मुस्लिम इतिहास के तीन दौर

 


मुस्लिम इतिहास के तीन दौर


AL-RISALA (Urdu) | Mar-2011



समीकरण (equation) के हिसाब से, मुस्लिम इतिहास के तीन दौर हैं —


पहला दौर वह है जो रसूल (पैग़ंबर) और सहाबा (पैग़ंबर के साथियों) के ज़माने से जुड़ा है।


दूसरा दौर वह है जब मुसलमानों ने दुनिया में अपना साम्राज्य (एम्पायर) बना लिया था। यह दौर आठवीं सदी ईसवी से लेकर सत्रहवीं सदी ईसवी तक जारी रहा।


तीसरा दौर वह है जिसे नव-औपनिवेशिक दौर (Colonial Period) कहा जाता है। यह दौर अठारहवीं सदी ईसवी में शुरू हुआ और बीसवीं सदी के बीच में आकर ख़त्म हो गया।

मगर दिलो-दिमाग़ के पहलू से देखें तो आज के ज़माने के मुसलमान अभी भी इसके असर के तहत जी रहे हैं।


 

मुस्लिम इतिहास के पहले दौर में मुस्लिम और ग़ैर-मुस्लिमों के बीच जो समीकरण था, वह दा'1-मद'2 (दावत देने वाले और दावत पाने वाले) का समीकरण था।


इस दौर में मुसलमान सकारात्मक सोच के साथ जीते थे। दूसरी क़ौमें उनके लिए ख़ैरख़्वाही (भलाई) का विषय बनी हुई थीं।

 


दूसरे दौर में यह समीकरण बदल गया। अब मुसलमानों और दूसरी क़ौमों के बीच हाकिम (शासक) और महकूम (शासित) का समीकरण क़ायम हो गया।


इस शासक-शासित समीकरण के दौर में मुसलमान बरतरी (श्रेष्ठता) की भावना के शिकार हो गए। वह दूसरी क़ौमों के मुक़ाबले में ख़ुद को बेहतर समझने लगे। 


 

मुस्लिम इतिहास का तीसरा दौर वह है जब नव-औपनिवेशिक ताक़तों (Colonial Powers) ने मुसलमानों के सियासी साम्राज्य का ख़ात्मा कर दिया। अब मुसलमानों के बीच समीकरण का तीसरा दौर आया। 


अब मुसलमान ख़ुद को मज़लूम (पीड़ित) और दूसरी क़ौमों को ज़ालिम (अत्याचारी) समझने लगे।


इस तीसरे दौर के आने पर मुसलमान आम तौर पर नकारात्मक सोच का शिकार हो गए। इस दौर में मुसलमानों के अंदर स्वभाव की उग्रता, शिकायत और एहतिजाज (protest) का मिज़ाज पैदा हो गया। यह मिज़ाज बढ़ते-बढ़ते उस हद तक पहुँच गया, जिसे हिंसा (Violence) कहा जाता है।

 

मौजूदा ज़माने के मुसलमान आम तौर पर इसी तीसरे दौर में जी रहे हैं। 

यह दौर, दूसरे लफ़्ज़ों में, नफ़्सियाती ख़ुदकुशी (Psychological Suicide) का दौर है।


आज सबसे बड़ी ज़रूरत यह है कि मुसलमानों को इस ख़तरनाक सोच से बाहर निकाला जाए।



और  पढ़ें →




दा'1: ईश्वर की सृजन योजना (Creation plan of God) से परिचित वह व्यक्ति जो ईश्वर के संदेश से लोगों को अवगत कराता है।


मद'2: वह व्यक्ति जिसे ईश्वर के संदेश से अवगत कराना है या अवगत कराया जाता है।



Post a Comment

Previous Post Next Post