की ज़रूरत है। 


अल्लाह तआला ने हिदायत दी कि अपनी स्ट्रेटेजी (strategy) और अहम बातों को ऐसे लोगों के सामने ज़ाहिर न करें जो मोमिनीन (विश्वासपात्र मुसलमानों) में से नहीं हैं। ये लोगजो सच्चाई के रास्ते में रुकावट डालने और इस मिशन को ख़त्म करने की कोशिश कर रहे हैंवे तुम्हें नुक़्सान पहुंचाने का कोई भी मौक़ा हाथ से नहीं जाने देंगे। 


यह आयत सिर्फ़ इतना ही नहीं कह रही कि “अपने लोगों को छोड़ कर”  किसी को अपना राज़दार (confidential person) न बनाओबल्कि उन लोगों की नफ़्सियात (साइकोलॉजी) को भी खोलकर बता रही हैजो मिशन को तबाह करने की कोशिश में हैं। 


इन गिरोहों की चार ख़ास ख़सलतें (स्वभाव) ये बताई गई हैं: 


1. वे मोमिनीन को नुक़्सान पहुँचाने में कोई कसर नहीं छोड़ते।


2. मोमिनीन को जितनी ज़्यादा तकलीफ़ होती है उतनी ज्यादा उन्हें ख़ुशी होती है।


3. उनके दिलों में जो दुश्मनी हैवह इतनी ज़्यादा होती है कि वह बार-बार उनकी   ज़बान से निकल पड़ती है।


4. उनके दिलों में ज़ुबान से भी ज़्यादा तीखा ज़हर छुपा होता है। 

 

"यानी यह कोई मामूली दुश्मनी नहीं हैबल्कि एक ऐसी छुपी हुई दुश्मनी है जो पूरी दावत के मिशन को नुक़सान पहुँचा सकती है। इसीलिए अल्लाह तआला ने ये बातें बिल्कुल साफ़-साफ़ निशानी में ज़ाहिर कर दी — ताकि जो लोग अक़्ल रखते हैंयानी मोमिनीन (विश्वासपात्र मुसलमान) समझ जाएँ और सावधान हो जाएँ।"







[3: 119]: तुम उनसे मुहब्बत रखते हो मगर वे तुमसे मुहब्बत नहीं रखते। हालांकि तुम सब आसमानी किताबों को मानते हो। और वे जब तुमसे मिलते हैं तो कहते हैं कि हम ईमान लाए और जब आपस में मिलते हैं तो तुम पर ग़ुस्से से उंगलियां काटते हैं। कहो कि तुम अपने ग़ुस्से में मर जाओ। बेशक अल्लाह दिलों की बात को जानता है।




इस आयत में अल्लाह तआला ने मोमिनीन और उनके मुख़ालिफ़ लोगों की मानसिकता (साइकोलॉजी) को बहुत गहराई से बयान किया है।  सबसे पहले मोमिनीन की नफ़्सियात पर रौशनी डाली गई है।

अल्लाह तआला फ़रमाते हैं:


हा-अंतुम उलाई तुहिब्बूनहुम

यानी - "तुम ही तो हो जो उनसे मोहब्बत करते हो"


यह जुमला मोमिन के दिल की उस पाकीज़गी को उजागर करता है जिसमें नफ़रत और दुश्मनी की कोई जगह नहीं होती। एक सच्चा मोमिन रहमत और अद्ल (इंसाफ़) का मिसाल बन जाता हैक्योंकि वह रब्ब-उल-आलमीन के अख़्लाक़ को अपनाता है। 

 

मौलाना ने अपनी तज़कीर (तज़किरुल क़ुरआन) में इस आयत के हवाले से एक अहम बात बयान की — वह लिखते हैं:

 

“अल्लाह सरापा रहम और अद्ल है । वह तमाम इंसानों का ख़ालिक़ और मालिक है इसलिए जो शख़्स हक़ीक़ी तौर पर अल्लाह को पा लेता है उसका सीना अल्लाह के तमाम बंदों के लिए खुल जाता है । उसके लिए तमाम इंसान समान रूप से अल्लाह की संतान बन जाते हैं । वह हर एक के लिए वही चाहने लगता है जो वह ख़ुद अपने लिए चाहता है।” 

 

क़ुरआन इस हक़ीक़त को इस अन्दाज़ में बयान करता है:


"सिबग़तल्लाह! व-मन अह्सनु मिनल्लाहि सिबग़ह"


