जज़्बात को ठेस पहुँचना
Source : AL-RISALA (Urdu) | SEPT -2006
मौजूदा ज़माने के मुसलमानों
में एक नई बात आम हो गई है। वो है -
“जज़्बात को ठेस पहुँचना।”
अक्सर ऐसा होता है कि कोई
ऐसी घटना हो जाती है जो मुसलमानों के क़ौमी जज़्बात (भावनाओं) के
ख़िलाफ़ मानी जाती है। ऐसे मौक़े पर मुसलमान भड़क उठते हैं, और विरोध प्रदर्शन या सड़कों पर उतरकर नारेबाज़ी और तोड़फोड़ जैसी
कार्रवाई करने लगते हैं।
मुस्लिम बुद्धिजीवी ये कह
कर इसको जायज़ बताते हैं कि इस घटना से मुसलमानों की भावनाओं (जज़्बात) को
ठेस पहुंची और जब उनके जज़्बात को ठेस पहुँचेगी तो
स्वाभाविक तौर पर वे ग़ुस्से में आ जाएंगे और प्रदर्शन करेंगे, चाहे वह हिंसा तक क्यों न पहुँच जाए। लेकिन यह
दलील पूरी तरह ग़ैर-इस्लामी है।
अगर मुसलमान अपने “क़ौमी
जज़्बात” के नाम पर प्रदर्शन करें तो शायद किसी को एतराज़ न हो। लेकिन जब वे
शोर-शराबे वाले प्रदर्शन “इस्लामी ग़ैरत” (धार्मिक आत्मसम्मान) या “इस्लामी हमीयत” (इस्लामी स्वाभिमान) के नाम पर करते हैं, तो
यह एक ग़लत काम ठहरता है, क्योंकि इस मामले में इस्लाम
की तालीम पूरी तरह से इसके ख़िलाफ़ है।
क़ुरआन की वाज़ेह (स्पष्ट) तालीम के मुताबिक़, ये ख़ुद मुसलमानों का फ़र्ज़ है कि वो दूसरों के जज़्बात को ठेस न पहुँचाएँ।
और जहाँ तक दूसरों की भड़काऊ बातों का सवाल है, तो उस पर मुसलमानों के लिए सब्र और नज़रअंदाज करने का हुक्म है, न कि भड़क कर उसके ख़िलाफ़ हंगामा करना।
इस मामले को समझने के लिए
क़ुरआन की दो आयतों पर ग़ौर कीजिए। इन दोनों आयतों का अनुवाद यहाँ दिया जा रहा है:
पहली आयत :
“और अल्लाह के सिवा जिन्हें ये लोग पुकारते हैं उन्हें गाली न दो वर्ना ये लोग हद से गुज़र कर जहालत की बुनियाद पर अल्लाह को गालियां देने लगेंगे। इसी तरह हमने हर गिरोह की नज़र में उसके अमल को ख़ुशनुमा बना दिया है। फिर उन सबको अपने रब की तरफ़ पलटना है। उस वक़्त अल्लाह उन्हें बता देगा जो वे करते थे।”
(सूरह अल-अनआम, 6: 108)
दूसरी आयत :
दूसरी आयत :
“जब इंकार करने वालों ने अपने दिलों में हमिय्यत पैदा की, जाहिलियत की हमिय्यत, फिर अल्लाह ने अपनी तरफ़ से सकीनत (शांति) नाज़िल फ़रमाई अपने रसूल पर और ईमान वालों पर, और अल्लाह ने उन्हें तक़वा (ईशपरायणता) की बात पर जमाए रखा और वे उसके ज़्यादा हक़दार और उसके अहल थे। और अल्लाह हर चीज़ का जानने वाला है।”
(सूरह अल-फ़त्ह 48: 26)
पहली आयत से मालूम होता है कि मुसलमानों को चाहिए कि वो अपने आप को इससे बचाएँ कि वो दूसरों के पूज्य देवताओं या उनके धार्मिक प्रतीकों को बुरा-भला कहें। ऐसा करने का नतीजा यह हो सकता है कि वे रद्द-ए-अमल (प्रतिक्रिया) का शिकार हो जाएँ और जवाब में मुसलमानों के दीन और धार्मिक प्रतीकों को बुरा-भला कहने लगें।
इसलिए इस आयत में
मुसलमानों को साफ़-साफ़ हिदायत दी गई है कि उन्हें अपने जज़्बात (भावनाओं) पर कंट्रोल करना है।
