सूरह: आल-ए-इमरान | 59 – 63

 

 क़ुरआन की आयात पर ग़ौर-ओ-फ़िक्र

सूरह: आल-ए-इमरान | 59 – 63



[3: 59]: बेशक ईसा की मिसाल अल्लाह के नज़दीक आदम की-सी है। अल्लाह ने उसे मिट्टी से बनाया। फिर उसको कहा कि हो जा तो वह हो गया।


[3: 60]: हक़ बात है तेरे रब की तरफ़ से। पस तुम न हो शक करने वालों में।


[3: 61]: फिर जो तुमसे इस बारे में हुज्जत करे बाद इसके कि तुम्हारे पास इल्म आ चुका है तो उनसे कहो कि आओ, हम बुलाएं अपने बेटों को और तुम्हारे बेटों को, अपनी औरतों को और तुम्हारी औरतों को। और हम और तुम ख़ुद भी जमा हों। फिर हम मिलकर दुआ करें कि जो झूठा हो उस पर अल्लाह की लानत हो।


[3: 62]: बेशक यह सच्चा बयान है। और अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं और अल्लाह ही ज़बरदस्त है, हिक्मत वाला है।


[3: 63]: फिर अगर वे क़ुबूल न करें तो अल्लाह फसाद करने वालों को जानता है।



हमलोग सूरह आल-ए-इमरान की जिन आयात का मुतआला कर रहे हैं, यह बहुत अहम है. अगर हम इस पर गहराई से विचार करें, तो बहुत सारी गुत्थियाँ इसमें सुलझ जाती हैं. और वो गुत्थियाँ वही हैं जो अभी-अभी हमारे भाइयों के सवाल के रूप में हमारे सामने आईं हैं. इसलिए, आयात के मुताले के साथ-साथ मैं इन सवालों का हल भी देने की कोशिश करूंगा। 

 


इन आयात का जो पस-मंज़र (context) है, उससे हमलोग पहले से ही अच्छी तरह वाक़िफ़ हैं।

 

क़ुरआन में यह साफ़ तौर पर देखा जा सकता है कि अल्लाह तआला ने ईसा अलैहिस्सलाम की पैदाइश एक असाधारण तरीक़े से की। अल्लाह ने उन्हें बिना बाप के पैदा किया। लेकिन कुछ लोगों ने इस असाधारण पैदाइश का ग़लत मतलब निकाला और ईसा अलैहिस्सलाम में ख़ुदाई (divinity) तलाश कर ली। उनका मानना था कि ईसा अलैहिस्सलाम अल्लाह के बेटे हैं, और अगर वह बेटे हैं, तो वह “डिवाइन” यानी ख़ुदा का हिस्सा भी हैं, और इस प्रकार वे ख़ुदा का हिस्सा बनकर ख़ुद God (ख़ुदा) हो जाते हैं।   

 


इस तरह, ईसा अलैहिस्सलाम के फ़ौरन बाद ही “डिविनिटी” यानी ईसा को ख़ुदा का हिस्सा मानने का मामला उठ खड़ा हुआ, उस वक़्त जब सेंट पॉल ने इस सोच को बहुत ज़्यादा बढ़ावा दिया और विस्तार से समझाया।

 

यह पूरी कहानी जो आज मानी जाती है, असल में वही सेंट पॉल का बनाया हुआ नैरेटिव है, जिसने ईसा अलैहिसलाम की असाधारण पैदाइश को “ख़ुदाई” का सबूत बताने की कोशिश की। 



यहाँ एक बेहद अहम बात समझनी है, जिसे हमें हमेशा ध्यान में रखना चाहिए।

 

अल्लाह का असली मज़हब वही होता है जिसे “रिवील्ड मज़हब” कहते हैं, यानी जो सीधे अल्लाह की ओर से उतारा गया हो। इसकी सबसे बड़ी पहचान और विशेषता यह है कि उसमें अल्लाह की बातें (पैग़ाम) लोगों तक या तो वहि के ज़रिए या फिर किताब (रिवील्ड टेक्स्ट) की शक्ल में पहुंचाई जाती हैं।

 