हमने लिया अल्लाह का रंग और अल्लाह के रंग से किसका रंग अच्छा है”

(क़ुरआन2:138)

 

यहाँ "अल्लाह का रंग" से मुराद अल्लाह के उसूल और अख़्लाक हैं।

 

इस तरह इंसान जब अल्लाह के अख़्लाक को अपने अंदर जगह देता हैतो उसका मिज़ाज मोहब्बत और इंसाफ़ से भर जाता है और वह हर चीज़ को ता'अस्सुब (पक्षपात) से दूर होकर हक़ीक़त की बुनियाद पर सोचने लगता है। उसकी सोचउसका रवैयाऔर उसके दिल की कैफ़ियत सब कुछ बदल जाता है।

 

यही वह नफ़्सियात (मानसिकता) है जो मोमिनीन को उनके विरोधियों से अलग करती है —विरोधियों के दिलों में जहां दुश्मनी और नफ़रत की आग सुलग रही होती हैवहीं मोमिनीन का दिल रहमतमोहब्बत और इंसाफ़ से भरा होता है।

 

यही आयत [3:119] मोमिनीन और अहले-किताब के बीचमानसिकता के इस अंतर को भी उजागर करती है — 


"व-तु'मिनूना बिल-किताबि कुल्लिही"


यानी "तुम वो लोग हो जो तमाम आसमानी किताबों पर ईमान रखते हो।"

 

इसका मतलब है कि मोमिन सिर्फ़ क़ुरआन ही नहींबल्कि तौरातइंजील और पहले की आसमानी किताबों को भी अल्लाह की तरफ़ से मानते हैं। 


लेकिन अहले-किताब का व्यवहार बिल्कुल अलग है। वे जब मोमिनीन से मिलते हैंतो कहते हैं "आमन्ना"यहाँ बयान करने का उस्लूब इस तरह से झलकता - "हम भी तो ईमान वाले हैंहम भी अल्लाह की किताब को मानते हैं।" मगर यह सिर्फ़ दिखावा होता हैदिल से वे सच्चे ईमान वाले नहीं होते वे बस अपनी ही किताब को मानते हैं और अल्लाह की बाक़ी हिदायतों को नहीं मानते। 

 

उनका असली चरित्र तब सामने आता है जब वे तन्हाई में अपने लोगों के साथ होते हैं —उस वक़्त मोमिनीन और उनके दावती मिशन के ख़िलाफ़ उनका दिल हसद और ग़ुस्से से जल रहा होता है। 


अल्लाह तआला ने उनके इस हाल को यूं बयान किया कि वे “तुम पर ग़ुस्से से उंगलियां काटते हैं।” 

यानी उनका ग़ुस्सा इतनी शिद्दत का होता है कि वे ख़ुद को ही नुक़सान पहुँचाते हैं। 


आख़िर में अल्लाह तआला ने साफ़ कर दिया :


इन्नल्लाहा अलीमुम बि ज़ातिस्सुदूर 


बेशक अल्लाह सीने की पोशीदा बातों को जानता है।


चाहे ये लोग कितना भी अच्छा दिखावा क्यों न करें अल्लाह उनके दिलों में छुपी नफ़रतदुश्मनी और छुपे इरादों को पूरी तरह जानता है।





[3: 120]: अगर तुम्हें कोई अच्छी हालत पेश आती है तो उन्हें रंज होता है और अगर तुम पर कोई मुसीबत आती है तो वे इससे ख़ुश होते हैं। अगर तुम सब्र करो और अल्लाह से डरो तो उनकी कोई तदबीर तुम्हें कोई नुक़्सान न पहुंचा सकेगी। जो कुछ वे कर रहे हैं सब अल्लाह के बस में है।




सूरह आल-ए-इमरान की इस आयत [3:120] में अल्लाह तआला, मोमिनीन और दावती मिशन के मुख़ालिफ़ लोगों की एक और बड़ी ख़सलत (स्वभाव, किरदार) को बता रहे हैं —

 

ये लोग इतने तंगदिल हैं कि अगर मोमिनीन को ज़रा-सी भलाई मिले या उनपर कोई अच्छी हालत पेश आ जाएतो वे दुखी और मायूस हो जाते हैं। लेकिन अगर कोई मुसीबत आएतो वे ख़ुश हो जाते हैं।


उनकी यह प्रतिक्रिया कोई साधारण ईर्ष्या नहींबल्कि एक गहरी मानसिक विकृति (ख़राबी) को दर्शाती है।

 

