मानव इतिहास के पाँच युग

 AL-RISALA (Urdu) | January-2011

अल्लाह तआला ने इंसान को पैदा किया और विशेष व्यवस्था के साथ उसे धरती (Planet Earth) पर बसाया। इंसान को सही राह दिखाने के लिए अल्लाह ने लगातार पैग़ंबर भेजे। इस नबुव्वत के सिलसिले के आख़िरी पैग़ंबर हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) हैं। इसके बाद, दावत-ए-इल-अल्लाह का इतिहास अलग-अलग युगों से से गुज़रता रहा।

21वीं सदी में यह इतिहास अपने आख़री दौर में पहुँच चुका है। इस आख़री दौर के बाद क़यामत बरपा होगी और फिर इंसानी इतिहास के पूरा होने का वह दौर शुरू हो जाएगा जिसको जन्नत का दौर कहा गया है।

 

इंसानी इतिहास के ये पाँच युग इस प्रकार हैं:

1. ऐलान हक़

(proclamation of divine truth)

2. इज़हार-ए-दीन

(reprocessing of hisotry)

3. ताईद-ए-दीन 

(supporting role)

4. इदख़ाल-ए-कलिमा 

(global dawah)

5. दौर-ए-जन्नत 

(age of eternal paradise)

 

1.  ऐलान-ए-हक़

(proclamation of divine truth)

दावत के दृष्टिकोण से मानव इतिहास का पहला दौर (युग) हज़रत आदम अलैहिस्सलाम से शुरू हुआ, जो पहले इंसान (First Man) भी थे और पहले पैग़ंबर भी। इस पहले युग का अंत आख़िरी पैग़ंबर हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) के ज़हूर (आगमन) पर हुआ। आप ने 610 ईस्वी में अपनी नबुव्वत का आग़ाज़ किया। इस पहले दौर में जो काम अंजाम पाया, वह  बुनियादी तौर पर ये था कि *हर नस्ल के इंसानों को वह्य (Revelation) पर आधारित सच्चाई से आगाह कर दिया जाये।*

 

आख़िरी पैग़ंबर हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) के ज़माने में अल्लाह की किताब क़ुरआन पूरी तरह से एक *महफ़ूज़ किताब* (Preserved Book) बन गई। *बाद के दौर में ये महफ़ूज़ किताब, हिदायत पाने के लिए पैग़ंबर का बदल बन गई।*  इसी कारण, आख़िरी पैग़ंबर के बाद अल्लाह की तरफ़ से कोई पैग़ंबर नहीं भेजा गया।


2.  इज़्हार-ए-दीन

(reprocessing of history)

दूसरे दौर के काम को क़ुरआन में "इज़्हार-ए-दीन" (सूरा फ़तह, 48:28) कहा गया है। यह काम बुनियादी तौर पर सातवीं सदी ईसवी में अस्हाब-ए-रसूल (पैग़ंबर के साथियों) की ताक़तवर टीम की कोशिशों से पूरा हुआ। 

अस्हाब-ए-रसूल जिनकी तादाद लगभग डेढ़ लाख थी, इन्होंने, और उनके बाद ताबेईन (सहाबा के शिष्य) की जमाअत ने इस काम को बख़ूबी तौर पर अंजाम दिया।


इस काम की ख़ास अहमियत को अगर मज़हबी इस्तिलाह (धार्मिक भाषा) में बयान किया जाये तो यह कहा जाएगा कि उन्होंने दौर-ए-शिर्क को ख़त्म करके दौर-ए-तौहीद का आग़ाज़ किया। और अगर इस काम को सेक्युलर इस्तिलाह में बयान किया जाए तो ये कहा जाएगा कि उन्होंने तवह्हुम-परस्ती (superstition/ अंधविश्वास) के दौर को ख़त्म किया और साइंस के दौर की बुनियाद रखी।


सहाबा और ताबेईन  के इस अमल का मतलब यह नहीं था कि उन्होंने अपनी ज़िंदगी में सारे काम को सीधे तौर पर अंजाम दे दिया। उनके रोल की असल अहमियत यह है कि उन्होंने इंसानी तारीख़ में एक नया प्रोसेस (process) शुरू किया। ये प्रोसेस तक़रीबन एक हज़ार साल में अपनी आख़िरी तकमील (culmination) तक पहुंचा।

इसके नतीजे में दुनिया में दावत के मुवाफ़िक़ हालात पैदा हुए। जैसे कि मज़हबी आज़ादी आई, जम्हूरियत (लोकतंत्र) का ज़माना आया, वास्तविकता पर आधारित सोच (हक़ीक़त-पसंदी), यानी साइंसी तर्ज़े-फिक्र (वैज्ञानिक सोच) का रिवाज शुरू हुआवग़ैरा।


उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के बीच ज़हूर में आने वाला साइंसी इंक़लाब दरअसल इसी प्रोसेस की तकमील है जो सातवीं सदी ईसवी में सहाबा और ताबेईन के ज़रिये अरब में शुरू हुआ और फिर धीरे-धीरे यूरोप तक पहुंचा।


3.  ताईद-ए-दीन

(supporting role)

इस तारीख़ी अमल का तीसरा दौर वह है जिसे हदीस में "ताईद-ए-दीन" (दीन का समर्थन) कहा गया है। ऊपर वर्णित काम को अंजाम देने के बाद अब ज़रूरत थी कि ख़ुदाई सच्चाई को ज़मीन पर बसने वाले तमाम इंसानों तक पहुंचा दिया जाये। मगर इस आलमी दावत को अंजाम देने के लिए इम्तिहान की इस दुनिया में ज़रूरी साधनों की ज़रूरत थी। ख़ासतौर पर ऐसे संचार के साधन, जिनकी मदद से पैग़ाम को आलमी सतह पर पहुंचाना मुम्किन हो सके।

