सब्र का फ़ायदा
Source : AL-RISALA (Urdu) | JUL - 2005
सामाजिक ज़िंदगी में अक्सर ऐसा होता है कि एक व्यक्ति को दूसरे से शिकायत हो जाती है। किसी की बात या उसके रवैये से दूसरे के मन में ग़ुस्सा और नफ़रत के जज़्बात पैदा हो जाते हैं। एक का कोई रवैय्या दूसरे के अंदर इंतिक़ामी (बदले की) जज़्बात भड़का देता है।
ऐसे मौक़े पर अक्सर लोग बदला के ज़ेहन से सोचने लगते हैं। वे समझते हैं कि अगर हम अपनी बेइज़्ज़ती पर चुप
हो जाएं तो ये हमारी ग़ैरत (स्वाभिमान) के ख़िलाफ़ होगा। उन्हें लगता है
कि चुप रहना अपने आत्मसम्मान
और ग़ैरत से सौदा करने जैसा होगा।
लेकिन यह सोच सही नहीं है।
हक़ीक़त यह है कि ऐसा मौक़ा बेइज़्ज़ती का
मौक़ा नहीं,
बल्कि अपने सोचने के स्तर और रूहानी हालत को बेहतर बनाने का
मौक़ा होता है।
ग़ुस्से की घड़ी में सब्र करना आसान नहीं, लेकिन यही वह मौक़ा होता है जब इंसान अपनी तर्बीयत कर (व्यक्तित्व को निखार) सकता है।
यह अपने अंदर ऐसी सलाहियत (क्षमता) पैदा
करने का मौक़ा है,
जिससे
आदमी अपनी अंदरूनी शख़्सियत को इतना मज़बूत बनाए कि वह बाहरी
हालात से असर लिए
बग़ैर ज़िंदा रह सके।
जो आदमी ग़ुस्सा, नफ़रत और उत्तेजना में बह जाए, वह अपने इस मिज़ाज से इस बात का सबूत दे रहा होता है कि वह बाहरी उकसावे के वक़्त ख़ुद को संभाल नहीं सका। ऐसे इंसान का ज़ेहनी (मानसिक) और रुहानी विकास का सफ़र रुक जाएगा, और उसकी शख़्सियत में सोच-विचार का सकारात्मक विकास का अमल भी जारी नहीं हो सकेगा।
इस दुनिया में पाने की सबसे बड़ी चीज़ यह है कि इंसान का सोच-विचार (फ़िक्र) लगातार तरक़्क़ी करता रहे। इसी सोच-विचार की तरक़्क़ी से रुहानी तरक़्क़ी भी जुड़ी हुई है।
जहाँ सोच-विचार का विकास (फ़िक्री
इर्तिक़ा)
होगा, वहां रुहानी तरक़्क़ी भी ज़रूर पाई जाएगी।
लेकिन यह सोच-विचार की तरक़्क़ी तब ही
मुमकिन है जब इंसान अपने आपको इतना ताक़तवर बना ले कि वह नकारात्मक सोच को अपने अन्दर
दाख़िल होने से रोक दे।
सब्र दरअसल वह क़ीमत है जो हमें अपनी सोच और रुहानी तरक़्क़ी के लिए चुकानी पड़ती है।
इस दुनिया में कोई भी चीज़ ज़रूरी क़ीमत के
बग़ैर नहीं मिलती। ठीक इसी
तरह मानसिक (फ़िक्री) और रुहानी तरक़्क़ी भी सिर्फ़ उस
ख़ुश-क़िस्मत इंसान का हिस्सा बनती है, जो सब्र की सूरत में उसकी क़ीमत दे सके।
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