क़ुरआन की आयात पर ग़ौर-ओ-फ़िक्र
सूरह: आल-ए-इमरान || 72– 76
[3: 72]: और अहले किताब के एक गिरोह ने कहा कि मुसलमानों पर जो चीज़ उतारी गई है उस पर
सुबह को ईमान लाओ और शाम को उसका इंकार कर दो, शायद कि मुसलमान भी इससे फिर जाएं।
[3: 73]: और यक़ीन न करो
मगर सिर्फ़ उसका जो चले तुम्हारे दीन पर। कहो हिदायत वही है जो अल्लाह हिदायत करे।
और यह उसी की देन है कि किसी को वही कुछ दे दिया जाए जो तुम्हें दिया गया था। या वे
तुमसे तुम्हारे रब के यहां हुज्जत करें। कहो बड़ाई अल्लाह के हाथ में है। वह जिसे चाहता
है देता है और अल्लाह बड़ा वुस्अत वाला है, इल्म वाला है।
[3: 74]: वह जिसे चाहता
है अपनी रहमत के लिए ख़ास कर लेता है। और अल्लाह बड़ा फ़ज़्ल वाला है।
[3: 75]: और अहले किताब में कोई ऐसा भी है कि अगर तुम उसके पास अमानत का ढेर रखो तो वह
उसे तुम्हें अदा कर दे। और इनमें कोई ऐसा है कि अगर तुम उसके पास एक दीनार अमानत रख
दो तो वह तुम्हें अदा न करे इल्ला यह कि तुम उसके सिर पर खड़े हो जाओ, यह इस सबब से कि वे कहते हैं कि ग़ैर-अहले किताब
के बारे में हम पर कोई इल्ज़ाम नहीं। और वे अल्लाह के ऊपर झूठ लगाते हैं हालांकि वे
जानते हैं।
[3: 76]: बल्कि जो शख़्स अपने अहद को पूरा करे और अल्लाह से डरे तो बेशक अल्लाह ऐसे मुत्तक़ियों को दोस्त रखता है।
पहली सीख :
क़ुरआन
की आयात [3:72-73] हमें एक बहुत गहरी और अहम सीख देती है —
वह अहम सीख यह है कि अल्लाह तआला जिस अंदाज़ (उस्लूब) में बातचीत करता है, उस ख़ुदाई अंदाज़
को समझना और उसे अपनी ज़िंदगी में अपनाना।
साथ
ही ये आयात हमें सिखाती है कि बात को किस तरह पेश करना चाहिए और सच्चाई को किस नज़र
से देखना चाहिए।
यानी, जब हम किसी मुद्दे पर बात करें या किसी के बारे में राय दें, तो हमारे लहजे में भी हिकमत (समझदारी)
और इंसाफ़ झलकना चाहिए — ठीक वैसे ही जैसे क़ुरआन में अल्लाह तआला का अंदाज़ है।
अहले किताब की नफ़्सियात (psychology) और अल्लाह
का तरीक़ा:
[क़ुरआन, 3: 72]:
और अहले किताब के एक गिरोह ने कहा कि मुसलमानों पर जो चीज़ उतारी गई है उस पर सुबह को ईमान लाओ और शाम को उसका इंकार कर दो, शायद कि मुसलमान भी इससे फिर जाएं।
[क़ुरआन, 3: 73]:
और यक़ीन न करो मगर सिर्फ़ उसका जो चले तुम्हारे दीन पर.......
