क़ुरआन की आयात पर ग़ौर-ओ-फ़िक्र
सूरह: आल-ए-इमरान | 33 – 44
[3: 33]: बेशक अल्लाह ने
आदम को और नूह को और आले इब्राहीम को और आले इमरान को सारे आलम के ऊपर मुंतख़ब किया
है।
[3: 34]: ये एक-दूसरे की
औलाद हैं। और अल्लाह सुनने वाला जानने वाला है।
इन आयात के मुताले में
सबसे पहली बात जो समझ में आती है,
वह है कि यहाँ ह्यूमन
हिस्ट्री के कुछ अहम पड़ाव (milestone)
का जिक्र किया जा रहा है।
जैसे आदम अलैहिस्सलाम,
फिर नूह, फिर इब्राहीम,
और फिर आले-इमरान यानी
पैग़म्बर ईसा अलैहिस्सलाम तक।
यह इंसानी इतिहास का एक बड़ा अध्याय है, जो ईसा अलैहिस्सलाम पर आकर पूरा हो गया।
इसके बाद इतिहास का एक नया दौर शुरू होता है, जहां अल्लाह तआला नेतृत्व (इमामत) का रुख़ इब्राहीम की
दूसरी संतान — आले-इस्माइल की नस्ल की तरफ़ मोड़ने वाला है। यह एक बड़ा बदलाव था
जिसे ह्यूमन हिस्ट्री में एक महत्वपूर्ण milestone
के रूप में पेश किया जा
रहा है।
यहीं से इंसानी इतिहास में एक नया चैप्टर शुरू होता है जिसमें आख़िरी नबी हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) का आगमन होता है। यह ह्यूमन हिस्ट्री का एक नया (दूसरा) डायमेंशन है।
अल्लाह ने उन्हें रहती दुनिया तक आख़िरी नबी के रूप में चुना और उन्हें रौशनी का ऐसा मीनार (प्रकाश स्तंभ) बनाया, जो इंसानी इतिहास का आख़िरी milestone बन गया।
इसके बाद अब
दुनिया में किसी और नबी की ज़रूरत बाकी नहीं रही, क्योंकि हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) के बाद नबी के आने का
सिलसिला अल्लाह तआला ने हमेशा के लिए बंद कर दिया।
यहाँ दरअसल इंसानी इतिहास
के उस निर्णायक मोड़ की बात हो रही है,
जहाँ एक पुराना चैप्टर
ख़त्म हो रहा है और एक नया चैप्टर शुरू होने वाला है। इस मोड़ पर आले-इब्राहीम की
एक शाख़ (branch) को जो इमामत (नेतृत्व) दी गई थी,
वह अब अपने अंत की ओर बढ़
रही है और ईसा अलैहिस्सलाम पर आकर ख़त्म हो रही है।
यहाँ अल्लाह तआला उस अंतिम चरण के बारे में बता रहे हैं, जब समाज में गिरावट (deterioration) आ चुकी थी और हालत इतनी ख़राब थी कि उस दौर में एक नबी — ईसा अलैहिस्सलाम को भेजना पड़ रहा है।
उस मुश्किल हालात में भी जो लोग दीन के दा'ई1 बने हैं और जिन्होंने ख़ुद को अल्लाह के रास्ते में पेश कर दिया, उनका मिजाज क्या है ?