अल्लाह ने इस तरह के लोगों के पूरे किरदार (character) को साफ़-साफ़ खोलकर बयान कर दिया हैताकि हमें समझ आ जाए कि दावती मिशन के रास्ते में किस तरह के लोग सामने आएंगेऔर हमें उनके मुक़ाबले में क्या रवैया अपनाना है।

 

इसके बाद अल्लाह तआला हमें हिदायत (गाइडेंस) दे रहे हैंयानी जब ऐसी सूरत पेश आए उस वक़्त अल्लाह के सच्चे बंदों को क्या करना है –


"इंतसबिरू व तत्तक़ू" — 


यानीसब्र करो और तक़वा की राह पर क़ायम रहो।


यही है क़ुरआन का अंदाज़ — पहले हक़ीक़त को सामने लानाफिर सही रास्ता दिखाना।

 

यही वह ज़बरदस्त बात है जो अल्लाह के कलाम को अलग बनाती है — उस किताब को जिसे अल्लाह ने "हुदल-लिलमुत्तक़ीन" (मुत्तक़ी के लिए हिदायत) कहा है।  

 


मौलाना ने इस हिदायत (तुम सब्र करो और अल्लाह से डरो) की बहुत सुंदर तशरीह की है वे लिखते हैं कि –


मनफ़ी रद्देअमल (नकारात्मक प्रतिक्रिया) से बचें और मुकम्मल तौर पर सब्र व तक़वा पर क़ायम रहें.


सब्र का मतलब है  हर हालत में अपने आप को हक़ (सत्य के मार्ग) का पाबंद रखनायानी हालात कितने भी मुश्किल होंतुम अपने क़दम डगमगाने न दो।


और तक्वा का मतलब है — 

फ़ैसलाकुन ताक़त सिर्फ़ अल्लाह को समझा जाएकिसी और को नहीं। 


विरोधी चाहे जितनी भी दुश्मनी करेंजितनी भी चालें चलेंलेकिन होगा वही जो अल्लाह चाहेगा। 


अल्लाह तआला हमारे साथ जो भी मामला करेगा हम उस पर राज़ी हैंहम सब्र से अपने आप को हक़ का पाबंद बनाए रखेंगेहम ये यक़ीन रखेंगे कि जो भी फ़ैसला होगा वह अल्लाह की ज़ात ही करेगी उसके इलावा कोई नहीं.

 


जब एक इंसान इस सच्चाई को समझ लेता हैतो उसकी सोच ऊँचे मुकाम पर पहुँच जाती है। इस हालत में अल्लाह तआला हमें यक़ीन दिलाते हैं कि अगर तुम मुस्बत (सकारात्मक) रवैये का सुबूत देते हुए इस हिदायत (सब्र और तक़वा) पर क़ायम रहोतो कोई भी साज़िश या चाल मोमिनीन की जमात और दावती मिशन को नुक़सान नहीं पहुंचा सकती। क्योंकि अल्लाह तआला हर चीज़ को अपने घेरे में लिए हुए हैइंसान का हर अमल उसके इल्म और क़ुदरत में हैऔर वह जब चाहेसारी चालें पलट सकता है।

 


यह आयत मोमिनीन और दावती मिशन से जुड़े लोगों के लिए बहुत बड़ी रहनुमाई हैक्योंकि यह मुहम्मद रसूलुल्लाह (सल्ल०) और उनके सहाबा के सामने आए हालात को बयान करती है,जब दुश्मनी करने वाले कई गिरोह उनके सामने आ खड़े हुए थे।

 

क़ुरआन ने इनके किरदार को खोल कर ज़ाहिर कर दियाताकि दावती मिशन पर काम करने वाले यह समझ लें कि ऐसे हालात में उन्हें कौन-सा रवैया अपनाना है।

 

मुहम्मद रसूलुल्लाह (सल्ल०) की इता'अत (क़ुरआन, 33:21) में, यह आयत हमें सिखाती है कि इस उम्मत को जब भी इस तरह के हालात पेश आएंतो बिना घबराए मुकम्मल तौर पर सब्र और तक़वा की राह पर क़ायम हो जाना है।




क़ुरआन | 33: 21

तुम्हारे लिए अल्लाह के रसूल में बेहतरीन नमूना थाउस शख़्स के लिए जो अल्लाह का और आख़िरत के दिन का उम्मीदवार हो और कसरत से अल्लाह को याद करे।



Note: क़ुरआन मुताला पर एक दा’ई के बयान का सारांश। 

 



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