इतिहास के फ़ैसले को बदलना

 

इतिहास के फ़ैसले को बदलना  


AL-RISALA (Urdu) | July-2011


का’बा को लगभग चार हज़ार साल पहले हज़रत इब्राहीम ने मक्का में बनाया था। 

उस समय इसकी शक्ल आयताकार (Rectangular) थी।

 

पैग़म्बर-ए-इस्लाम (सल्ल०) के नबी बनने से पहले, मक्का के क़ुरैश क़बीले ने का’बा की इमारत को दोबारा बनाया। उस वक़्त उन्होंने इसकी लंबाई थोड़ी कम कर दी और इसे चौकोर (square) बना दिया। का’बा आज तक उसी चौकोर रूप में मौजूद है।


 

रिवायतों (रिपोर्ट) में आया है कि पैग़ंबर मुहम्मद रसूलुल्लाह ने अपनी पत्नी हज़रत आयशा से कहा कि मैं चाहता हूँ कि का’बा की इमारत को फिर से उसी बुनियाद पर बनाऊँ, जिस पर हज़रत इब्राहीम ने बनाया था। 

मगर आप ने इस काम से गुरेज़ (परहेज़) किया, क्योंकि उस समय के व्यावहारिक हालात के मद्देनज़र अब ऐसा होना मुमकिन नहीं था। 

 

(सहीह अल-बुख़ारी, किताब अल-हज्ज, बाब फ़ज़्ल मक्का वा बुन्यानीहा)

  

 

पैग़म्बर-ए-इस्लाम मुहम्मद रसूलुल्लाह के इस वाक़ि'आ से हमें एक बहुत अहम उसूल (महत्वपूर्ण सिद्धांत) पता चलता है — और वह यह कि इतिहास के पहिए को दोबारा उल्टी दिशा में नहीं चलाया जा सकता ।


The wheel of history cannot be put in the reverse gear.


 

यह कोई साधारण बात नहीं है। इस पैग़म्बराना वाक़ि'ए से फ़ितरत (nature) का एक क़ानून मालूम होता है, वह यह कि इतिहास का सफ़र हमेशा आगे की तरफ़ होता है। यानी, वह Past से Present, और फिर Present से Future की ओर बढ़ता है।

 

इतिहास में यू-टर्न (U-turn) लेना मुम्किन नहीं होता। यह इंसान की ताक़त से बाहर है कि वह इतिहास के सफ़र को Future से Present की तरफ़ और Present से Past की तरफ़ मोड़ सके। 

 


इसलिए इतिहास के मामले में मौजूदा सूरत-ए-हाल (status quo) को मान कर मंसूबा बनाया जाता है, न कि उसका इनकार करके।   

 

का’बा का इतिहास इस मामले का एक साफ़ उदाहरण है। पैग़ंबर मुहम्मद (सल्ल०) ने फ़ितरत (nature) के इसी क़ानून को मानते हुए, का’बा को उसकी पुरानी इब्राहीमी नींव पर दुबारा बनाने की कोशिश नहीं की।

 

बाद में जब अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर (मौत: 692 ई०) का दौर आया, तो उन्होंने का’बा की इमारत को तोड़कर उसे फिर से इब्राहीमी बुनियाद पर बनाया। लेकिन अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर की मौत के फ़ौरन बाद, हज्जाज बिन यूसुफ सक़फ़ी (मौत: 714 ई०) ने उस इमारत को तोड़ दिया और दुबारा का’बा को उसकी पहले वाली (कुरैश के ज़माने वाली) बुनियाद पर बना दिया।




आज के मुसलमान इस बुनियादी उसूल से पूरी तरह बेख़बर हैं। इसलिए वे बार-बार इस उसूल की ख़िलाफ़वरज़ी (उल्लंघन) करते हैं — और नतीजा यह होता है कि वे सिर्फ़ अपनी तबाही में और ज़्यादा इज़ाफ़ा (वृद्धि) कर लेते हैं।   

बीसवीं सदी के पहले हिस्से में चला ख़िलाफ़त आंदोलन, फिर उसके बाद की फ़िलिस्तीनी तहरीक, बीसवीं सदी के आख़िरी दौर में कश्मीरी तहरीक और इस क़िस्म की दूसरी तहरीकें, ये सब इसी बात का सबूत हैं।

 

इन तहरीकों के लीडरों ने इतिहास के फ़ैसले को बदलने की कोशिश की, मगर इतिहास का फ़ैसला नहीं बदला, उल्टा, इस नादानी भरी राजनीतिक कोशिशों ने मुसलमानों की तबाही को और ज़्यादा बढ़ा दिया।

 

वह लम्हा जब तारीख़ (इतिहास) का फ़ैसला हो रहा हो, उस वक़्त आप अपनी समझदारी भरी नीतियों से फ़ैसले पर असर डाल सकते हैं, मगर एक बार जब फ़ैसला पक्का हो गया तो उसके बाद फ़ैसले को बदलने की कोशिश करना व्यावहारिक रूप से ख़ुदकुशी के सिवा और कुछ नहीं।



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