तम्सीली अंदाज़
Source : AL-RISALA (Urdu) | July 2011
मौलाना जलालुद्दीन रूमी (मौत :1273 ई०) ने अपनी मशहूर किताब "मसनवी"
जिस ज़माने में लिखी,
वह तम्सीली अस्लूब का ज़माना था। पुराने ज़माने में आम तौर
पर यही तम्सीली अंदाज़ बहुत आम था। यानी अपनी बात को काल्पनिक मिसालों और फ़र्ज़ी
क़िस्सों की ज़बान में बयान करना।
मौलाना रूमी ने भी ज़माने के इसी असर को देखते हुए अपनी मसनवी को तम्सीली
अंदाज़ में लिखा।
लेकिन बाद में जब न्यूटन (मौत : 1727 ई०) का ज़माना आया, तो तम्सीली अदब (साहित्य)
का यह अंदाज़ धीरे-धीरे ख़त्म हो गया।
आज के ज़माने में “तम्सीली अंदाज़” को एक ग़ैर-वैज्ञानिक (non-scientific) तरीक़ा समझा जाता है, वैज्ञानिक नज़रिए से यह
कोई भरोसेमंद या मान्य तरीक़ा नहीं माना जाता।
मुसलमानों के साथ हादसा
मुसलमानों के साथ यह हादसा हुआ कि वे ज़माने के इस बदलते रुख़ से बे-ख़बर रहे।
इसी वजह से,
पुराने ज़माने में मौलाना रूमी की मसनवी जिस तरह उनके यहाँ
आम तौर पर प्रचलित (राइज) थी,
उसी तरह बाद के ज़माने में भी वह उनके बीच प्रचलित रही।
इसका नतीजा यह हुआ कि मुसलमानों में नई वैज्ञानिक अंदाज़ को बढ़ावा नहीं मिल सका।
इसी वजह से आज भी उनकी तक़रीरों (भाषणों) और लेखों में मौलाना रूमी की मसनवी
के अश'आर (शे'र) इस अंदाज़ में पेश किए जाते
हैं जैसे कि वे किसी ठोस वैज्ञानिक बयान (authentic scientific statement) की हैसियत रखते हों।
यह कोई मामूली बात नहीं
बातचीत या बोलने का अंदाज़ सीधे तौर पर बोलने वाले के सोचने के तरीक़े से जुड़े
होते हैं।
अगर कोई इंसान अपनी बात को काल्पनिक कहानियों और गढ़ी हुई मिसालों के ज़रीये
कहने का आदी हो,
तो उसकी सोच भी उसी प्रकार अवास्तविक (ग़ैर-वाक़ि'ई) सोच बन जाएगी।
ऐसा इंसान मनगढ़ंत बातों और सच्चाइयों (वास्तविकता) के बीच का फ़र्क़ नहीं समझ पाएगा।
वह काल्पनिक मिसालों और ख़्याली क़िस्सों की बुनियाद पर एक बात कहेगा और यह
समझेगा कि उसकी बातें ठोस सच्चाई पर क़ायम हैं।
इसका नतीजा यह होगा कि उसके अंदर हक़ीक़त पर आधारित सोच (realistic
approach) का विकास नहीं हो सकेगा, और वह शा'इराना-तख़य्युल (कवियों जैसी
कल्पना) और हक़ीक़त पर आधारित सोच के फ़र्क़ को समझने में असमर्थ रहेगा।
इस तरह की सोच का एक और बड़ा नुक़सान यह होगा कि ऐसा आदमी ज़िंदगी के मामलों
में हक़ीक़त के मुताबिक़ फ़ैसले नहीं ले पाएगा। उसकी सारी प्लानिंग भावनाओं (जज़्बात)
के आधार पर होगी,
न कि सूझ-बूझ,
तर्क और समझदारी की बुनियाद पर।
इसका नतीजा यह होगा कि ऐसे लोगों का केस, सोच और अमल दोनों एतबार से, सिर्फ़ तबाही का केस बन कर रह जाएगा।
