उरूज और ज़वाल का क़ानून



उरूज और ज़वाल का क़ानून 


Source : AL-RISALA (Urdu) | July -2011 


क़ुरआन की सूरह अल-हदीद में उम्मत के उरूज और ज़वाल का क़ानून बताया गया है।

इसी विषय पर क़ुरआन की दो आयतों का आसान अनुवाद नीचे दिया जा रहा है:



क्या ईमान वालों के लिए वह वक़्त नहीं आया कि उनके दिल अल्लाह की नसीहत के आगे झुक जाएं। और उस हक़ के आगे जो नाज़िल हो चुका है। और वे उन लोगों की तरह न हो जाएं जिन्हें पहले किताब दी गई थीफिर उन पर लम्बी मुद्दत गुज़र गई तो उनके दिल सख़्त हो गए। और उनमें से अक्सर नाफ़रमान हैं।


जान लो कि अल्लाह ज़मीन को ज़िंदगी देता है उसकी मौत के बादहमने तुम्हारे लिए निशानियां बयान कर दी हैंताकि तुम समझो। 

(क़ुरआन, 57:16-17) 



क़ुरआन की इन आयात में फ़ितरत का एक क़ानून बताया गया है, लेकिन हैरानी की बात है कि क़ुरआन के व्याख्याकारों में से शायद ही किसी ने इस गहरे मतलब (मफ़हूम) को साफ़ तौर पर समझाया। 

मिसाल के तौर पर सय्यद क़ुतुब (मौत: 1966) ने इस आयत की तफ़सीर में लिखा है : 


"यह ज़रूरी है कि दिल हमेशा बेदार (जागृत) रहे, ताकि उसमें सुस्ती और बेपरवाही पैदा न हो।"


(फ़ी ज़िलाल अल-क़ुरआन, जिल्द-6, पेज-3489)

 

  

लेकिन असल में यह तफ़सीर (व्याख्या), प्राकृतिक नियम के ख़िलाफ़ है। इस तफ़सीर का मतलब ये निकलता है कि उम्मत पर कभी ज़वाल न आए, जबकि हक़ीक़त यह है कि ज़वाल का दौर आना फ़ितरत के तयशुदा नियम का हिस्सा है।     

किसी भी उम्मत को इस नियम से छूट नहीं मिली है — न यहूदियों को और न ही मुसलमानों को।

 

क़ुरआन की इन आयात में दरअसल फ़ितरत के उस क़ानून को बताया गया है जिसे "डी-जेनरेशन" (Degeneration) कहा जाता है।

 

इसका मतलब ये है कि मुसलमानों की आने वाली पीढ़ियों में भी “दिल सख़्त हो जाने” की वही कमज़ोरी पूरी तरह आ जाएगी जो इससे पहले यहूदियों में आ चुकी है।

 

इसके बाद, आयत में तम्सील (उदाहरण) के ज़रिए बताया गया है कि जब ऐसा हो तो उम्मत के विद्वानों (उलमा) और सुधार करने वालों को क्या करना चाहिए।

 

उन्हें वही करना चाहिए जो एक किसान अपनी बंजर ज़मीन के साथ करता है। पहले वह ज़मीन को तैयार करता है, उसे उपजाऊ बनाता है, इसके बाद वह उसमें बीज डालता है।

 


जान लो कि अल्लाह ज़मीन को ज़िंदगी देता है उसकी मौत के बाद, हमने तुम्हारे लिए निशानियां बयान कर दी हैं, ताकि तुम समझो। (क़ुरआन, 57: 17)


  

ठीक इसी तरह, उलमा (विद्वानों) और सुधारकों का काम यह होना चाहिए कि वे सबसे पहले उम्मत के अंदर शऊरी बेदारी पैदा करें। उसके बाद ही कोई अमली प्रोग्राम (व्यावहारिक योजना) को लागू करें। 

ज़वाल के बाद सुधार की शुरुआत का सही बिंदु (starting point) यही है।

 


लोगों के अंदर शऊरी बेदारी पैदा किए बिना, कोई भी अमली प्रोग्राम लागू करना कभी भी नतीजा देने वाला (result-oriented) नहीं हो सकता। 

  

शऊरी बेदारी का मतलब क्या है?


