क़ुरआन की तिलावत | क़ुरआन की दावत

AL-RISALA (Urdu) | OCT-2011 

इस्तांबुल (तुर्की) के मशहूर टॉपकापी पैलेस (Topkapi Palace) म्यूज़ियम में पैग़म्बर मुहम्मद रसूलुल्लाह (सल्ल०) से जुड़ी हुई कई चीज़ें मौजूद हैंजैसे: दो तलवारेंजुब्बा (पोशाक)मक़ूक़िस के नाम आपका ख़तवग़ैरह। 

उस्मानी सुल्तान सलीम ने इन चीज़ों के लिए यहां एक ख़ास कमरा बनवाया था। इस कमरे में सुल्तान सलीम ख़ुद अपने हाथों से झाड़ू लगाते थे।

इसके अलावाउन्होंने इस कमरे में अलग-अलग कई हाफ़िज़-ए-क़ुरआन को नियुक्त किया थाजो चौबीसों घंटे यहां क़ुरआन की तिलावत (पाठ) करते रहते थे। हाफ़िज़ों की ड्यूटियां तय थींऔर वे बारी-बारी से यहां आकर क़ुरआन की तिलावत करते रहते थे।

 

इस प्रकार की क़ुरआन की तिलावत सिर्फ़ बाद के ज़माने की पैदावार है।

 

अल्लाह के रसूल पैग़म्बर मुहम्मद और उनके साथियों (सहाबा) के ज़माने में इस तरह की तिलावत-ए-क़ुरआन (कुरआन पढ़ने का तरीक़ा) का कोई वजूद नहीं था। रसूल और उनके साथीक़ुरआन को अल्लाह का पैग़ाम पहुंचाने वाली किताब (दावत की किताब) के तौर पर इस्तेमाल करते थेन कि सिर्फ़ तिलावत की किताब के तौर पर।

 

हक़ीक़त यह है कि क़ुरआन रहनुमाई लिए उतरा है। इसे इसलिए नहीं उतारा गया कि इसे सिर्फ़ "बरकत" के तौर पर सुबह-शाम पढ़ा जाता रहे।


क़ुरआन के सिलसिले में असल करने का काम यह है कि इस पर ईमान रखने वाले इससे अपनी ज़िंदगी के लिए रहनुमाई (guidance) हासिल करें। और फिर क़ुरआन का अलग-अलग भाषाओं में अनुवाद तैयार करके उसे तमाम इंसानों तक पहुंचाएं।

इसके सिवा क़ुरआन का कोई भी दूसरा इस्तेमाल उसके हक़ को अदा नहीं कर सकता। 

क़ुरआन का सम्मान करनाउसे ख़ूबसूरत कपड़े में लपेटकर रखनाया दिन-रात क़ुरआन की तिलावत (पाठ) करना— इस क़िस्म का कोई भी अमल क़ुरआन का हक़ अदा करने के लिए काफ़ी नहीं।


 

क़ुरआन में बताया गया है कि उम्मत बाद के ज़माने में क़ुरआन को किताब-ए-महजूर (छोड़ी हुई किताब) बना देगी (25:30)

इसका मतलब है यह है कि लोग क़ुरआन को उसके असल मक़सद से अलग कर देंगे। वे न तो अपनी ज़िंदगी के लिए उसे राह दिखाने वाली (हिदायत की) किताब मानेंगे, और न ही उसे दूसरों तक अल्लाह का पैग़ाम पहुँचाने की किताब समझेंगे।

जब ऐसा होगा, तो यही वह हालत है जिसे किताब-ए-महजूर यानी छोड़ी हुई किताब बना देना कहा गया है। 

 

क़ुरआन की असल हैसियत यह है कि वह अपने लिए हिदायत (राह दिखाने) की किताब है और दूसरों तक अल्लाह का पैग़ाम पहुँचाने की किताब।


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