सूरह: आल-ए-इमरान | 28 – 32

 


क़ुरआन की आयात पर ग़ौर-ओ-फ़िक्र

सूरह: आल-ए-इमरान || 28 – 32





[3: 28]: मुसलमानों को चाहिए कि मुसलमानों को छोड़ कर हक़ का इंकार करने वालों को दोस्त न बनाएं। और जो शख़्स ऐसा करेगा तो अल्लाह से उसका कोई तअल्लुक़ नहीं। मगर ऐसी हालत में कि तुम उनसे बचाव करना चाहो। और अल्लाह तुम्हें डराता है अपनी ज़ात से। और अल्लाह ही की तरफ़ लौटना है।


[3: 29]: कह दो कि जो कुछ तुम्हारे सीनों में है उसे छुपाओ या ज़ाहिर करो, अल्लाह उसे जानता है। और वह जानता है जो कुछ आसमानों में है और जो ज़मीन में है। और अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है।


[3: 30]: जिस दिन हर शख़्स अपनी की हुई नेकी को अपने सामने मौजूद पाएगा, और जो बुराई की होगी उसे भी। उस दिन हर आदमी यह चाहेगा कि काश अभी यह दिन उससे बहुत दूर होता। और अल्लाह तुम्हें डराता है अपनी ज़ात से। और अल्लाह अपने बंदों पर बहुत मेहरबान है।


[3: 31]: कहो, अगर तुम अल्लाह से मुहब्बत करते हो तो मेरी पैरवी करो, अल्लाह तुमसे मुहब्बत करेगा। और तुम्हारे गुनाहों को माफ़ कर देगा। अल्लाह बड़ा माफ़ करने वाला, बड़ा मेहरबान है।


[3: 32]: कहो, अल्लाह की इताअत करो और रसूल की। फिर अगर वे मुंह मोड़ें तो अल्लाह हक़ का इंकार करने वालों को दोस्त नहीं रखता।



हम जिन आयात का मुताला कर रहे हैं, वे कई मायनों में बेहद अहम हैं।

 

कुछ भाइयों की तरफ़ से यह सवाल आया कि क्या इस आयत का यही मतलब है कि मुसलमानों को ग़ैर-मुस्लिमों से कोई तअल्लुक़ (रिश्ता या व्यवहार) नहीं रखना चाहिए ?


असल में यह मामला बहुत अहम है और इसे सही तरीक़े से समझना बेहद ज़रूरी है।


यहाँ सबसे पहली बात जो समझने की है, वह यह है कि उम्मत में जो बहुत से अल्फ़ाज़ चलन में आ गए हैं उनमें से कई, ग़लत बयानियों (narratives) पर खड़े हैं। ख़ास तौर पर "काफ़िर" लफ़्ज़ का जो बयानिया बना दिया गया है, उससे तो हमें फ़ौरन बाहर निकलने की ज़रूरत है। और इस ग़लत बयानिये से बाहर निकलकर "काफ़िर" के अस्ल मायने को समझना होगा, ताकि पूरी दुनिया को काफ़िर मानने की ग़लत-फ़हमी से बचा जा सके।



हम अक्सर "काफ़िर" को एक सामूहिक लफ़्ज़ की तरह इस्तेमाल करते हैं, मानो यह पूरी दुनिया की आबादी पर लागू होता हो। लेकिन हक़ीक़त यह है कि "काफ़िर" एक व्यक्तिगत किरदार (individual character) की सिफ़त है, न कि किसी क़ौम या समुदाय का लेबल।



लुग़त (डिक्शनरी) के मुताबिक़ "काफ़िर" का अस्ल मतलब है — "इनकार करने वाला"।


इस्लाम भी "काफ़िर" को उसी शख़्स के लिए इस्तेमाल करता है जो सच को जानने और समझने के बावजूद उसका इनकार करता है। 


यानी "काफ़िर" किसी नस्ल या कम्युनिटी का सामूहिक टाइटल नहीं है, बल्कि एक व्यक्ति के रवैये और किरदार की निशानदेही करता है।


दूसरे शब्दों में,


Kafir is an individual character rather than a group title of a certain race or community.