अगर उस रिवील्ड मज़हब के मतन (असली टेक्स्ट) को महफूज़ (सुरक्षित) रखा जाए, तो वह मतन इंसान के लिए हिदायत (मार्गदर्शन) का सबसे भरोसेमंद ज़रिया बन जाता है और इंसान उससे सही रास्ता पा सकता है। लेकिन अगर उस मतन (असली टेक्स्ट) की हिफ़ाज़त न की जाए और उसमें बदलाव हो जाए, तो फिर हिदायत की जगह गुमराही (भटकाव) फैल जाती है।

 

पिछली आसमानी किताबों के साथ यही हुआ।

 

अल्लाह तआला ने क़ुरआन से पहले के रिवील्ड टेक्स्ट (revealed text) की हिफाज़त की ज़िम्मेदारी पिछली क़ौमों पर छोड़ी थी, लेकिन उन क़ौमों ने अपनी इस ज़िम्मेदारी को नहीं निभाया, उन्होंने अपनी सोच-समझ, अपनी व्याख्याएँ और अपने बयानिया (narratives) को अल्लाह की वहि (revealed text) के साथ मिला दिया। नतीजा यह हुआ कि असली रिवील्ड टेक्स्ट में घालमेल हो गया।

  

 

ऐसी प्रक्रिया के बाद जो बयानिया (नैरेटिव) तैयार होता है उसी नैरेटिव को लोग समझ लेते हैं कि यही अस्ल दीन है। ख़ुदा के दीन को ख़ुदा का दीन समझते हुए भी, लोग उस इंसानी बयानिया और व्याख्याओं को वही दर्जा देने लगते हैं, जो ख़ुदाई मतन (असली रिवील्ड टेक्स्ट) का दर्जा होता है। और यही गुमराही का कारण बन जाता है।





उन्होंने जो अपना नैरेटिव बनाया, उसे ही ख़ुदाई दीन और ख़ुदाई मतन (असली रिवील्ड पैग़ाम) की तरह पेश कर दिया। मैं यह इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि जिस आयत का हम अध्ययन कर रहे हैं, उसमें यह बात स्पष्ट रूप से मौजूद है।

 

आयत में कहा गया है: 


“बेशक ईसा की मिसाल अल्लाह के नज़दीक आदम की-सी है।” [3: 59] 


inna mathala isa inda al-lahi kamathali adama” [3: 59] 


 

अब सोचने की बात यह है कि अगर आयत में inda al-lahi” ("अल्लाह के नज़दीक") का लफ्ज़ हटा दिया जाए और सिर्फ़ इतना कहा जाए— 


बेशक ईसा की मिसाल आदम की-सी है। 

inna mathala isa kamathali adama 



तो भी मतलब वही निकलता है। यानी बात वही पहुँचती है जो कहा जा रहा है। 

 


लेकिन सवाल यह है कि अल्लाह ने inda al-lahi” (अल्लाह के नज़दीक) का ज़िक्र क्यों रखा?  यह बहुत ग़ौरतलब बात है। 


 

इसका मतलब यह है कि दीन के किसी मसले को समझते वक़्त यह देखना ज़रूरी है कि “अल्लाह के नज़दीक” उस मामले की हक़ीक़त  क्या है, अल्लाह के रिवील्ड टेक्स्ट में वो मामला क्या है, ये नहीं देखा जाएगा कि इंसानी “नैरेटिव्स” क्या कहते हैं। 

 

इसीलिए आयत में ईसा अलैहिस्सलाम के बारे में यह साफ़ किया गया कि — 


“अल्लाह के नज़दीक”, ईसा की मिसाल आदम की-सी है।  

 



हमें अपना नज़रिया बदलना होगा। अक्सर लोग अपने उलमा, पेशवाओं और रहनुमाओं को दीन का असली स्रोत मानकर उनके बनाए नैरेटिव को ही "असल दीन" समझने लगते हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि इंसानी नैरेटिव्स कभी भी अल्लाह का असल दीन नहीं हो सकता। 

 

असल दीन वही है जो अल्लाह के पास से आया है, यानी जो अल्लाह ने वहि (revelation) किया है, यानी जो इन्दल्लाह (अल्लाह के नज़दीक) है और इन्दल्लाह होने का मतलब है यह है कि जो संरक्षित मतन (protected text) है, जिसपर रख कर हर मसले को जांचा जाएगा कि उस मामले की वास्तविक हक़ीक़त क्या है। 

 

यह एक बेहद महत्वपूर्ण बात है जो मुझे समझ में आई है। 

 


