विनाशकारी राजनीति
Source : AL-RISALA(Urdu) | MAY-2011
पश्चिमी दुनिया के एक
मशहूर मुस्लिम वक्ता ने वहाँ के मुसलमानों की एक कॉन्फ़्रेंस में तक़रीर करते हुए
कहा:
ज़ालिम हुक्मराँ के ख़िलाफ़ बग़ावत,
ख़ुदा के लिए वफ़ादारी है।
Rebellion to a tyrant, obedience to God.
यह जुमला उस सोच का प्रतिनिधित्व करता है, जो इस्लाम की राजनीतिक व्याख्या (सियासी ता'बीर) से पैदा हुई है।
नई पीढ़ी के बहुत से
मुसलमान आमतौर पर इसी तरह की राजनीतिक व्याख्या से प्रभावित हैं। आज दुनिया में
जगह-जगह "इस्लामी इंक़िलाब" के नाम पर जो हंगामे जारी हैं, वे इसी सियासी सोच का नतीजा हैं।
इस क़िस्म की नाम-निहाद (तथाकथित) इंक़िलाबी सियासत हरगिज़
इस्लामी सियासत नहीं है।
अगर सख़्त लफ़्ज़ इस्तेमाल
किया जाए, तो यह कहना सही होगा कि यह इस्लाम के नाम पर एक शैतानी
सियासत है, जिसका पहला संस्थापक ख़ुद
शैतान है। आज जो लोग इस क़िस्म की सियासत का झंडा उठाए हुए हैं, असल में वे इस्लाम की नहीं बल्कि शैतान की पैरवी कर रहे
हैं।
विनाश की राजनीति
क़ुरआन में बताया गया है
कि जब इंसान की तख़लीक़ (सृष्टि) हो रही थी और अल्लाह तआला ने आदम को पैदा किया, तो उस वक़्त वहां आदम के अलावा दो और मख़लूक़ (प्राणी) मौजूद थे — फ़रिश्ते और
जिन्नात।
अल्लाह ने हुक्म दिया कि
“तुम लोग आदम के आगे झुक जाओ।”
फ़रिश्तों ने अल्लाह तआला
के इस हुक्म का पालन किया,
लेकिन इब्लीस (जिन्नात का सरदार) ने अल्लाह के इस हुक्म को
मानने से इंकार कर दिया। इसी बग़ावत की वजह से वह अल्लाह का नाफ़रमान और बाग़ी बन
गया।
यह इंसानी इतिहास में
अथॉरिटी के ख़िलाफ़ बग़ावत का पहला वाक़िया था। ये सियासी बग़ावत या पॉलिटिक्स ऑफ़
अपोज़िशन निस्संदेह शैतान की सुन्नत (रीति) है।
अथॉरिटी से टकराए बिना अपना काम करना — यह फ़रिश्तों का तरीक़ा है।
जबकि अथॉरिटी से टकराव करके, पॉलिटिक्स ऑफ़ अपोज़िशन का हंगामा खड़ा करना — यह शैतान का तरीक़ा है।
अजीब बात यह है कि शैतान
की यह मनफ़ी (नकारात्मक) सियासत पूरी तारीख़ में लगातार चलती रही है — ईमान वालों
के बीच भी और ग़ैर-ईमान वालों के बीच भी।
इस मनफ़ी (negative) सियासत का यह सीधा नतीजा है कि इंसानी इतिहास, निर्माण और तरक्क़ी का इतिहास बनने के बजाय, ज़्यादातर तबाही और विनाश का इतिहास बन गया।
अब बड़ा सवाल यह है कि ऐसा
क्यों हुआ कि पूरी इंसानी तारीख़ (इतिहास) इस क़िस्म की शैतानी सियासत की तारीख़ बन गई?
इसका कारण यह है कि
ख़ालिक़ (अल्लाह) ने इंसान को एक असाधारण सलाहियत (क्षमता) दी है, जिसे ईगो (ego) कहते हैं। ये दरअसल ईगो ही है
जो इंसान को पूरी कायनात में एक ख़ास दर्जा अता करता है।
लेकिन ईगो (ego) के दो पहलू हैं —
एक “प्लस पॉइंट”,
और दूसरा “माइनस पॉइंट”।
इंसानी समाज में, चाहे वह परिवार के अंदर की ज़िंदगी हो या बाहर की, हर जगह इंसान ऐसे हालात और तजुर्बे से गुज़रता है जहाँ उसका ईगो (अहंकार) जाग उठता है।
इस तरह के
मौक़े पर अगर ऐसा हो कि इंसान अपने आप को कंट्रोल करे, वह ईगो मैनेजमेंट (Ego Management) का सबूत दे, तो गोया कि उसने अपने ईगो का सही इस्तेमाल किया।
और अगर ऐसा हो कि जब उसका
ईगो भड़के तो उसकी पूरी शख़्सियत (व्यक्तित्व) उससे प्रभावित हो जाए,
तो ऐसी हालत में वह सरकशी (दुष्टता) के रास्ते पर चल पड़ेगा।
यह उसके लिए ईगो मैनेजमेंट में नाकाम होने का वाक़ि'आ होगा।
ईगो (Ego) का यह वाक़ि'आ इंसान के बीच हर जगह पेश आ रहा है। यही वाक़ि'आ जब सियासी मैदान में पेश आए, तो इसी का नाम पॉलिटिक्स ऑफ़ अपोज़िशन है, इसी का नाम पॉलिटिकल अथॉरिटी (सत्ता) को चैलेंज करना है।
चूँकि ज़्यादातर लोग ईगो मैनेजमेंट के इम्तिहान में नाकाम हो जाते हैं, इसलिए पूरे इंसानी इतिहास में वो मंज़र (दृश्य) दिखाई देता है, जिसे सियासी तबाही (Political Destruction) के अल्फ़ाज़ में बयान किया जा सकता है।
इस मसले का हल
क़ुरआन और हदीस में इस
मसले का हल, “सब्र की सियासत” बताया गया
है।
सब्र की सियासत कोई पीछे
हटने की सियासत नहीं है।
सब्र की सियासत असल में
पॉलिटिकल स्टेटस कोइज़्म (Political Status Quoism) का दूसरा नाम है, यानी राजनीतिक सत्ता के मामले में मौजूदा स्थिति को
व्यवहारिक रूप से क़बूल करना और सत्ता से टकराए बिना, ग़ैर-राजनीतिक मैदान में मौजूद मौक़ों का पूरा इस्तेमाल
करना।
यही वह फ़ॉर्मूला है जिसे
हदीस में इन अल्फ़ाज़ (शब्दों) में बयान किया गया है:
(तर्जमा): "अल्लाह, ग़ैर-टकराव (non-confrontation) के तरीक़े पर वह चीज़ अता करता है, जो वह टकराव के तरीक़े पर किसी को नहीं देता।"
(सहीह मुस्लिम, हदीस नंबर: 2593)