वो कभी इस बात की शिकायत
या परवाह नहीं करते कि आर्थिक स्थिति उनके लिए कोई बड़ी चीज़ है, बल्कि उनकी सबसे बड़ी चिंता अल्लाह के दीन के लिए खड़े रहने, अल्लाह के दीन को तक़्वियत (मदद) पंहुचाने की है।
इंसानी नज़रिए से देखा जाए
तो इस दा'ई1 गिरोह को दो हिस्सों में बाँटा जा सकता है - एक मर्दों का और दूसरा
औरतों का गिरोह।
अल्लाह तआला ने यहाँ औरतों
के गिरोह की मिसाल ख़ास तौर पर दी है,
जिन्होंने अपने जज़्बात और
अपनी मेहनत को अल्लाह के दीन के लिए वक्फ़ (अर्पित) कर दिया।
इस आयत के मुताले में जब
हम "inna
al-laha is'tafa"
(अल्लाह ने चुना) पर ग़ौर करते हैं, तो इसका मतलब यह है कि अल्लाह ने उन्हें चुना जो ख़ुद को
पहले से अल्लाह के लिए समर्पित कर चुके थे।
अल्लाह बिना किसी वजह के
किसी को फज़ीलत (बड़ा दर्जा) नहीं दे रहा है,
बल्कि उन लोगों को क़ुबूल
किया जिन्होंने अपने आपको अल्लाह के दीन के लिए पेश किया। इसीलिए आप समझ सकते हैं
कि “is'tafa”
यानी “चुने जाने” का यह
मामला कितना महत्वपूर्ण और बड़ा है।
इस आयत से हमें यह हिदायत
मिलती है कि अगर आज की उम्मते-मुस्लिमा में कोई गिरोह उसी तरह पूरी सच्चाई और
निष्ठा से अल्लाह के दीन के लिए खड़ा हो जाए—दुनिया की आर्थिक चिंताओं की परवाह किए
बिना उसकी पूरी फ़िक्र यही हो कि उसका सब कुछ—उसके बच्चे, उसकी दौलत,
हर चीज़ अल्लाह और उसके
दीन के लिए समर्पित हो जाए,
और वह ख़ुद को दुनिया की
आलाइशों (गंदगी) से पाक कर ले,
तब अल्लाह तआला ऐसे लोगों
को चुन लेता है।
हमें ये हिदायत मिल रही है
कि अगर हमलोग भी अल्लाह के दीन के लिए खड़े होंगे तो अल्लाह का यही मुबारकबादी
हमलोगों के लिए भी आएगी कि अल्लाह ने तुम लोगों को चुन लिया है। जैसा कि सूरह-हज [22:78] में अल्लाह फ़रमाता है:
“और अल्लाह की राह में
कोशिश करो जैसा कि कोशिश करने का हक़ है। उसी ने तुम्हें चुना है। और उसने दीन के
मामले में तुम पर कोई तंगी नहीं रखी। तुम्हारे बाप इब्राहीम का दीन। उसी ने
तुम्हारा नाम मुस्लिम (आज्ञाकारी) रखा,
इससे पहले और इस क़ुरआन में
भी ताकि रसूल तुम पर गवाह हो और तुम लोगों पर गवाह बनो। पस नमाज़ क़ायम करो और ज़कात
अदा करो। और अल्लाह को मज़बूत पकड़ो,
वही तुम्हारा मालिक है। पस
कैसा अच्छा मालिक है और कैसा अच्छा मददगार ।”
[22:78]
यह आयत हमें यह समझने में
मदद करता है कि चुनाव का यह मामला आज भी जारी है और अल्लाह के दीन के लिए दा’ई
बनने का चुनाव किस तरह होता है,
और अगर हम भी अल्लाह के
दीन के लिए पूरी निष्ठा और यक़ीन के साथ खड़े हों, तो हम भी चुने जा सकते हैं।
[3: 35]: जब इमरान की बीवी
ने कहा ऐ मेरे रब मैंने नज्ऱ (अर्पित) किया तेरे लिए जो मेरे पेट में है वह आज़ाद रखा जाएगा। पस
तू मुझसे क़ुबूल कर बेशक तू सुनने वाला, जानने वाला है।
[3: 36]: फिर जब उसने बच्चा
जन्मा तो उसने कहा ऐ मेरे रब मैंने तो लड़की को जन्मा है और अल्लाह ख़ूब जानता है कि
उसने क्या जन्मा है और लड़का नहीं होता लड़की की मानिंद। और मैंने उसका नाम मरयम रखा
है और मैं उसे और उसकी औलाद को शैतान मरदूद से तेरी पनाह में देती हूं।
बात यहाँ से आगे बढ़ती है, हम देखते हैं कि एक औरत अपने बच्चे को अल्लाह के दीन के लिए
वक्फ़ करने का फ़ैसला ख़ुद ले रही है,
भले ही घर में मर्द या
शौहर मौजूद हों। यह दिखाता है कि दीन के काम में औरत को भी बराबरी से हिस्सा लेने
की आज़ादी है। इमरान की बीवी का यह क़दम बताता है कि उस समय वह कैसी आज़ादी और
यक़ीन के साथ जी रही थीं।
अल्लाह तआला ने यहाँ
सिलसिला सिर्फ़ वालिदैन की दुआ और प्रार्थना पर ख़त्म नहीं किया।
अगर उस ज़माने के हालात पर
नज़र डालें, तो समझ में आता है कि
इमरान की बीवी ने जब कहा— “या अल्लाह,
ये तो बेटी है” — ये किस
पस-मंज़र में उन्होंने कहा होगा।
यह उन्होंने किसी नाराज़गी
या शिकायत में नहीं कहा,
बल्कि शायद उस दौर के
रिवाज़ को देखते हुए कहा। उस समय के चलन के हिसाब से आमतौर पर दीन के काम के लिए
लड़कों को ही वक्फ़ किया जा रहा होगा। इसी वजह से उनके दिल में सवाल आया कि अब जब
बेटी पैदा हुई है तो यह काम कैसे होगा?