उन्हें न लिखित तौर पर और न ही बोलचाल में ऐसी कोई बात कहनी है, जो
दूसरों के लिए उकसावे का कारण बने, और जिसका नतीजा यह हो कि
वे भड़क उठें और मुसलमानों के दीन के ख़िलाफ़ नकारात्मक बातें बोलने लगें।
इस आयत में मुसलमानों को इस बात से रोका गया है कि वे दूसरों के जज़्बात (भावनाओं) को ठेस पहुँचाएँ।
दूसरी आयत सुलह-ए-हुदैबिया (हुदैबिया की संधि) के मौक़े से जुड़ी है।
इस मौक़े पर विरोधी पक्ष ने बहुत उकसाने वाली बातें कीं।
मिसाल के तौर पर, उन्होंने समझौते की लिखावट में 'रसूलुल्लाह'(अल्लाह के रसूल) के लफ्ज़ पर सख़्त ऐतराज़ जताया और पैग़म्बर साहब और उनके साथियों को मजबूर किया कि वे इस शब्द को समझौते के दस्तावेज़ से हटा दें वग़ैरह।
इन बातों से मुसलमानों के जज़्बात को ठेस पहुँची थी। लेकिन अल्लाह की हिदायत के
मुताबिक़, उन्होंने अपने जज़्बात को क़ाबू में रखा।
इस आयत के मुताबिक़, मुसलमानों
को चाहिए कि वे ख़ुद अपने आपको ईमान और तक़्वा (परहेज़गारी) की राह पर क़ायम रखें। ये
कोई सही बात नहीं है कि मुसलमान दूसरों से ये माँग करें कि “तुम हमारे जज़्बात को
ठेस मत पहुँचाओ।” यही इस्लाम का उसूल है और यही अक़्ल की माँग भी।
यहाँ ये सवाल पैदा होता है
कि क़ुरआन में ऐसी तालीम क्यों दी गई है जो ऊपर से देखने में ना-बराबरी की तालीम
मालूम होती है। यानी मुसलमानों को भड़कने से रोकना, और दूसरों
की भड़काऊ हरकतों पर मुसलमानों को सब्र और नज़रअंदाज करने की सलाह देना।
इस तरह का “एकतरफ़ा नैतिक
ज़िम्मेदारी और सही आचरण” इस्लाम में क्यों रखा गया है?
इसका जवाब क़ुरआन की दूसरी
आयतों के अध्ययन से मालूम होता है।
क़ुरआन में बार-बार ये
हुक्म दिया गया है कि तुम सब्र की रविश अपनाओ। तुम सब्र से मदद लो (इस्त’ईनू बिस्सब्र)। इसी तरह फ़रमाया कि तुम
उनकी तकलीफ़ देने वाली बातों को नज़रअंदाज़ करो और अल्लाह पर भरोसा रखो।
क़ुरआन में इस तरह की बहुत
सी आयतें हैं जो ये तालीम देती हैं कि मुसलमान, विरोधी पक्ष के मुक़ाबले में जवाबी
कार्रवाई (रिएक्शन) का तरीक़ा न अपनाएं, बल्कि एकतरफ़ा
तौर पर अपने आप को सब्र और सहनशीलता की रविश पर क़ायम रखें।
इस “एकतरफ़ा नैतिकता” (अख़लाक़ियात) का असली मतलब क़ुरआन की एक और आयत से मालूम होता है।
“वतर्जून मिनल्लाहि मा ला यर्जून”
(अन-निसा: 104)
और तुम अल्लाह से वह उम्मीद रखते हो जो उम्मीद वे नहीं रखते।
(अन-निसा: 104)
यानी सब्र का रविश का
महत्व विरोधियों को मालूम नहीं। क्योंकि वे सिर्फ़ इसी दुनिया को सब कुछ समझते
हैं। इसके विपरीत, तुम्हारा मामला ये है कि तुम आख़िरत (परलोक) पर यक़ीन रखते हो।
तुम्हें यक़ीन है कि तुम्हारे सब्र की रविश का इनाम, बे-हिसाब
मिक़दार में आख़िरत में मिलेगा।
ये मामला कोई रहस्यमयी
मामला नहीं है। असल में, मुसलमानों को अल्लाह की तरफ़ से एक “आलमी
मिशन” सौंपा गया है, और
इसी आलमी मिशन की अदायगी पर उनसे जन्नत का वादा किया गया है।
