सुलतानी मॉडल
दावती मॉडल
Source : AL-RISALA (Urdu) | April - 2002
मौजूदा ज़माने के मुसलमान सारी दुनिया में तबाही और अपमान का सामना कर रहे हैं।
तबाही की ये
मुद्दत पूरी उन्नीसवीं सदी और बीसवीं सदी तक फैली हुई है।
सुलतान टीपू
से लेकर यासिर अराफ़ात तक —करीब दो सौ सालों से तबाही का
सिलसिला जारी है और अभी तक ब-ज़ाहिर उसके ख़ात्मे का कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिख रहा
है।
मुसलमानों
की इस तबाही का कारण, कुछ-नहीं-करना (बे-अमली) नहीं है, बल्कि ये लगातार शोर-शराबे और हंगामा बरपा करने वाले अमल के बीच हो रही है।
ये कहना
मुबालग़ा (अतिशयोक्ति) नहीं होगा कि इन दो सौ सालों
में दुनियाभर के मुसलमानों ने जान-माल की जो क़ुर्बानियाँ दी हैं, वह मिक़दार के एतबार से इस्लाम की बक़िया पूरी
तारीख़ की क़ुर्बानियों से भी ज़्यादा है।
अब सवाल यह पैदा होता है कि लगातार प्रयासों और क़ुर्बानियों के बावजूद,मुसलमान आधुनिक दौर में इज़्ज़त और सफलता (ग़ल्बा) का मक़ाम क्यों हासिल नहीं कर सके ?
जबकि क़ुरआन और हदीस में
स्पष्ट रूप से यह यक़ीन दिलाया गया है कि अहले-ईमान की कोशिशों को अल्लाह कभी
व्यर्थ नहीं जाने देगा, और उनका बुरा चाहने वालों के
मुक़ाबले में उन्हें ज़रूर इज़्ज़त अता फ़रमाएगा।
इस सवाल का जवाब ये है :
मौजूदा ज़माने के मुस्लिम रहनुमाओं ने अपनी कोशिशों के लिए ग़लत तरीक़ा अपनाया। उन्होंने अपनी कोशिशों को उस मतलूब तरीक़े पर जारी ही नहीं किया जिसे अपनाकर अल्लाह की मदद हासिल की जा सकती है।
और इसमें कोई शक नहीं कि इस दुनिया में
कामयाबी सिर्फ़ उसके लिए है जिसे अल्लाह अपनी मदद से नवाज़े। अल्लाह के मदद के बग़ैर
यहां कामयाबी मुम्किन नहीं।
असल बात यह है कि अल्लाह ने अपनी मदद का वादा उन लोगों से किया है जो अपनी
कोशिशों के लिए पैग़म्बर के मॉडल (Prophetic
Model) को इख़्तियार करें। ये पैग़म्बराना मॉडल वही है जिसे हमने
"दावती मॉडल" का नाम दिया है।
अहले-ईमान की अस्ल कामयाबी पैग़म्बर के क़ायम किए हुए इसी "दावती
मॉडल" से जुड़ी हुई है। लेकिन मौजूदा ज़माने के मुस्लिम
रहनुमा बाद के दौर में मुस्लिम सुल्तानों के बनाए हुए "सुलतानी मॉडल" से
इतना प्रभावित थे कि उन्होंने अपनी तमाम तहरीकें उसी “सुलतानी मॉडल” पर चला दीं।
मौजूदा
ज़माने में मुसलमानों की तमाम तबाहियों की अस्ल वजह, यही भटकाव
(इंहिराफ़) है।
मुस्लिम
रहनुमाओं ने देखा कि बाद के ज़माने में मुस्लिम सुल्तानों ने हथियारों से लैस
फ़ौजों के साथ अलग-अलग इलाकों में घुसकर वहां की क़ायम-शुदा हुकूमतों की फ़ौजों को
हराकर अपनी हुकूमत क़ायम कर ली।