शऊरी बेदारी का मतलब है - उम्मत के अफ़राद के लिए इस्लाम को उनकी "री-डिस्कवरी" (नए सिरे/ नई नज़र से खोज) बनाना, 


उनके अंदर फ़िक्री इन्क़िलाब (वैचारिक बदलाव) लाना, 


उनके सामने इस्लाम की शिक्षाओं को ऐसे अंदाज़ में पेश करना जो सीधे उनके दिल और दिमाग़ को छू ले। यानी जो उनकी बेपरवाही और उदासीनता (बेहिसी) को, दुबारा संवेदनशीलता में तब्दील कर दे। उन्हें फिर से संवेदनशील और सजग (हस्सास) बना दे।


 

मिसाल के तौर पर मुसलमानों की मौजूदा नस्लों में आम तौर पर ज़वाल की वही हालत तारी हो चुकी है जिसका ज़िक्र क़ुरआन की बताई गई आयतों में किया गया है।

 

इस हालत की असली वजह यह है कि आज का दौर, “अक़्ल और तर्क (reason)का दौर है। आज का इंसान किसी भी बात को तब तक नहीं समझ पाता जब तक वह उसे “तर्क” (reasoning) से साबित न कर ले।  अगर किसी बात की तार्किक बुनियाद (rational basis) उसे न मिले, तो वह यह नहीं समझ पाता कि उस बात का आज के समय से क्या संबंध है, इसलिए वह उसे ज़िंदा समझ-बूझ (ज़िंदा शऊर) के साथ अपनाने में नाकाम रहता है।  

 


अब सूरतेहाल ये है कि पुराने ज़माने में जो किताबें लिखी गईं, वे सभी रिवायती (पारंपरिक) अंदाज़ में थीं, जबकि आज के दौर का इंसान “साइंटिफिक ज़ेहन” (scientific mindset) रखता है।

 

यही वजह है कि पुराने रिवायती लिटरेचर आज के आधुनिक-सोच वाले इंसानों को अपनी ओर खींच नहीं पाते। ऐसा लिटरेचर उन्हें बेमेल (irrelevant) नज़र आता है।

 

मौजूदा ज़माने में मुसलमानों के सोच-विचार में जो ज़वाल (फ़िक्री ज़वाल) नज़र आ रहा है, उसका असल कारण यही है। 

 

 

मौजूदा दौर में मुस्लिम दुनिया में सैकड़ों बड़ी बड़ी तहरीकें (आंदोलन) उठीं, लेकिन वे ज़वाल में पड़ी उम्मत को दुबारा ज़िंदा उम्मत नहीं बना सकीं। 

इसकी वजह यह थी कि इन तहरीकों ने मुसलमानों से उसी पुराने, रिवायती अंदाज़ (पुरानी शैली) में बात की, वे आधुनिक अंदाज़ में लोगों से बात नहीं कर सके।

 

और सबसे बड़ी बात,

 

इन तहरीकों ने मानसिक बदलाव (ज़ेहनी इन्क़िलाब) लाए बिना ही, उम्मत के सामने सीधे अमली प्रोग्राम (कार्रवाई की योजनाएँ) पेश कर दीं।

 

इस क़िस्म का काम करने का तरीक़ा यक़ीनी तौर पर बेनतीजा होने वाला था, क्योंकि यह ठीक वैसा ही था जैसे घोड़े के आगे गाड़ी बांध दी जाए (putting the cart before the horse)


 

फ़ितरी क़ानून (natural law) के मुताबिकइस तरह काम करने का अंजाम यही होना था — कि वह अमली तौर पर बेनतीजा हो कर रह जाए।




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