लेकिन अल्लाह तआला का मंशा
क्या है ?
अल्लाह तआला ने यहाँ एक
बड़ा संदेश दिया कि दीन के लिए सिर्फ़ लड़कों की ज़रूरत नहीं है, बल्कि लड़कियाँ भी उतनी ही अहम हैं और उन्हें भी दीन के काम
के लिए वक्फ़ किया जा सकता है। इस काम के लिए लड़कियों को भी होना चाहिए ।
इसलिए, यह समझना ज़रुरी है कि लड़का हो या लड़की, दोनों को दीन के लिए वक्फ़ करना अल्लाह की मंशा के मुताबिक़
है।
ये जवाज़ पेश करना कि दीन
का काम सिर्फ़ लड़के ही कर सकते हैं,
दरअसल एक ऐसा जवाज़ (justification) है जो अल्लाह की नज़र में नापसंद है।
इसलिए अल्लाह तआला ने साफ़
कर दिया कि उसे पूरा इल्म है कि कौन पैदा हुआ है—लड़का या लड़की, और लड़का लड़की के मानिंद नहीं होता ये बात भी मालूम है।
यानी लड़का और लड़की
एक-दूसरे की तरह नहीं होते,
बल्कि दोनों की अपनी-अपनी
जगह और अपनी-अपनी अहमियत है।
[3: 37]: पस उसके रब ने उसे
अच्छी तरह क़ुबूल किया और उसे उम्दा तरीक़े से परवान चढ़ाया और ज़करिया को उसका
सरपरस्त बनाया। जब कभी ज़करिया उनके पास हुजरे में आता तो वहां रिज़्क़ पाता। उसने
पूछा ऐ मरयम ये चीज़ तुम्हें कहां से मिलती है। मरयम ने कहा यह अल्लाह के पास से है, बेशक
अल्लाह जिसको चाहता है बेहिसाब रिज़्क़ दे देता है।
मरियम अलैहिस्सलाम की घटना में अल्लाह तआला ने एक बड़ी मिसाल क़ायम कर दी है।
जब ज़करिया अलैहिसलाम उनकी परवरिश और सरपरस्ती कर रहे थे, मरियम मस्जिद में अल्लाह के लिए वक्फ़ होकर अल्लाह की इबादत में पूरी तरह लगी रहती थीं। जब कभी ज़करिया अलैहिसलाम मरियम के पास हुजरे में आते तो वह वहां रिज़्क़ पाते। (यह रिज़्क़ रूहानी हो या माद्दी दोनों तरह से समझ सकते हैं) उसके बाद ज़करिया अलैहिसलाम का सवाल ये था कि ये रिज़्क़ तुम्हारे पास कहाँ से आता है।
इस सवाल का जो जवाब है वो बहुत इम्पोर्टेन्ट
है।
मरियम ने जवाब दिया कि यह
अल्लाह के पास से है।
ये रिफरेन्स पॉइंट है, यानी चीज़ का रिफरेन्स पॉइंट बनाना।
यह घटना हमें दो
महत्वपूर्ण बातें सिखाती है।
पहला सबक़ यह कि रिज़्क़
चाहे माद्दी (भौतिक) हो या रूहानी,
हर तरह का रिज़्क़ अल्लाह
की तरफ़ से आता है।
दूसरा और ज़्यादा
महत्वपूर्ण सबक़ यह है कि हमें सिर्फ़ इस पर ध्यान नहीं देना चाहिए कि हमें क्या
मिला है, बल्कि इस पर ग़ौर करना चाहिए कि देने वाला कौन है।
यानी असल अहमियत देने वाले
की है, न कि केवल दिए गए सामान या नेमत की।
इससे हमें एक और गहरी बात समझने को मिलती है कि हमारा रिश्ता अल्लाह के साथ कैसा है।
जब हमारा रब्त (कनेक्शन) अल्लाह से मजबूत हो जाता
है, तब हमें हर चीज़—यहाँ तक कि छोटी से छोटी नेमत भी— अल्लाह
का दिया हुआ नज़र आने लगती है।
[3: 38]: उस
वक़्त ज़करिया ने अपने रब को पुकारा। उसने कहा ऐ मेरे रब मुझे अपने पास से पाकीज़ा
औलाद अता कर, बेशक तू दुआ का सुनने वाला है।
[3: 39]: फिर
फ़रिश्तों ने उसे आवाज़ दी जबकि वह हुजरे में खड़ा हुआ नमाज़ पढ़ रहा था कि अल्लाह तुझे