यह “सुलतानी
मॉडल” इतना ज़्यादा आम हुआ कि बाद के ज़माने में लिखी जाने वाली मुस्लिम तारीख़ (इतिहास) तक़रीबन
सबकी-सब उसी “सुलतानी मॉडल” पर ढाल दी गईं।
मौजूदा
ज़माने के मुस्लिम रहनुमाओं ने इन तारीख़ी किताबों (historical
books) को पढ़ा और ये समझ लिया कि इस्लामी तहरीक का मॉडल बस यही “सुलतानी मॉडल”
है।
उन्होंने जाने-अनजाने में इसी “सुलतानी मॉडल” को मे’यारी मॉडल (अस्ल इस्लामी मॉडल) समझा और इसे हथियारबंद जिहाद के नाम पर हर जगह जारी कर दिया। यही ग़लती मौजूदा ज़माने के मुसलमानों की तबाही का अस्ल कारण है।
दावती मॉडल
इस्लामी अमल
(कार्य) का सही
मॉडल वह है जो पैग़म्बर-ए-इस्लाम हज़रत मुहम्मद और दूसरे पैग़म्बरों की मिसाल से
मालूम होता है। ये मॉडल "दावती मॉडल" है।
"दावती मॉडल" का मतलब यह है कि अपने अमल की बुनियाद इस्लाम की वैचारिक
प्रचार पर रखी जाये।
इसे संबोधित
किये जाने वाले व्यक्ति की समझ और सोचने की क्षमता के अनुसार दलील से साबित करते
हुए पेश किया जाये, और हिंसा से पूरी तरह परहेज़
करते हुए सिर्फ़ शान्तिपूर्ण ज़राए से काम को आगे बढ़ाया जाये।
अगर सामने
वाला पक्ष ज़्यादती (न्यायहीनता) भी करे, तब भी जवाब में एकतरफ़ा सब्र करते हुए शान्तिपूर्ण वैचारिक प्रचार की
मुहिम को जारी रखा जाये ।
हर क़ीमत पर ये कोशिश की जाये कि दा'ई1 और मद'ऊ2 के बीच नफ़रत और झगड़े का माहौल हरगिज़ क़ायम न होने पाए।
दा'ई1: ईश्वर की सृजन योजना (Creation plan of God) से परिचित वह व्यक्ति जो ईश्वर के संदेश से लोगों को अवगत कराता है।
मद'ऊ2: वह व्यक्ति जिसे ईश्वर के संदेश से अवगत कराना है या
अवगत कराया जाता है।
“एक शांत और सामान्य माहौल हमेशा इस्लाम के लिए फ़ायदेमंद होता है, जबकि अशांत माहौल हमेशा इस्लाम के लिए नुक़सानदेह।”
मौजूदा
ज़माने में सारी दुनिया में कई नए बदलाव (revolutions) हुए हैं। इसके नतीजे में आलमी सूरत-ए-हाल मुकम्मल तौर पर बदल गई है। इन
बदलावों ने हथियारबंद जंग को बिलकुल ग़ैर-ज़रूरी क़रार दे दिया है। अब ये मुम्किन हो
गया है कि सिर्फ़ दावती अमल के ज़रिये वह सब कुछ हासिल कर लिया जाये जो इस्लाम और
अहले-इस्लाम को इज़्ज़त और ग़लबा के मुक़ाम तक पहुंचाने के लिए दरकार है।
पुराने
ज़माने में अहले-ईमान को मज़हबी जब्र (अत्याचार और रोक-टोक) के माहौल
में अपना दावती काम करना पड़ा था, अब ये दावती काम पूरी तरह मज़हबी
आज़ादी के माहौल में किया जा सकता है।
पहले ज़माने
में हक़ का पैग़ाम लोगों तक पहुंचाने के लिए दा’ई को कठिन यात्राएं करनी पड़ती थीं, लेकिन अब मॉडर्न कम्यूनीकेशन से यह मुम्किन हो गया है कि दावती पैग़ाम तेज़ी