क़ुरआन की इस आयत में अहले-किताब के एक गिरोह की नफ़्सियात (Psychology) और उनकी साज़िशों का ज़िक्र किया गया है। इससे यह समझ में
आता है कि उस वक़्त के कुछ अहले-किताब की नफ़्सियात (Psychology) कैसी
बन चुकी थी और वे किस तरह की साज़िशें
कर रहे थे।
लेकिन
अल्लाह तआला ने
इसे बयान करने का जो ख़ास तरीक़ा अपनाया, वो हमें एक बड़ा सबक़ देता
है।
अल्लाह तआला ने सारे अहले-किताब को इल्ज़ाम नहीं दिया, बल्कि बहुत नर्मी और इंसाफ़ के साथ कहा — अहले-किताब के एक गिरोह ने [3: 72] ऐसा काम किया।
यह बहुत अहम सबक़ है।
हमारा रवैया और अल्लाह की सिखाई गई बात :
अक्सर देखा गया है कि हम मुसलमानों की
पत्रिकाओं (रिसालों), किताबों
या तक़रीरों
में जब किसी गिरोह या किसी क़ौम की
साज़िश को बयान किया जाता है, तो पूरी क़ौम या पूरा गिरोह को ही साज़िश करने का दोषी ठहरा दिया जाता है।
लेकिन अल्लाह तआला ने अपने इस आयत में हमें एक अहम
उस्लूब (तरीक़ा) सिखाया कि जब भी हम अपनी बात रखें, तो
बहुत मोहतात (संयमित) अंदाज़ में सोच-समझकर और इंसाफ़ के
साथ पेश करें।
अल्लाह
तआला ने हमें यह नहीं सिखाया कि हम कहें “पूरी क़ौम या पूरा गिरोह ऐसा है,” बल्कि यह तरीक़ा बताया कि कहें — इनमें से “कुछ लोगों ने” ऐसा
किया।
यह
हमारे लिए एक बड़ी नसीहत है —
कि जब भी हम अपनी बात रखें, तो उसे
हिकमत (समझदारी) और तमीज़ (अच्छे
आचरण) के साथ रखें। ऐसा करने से हमारी बात
में न सिर्फ़ असर पैदा होगा, बल्कि
इंसाफ़ का पहलू भी बरक़रार रहेगा, और साथ ही वह क़ुरआनी
अंदाज़ का हिस्सा भी बन जाएगा।
यही क़ुरआन का सिखाया हुआ उस्लूब है, जिसे हमें अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाना चाहिए।
दूसरी बात ये कि अगर हम तफ़सीरी रिवायतों (रिपोर्ट) और शान-ए-नुज़ूल (आयात-क़ुरआनी
उतरने के कारणों) पर ग़ौर करें,
तो यह बात साफ़ हो जाती है कि यह गिरोह किस तरह की चालें चल
रहा था।
उनकी नफ़्सियात
(Psychology) इतनी बिगड़ी हुई थी कि वे
हज़रत
मुहम्मद (सल्ल०) को अल्लाह का रसूल मानने को तैयार नहीं थे, और लगातार
मुसलमानों को गुमराह करने की कोशिश कर रहे थे।
उनकी साज़िश यह थी कि अपने
कुछ लोगों को सुबह मुसलमान बना दें और
शाम को उन्हें इस्लाम छोड़वा कर काफ़िर (मुंकिर) बना लें — ताकि आम लोगों में यह बात फैले
कि शायद इस्लाम कोई ठोस या सच्चा दीन नहीं है, तभी तो लोग
इसे छोड़ रहे हैं।
उनका
मक़्सद यह था कि मुसलमानों के दिलों में शक पैदा हो और वे अपने दीन से दूर हो
जाएं। इसके अलावा, ये गिरोह अपने लोगों को ये भी
सिखाता था कि सिर्फ़ उसी की बात मानो जो तुम्हारे मज़हब पर चलने वाला हो।
क़ुरआन
में इस बारे में साफ़ तौर पर कहा गया है:
और अहले किताब के एक गिरोह ने कहा कि मुसलमानों पर जो चीज़
उतारी गई है उस पर सुबह को ईमान लाओ और शाम को उसका इंकार कर दो, शायद कि
मुसलमान भी इससे फिर जाएं।
और यक़ीन न करो मगर सिर्फ़ उसका जो चले तुम्हारे दीन पर.......
क्या
हम भी वही ग़लती कर रहे हैं?
यहाँ
एक बहुत अहम सवाल उठता है —
क्या
हम भी वही ग़लती दोहरा रहे हैं जो पहले गिरोहों ने की थी?
क्या
हम भी अपनी जमात या अकाबिर (बुज़ुर्गों, पूर्वजों, मशहूर आलिमों)
की बात को बिना सोचे-समझे, आँख बंद करके सही मान लेंगे,
भले ही वह अल्लाह की हिदायत के ख़िलाफ़ ही क्यों न हो?