याहिया की ख़ुशख़बरी देता है जो अल्लाह के कलिमे की तस्दीक़ करने वाला होगा और सरदार
होगा और अपने नफ़्स को रोकने वाला होगा और नबी होगा नेकों में से।
[3: 40]: ज़करिया
ने कहा ऐ मेरे रब मेरे लड़का किस तरह होगा हालांकि मैं बूढ़ा हो चुका और मेरी औरत
बांझ है। फ़रमाया इसी तरह अल्लाह कर देता है जो वह चाहता है।
[3: 41]: ज़करिया
ने कहा कि ऐ मेरे रब मेरे लिए कोई निशानी मुक़र्रर कर दे। कहा तुम्हारे लिए निशानी
यह है कि तुम तीन दिन तक लोगों से बात न कर सकोगे मगर इशारे से और अपने रब को कसरत
से याद करते रहो और शाम व सुबह उसकी तस्बीह करो।
सूरह आले-इमरान की आयात : 38 से 41 के मुताले में तीन ख़ास
बातें जो समझ में आई वो ये हैं : -
पहली बात यह है कि अल्लाह
ही असल देने वाला है। और अगर किसी चीज़ की कमी महसूस हो रही है, तो हमें उसे अल्लाह से ही माँगना चाहिए और हमें उसकी याद, उसकी तस्बीह (प्रशंसा) और उसके साथ गहरे इरफ़ान (कनेक्शन) में रहना चाहिए।
दूसरी बात यह है कि दावत
के काम को लगातार आगे बढ़ाने के लिए एक और दा’ई की ज़रूरत महसूस की गई। इसलिए
ज़करिया अलैहिस्सलाम ने अल्लाह से औलाद के लिए दुआ की, और जवाब में अल्लाह ने याहिया अलैहिस्सलाम की ख़ुशख़बरी दी।
इसमें तीसरी महत्वपूर्ण
बात यह समझ में आई कि अल्लाह की क़ुदरत (शक्ति) हर चीज़ पर हावी है।
इंसानी सोच और फिजिकल लॉज़ (भौतिक नियम) के आगे भी अल्लाह की क़ुदरत काम करती है।
यहाँ ज़करिया अलैहिसलाम की
मिसाल से देखिए—जो अपनी ज़्यादा उम्र और
अपनी पत्नी की बांझपन के कारण औलाद की उम्मीद छोड़ चुके थे। इंसानी नज़रिए से देखा
जाए तो उनके लिए औलाद की उम्मीद रखना मुमकिन नहीं था, क्योंकि यह "नैचुरल लॉ" (प्राकृतिक नियमों) के ख़िलाफ़ था। लेकिन
अल्लाह तआला ने उनकी दुआ क़बूल की और यह दिखाया कि अल्लाह की क़ुदरत किसी भी फिजिकल
लॉ से ऊपर है।
यह वाक़ि'आ हमें सिखाता है कि फिजिकल लॉज़ को अल्लाह ने ही बनाया है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह इनसे ख़ुद बंधा हुआ है। जब चाहे, जैसे चाहे, वह अपनी क़ुदरत से इन नियमों को बदल सकता है—कभी कुछ समय के लिए और कभी हमेशा के लिए।
अस्ल बात यह है कि हम
इंसान अपने अनुभव और ज्ञान के आधार पर सोचते हैं कि फिजिकल लॉज़ (physical laws) हमेशा अटल और निश्चित (अंतिम) होते हैं, ये नियम हर हालत में एक जैसे ही काम करेंगे। लेकिन अगर हम
अल्लाह की क़ुदरत को पहचानें और अल्लाह से हमारा संबंध मज़बूत हो जाए, तो उसकी क़ुदरत इन नियमों में हस्तक्षेप करके उन्हें बदल
सकती है।
इल्हाद (नास्तिकता) का असल मसला यही है कि
लोग कारण और प्रभाव (cause
and effect) को अल्लाह की जगह मानने
लगे हैं। वे सोचते हैं कि सृष्टि केवल फिजिकल लॉज़ के तहत ही चल रही है, और यही फिजिकल लॉज़ हर चीज़ को कण्ट्रोल कर रही हैं। यही आज
की नास्तिक सोच की बुनियाद है।
पहले के लोग प्रकृति के