से सफ़र करके दुनिया के तमाम लोगों तक पहुंच सके।
पुराने
ज़माने के दा’ई को तरह-तरह के अंधविश्वासों का सामना करते हुए हक़ का पैग़ाम फैलाना
पड़ता था, लेकिन अब साइंस की तरक़्क़ी ने ज़्यादातर अंधविश्वासों को ख़त्म कर दिया
है। अब ये मुम्किन हो गया है कि खुले विचारों वाले माहौल में हक़ के पैग़ाम को आम
बनाया जा सके।
पहले ज़माने में अर्थव्यवस्था सिर्फ़ खेती पर टिकी हुई थी, इसलिए दा’ईयों (हक़ की दावत पंहुचने वालों) को बहुत कम संसाधनों के साथ अपना मिशन चलाना पड़ता था।
अब औद्योगिक
क्रांति के बाद सारी दुनिया में economic explosion का ज़माना आ गया है, जिससे अब यह काम आसानी से
और अच्छे संसाधनों के साथ किया जा सकता है — जबकि पहले के लोगों को यह बड़ी आर्थिक
(पैसे की) तंगी के साथ करना पड़ा था,वग़ैरा वग़ैरा।
यह एक
सच्चाई है कि आज के दौर में आए नए बदलावों ने दावती-मॉडल की उपयोगिता और अहमियत को
बहुत ज़्यादा बढ़ा दिया था।
लेकिन मौजूदा ज़माने के मुस्लिम रहनुमा सिर्फ़ "सुलतानी मॉडल" से परिचित थे, वह दावती-मॉडल (दावत के असल तरीक़े) को बिलकुल भूल चुके थे।
उन्होंने बड़ी नासमझी का
मुज़ाहरा करते हुए पूरी मिल्लत (मुसलमानों) को सुलतानी-मॉडल के तरीक़े पर
डाल दिया, और फिर मिल्लत को भी तबाह किया और ख़ुद अपने आपको भी।
दोगुनी ग़लती
नए ज़माने
में "सुलतानी मॉडल" तबाह-कुन हद तक बे-फ़ायदा बन चुका था। लेकिन दो सौ
सालों का नाकाम तजुर्बा भी अयोग्य मुस्लिम रहनुमाओं की बेख़बरी को तोड़ने वाला
साबित न हो सका।
19वीं और 20वीं सदी को पूरी तरह खोने के बावजूद, 21वीं सदी में भी वे पुराने सुलतानी दौर के इस घिसे-पिटे मॉडल को ही ब-ज़ाहिर मे’यारी मॉडल (असली और सही मॉडल) समझ रहे हैं।
आधुनिक युग में नाकाम हो चुके “सुलतानी मॉडल” को दोहराने की दो क़िस्में हैं।
इसकी पहली
क़िस्म है, हुक्मराँ (शासक) के ज़रिये "सुलतानी मॉडल" को अपनाना और
इसकी दूसरी क़िस्म है, ग़ैर-हुकूमती (ग़ैर-सरकारी) लोगों या
जमातों के ज़रिये इस मॉडल पर अमल करना।
पहली क़िस्म
की एक मिसाल सुलतान टीपू हैं, जिन्होंने हुक्मराँ की सतह पर
इस पुराने मॉडल को नाकाम तौर पर दोहराया। वह "सुलतानी मॉडल" से बाहर
निकलकर मामले को समझ न सके।
1799 ई० में वह अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ एक दूरदर्शिता-विहीन (दूरदृष्टि
से खाली) जंग लड़कर हलाक हो गए।
इसी तरह
मौजूदा ज़माने में इराक़ के पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन की ज़िंदगी भी इसी
“सुलतानी मॉडल” को इख़्तियार करने की एक नाकाम मिसाल है।
इसके बाद