बाद के ज़माने में "काफ़िर" लफ़्ज़ का इस्तेमाल अपने असल मायने से हटकर तहकीरी (अपमानजनक) अंदाज़ में होने लगा। ग़लत बयानियों की वजह से यह तसव्वुर (सोच) आम हो गया कि "काफ़िर" और "ग़ैर-मुस्लिम" दोनों ऐसे शब्द हैं जिनका अर्थ एक ही हैं। जबकि हक़ीक़त यह है कि यह सोच ग़लत बयानियों (narratives) का नतीजा है। धीरे-धीरे यह मान लिया गया कि जो लोग मुसलमान नहीं हैं, वे सब के सब "काफ़िर" हैं।


क़ुरआन की व्याख्या करने वाले विद्वान (मुफ़स्सिरीन) की राय में "अल-काफ़िरीन" का लफ़्ज़ हर ग़ैर-मुस्लिम के लिए नहीं है, बल्कि यह ख़ास तौर पर उस गिरोह के लिए आया है जो पूरी दलील और सच्चाई सामने आने के बावजूद अल्लाह के पैग़ाम को मानने से इनकार करता है।



अब क़ुरआन की इस आयत पर ग़ौर करें कि यहाँ क्या बेसिक बात बताई जा रही है:


min-doo-nil-Mu'-mi-neen

"मोमिनीन को छोड कर"  [3: 28]

 

यह बात ध्यान देने वाली है कि अल्लाह ने ये बात क्यों कही :


"मोमिनीन को छोड़कर"

 

इसके बाद आयत में एक एक्सेप्शन दिया गया है –


'il-laaa 'an-tat-ta-qoo min-hum tu-qaah [3: 28]


जो बताता है कि अगर कोई तअल्लुक़ (रिश्ता या व्यवहार) तक़वा (अल्लाह का ख़ौफ़) की बुनियाद पर हो, तो मोमिनीन और मुंकिरीन (इनकार करने वालों) के बीच संबंध क़ायम रह सकता है।


असल पैमाना यह है कि रिश्ता तक़वा और अल्लाह की हिदायत की बुनियाद पर होना चाहिए।


ये बहुत इम्पोर्टेन्ट चीज़ है जिसे समझना बेहद ज़रुरी है।  




अगर हम अरबी आयत पर ग़ौर करें और मौलाना की तज़्कीर (तज़्कीरुल क़ुरआन) पढ़ें, तो दो बातें साफ़ सामने आती हैं।


पहली बात जो मौलाना ने नोट कराई, वह है:


"मोमिन तमाम इंसानों के साथ नेकी और अदल (बराबरी और संतुलन) का सलूक करने वाला होता है।"


यह बात सीधे तौर पर आयत के शब्दों में मौजूद नहीं है, लेकिन पूरे क़ुरआन का मंशा इसी तरफ़ इशारा करता है। इसलिए मौलाना ने पहले ही इसे स्पष्ट कर दिया कि मोमिन का रवैय्या तमाम इंसानों के साथ कैसा होता है।


एक मोमिन नेकी और अदल के मामले में मुस्लिम और ग़ैर-मुस्लिम में कोई फ़र्क़ नहीं करता।


मोमिन का अस्ल मक़्सद और अस्ल मफ़ाद (interest) यह नहीं होता कि उसे आर्थिक, सामाजिक या राजनीतिक फ़ायदा मिले।

बल्कि उसका सबसे बड़ा उद्देश्य यह होता है कि वह अल्लाह (वास्तविक ईश्वर) से अपने त’अल्लुक़ (रिश्ते) को मजबूत करे, उसके हुक्म को माने और उसके त’अर्रुफ़ (पहचान/मा'रिफ़त) और उसके पैग़ाम (संदेश) को तमाम इंसानों तक पहुँचा दे, ताकि सभी इंसान अपने रब को पहचानें, उससे मुहब्बत करें और सीधे तौर पर उससे जुड़ जाएँ।


लेकिन अगर कभी मुंकिरीन से दोस्ती, मोमिनीन के इस अस्ल मक़सद और अस्ल मफ़ाद को नुक़्सान पहुँचाए, तो ऐसी दोस्ती मोमिनीन के लिए जाएज़ नहीं है।



अब अस्ल सवाल यह है कि — “अल्लाह के संदेश को इंसानों तक पहुँचाने” या “इस्लाम को फ़ैलाने” का मतलब क्या है ?


