ज़वाल क्या है ?



ज़वाल क्या है ?  


Source : AL-RISALA (Urdu) | February-2003 


क़ुरआन में बताया गया है कि यहूदी और ईसाई (यहूद व नसारा) को अल्लाह की तरफ़ से जो आसमानी तालीम (ईश्वरीय शिक्षाएँ) दी गई थीं, उसका बड़ा हिस्सा उन्होंने भुला दिया।  (5: 13-14)

 

इस भुलाने का मतलब ये नहीं है कि यहूदी या ईसाइयों ने कोई मीटिंग या कॉन्फ्रेंस करके इसमें बाक़ायदा यह तय किया हो कि आज से हम ये-ये बातें याद रखेंगे और बक़िया बातों को भुला देंगे।


ऐसा कभी नहीं होता।  

 


असल में, इस तरह का भूलना एक धीरे-धीरे होने वाली प्रक्रिया होती है, जिसके पीछे तारीख़ी और साइकोलॉजिकल कारण होते हैं।

समय बीतने के साथ धीरे धीरे ऐसे हालात पैदा होते हैं कि कुछ बातें लोगों की ज़िंदा याददाश्त में बनी रहती हैं, जबकि दूसरी बातें उनकी ज़िंदा याददाश्त से निकल जाती हैं। 

कुछ चीज़ों की अहमियत उन्हें याद रहती है, लेकिन कुछ दूसरी चीज़ों की अहमियत से वे बे-ख़बर हो जाते हैं।




हदीस में ये भविष्यवाणी की गई थी कि यहूदी और ईसाई ने बिगाड़ पैदा होने के बाद जो कुछ किया वही सब मुसलमान भी बाद के ज़माने में करेंगे।



इस हदीस से यह बात समझ में आती है कि उम्मत-ए-मुहम्मदी, यानी मुसलमानों पर भी ऐसा वक़्त आ सकता है। 

ऐसा हो सकता है कि लोग दीन (इस्लाम) के एक हिस्से को तो जानते और मानते हों, लेकिन उन्हें दीन के दूसरे हिस्से की ख़बर न रहे। दीन के कुछ हिस्सों की उनके यहां धूम हो, और दूसरे ज़्यादा बड़े हिस्से को उन्होंने इस तरह छोड़ रखा हो जैसे कि वे जानते ही नहीं कि ये भी इस दीन (इस्लाम) का हिस्सा है जिसको अल्लाह तआला ने पैग़ंबर मुहम्मद (सल्ल०) के ज़रिए उनके पास भेजा था।


 


किसी क़ौम पर जब भी ये हालत आती है तो वह उस क़ौम के लोगों के मिज़ाज में बिगाड़ के नतीजे पर आती है। 

सबसे पहले लोगों के अंदर का मिज़ाज (सोचने का तरीक़ा) बिगड़ता है, और फिर उसके नतीजे के तौर पर उनका अख़लाक़ (चरित्र) और किरदार (व्यवहार) भी बदलता चला जाता है।



मिसाल के तौर पर, अलग-अलग वजहों से दीन के बाहरी रूप (ज़वाहिर) को ही, दीन के रूह का बदल समझ लेना।

 

अब ऐसा होता है कि दीन की असल रूह को जानने और अपनाने की फ़िक्र नहीं होती बल्कि सिर्फ़ उसके बाहरी ढाँचे को ही सब कुछ समझ लिया जाता है।

ये ज़वाल की निशानी है और ये ज़वाल हर उम्मत के साथ हर हाल में पेश आता है।


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उरूज और ज़वाल का क़ानून →



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