"सुलतानी मॉडल" के नाम पर दूसरा प्रयोग शुरू हुआ, जिसमें ग़ैर-सरकारी संगठनों ने अपने मन के बनाए हुए (काल्पनिक) दुश्मनों
के ख़िलाफ़ लड़ाई छेड़ दी।
इस दूसरी
क़िस्म की लड़ाई का शायद सबसे पहला वाक़िया 1831 ई० में पेश
आया, जब मौलाना सय्यद अहमद बरेलवी और उनके साथियों का क़ाफ़िला महाराजा रणजीत से
लड़कर बालाकोट में तबाह हो गया।
इसके बाद 1857 ईस्वी में इसी तरह की दूसरी बड़ी घटना उस वक़्त हुई, जब उलेमा-ए-हिंद की जमात (धार्मिक नेताओं के एक समूह) ने
अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ हथियारबंद जिहाद शुरू किया।
इसके बाद
ग़ैर-सरकारी संगठनों की ओर से "सुलतानी मॉडल" के असफल प्रयोगों का एक
लंबा सिलसिला शुरू हो गया, जो लिखते समय तक जारी है।
फ़लस्तीन, कश्मीर, बोसनिया, चेचन्या, फिलीपींस, अराकान और दूसरे कई जगहों पर जिहाद
के नाम पर जो विनाशकारी हथियारबंद टकराव हो रहे हैं, वे
सब इसी दूसरे क़िस्म के प्रयोग की मिसालें हैं।
"सुलतानी मॉडल" के इस दूसरे प्रकार में, जिसमें ग़ैर-सरकारी संगठनों ने गोरिल्ला वार (छिपकर लड़ाई लड़ने), प्रॉक्सी वार जैसी रणनीतियाँ अपनाईं, तो यह पहले प्रकार से भी ज़्यादा नुक़्सानदेह साबित हुआ। इसमें एक साथ दो बड़ी ग़लतियाँ शामिल हो गईं।
पहली ग़लती
दावती दौर
में, “सुलतानी मॉडल” के तरीक़े को अपनाने की कोशिश की गई — जो कि ज़माने की
ज़रूरतों के बिल्कुल खिलाफ़ थी।
दूसरी ग़लती
दूसरी इससे
भी ज़्यादा संगीन बात ये कि ये तरीक़ा शर'ई एतबार से (इस्लामी
क़ानून के नज़रिए से) भी पूरी तरह ग़लत था। क्योंकि साबित-शुदा तौर पर
हथियार उठाकर जंग करने का हक़ सिर्फ़ एक स्थापित हुकूमत को है, कोई भी ग़ैर-सरकारी संगठन यह हक़ नहीं रखता कि वह किसी को दुश्मन मानकर
उसके ख़िलाफ़ हथियारबंद लड़ाई शुरू कर दे।
अगर पहली
क़िस्म में “सुलतानी मॉडल” अपनाना सिर्फ़ नासमझी या अनुभव की कमी थी, तो दूसरी क़िस्म में सुलतानी-मॉडल का प्रयोग नासमझी के साथ-साथ शरीअत से
सीधा भटकाव भी बन गया।
यही वह
दोगुनी ग़लती है जिसने मौजूदा ज़माने में मुस्लिम रहनुमाओं के हथियारबंद-जिहाद को
पूरी तरह नाकाम बना दिया।
इस नाकामी
की वजह कोई बाहर की क़ौम की साज़िश नहीं है — जैसा कि अक्सर उलेमा और दानिशवर (बुद्धिजीवी) बिना किसी
ठोस दलील के ऐलान करते रहते हैं।
असल वजह यह है कि उन्होंने एक ऐसा तरीक़ा (सुलतानी
मॉडल) अपनाया जो हर लिहाज़ से "दावत के तरीक़े" (दावती
मॉडल) से बिल्कुल अलग है।
"दावती मॉडल" पूरी तरह इस्लाम की प्रकृति और उसके उद्देश्य के मुवाफ़िक़
मिज़ाज बनाता है। इसके विपरीत "सुलतानी मॉडल" ऐसा स्वभाव बनाता है जो हर