इस बात को सही तरीक़े से समझने के लिए हमें सबसे पहले इस पुराने बयानिये (narrative) से बाहर निकलना होगा कि “इस्लाम फैलाने का मतलब सिर्फ़ लोगों को मुसलमान बनाना या मुसलमानों की तादाद बढ़ाना है।”


यह धारणा बिलकुल ग़लत है जो कि ग़लत बयानिये (narrative) की वजह से वजूद में आई है।


अस्ल में, इस्लाम फैलाने का मतलब यह है कि अल्लाह के संदेश (God’s creation plan) को सभी इंसानों तक पहुँचा दिया जाए ताकि तमाम इंसान अपने रब को पहचानने वाला बन जाए, उससे मुहब्बत करें, और सीधे तौर पर उससे अपना त’अल्लुक़ जोड़ ले।




अल्लाह तआला हुक्म के अंदाज़ में हमलोगों को बता रहे हैं कि मोमिनीन की सिफ़ात (विशेषताओं) में ये सिफ़त नहीं हो सकती कि वे उन लोगों से दोस्ती कर लें जो अल्लाह के साथ उनके त’अल्लुक़ (संबंध) को तोड़ देना चाहते हैं। बल्कि मोमिनों को उन लोगों से दोस्ती रखनी चाहिए जो अल्लाह से, ज़्यादा त’अल्लुक़ जोड़ने वाले हैं।


आयत में जो अल्फ़ाज़ आए हैं,


min-doonil-Mu’minīn”

(मोमिनों को छोड़कर) वे इसी बात की तरफ़ इशारा करते हैं।


अगर आप इस कलाम के पस-मंज़र में जाएंगे तो आपको नज़र आएगा इस आयत के मुखातिब मुनाफ़िक़ीन (hypocrites) हैं, जो मोमिनीन के बीच रहकर उन लोगों से रिश्ता बनाए रखते थे जो मोमिनीन को मिटा देना चाहते थे। उनका इरादा यह था कि ये मोमिनीन मिट जाएंगे तो अल्लाह के साथ त’अल्लुक़ पैदा करने की जो कोशिश शुरू हुई है वह ख़त्म हो जाए।


इसलिए यहाँ (तज़्कीर में) मौलाना को इस्लाम की जगह मुसलमानों की मफ़ाद (interest) की बात करनी पड़ी है।

 


अक्सर लोग यह समझ लेते हैं कि “काफ़िर” और “ग़ैर-मुस्लिम” एक ही चीज़ हैं। लेकिन यह धारणा क़ुरआन की सही समझ के खिलाफ़ है। 


बाद के ज़माने में बने ग़लत बयानियों (narratives) की वजह से यह धारणा बन गई कि वे तमाम लोग जो मुसलमान नहीं हैं, सभी काफ़िर हैं। 


इसी ग़लतफ़हमी की वजह से क़ुरआन की इस आयत को इस तरह समझा जाने लगा कि मुसलमानों को ये हुक्म दे दिया गया है कि वे ग़ैर-मुस्लिमों के साथ दोस्ती न रखें । जबकि असल में आयत का संबोधन उन दुश्मनों से है जो मुसलमानों के वजूद और उनके अल्लाह से रिश्ते को ख़त्म करना चाहते थे।


इस्लाम का असल मंशा हमेशा फैलाव का है, न कि सिमटाव का। अल्लाह चाहता है कि उसका पैग़ाम (God’s creation plan) पूरी इंसानियत तक पहुँचे। इसलिए मोमिनीन को अल्लाह का पैग़ाम सभी इंसानों तक पहुँचाने के लिए दूसरों से दोस्ती करने की इजाज़त है, बशर्ते कि यह दोस्ती ऐसी न हो कि अल्लाह से उनका ताल्लुक़ (रिश्ता) कमज़ोर हो जाए या टूट जाए।

 

यानी मोमिनीन का असल और सबसे अहम रिश्ता अल्लाह से है। यही रिश्ता उनका अस्ल मुफ़ाद (interest) है, और यह किसी भी दूसरे रिश्ते से ज़्यादा अहम है।







