ग़ैर-ख़ुदा में जीना
Source : AL-RISALA (Urdu) | MAR - 2011
मौजूदा ज़माने के मुसलमानों का केस एक लफ़्ज़ में यह है कि — वे ख़ुदा में जीने वाले नहीं बने, वे ग़ैर-ख़ुदा (दूसरी चीज़ों) में जी रहे हैं।
यही वह बुनियादी वजह है जिसने तमाम मुसलमानों को नकारात्मक सोच (नेगेटिव थिंकिंग) में मुब्तिला कर दिया है।
मौजूदा ज़माने के मुसलमानों में नेगेटिव थिंकिंग इतनी ज़्यादा आम हो चुकी है कि मुश्किल से ही कोई औरत या मर्द इससे अछूता नज़र आएगा।
उनका लिखना और बोलना— सब का सब, उनकी नेगेटिव थिंकिंग का इज़हार है।
आख़िर नकारात्मक सोच की वजह क्या है ?
नेगेटिव थिंकिंग दरअस्ल शिकायत के नतीजे में पैदा होती है।
हर मुसलमान इसी तरह की शिकायतों में जीता है। इन्हीं शिकायतों ने हर मुसलमान को नेगेटिव थिंकिंग का शिकार बना दिया है।
मगर नेगेटिव थिंकिंग कोई सादा मामला नहीं है।
Making one's
concern something else other than God.
हक़ीक़त यह है कि ख़ुदा को पाना, सबसे बड़ी चीज़ को पाना है।
जिस आदमी को ख़ुदा की पहचान (discovery of God) हो जाए, उसकी सोच इतनी ऊँची हो जाती है कि हर दूसरी चीज़ उसकी नज़र में हक़ीर (छोटी) बन जाती है। किसी चीज़ का खोना या पाना — दोनों उसकी नज़र में बराबर हो जाते हैं।
वह इस नफ़्सियात
(मनोदशा) में जीने लगता है कि —
तुम जो चीज़ चाहो मुझ से छीन लो, लेकिन तुम ख़ुदा को मुझसे नहीं छीन सकते:
You can take away from me whatever you want to, but you cannot take God away from me.
यही नफ़्सियात (सोच) एक मोमिन
को आख़िरी हद तक पॉज़िटिव थिंकिंग वाला
इंसान बना देती है।
किसी के ख़िलाफ़ नफ़रत का एक ज़र्रा भी उसके अंदर बाक़ी नहीं
रहता।
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