इस मिशन के लोगों के लिए यह एक बड़ी खुशखबरी है, क्योंकि इस मिशन में मौलाना ने इसी बात को समझाया है कि असल दीन वही है जो क़ुरआन और सुन्नत में मौजूद है। बाक़ी जो नैरेटिव्स हैं उन्हें क़ुरआन और सुन्नत की कसौटी पर परखा जाएगा। अगर वे नैरेटिव्स क़ुरआन और सुन्नत के मुताबिक़ हैं, तो उन्हें स्वीकार किया जाएगा, लेकिन अगर वे उनसे टकराते हैं, या मेल नहीं खाते, तो उसे हमलोग रद्द कर देंगे, उसपर हम अमल करने के लिए बिलकुल मज़बूर नहीं होंगे





दूसरी बात जो मैं बताना चाहता हूँ, वह यह है कि जो तर्क (लॉजिक) दिया जा रहा है, उसका बैकग्राउंड क्या है।

 

लोगों का मानना था कि ईसा अलैहिस्सलाम बिना बाप के 'सुपरनेचुरल' तरीक़े से पैदा हुए थे। इससे लोग सवाल उठाते थे—बिना बाप के किसी इंसान का जन्म कैसे संभव है

साथ ही, अल्लाह ने उन्हें "कलिमुतल्लाह" कहा और यह भी बताया कि "मैंने अपनी रूह में से फूंका।"

 

इन बातों को देखकर उन्होंने ख़ुद तर्क तैयार किया। पहले उन्होंने आधार (premise) तय किया, फिर argument बनाया और लॉजिक के आधार पर यह नतीजा निकाला कि ईसा अलैहिस्सलाम अल्लाह के बेटे हैं।

 


यह पूरी प्रक्रिया तार्किक (logical) थी, लेकिन इंसानी समझ पर आधारित थी, न कि अल्लाह की वहि (revelation) पर ।

यह लॉजिक उनके हिसाब से सही लग रहा था, क्योंकि उनका आधार ठीक था और लॉजिक भी वैध (valid) था।

 

लेकिन अल्लाह ने इसी लॉजिक को बहुत सादे और स्पष्ट तरीक़े से रद्द कर दिया।

 

अल्लाह ने उसी भाषा में उन्हें जवाब दिया:

 

“बेशक ईसा की मिसाल अल्लाह के नज़दीक आदम की-सी है। अल्लाह ने उसे मिट्टी से बनाया। फिर उसको कहा कि हो जा तो वह हो गया।” [3: 59]

 

यानी—अगर बग़ैर बाप के जन्म लेना ईसा अलैहिस्सलाम को ख़ुदा का बेटा बनाता है, तो फिर आदम अलैहिस्सलाम के बारे में तुम क्या कहोगे, जिनका न तो बाप था और न ही माँ ?

 

सोचो—अगर तुम आदम अलैहिस्सलाम को अल्लाह का बेटा नहीं मानते, तो उसी लॉजिक के आधार पर ईसा अलैहिस्सलाम को अल्लाह का बेटा कैसे मान सकते हो ?

 

 

अल्लाह तआला ने बस इस एक लाइन से उनके उस लॉजिक को ढहा दिया :


“बेशक ईसा की मिसाल अल्लाह के नज़दीक आदम की-सी है।”




 


अब आगे अल्लाह तआला ने जो हिदायत दी है उस पर ग़ौर करें :

 

"हक़ बात है तेरे रब की तरफ़ से। इसलिए तुम न हो शक करने वालों में।"[3: 60]

 

इस आयत से जो सबसे बड़ी हिदायत मिल रही है, वह यह है कि हक़ बात इंसानी नैरेटिव्स से नहीं, बल्कि सिर्फ़ अल्लाह की तरफ़ से ही मिलती है।  असल हक़ीक़त तक रसाई (पहुँच) सिर्फ़ रब के ज़रिये ही हासिल हो सकती है।  इंसान अपनी अक़्ली दलील के ज़रिये सिर्फ़ आधीअधूरी समझ तक पंहुच सकता है।

 

यही वजह है कि अल्लाह तआला ने “वहि” (revelation) को इंसानों के लिए उतारा। “वहि” हमारी फ़ितरत को जगाती है, हमारे अंदर छुपी हुई सच्चाई को बाहर लाती है और हमारी उलझनों को सुलझाती है।