चमत्कारों को अल्लाह की जगह रखते थे,
और आज लोग फिजिकल लॉज़ को
ख़ुदा की जगह मानने लगे हैं,
लेकिन अल्लाह ने पूरी
इंसानी इतिहास में कई उदाहरणों से यह बताया है कि वही फिजिकल लॉज़ को कण्ट्रोल
करने वाला है, जैसे आदम (अलैहिस्सलाम) की पैदाइश में और ज़करिया
अलैहिस्सलाम के मामले में।
अल्लाह तआला ने ज़करिया (अलैहिस्सलाम) से कहा :
“इसी तरह अल्लाह कर देता
है जो वह चाहता है।” [3: 40]
जब ज़करिया (अलैहिस्सलाम) ने निशानी मांगी, तो अल्लाह ने उन्हें बताया कि तुम्हारे लिए निशानी यह
होगी कि तुम तीन दिन तक लोगों से सिर्फ़ इशारों में बात करोगे। इस दौरान, उन्हें अल्लाह का ज़िक्र और सुबह-शाम उसकी ख़ूब तस्बीह करने
का हुक्म दिया गया।
यह निशानी अल्लाह की क़ुदरत को समझाने के लिए थी।
अल्लाह तआला इस निशानी के माध्यम से बता रहे हैं कि आप तस्बीह कीजिए यानी आप अल्लाह को उसकी पाकीज़गी और निर्दोषता के साथ याद कीजिए, आप सोचिये, अपने दिमाग़ को ये बताइये कि मेरा रब तो वह है जो इन फिजिकल लो से भी ऊपर है। वह जो भी चाहता है कर सकता है।
[3: 42]: और
जब फ़रिश्तों ने कहा ऐ मरयम अल्लाह ने तुम्हें मुंतख़ब किया और तुम्हें पाक किया और
तुम्हें दुनिया भर की औरतों के मुक़ाबले में मुंतख़ब किया है (चुना है)।
[3: 43]: ऐ
मरयम अपने रब की फ़रमांबरदारी करो और सज्दा करो और रुकूअ करने वालों के साथ रुकूअ
करो।
[3: 44]: यह
ग़ैब की ख़बरे हैं जो हम तुम्हें ‘वही’ (अवतरित) कर रहे हैं और तुम उनके पास मौजूद न
थे जब वे अपने कु़रअे डाल रहे थे कि कौन मरयम की सरपरस्ती करे और न तुम उस वक़्त
उनके पास मौजूद थे जब वे आपस में झगड़ रहे थे।
अल्लाह तआला ने मरियम
अलैहिस्सलाम के बारे में कहा :
"मैंने तुम्हें
दुनिया की सभी औरतों में चुना है।" [3: 42]
इसके विस्तृत अर्थ (मफ़्हूम) में ये बात आप से आप
शामिल है कि जो भी व्यक्ति या गिरोह आज अल्लाह के दीन के लिए खड़ा होगा, और अपना
समय, मेहनत और साधन, सब कुछ पूरी
निष्ठा के साथ अल्लाह के लिए समर्पित कर देगा, तो वह भी गोया
अल्लाह की नज़र में विशेष और चुना हुआ हो जाएगा।
इसके अलावा, क़ुरआन
में अल्लाह ने कहा:
यह ग़ैब की ख़बरे हैं जो हम तुम्हें ‘वहि’ (अवतरित) कर रहे हैं। (3: 44)
"dhalika min anbai
al-ghaybi nuhihi"
आमतौर पर हम 'गैब'
शब्द से उन चीज़ों को जोड़ते हैं जो हमारी समझ या जानकारी से परे
हैं, जैसे भविष्य की बातें, क़यामत कब
आएगी, जन्नत और जहन्नम कैसे होंगे वगैरह।
लेकिन यहाँ, एक और अहम बात है कि अल्लाह ने इतिहास की कुछ घटनाओं को भी 'गैब' कहा है।
यानी वे बातें जो पहले घट
चुकी हैं, लेकिन आम
लोगों को या इतिहासकारों को उनके बारे में जानकारी नहीं है और न ही उन्हें जानने
का कोई साधन है।
आधुनिक इतिहासकार अक्सर
बहुत सी घटनाओं का पता, पुराने अवशेषों और सबूतों (archaeological evidence) से लगाते
हैं और वहां से तारीख़-साज़ी करते हैं।