दृष्टि से इस्लामी शिक्षाओं और सिद्धांतों के बिलकुल ख़िलाफ़ हो।
इस बात को समझने के लिए "कश्मीर और पाकिस्तान" का मामला एक अच्छा
उदाहरण है।
पाकिस्तान
का विचार पूरी तरह से "सुलतानी सोच" (यानी सत्ता
और हुकूमत पर आधारित सोच) का नतीजा था। अगर उस समय के पाकिस्तानी लीडरों के
ज़हन में "दावती मॉडल" होता तो वे कभी भी भौगोलिक विभाजन की बात नहीं
करते। बल्कि वे इसे अल्लाह की एक रहमत मानते कि एक बड़ा देश — अखंड भारत — गोया कि
एक पूरा महाद्वीप, उन्हें एक विशाल कार्यक्षेत्र
के तौर पर मिल रहा है।
लेकिन उनके
ज़हन में “सुलतानी मॉडल” की सोच बसी हुई थी, जिसमें सारा फ़ोकस सिर्फ़
पोलिटिकल पॉवर पर होता है, इस सोच में दावत के अवसरों
या मवाक़ेकार की कोई अहमियत ही नहीं होती।
इस नासमझी
का नतीजा ये हुआ कि उन्होंने भारत के बँटवारे की तहरीक चलाकर पूरे भारतीय
उपमहाद्वीप (बंटवारे से पहले का पूरा हिंदुस्तान) में नफ़रत (दूसरे
शब्दों में - मुख़ालिफ़ दावत) का जंगल उगा दिया। जिससे दावत की सारी संभावनाएँ
अवरुद्ध हो कर रह गईं।
इस
ग़ैर-इस्लामी सोच और बुद्धिमानी से दूर सियासत का दूसरा दौर 1947 ईस्वी से
शुरू होता है।
15-अगस्त 1947 को जब यह इलाक़ा अंग्रेज़ी हुकूमत
से आज़ाद हुआ, तो यहां दो बड़े रियासती मसले सामने आए —
एक था हैदराबाद का मसला और दूसरा कश्मीर का।
हैदराबाद रियासत में हिंदू मेजोरिटी थी मगर हुक्मराँ मुसलमान था। इसके विपरीत रियासत-कश्मीर में मुस्लिम मेजोरिटी थी लेकिन हुकूमत हिंदू राजा के हाथ में थी।
अब सवाल यह था कि
इन दोनों रियासतों का पोलिटिकल फ्यूचर क्या हो ?
हैदराबाद के
नवाब ने औपचारिक रूप से पाकिस्तान से विलय (मिल जाने) का फ़ैसला
किया जबकि कश्मीर के राजा ने भारत से विलय के काग़ज़ात पर दस्तख़त कर दिए।
इस झगड़े को
ख़त्म करने के लिए नई दिल्ली की लीडरशिप ने एक हक़ीक़त-पसंदाना (वास्तविकता
पर आधारित) पेशकश रखी।
उन्होंने
पाकिस्तानी नेताओं से कहा कि तुम हैदराबाद से अपना दावा छोड़ दो और हम कश्मीर से
अपना दावा वापिस ले लें। इस तरह ये झगड़ा ख़त्म हो जाएगा और दोनों देश पुरसुकून
अंदाज़ में तरक़्क़ी के रास्ते पर अपना सफ़र शुरू कर देंगे।
हिंदुस्तानी
लीडरों के इस पेशकश (सुलह की बात) के समर्थन में ख़ुद क़ुरआन में
ये साफ़-साफ़ हिदायत मौजूद थी –
“और अगर वे सुलह (संधि) की तरफ़ झुकें तो तुम भी इसके लिए झुक जाओ और अल्लाह
पर भरोसा रखो। बेशक वह सुनने वाला जानने वाला है।”
— क़ुरआन, सूरह अल-अंफ़ाल
यानी अगर दूसरा-पक्ष सुलह की पेशकश करे तो तुम फ़ौरन इस पेशकश को क़बूल कर लो।
मगर पाकिस्तान