[क़ुरआन 3: 30]जिस दिन हर शख़्स अपनी की हुई नेकी को अपने सामने मौजूद पाएगा, और जो बुराई की होगी उसे भी। उस दिन हर आदमी यह चाहेगा कि काश अभी यह दिन उससे बहुत दूर होता। और अल्लाह तुम्हें डराता है अपनी ज़ात से। और अल्लाह अपने बंदों पर बहुत मेहरबान है।



इस आयत में, अल्लाह तआला हमें बता रहे हैं कि आख़िरत (परलोक) में पहुँचने के वक़्त हमारा क्या हाल होने वाला है।

"अल्लाह हमें अपनी ज़ात से डराता है।" यहाँ मक़सद इंसान को सचेत कर के उसे तैयार करना है, ताकि हम समझें, और उस दिन के लिए अपने आपको तैयार कर लें।


यहाँ सोचने का मक़ाम यह है कि अल्लाह तआला हमें ये बताना चाह रहे हैं कि उस दिन मैं तुम्हारे तमाम आमाल को तुम्हारे सामने कर दूंगा, मैं तमाम चीज़ों को जानता हूँ जो कुछ इस आसमान और ज़मीन के बीच में है, उन चीज़ों को भी जानता हूँ जो तुम अपने दिलों में छुपाए हुए हो और जो तुम ज़ाहिर करते हो [3: 29-30].

 

यानी तुम ज़ाहिर करते हो कि हम मोमिनीन के favour में हैं, हम अल्लाह के Creation Plan में कोई रुकावट नहीं पैदा करना चाहते, और दूसरी तरफ़ तुम्हारे दिलों में ये छुपी हुई बात है कि तुम अल्लाह के Creation Plan में रुकावट डाल देना चाहते हो, उन लोगों को ही सफ़्हा-ए-हस्ती (जीवन-पटल) से मिटा देना चाहते हो जिसका मक़्सद है कि सभी इंसान अपने रब को पहचाने और उससे मुहब्बत करें और उससे सीधे तौर पर अपना त’अल्लुक़ जोड़ लें।

 

तुम सोचो कि जिस दिन तुम्हें अल्लाह के सामने खड़ा कर दिया जाएगा और अल्लाह तुम्हारी तमाम नेकी और जो बुराई तुमने की होगी उसे भी सामने रख देगा तो उस दिन तुम यह सोचने नहीं लगोगे कि काश यह दिन कभी आता ही नहीं, कि काश इस दिन के आने में और मेरे बीच एक लंबी मुद्दत हाइल हो जाती कि हम अल्लाह के सामने रुसवा और ज़लील हो कर खड़े न होते, बल्कि हम ऐसा काम करके आते जिनसे अल्लाह की रहमत हमें नसीब होती।

 

इस बारे में क़ुरआन में जो अलफ़ाज़ आए हैं वो बहुत ही इम्पोर्टेन्ट हैं, वो अलफ़ाज़ ये हैं:


Ta-wad-du law 'an-na bay-na-haa wa bay-na-hooo 'a-ma-dam-ba-`ee-daa. [3: 30]


हर आदमी यह चाहेगा कि काश अभी यह दिन उससे बहुत दूर होता। [3: 30]


 

ये एहसास दिलाने के बाद भी अल्लाह तआला फ़रमाते हैं –


Wal-laa-hu Ra-'oo-fum-bil-`i-baad.


और अल्लाह अपने बंदों पर बहुत मेहरबान है। (3:30)

 

यह कि अल्लाह डराता तो है अपनी ज़ात से, लेकिन ये डर किस लिए है।


ये इसलिए कि यह भी उसके रहमत का तकाज़ा है, वो अपने बंदों से बहुत ज़्यादा मुहब्बत करता है इसलिए बता रहा है कि कल जब तुम उस ज़ात के सामने खड़े होगे, तो तुम्हें कितनी पशेमानी (पश्चात्ताप) होगी। 

सोचो, एक तरफ तुम कहते रहे कि हम अल्लाह से मोहब्बत करते हैं, लेकिन दूसरी तरफ दोस्ती उन लोगों से निभाते रहे जो अल्लाह के Creation Plan के दुश्मन हैं और उसके पूरे मिशन को ही मिटा देना चाहते हैं। उस दिन तुम किस हालत में अल्लाह के सामने खड़े हो सकोगे?