अगर हमारा मेयार (मानदंड) यह बन गया कि —"जो बात हमारे बुज़ुर्गों या हमारी जमात ने कही, वही हक़ है", और उनके बनाए नियमों को ही हर चीज़ का पैमाना (मेयार) मान लिया, तो यह ख़ुदा-परस्ती नहीं, बल्कि अकाबिर-परस्ती है।
अल्लाह
तआला हमें बताते हैं कि ईमान और हिदायत (गाइडेंस)
का असल मेयार यह नहीं कि किस गिरोह ने क्या कहा, बल्कि
यह है कि हिदायत कहाँ से आ रही है।
और सच्ची
हिदायत हमेशा अल्लाह की तरफ़ से आती है। जैसा कि क़ुरआन में अल्लाह तआला ने
फ़रमाया:
"कहो, हिदायत वही है जो अल्लाह हिदायत
करे"
—
(सूरह आले इमरान 3:73)
ईमान
और गाइडेंस के मामले में, हमें किसी गिरोह, जमात या शख़्स की तरफ़ नहीं देखना चाहिए। हमारा पूरा ध्यान सिर्फ़ इस बात
पर होना चाहिए कि अल्लाह की हिदायत (गाइडेंस)
क्या है।
हर
फ़ैसले और हर सोच में हमें यही देखना चाहिए कि अल्लाह क्या कहता है —
क्योंकि
असली दीन वही है जो अल्लाह की बताई हुई हिदायत पर क़ायम हो।
अगर हम
अल्लाह को ही अपनी ज़िंदगी का एकमात्र केंद्र (sole concern) बना लें, और उसी की हिदायत को
सच्चाई का असली स्रोत मानें, तो हम उन नफ़्सियाती
पेचीदगियों और
बीमारियों से बच जाएंगे, जो हमारे ईमान को कमज़ोर या
ख़त्म कर सकती हैं।
क़ुरआन का ये मुताला (अध्ययन) मेरे लिए बहुत अहम रहा। ख़ास तौर पर ये आयत, “कुल इन्नल हुदा हुदल्लाह”
यानी — कहो हिदायत वही है जो अल्लाह हिदायत करे।
(सूरह आले इमरान 3:73)
[3: 73]: .......और यह उसी की देन है कि किसी को वही कुछ दे दिया जाए जो तुम्हें दिया गया था। या वे तुमसे तुम्हारे रब के यहां हुज्जत करें। कहो बड़ाई अल्लाह के हाथ में है। वह जिसे चाहता है देता है और अल्लाह बड़ा वुस्अत वाला है, इल्म वाला है।
[3: 74]: वह जिसे चाहता है अपनी रहमत के लिए ख़ास कर लेता है। और अल्लाह बड़ा फ़ज़्ल वाला है।
अल्लाह
की वुसअत (असीम व्यापकता) और
फ़ज़्ल (कृपा) इतनी विशाल है कि उसे
इंसान की छोटी-सी सोच में नहीं समेटा जा सकता। लेकिन जब इंसान इस सच्चाई को नहीं
समझता,
तो वो ये ग़लतफ़हमी पाल लेता है कि अल्लाह की रहमत और फ़ज़्ल सिर्फ़
उसके अपने खानदान, गिरोह या क़ौम तक ही सीमित है।
क़ुरआन की ये आयात [3:73-74] इस बात को साफ़ करती हैं कि अल्लाह की रहमत और फ़ज़्ल किसी एक क़ौम, गिरोह या परिवार तक महदूद नहीं हैं।
जैसा कि अल्लाह
ने फ़रमाया:
“कहो, बड़ाई अल्लाह के हाथ में है। वह जिसे चाहता है
देता है, और अल्लाह वुसअत वाला, इल्म वाला है। वह जिसे चाहता है अपनी रहमत के लिए ख़ास कर लेता है। और अल्लाह
बड़ा फ़ज़्ल वाला है।”
(आले इमरान 3:73-74)
बनी-इस्राईल
(यहूदी)
का रवैया इसी सीमित सोच की एक साफ़ मिसाल है।
वे यह मान बैठे थे कि नबूवत (पैग़म्बरी)
का सिलसिला सिर्फ़ उनके खानदान बनी-इस्राईल (The Israelites) में ही जारी
रहेगा, और पैग़म्बर इब्राहिम (अलैहिस्सलाम)
की दूसरी संतान, बनी-इस्माईल (पैग़म्बर
इस्माईल की औलाद) में नबूवत हो ही नहीं सकती।