के लीडर, जो “सुलतानी मॉडल” से सम्मोहन की हद तक प्रभावित होने की वजह से हुकूमत की
मानसिकता (psychology of authority) के शिकार थे, वे इस क़ीमती पेशकश को समझ न सके
और न ही उसे क़बूल कर सके। इसके बाद जो भयानक तबाही आई वह हर एक के लिए एक मालूम
घटना है।
कश्मीर के
बारे में पाकिस्तानी लीडरों की बुद्धि और समझ से बाहर की नादानी ऐतिहासिक रिकार्ड से साबित है। इस सच्चाई की तफ़सील इन किताबों में स्पष्ट
रूप से देखी जा सकती है:
1.Looking Back–मेहरचंद महाजन
2.Witness to an Era–फ्रैंक मॉरिस
3.Emergence
of Pakistan
–चौधरी मोहम्मद अली
4.The
Nation that Lost Its Soul
–सरदार शौकत हयात ख़ान
पाकिस्तानी
लीडरों की सुलतानी मानसिकता इसमें रुकावट बन गई कि वह कश्मीर के मसले को बातचीत की
मेज़ पर हल कर सकें। इसके बाद, उन्होंने एक और गंभीर ग़लती की
— फ़ौजी ताक़त के इस्तिमाल के ज़रिये कश्मीर के मसले के हल का ख्व़ाब देखने लगे।
पहले उन्होंने सीधे तौर पर हथियारबंद पहल के ज़रिये भारत से फ़ौजी टकराव किया। लेकिन इस प्रयास में उन्हें पूरी तरह नाकामी मिली।
इस नाकामी के बाद भी, उनकी सुलतानी मानसिकता हक़ीक़त-पसंदी (वास्तविकता) का रास्ता
इख़्तियार करने के लिए तैयार न थी। इसलिए उन्होंने कश्मीर में हिंदुस्तान के ख़िलाफ़ वह खु़फ़ीया जंग शुरू कर दी जिसे प्रॉक्सी वार कहा जाता है।
ये प्रॉक्सी
वार न सिर्फ़ पाकिस्तान और कश्मीर दोनों की तबाही का कारण बनी, बल्कि इस्लामी शरी'अत की नज़र में भी यह यक़ीनी तौर
पर ना-जायज़ थी। क्योंकि इस्लाम में किसी के ख़िलाफ़ जंग छेड़ने के लिए ऐलान ज़रूरी है।
Quran: Al-Anfaal-58 :
fa-inbidh ilayhim ala sawain
हिंदुस्तान
के ख़िलाफ़ इस ग़ैर-इस्लामी और असमझदारी वाली जंग को सही ठहराने के लिए पाकिस्तान ने
दूसरी बहुत सी गंभीर ग़लतियां कीं।
उदाहरण के
लिए, पाकिस्तान ने अपनी विदेश नीति और अपने मीडीया को पूरी तरह से हिंदुस्तान
को बदनाम करने और उसके ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने का कारख़ाना बना दिया।
कश्मीर की
गोरिल्ला वार या प्रॉक्सी वार में पूरी तरह शामिल होने के बावजूद पाकिस्तान लगातार
इस झूठी बात का सहारा लेता रहा कि इस संघर्ष से हमारा कोई अमली तअल्लुक़ (सीधा
रिश्ता) नहीं। हालाँकि सारी दुनिया जानती है कि कश्मीरियों का संघर्ष पूरी तरह
पाकिस्तान की मदद से जारी है।
इसी तरह ज़ाहिरी तौर पर अपने आपको पुर-अम्न क़ौम बताने के लिए पाकिस्तानी लीडरों ने बार-बार शांति के समझौतों पर हस्ताक्षर किए।
ताशकंद-समझौता (1965),
शिमला-समझौता (1972),
और लाहौर-समझौता (1998)।
