क़ानून-ए-शरीअत, क़ानून-ए-रहमत

 AL-RISALA (Urdu) | JUNE-2010

क़ुरआन की सूरह नंबर-4 में कानून-ए-विरासत के जे़ल में एक आयत आई है। इसका तर्जुमा इस प्रकार है:

और अगर तक़्सीम के वक़्त रिश्तेदार और यतीम और मोहताज मौजूद हों तो इसमें से उन्हें भी कुछ दो और उनसे हमदर्दी की बात कहो।  (अल-निसा, 4:8)

 

इसका मतलब ये है कि मीरास (उत्तराधिकार में प्राप्त धन-संपत्ति) के बँटवारे के वक़्त अगर परिवार के कुछ ऐसे सदस्य वहां मौजूद हों, जिन्हें क़ानून के मुताबिक मीरास में हिस्सा नहीं मिलता तो उन्हें भी उस संपत्ति में से कुछ दे दो, उन्हें खाली हाथ न लौटाओ।

 

बज़ाहिर ये मीरास (विरासत) की एक आयत है, लेकिन इसमें दुआ के लिए एक अहम point of reference मिलता है।


जब एक मोमिन (ईमान वाला) इस आयत को पढ़ेगा तो वह तड़प उठेगा। वह  कहेगा कि "ख़ुदाया, यही मामला मेरा जन्नत की निसबत से है। मेरे पास कोई भी ऐसा अमल (कर्म) नहीं जो मुझे जन्नत का हक़दार बनाए। लेकिन मीरास की इस आयत में तूने यह उसूल बताया है कि जब विरासत बांटी जा रही हो, तो जो लोग हक़दार नहीं हैं, उन्हें भी शफ़क़त (दया) के आधार पर कुछ दिया जाए।"

 

क़ुरआन की इस आयत में एक बंदा-ए-मोमिन के लिए अज़ीम तस्कीन (तसल्ली) का सामान मौजूद है।

 

इस आयत को लेकर एक मोमिन बंदा यह दुआ कर सकता है, कि ख़ुदाया, मैं आख़िरी हद तक एक बे-माया (तुच्छ) इंसान हूँ, लेकिन क़ुरआन की ये आयत बताती है कि तेरी रहमत इतनी व्यापक (वसी) है कि वह उन लोगों तक भी पहुंचती है, जो इसके हक़दार नहीं हैं।

 

ख़ुदाया, तेरी यही रहमत मेरे लिए उम्मीद का सहारा है। तेरे इस उसूल के आधार पर मैं तुझसे सवाल करता हूं कि भले ही मैं इस लायक नहीं हूँ, फिर भी तू मुझे अपनी रहमतों में हिस्सेदार बना दे।

 

मेरे जैसे ग़ैर-मुस्तहक़ (अयोग्य) को भी तू उस जन्नत में जगह दे दे जो सिर्फ़ हक़दारों के लिए बनाई गई है।

 

मैं मानता हूं कि शरीअत के क़ानून के मुताबिक़, मैं जन्नत का हक़दार नहीं, लेकिन तू अपने रहमत के क़ानून के मुताबिक़, मुझे भी अपनी जन्नत में दाख़िल कर दे।



Hindi Translation : AL-RISALA (Urdu) | JUNE-2010


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