क़ुरआन की अगली आयत में अल्लाह तआला मोमिनीन की तरफ़ रुख़ करके, ज़ोर देकर फ़रमाते हैं:

[3: 31]: कहोअगर तुम अल्लाह से मुहब्बत करते हो तो मेरी पैरवी करोअल्लाह तुमसे मुहब्बत करेगा। और तुम्हारे गुनाहों को माफ़ कर देगा। अल्लाह बड़ा माफ़ करने वालाबड़ा मेहरबान है।



इस्लाम में जो सबसे बड़ी बात हमलोगों को हिदायत के तौर पर मिलती है वो है – इबादत।


और इबादत का असल मतलब है – अल्लाह की मुहब्बत, अल्लाह का डर, और उसके सामने पूरे विनम्र भाव से अपने आपको छोटा और बेबस समझना।


यही असल भावना है जिसे हर इंसान के अंदर पैदा करने की हिदायत दी गई है।

 

और इस आयत में बताया गया है कि अगर तुम सच में अल्लाह से मुहब्बत करते हो, तो तुम्हें उसके रसूल की राह पर चलना होगा। क्योंकि मुहब्बत का तकाज़ा यही है कि तुम अल्लाह और उसके रसूल की पूरी इताअत करो।


यह मुहब्बत और तज़ल्लुल (बहुत अधिक विनम्रता) केवल दिल की भावना में नहीं, बल्कि हमारे कामों और आचरण में भी नज़र आनी चाहिए।

 

फिर अल्लाह तआला फ़रमाते हैं –


फिर अगर वे मुंह मोड़ें तो अल्लाह हक़ का इंकार करने वालों को दोस्त नहीं रखता।

[क़ुरआन,3: 32]


यानी अल्लाह फिर ऐसे लोगों को दोस्त नहीं रखता जो उसका इनकार करते हैं। जो अल्लाह की मुहब्बत को अहमियत देने वाले नहीं हैं, अल्लाह की मा'रिफ़त (पहचान) को अस्ल समझने वाले नहीं हैं। जो अल्लाह की मा’रिफ़त (realization) और अल्लाह की इबादत के तकाज़ों को समझने वाले नहीं हैं। इसलिए ऐसे लोग दरअसल इनकार करने वालों की तरह हैं। तो अल्लाह तआला भी उनसे वैसी मुहब्बत नहीं करता, जिस तरह वह मोमिनीन से करता है जो पूरी तरह अल्लाह की मुहब्बत में डूबे रहते हैं।

 

ये वो बड़ी बड़ी बातें हैं जिसमें अल्लाह तआला ने इबादत का सही मतलब साफ़ कर दिया है। उसने बताया कि मोमिनीन असल में मोमिन क्यों है, और इबादत का अस्ल मक़्सद और मफ़हूम (मतलब) क्या है।


जब आप इन आयात पर दावती दृष्टिकोण से ग़ौर करेंगे तो समझ में आएगा कि सारे के सारे मोमिनीन अल्लाह की मुहब्बत में पूरी तरह डूबे होते हैं और यही मोहब्बत वे दूसरों तक पहुँचाना चाहते हैं, वे चाहते हैं कि तमाम इंसान भी उस रब से मुहब्बत करें और उससे अपना रिश्ता जोड़ लें। 


अब ऐसे काम के लिए अगर एक गिरोह बन रहा रहा हो और उसी गिरोह को ख़त्म करने के लिए चालें चली जा रही हों, और उन साज़िशों में कुछ दिखावटी-मुसलमान (मुनाफ़िक़) या फिर कम अक़्ल रखने वाले लोग शामिल हो जाएँ, उस वक़्त मुसलमानों के लिए अल्लाह तआला की ये तंबीह आती है कि मोमिनीन ऐसे नहीं हैं कि मोमिनीन के अस्ल मक़सद और हित (मफ़ाद) को छोड़कर कर ऐसे लोगों का साथ दें जो उनकी कोशिशों को ही ख़त्म करने का इरादा रखते हैं। ये कैसे मुमकिन है कि मोमिनीन अपने अस्ल मफाद को नुक़्सान पहुंचाने वालों का साथ दें।

 

यह वही बुनियादी दृष्टिकोण है जिसमें मैंने इन आयात को समझने की कोशिश की है।



Note: क़ुरआन मुताला पर एक दा’ई के बयान का सारांश। 







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