इस क़िस्म के
तमाम समझौते और ऐलान भी पाकिस्तानी लीडरों के ग़ैर-दावती ज़हन का शिकार होते रहे।
काग़ज़ के ऊपर
उन्होंने बार-बार ये लिखा कि कश्मीर के मसले को जंग के बजाय शांतिपूर्ण बातचीत के
ज़रिए हल किया जाये। मगर ये समझौते शायद केवल दुनिया को दिखाने के लिए थे, क्योंकि उन्होंने किसी भी समझौते के बाद अपनी ख़ुफ़िया जंगी कार्रवाई को
बंद नहीं किया।
हालाँकि
क़ुरआन के मुताबिक़, समझौते की बातों को शब्दों के (लफ़्ज़ी) स्तर पर भी
और भावना या मक़सद के स्तर पर भी निभाना मुसलमानों के लिए ज़रूरी है:
...और अहद (वचन) को पूरा करो। बेशक अहद की पूछ
होगी। [क़ुरआन, 17: 34]
पाकिस्तान
के लीडर अगर अपने “सुलतानी मॉडल” से बाहर आएं और “दावती मॉडल” को बुनियाद बना कर
सोचें तो उन्हें मालूम होगा कि उनके लिए क़ुरआन में बिलकुल साफ़ रहनुमाई मौजूद है।
क़ुरआन में
बताया गया है कि मौजूदा दुनिया में हर हाल में हर फ़र्द और क़ौम को मुसीबत का सामना
करना पड़ता है। यहां इंसान खोता भी है और पाता भी है। ये दोनों अनुभव इम्तिहान के
लिए होते हैं।
ऐसी हालत
में इंसान को क्या करना चाहिए,
इसका जवाब
क़ुरआन की इस आयत से मिलता है:
[Quran 57: 23] : ताकि तुम ग़म न करो उस पर जो तुमसे खोया गया। और न उस चीज़
पर फ़ख्र करो जो उसने तुम्हें दिया, और अल्लाह इतराने
वाले फ़ख्र करने वाले को पसंद नहीं करता।
क़ुरआन की इस आयत में पाकिस्तानी लीडरों के लिए ये रहनुमाई है कि वे कश्मीर को उसी तरह इख़्तियाराना (ऐच्छिक) तौर पर खोए हुए ख़ाना में डाल दें, जिस तरह वे 1971 में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) को मजबूराना तौर पर खोए हुए ख़ाने में डाल चुके हैं।
कश्मीर में
वे अपनी मौजूदा मायूसाना सियासत को ख़त्म कर दें। दूसरे लफ़्ज़ों में ये कि वे
कश्मीर के मामले में सूरते-मौजूदा (status quo) को मान कर हिंदुस्तान से सामान्य संबंध क़ायम कर लें और मनफ़ी (destructive) सियासत का तरीक़ा छोड़कर सकारात्मक (positive) सियासत का तरीक़ा इख़्तियार करें। इस तरह उनकी तरक़्क़ी का वह दरवाज़ा खुल
जाएगा जो पिछले आधी सदी से भी ज़्यादा मुद्दत से उनके ऊपर बंद पड़ा हुआ है।
ख़ुलासा-ए-बहस
इक्कीसवीं
सदी में पहुंचकर अब वह आख़िरी वक़्त आ गया है कि तमाम मुस्लिम रहनुमा तौबा के शर'ई उसूल पर अमल करें।
वह अपनी दो
सौ साल की ग़लती को खुले तौर पर स्वीकार करें। और दावती मॉडल के उसूल पर अपने
इस्लामी अमल की नये सिरे से मंसूबा-बंदी (planning) करें।
इस एतराफ़ (स्वीकारोक्ति) और भूल को
ठीक करने के अमल से कम, कोई चीज़ मौजूदा विनाशकारी हालात
को बदलने वाली नहीं।