यह मिशन दावत-इलल्लाह (लोगों को अल्लाह की ओर
बुलाना) है। इस दावती काम के लिए दोनों पक्षों के बीच संतुलित और
शांतिपूर्ण रिश्ते बेहद ज़रूरी हैं।
दोनों के बीच संतुलित और
शांतिपूर्ण रिश्तों के बिना दावत का अमल, प्रभावी ढंग से जारी नहीं रह सकता। सब्र और
संयम की एकतरफ़ा राह अपनाने का मक़सद और हिकमत यही है।
साबिराना रविश के ज़रिए ही
ये मुमकिन है कि दोनों पक्षों (मुसलमानों और दूसरों) के बीच सामान्य और
शांतिपूर्ण रिश्ते क़ायम हों, जिससे मुसलमान अपने उस दावती अमल को
अंजाम दे सकें, जिसके लिए उन्हें इस दुनिया में कामयाबी
और आख़िरत में जन्नत का वादा किया गया है।
यह अंजाम सिर्फ़ ईमान
वालों के लिए तय किया गया है। इसलिए, यह ईमान वालों की ज़िम्मेदारी है कि
वे दोनों पक्षों के बीच रिश्तों को नार्मल और शांतिपूर्ण बनाए रखें, ताकि अल्लाह के वादे के मुताबिक़ वे बड़े ख़ुदाई इनामों (जन्नत) को हासिल कर सकें।
यहाँ जिस “दोतरफ़ा रवैये”
की बात की गई है, वह कोई आसान बात नहीं है। यह असल में
एक मक़सद रखने वाले इंसान का तरीक़ा है।
एक बा-मक़सद इंसान
का तरीक़ा यह होता है कि वह
अपने रवैये का फैसला दूसरों के रवैये को देखकर प्रतिक्रिया (रिएक्शन) के
तौर पर नहीं करता, बल्कि उसका तरीक़ा यह होता है कि वह
दूसरों की नापसंद बातों से प्रभावित हुए बिना यह सोचता है कि उसके बड़े मक़सद के
लिहाज से उसके लिए सही रवैया क्या है। वह कौन-सा रास्ता है जो उसके भविष्य के लिए
ज़्यादा फ़ायदेमंद साबित हो सकता है।
यही सोच बा-मक़सद इंसान को
मजबूर करती है कि वो सिर्फ़ ग़ुस्से या भावनाओं (जज़्बात) में आकर कोई क़दम न उठाए, बल्कि
सोच-समझकर, योजनाबद्ध तरीक़े से अपने क़दम का फैसला करे।
इसी का नाम “मन्सूबा-बंद अमल” (प्लानिंग के साथ काम) हैं, और
“मन्सूबा-बंद अमल” बा-मक़सद इंसान की एक ज़रूरी ख़ासियत है।
तजुर्बा यही बताता है कि जज़्बाती प्रतिक्रिया (इमोशनल रिएक्शन) हमेशा
नुक़सान का सबब बनती है, और सोची-समझी कार्रवाई (मन्सूबाबंद अमल) हमेशा
फ़ायदेमंद साबित होती है। जज़्बाती रिएक्शन में इंसान का
रहनुमा (गाइड), उसकी नकारात्मक भावनाएं (Negative emotions) बन जाती हैं। लेकिन योजनाबद्ध (मन्सूबाबंद) अमल में इंसान का रहनुमा, उसका
सकारात्मक दिमाग़ होता है।
इस फ़र्क़ का नतीजा यह होता
है कि दोनों में से एक तबाही का अमल बन जाता है और दूसरा, पूरी तरह
रचनात्मक (कंस्ट्रक्टिव) अमल।
असल सच्चाई यह है कि इस
दुनिया में ऐसी घटनाएं हमेशा होती रहती हैं जिनसे आदमी के जज़्बात को ठेस पहुँचे।
लेकिन समझदारी इसी में है कि आदमी ऐसी घटनाओं को नज़रअंदाज़ करे। और अपने जज़्बातों (भावनाओं) के
बजाए अपनी अक़्ल को अपना रहनुमा बनाए।
तमाम घटनाएँ बताती हैं कि
जज़्बात (भावनाओं) के पीछे चलने वाला इंसान हमेशा नाकाम होता है, और
अक़्ल की राह पर चलने वाला हमेशा कामयाब रहता है।