 

इसलिए अक़ल के ज़रिया जो इल्म हासिल होगी, उसकी तुलना में “वहि” के ज़रिये मिलने वाली इल्म और हिदायत को हमेशा फ़ौक़ियत (प्राथमिकता) दी जाएगी।     


 

अब आगे जो बात है वो ये है कि "जब हक़ रब की तरफ़ से आए तो तुम न हो शक करने वालों में।"    


यानी, तुम ख़ुद उसी दीन को मानते हो जो हक़ को सामने लाता है, और जब हक़ तुम्हारे सामने रिवील्ड हो के आ जाए और तुम्हारे लॉजिक को वो काट रहा हो और बता रहा हो कि अल्लाह के नज़दीक ईसा का मामला क्या है।  और जब वह तुम्हारी ही उस्लूब में, तुम्हारी अक़्ली दलील और लॉजिक को रद्द कर रहा है तो फिर क्यों इसमें शक करते हो।

 

ये हक़ीक़त है जो अल्लाह तआला ने बता दिया है।   

 

यहाँ ये हिदायत मिल रही है कि हमें अपने ख़ुद के बनाए हुए नैरेटिव और लॉजिक में उलझने के बजाय अल्लाह की “वहि” (revelation) से मिली हक़ीक़त पर भरोसा करना चाहिए।   



 

अब आयत के दूसरे हिस्से की तरफ़ आते हैं:


"फिर जो तुमसे इस बारे में हुज्जत करे बाद इसके कि तुम्हारे पास इल्म आ चुका है तो उनसे कहो कि आओ, हम बुलाएं अपने बेटों को और तुम्हारे बेटों को, अपनी औरतों को और तुम्हारी औरतों को। और हम और तुम ख़ुद भी जमा हों। फिर हम मिलकर दुआ करें कि जो झूठा हो उस पर अल्लाह की लानत हो।" [3: 61]

 

अब जो लोग अल्लाह के रिवील्ड मतन के ज़रिया दीन को नहीं लेना चाहते वो इस बात पर अड़ जाते हैं कि हम तो दीन अपने रहनुमाओं, उलेमा और मशाइख़ (धर्मगुरू) के बनाए हुए नैरेटिव्स से ही लेंगे, चाहे वे ग़लत ही क्यों न हों।

 

तब मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को ये हुक्म दिया जा रहा है कि अगर वे अल्लाह के रिवील्ड मतन को नहीं मानते, तो उन्हें मुबाहिला (एक-दूसरे पर लानत की दुआ) के लिए चैलेंज कीजिए।  

 

यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण बात है जिसे समझना ज़रूरी है।

 

रसूलुल्लाह ने ख़ुद से मुबाहिला की दावत नहीं दी, बल्कि अल्लाह तआला उस मामले पर कह रहा है कि ये लोग जिस लॉजिक से बात कर रहे हैं उसी लॉजिक से रद्द किया जाए, अगर इसके बाद भी वे न मानें, तो फिर अल्लाह का हुक्म है कि आप उनको मुबाहिला के लिए चैलेंज कीजिए और बुलाइए।

 

इसलिए आयत में अलफ़ाज़ हैं –


faqul ta'alaw”बस आप कह दो।

 

यानी यह हुक्म सीधे अल्लाह की तरफ़ से मुहम्मद रसूलुल्लाह (सल्ल०) को दिया गया।

 


यहाँ एक और महत्वपूर्ण बात समझनी है—

मुबाहिला का हुक्म सिर्फ मुहम्मद रसूलुल्लाह को उस समय के लिए दिया गया था । आज के मुसलमान हर जगह मुबाहिला नहीं कर सकते, क्योंकि यह एक ख़ास हुक्म था,जो सिर्फ़ उसी समय और उसी संदर्भ के लिए था।


अगली आयत में अल्लाह तआला कहते हैं :

 

"फमन हज्जका फिही मिन बा’दी मा जाअका मिनल-'इल्म" [3:61] 


यानी - "अगर इसके बाद भी, जबकि तुम्हारे पास इल्म आ चुका है, कोई तुमसे बहस करे," तो बहस (मुनाजरे) की कोई जगह नहीं रह जाती।

 