लेकिन यहाँ अल्लाह तआला
हमें ये बता रहे हैं कि कुछ घटनाएँ ऐसी भी हुई हैं जिनके बारे में कोई इंसान कभी
नहीं जान सकता था। अल्लाह तआला यहाँ उन घटनाओं की ख़बर दे रहा है, जो इतिहास
में पहले हो चुकी हैं।
उदाहरण के तौर पर, अल्लाह
तआला ने कहा, "तुम उस वक़्त उन लोगों के बीच नहीं थे जब
वे मरियम की देखभाल की ज़िम्मेदारी लेने के लिए क़ुर्रा (चिट्ठी डालकर) अंदाजी कर रहे थे और आपस
में झगड़ रहे थे कि कौन उनकी देखभाल करेगा।"
ये ऐसी बातें हैं जो
इतिहास में किसी को मालूम नहीं थीं, और इन बातों का कोई इतिहासकार या आम इंसान
कभी पता नहीं लगा सकता था। अल्लाह ने इन घटनाओं को "anbai al-ghaybi" यानी छुपी
हुई जानकारी [news of the Ghaib (unseen)] के रूप में बयान
किया है।
तो आप समझ सकते है कि 'गैब'
का मतलब सिर्फ़ भविष्य (future) की बातें
नहीं हैं, बल्कि वो इतिहास (अतीत) की घटनाएँ भी हैं, जो हमसे
छिपी हुई हैं और जिन तक हमारी पहुँच नहीं है।
'गैब'
की यह व्याख्या एक गहरी समझ को जन्म देती है, जिसमें
past और future दोनों
शामिल हैं।
ये वो चंद बाते हैं जो
क़ुरआन पढ़ते वक़्त मुझे समझ में आई थी।
मौलाना ने इन आयात के तज़्किरी पहलू (तज़किरुल-क़ुरआन) में कई महत्वपूर्ण बिंदुओं को (dimensions) सामने रखा है। मैं अपने भाइयों से गुज़ारिश करता हूँ कि वे इसे गहराई से समझें और देखें कि इसमें किन-किन पहलुओं को समझाया गया है।
Note: क़ुरआन मुताला पर एक दा’ई के बयान का सारांश।
तज़्कीरुल-क़ुरआन | तज़्कीर
अल्लाह ने हज़रत ज़करिया को बुढ़ापे में औलाद दी, हज़रम मरयम को हुजरे में रिज़्क़ पहुंचाया, हज़रत मसीह को बग़ैर बाप के पैदा किया, आले इब्राहीम ने ऐसे सुलहा (महापुरुष) पैदा किए जिन्हें ख़ुदा की पैग़म्बरी के लिए चुना जाए।
अल्लाह ने अपने इन बंदों को ये इनामात यूं ही नहीं दिए बल्कि उन्हें इसका मुस्तहिक़ पाकर ऐसा किया।
ये वे लोग थे जिन्होंने अपनी औलाद से आर्थिक उम्मीदें क़ायम नहीं कीं उनकी ख़ुशी इसमें थी कि उनकी औलाद अल्लाह की राह में सरगर्म हो।
ये वे लोग थे जिन्होंने अपने अंदर इस तमन्ना की परवरिश की कि उनकी औलाद शैतान से बची रहे, वह नेक बंदों की जमाअत में शामिल हो जाए।
किसी के अंदर भलाई देख कर वे हसद और जलन में मुब्तला नहीं हुए । उनके नेक जज़्बात के असर से उनकी औलाद भी ऐसी हुई जो दुनिया की ज़िंदगी में अपने नफ़्स पर क़ाबू रखने वाली हो, वह अल्लाह को याद करे। बदी और नेकी के दर्मियान वह नेकी के रास्ते को अपनाए।
यही वे लोग हैं जिनको अल्लाह अपने ख़ास रिज़्क़ से खिलाता पिलाता है और उन्हें अपनी ख़ुसूसी रहमत के लिए क़ुबूल कर लेता है।
दा'ई1: ईश्वर की सृजन योजना (Creation
plan of God) से
परिचित वह व्यक्ति जो ईश्वर के संदेश से लोगों को अवगत कराता है।
मद'ऊ2: वह व्यक्ति जिसे ईश्वर के संदेश से अवगत कराना है या अवगत कराया जाता है।
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