आलमी (वैश्विक) दावत के लिए ऐसे संचार व्यवस्था को वजूद में लाने का काम मुसलमान अंजाम न दे सके। इसलिए अल्लाह तआला ने इस मक़सद के लिए मग़रिब (पश्चिम) की ग़ैर-मुस्लिम क़ौमों को इस्तेमाल किया।  ये गोया कि वही तरीक़ा है जिसे मौजूदा ज़माने की ज़बान में आउटसोर्सिंग (outsourcing) कहा जाता है।

मग़रिबी (पश्चिमी) क़ौमों ने लंबी जद्द-ओ-जहद (भरपूर कोशिश) के बाद एक नया दौर शुरू किया। यह दौर, Age of Communication है जो आलमी पैग़ाम-रसानी के लिए बेहद ज़रूरी है।


इन अनुकूल साधनों के उपलब्ध होने के बाद यह मुम्किन हो गया कि प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का इस्तेमाल करके ख़ुदा के कलाम को सारी दुनिया के तमाम इंसानों तक पहुंचा दिया जाये।


आउटसोर्सिंग के इस तरीक़े को हदीस में पहले ही बयान कर दिया गया था। एक लंबी हदीस में इस उसूल को इन शब्दों में बताया गया:

"अल्लाह बेशक इस दीन की ताईद (सहायता) फ़ाजिर इंसान के ज़रिये भी करेगा।"

 


4.  इदख़ाल-ए-कलिमा

(global dawah)

इदख़ाल-ए-कलिमा से मुराद वह दावती अमल है, जिसे हदीस में इन अल्फ़ाज़ में बयान किया गया है:

तर्जमा : ज़मीन की सतह पर कोई छोटा या बड़ा घर नहीं बचेगा, मगर अल्लाह उसके अंदर इस्लाम का कलिमा दाख़िल कर देगाइज़्ज़त वाले की इज़्ज़त के साथ और ज़िल्लत वाले की ज़िल्लत के साथ (willingly or unwillingly)

 (मुस्नद अहमद, जिल्द-6, पेज-4)


पिछली सदियों में ख़ुदा का दीन अपने मुस्तनद मतन (authentic text) के एतबार से पूरी तरह महफ़ूज़ हो गया। उसके बाद दुनिया में मज़हबी आज़ादी (religious freedom) का दौर अपने तमाम पहलुओं के साथ क़ायम हो गया। इसके बाद अगला काम ये हुआ कि दुनिया में आधुनिक संचार (modern communication) का ज़माना पूरी तरह आ गया।


इन मुवाफ़िक असबाब (अनुकूल साधनों) के उपलब्धता के बाद अब 21वीं सदी में आख़िरी तौर पर जो काम अंजाम पाना है, वह यह है कि **इदख़ाल-ए-कलिमा** की भविष्यवाणी (पेशीनगोई) पूरी हो और संचार के आधुनिक साधनों का इस्तेमाल करते हुए अल्लाह का कलाम पूरी दुनिया के तमाम मर्दों और औरतों तक पहुंचा दिया जाए।


तारीख़-ए-दावत के पहले दौर का काम (एलान-ए-हक़) ख़ुदा के पैग़म्बरों के ज़रिये अंजाम पाया।

दूसरे दौर का काम (इज़हार-ए-दीन) बुनियादी तौर पर उन लोगों ने अंजाम दिया जिन्हें सहाबा-ए-रसूल कहा जाता है।

तीसरे दौर का काम (ताईद-ए-दीन) उन लोगों ने अंजाम दिया जिन्हें हम साइंसदानों के गिरोह (scientific community) के नाम से जानते हैं। 


चौथे दौर का काम (इदख़ाल-ए-कलिमा) अब 21वीं सदी ईसवी में अंजाम पाना है।


जो अहल-ए-ईमान तारीख़-ए-दावत के इस तक़ाज़े (आवश्यकता) को समझें और इसे सही तरीक़े से अंजाम दें, वे हदीस की पेशीनगोई के मुताबिक अल्लाह के यहां इख़वान-ए-रसूल (रसूल के भाइयों) का दर्जा पाएंगे। इसी चौथे काम की अंजामदेही (पूरा होने) पर तारीख़ (इतिहास) का ख़ातमा हो जाएगा। 

 


5.  अबदी जन्नत का दौर 

(age of eternal paradise)

21वीं सदी ईसवी में ऐसे स्पष्ट आसार पैदा हो चुके हैं जो लगभग यक़ीनी तौर पर बताती हैं कि क़ियामत बिलकुल क़रीब आ चुकी है। संभवतः 21वीं सदी में ही वह समय आ जाएगा जब इसराफ़ील का सूर फूंका जाये और इंसानी तारीख़ दौर-ए-इम्तिहान से निकलकर दौर-ए-अंजाम (परिणाम के दौर) तक पहुंच जाये।


इसके बाद वह अबदी दौर (शाश्वत युग) शुरू होगा, जब इम्तिहान में पूरा उतरने वाले लोग जन्नत की बेहतरीन (मेयारी) दुनिया में दाख़िल कर दिए जाएं, और वही, इम्तिहान में नाकाम होने वाले लोग जहन्नम की तकलीफदेह (कष्टदायक) ज़िंदगी में डाल दिए जाएं, जहां वे हमेशा-हमेशा के लिए हसरत (पछतावा) और मायूसी में पड़े रहें।

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