इल्म आने के बाद हुज्जत (तर्क-वितर्क) की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। अगर फिर भी कोई बहस करे, तो मुनाजरा छोड़कर उन्हें मुबाहिला (दुआ करके सच्चाई पर निर्णय लेने) के लिए बुलाओ।

 

 

इस आयत से स्पष्ट होता है कि यहाँ मुनाजरा का discouragement किया जा रहा है, क्योंकि जब सच्चाई सामने आ चुकी है, तो बहस या मुनाजरा का कोई औचित्य नहीं रह जाता।

 


तारीख़ी तौर पर हमें मालूम है कि जब नबी (सल्ल०) ने इस हुक्म की तामील की और उन्हें मुबाहिले की दावत दी, तो वे लोग पीछे हट गए और राज़ी नहीं हुए।

 

लेकिन इस पूरे सिलसिले से पहले अल्लाह एक बात बता रहा है, वो बात बहुत इम्पोर्टेन्ट है:

"inna hadha lahuwa al-qasasu al-haqu wama min ilahin illa al-lahu,"

 

यहाँ ये जो बात बताई जा रही है जो क़सस (क़िस्सा) सुनाया जा रहा है ये बहुत सच्चा बयान है, यानी जो रिवील्ड मतन (“वहि, क़ुरआन) आपके पास आ रहा है उसकी सच्चाई में कोई शक या संदेह नहीं होना चाहिए।   






यहाँ दूसरी अहम बात यह बताई गई है कि डिविनिटी (ईश्वरत्व) के मामले में इंसान को एक बुनियादी उसूल याद रखना चाहिए।


अल्लाह तआला कहते हैं: 

"wama min ilahin illa al-lahu" 

[3: 62] 

 

यानी "अल्लाह के अलावा कोई 'डिवाइन' (divine) नहीं है।" अगर हम ' इलाहिन' का मतलब 'डिवाइन' समझें, तो ये बात ज़्यादा खुलती हुई नज़र आ रही है कि अल्लाह के सिवा किसी को भी डिविनिटी में शामिल नहीं किया जा सकता।

 


ईसा अलैहिस्सलाम के मामले में भी लोग डिविनिटी तक इसलिए पहुँच जाते हैं क्योंकि वे अल्लाह के बताए हुए रिवील्ड मतन के बजाय इंसानों के बनाए नैरेटिव को अस्ल समझ लेते हैं। यही कारण है कि वे अल्लाह के डिविनिटी में दूसरों को शामिल करना शुरू कर देते हैं। लेकिन अल्लाह ने इस भ्रम को दूर करते हुए साफ़ कहा है कि डिवाइन सिर्फ़ अल्लाह है, इलाहा सिर्फ़ अल्लाह है उसकी डिविनिटी में किसी को भी शरीक नहीं किया जाएगा।

 


फिर यहाँ एक आख़िरी और अहम बात यह है कि अगर लोग मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की दलील को नहीं मानते और मुबाहिले के लिए भी तैयार नहीं होते —

 

"फ-इन तवल्लव" 

(फिर अगर वे क़ुबूल न करें)   [3:63]

 

तो उनका मामला अब अल्लाह के पास आ गया। इसलिए देखिये क़ुरआन में जो आगे अलफ़ाज़ आए हैं वो बहुत इम्पोर्टेन्ट हैं:


fa-inna al-laha alimun bil-muf'sidina


तो अल्लाह फसाद करने वालों को जानता है। [3: 63]

 


अल्लाह ने ये ऐलान नहीं किया कि अगर ये नहीं मानतेक़ुबूल नहीं करते हैं तो यही लोग मुफ़्सिदीन (फ़साद करने वाले) हैं।  मतन के अल्फ़ाज़ पर ध्यान दें—


मतन कह रहा है कि फिर अल्लाह अलीम है मुफ़्सिदीन के बारे में, कौन मुफ़्सिदीन हैं, और कौन मुफ़्सिदीन नहीं हैं इसे अल्लाह बेहतर जानता है।

 

इससे हमलोगों को ये लर्निंग मिलती है कि हमें फ़तवाएक्टिविज़्म से परहेज़ करना चाहिए। मामला अल्लाह के हवाले है, और वही बेहतर जानता है कि कौन सही है और कौन ग़लत ।


Note: क़ुरआन मुताला पर एक दा’ई के बयान का सारांश।



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