जबकि सच्चाई यह है कि अल्लाह अपनी वुसअत और फ़ज़्ल को किसी खानदान, क़ौम,या गिरोह की सीमा में बाँधकर नहीं रखता। और यह बात भी समझना बेहद अहम है कि अल्लाह तआला सिर्फ़ वुसअत वाला ही नहीं, बल्कि अलीम (सब कुछ जानने वाला) भी है।
जो इंसान
अल्लाह को सही मायने में पहचानता है, और उसकी
रब्बानियत को सही तरह से समझता है, वह जानता है कि अल्लाह को सबसे बेहतर पता है
कि किसे क्या देना है और किसे क्या नहीं देना है। वह जिसे चाहे, अपनी रहमत के साए में ले ले, चाहे उसे आम करे या किसी ख़ास के लिए मख़्सूस कर दे।
यह
समझ इंसान को उस नफ़्सियाती पेचीदगी और ग़लतफ़हमी से बचाती है कि अल्लाह का फ़ज़्ल (कृपा)
सिर्फ़ हमारी क़ौम या गिरोह तक सीमित है।
ऐसा सोचना एक बड़ी ग़लतफ़हमी है — यह अल्लाह की असल पहचान की कमी को दर्शाती है।
क़ुरआन की अगली आयत
[3:75]
अहले-किताब के अमानत के मामलों
में दो अलग-अलग किरदारों की तस्वीर पेश करती है।
इस आयत में अल्लाह तआला फ़रमाते हैं :
“अहले किताब में कोई ऐसा भी है कि अगर तुम उसके पास अमानत का ढेर रखो तो वह
उसे तुम्हें अदा कर दे। और इनमें कोई ऐसा है कि अगर तुम उसके पास एक दीनार अमानत रख
दो तो वह तुम्हें अदा न करे इल्ला यह कि तुम उसके सिर
पर खड़े हो जाओ.” [3:75]
यह आयत
हमें सिखाती है कि जब किसी क़ौम या गिरोह के बारे में राय बनाओ, तो इंसाफ़ से काम लो। पूरी
क़ौम को ग़लत ठहराने के बजाय :
जो अच्छे हैं, उनकी तारीफ़
करो,
और जो
ग़लत हैं, उन्हें अलग से पहचानो।
अल्लाह तआला ने अहले-किताब के अमानतदार लोगों की तारीफ़ करते हुए फ़रमाया कि ऐसे लोग भी हैं जिनके पास अमानत का ढेर रख दिया जाए, तो वे उसे अदा देंगे।
अमानतदारी
का मतलब सिर्फ़ धन-दौलत या चीज़ों को लौटाने
या अदा करने तक सीमित नहीं है, इसका असल मतलब है :
अल्लाह
का नाज़िल किया हुआ दीन, जैसा है वैसा ही, बिना किसी मिलावट या बदलाव के अल्लाह के बंदों तक पहुँचाया जाए।
पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल०) ने अपने
बारे में कहा कि वह “ख़ैरख़्वाह और अमीन” हैं — यानी भलाई चाहने वाले और
अमानतदार।
यहाँ अमीन से मुराद यह है कि दीन
के मामले में पूरी तरह अमानतदार हैं। इसका मतलब यह है कि जो दीन और आयात अल्लाह ने
उन पर नाज़िल किया, उन्हें बिल्कुल वैसा ही, बिना किसी
कमी-बेशी के, बिल्कुल
सही तरीक़े से लोगों तक पहुंचा रहे हैं। उन्होंने इसमें न अपनी राय मिलाई और न ही
कोई चीज़ छिपाई।
दीन
के मामले में नफ़्सियाती उलझनें इसलिए पैदा हुई हैं क्योंकि लोगों में अल्लाह के
दीन को अमानत समझने और उसके अमीन बनने का एहसास ख़त्म हो चुका है।
इसका नतीजा ये हुआ कि लोग
अस्ल दीन के अमीन बनने के बजाय अपने बुजुर्गों या अपने गिरोह के बनाए हुए दीन को ही
अमानत समझने लगे। इसलिए वे अल्लाह के नाज़िल किए हुए दीन को वैसा पेश नहीं करते
जैसा कि वह है, बल्कि वे अपने बुजुर्गों या गिरोह के बनाए
हुए दीन को अमानत समझकर आगे बढ़ाते हैं।
इसलिए क़ुरआन की आयत [3:75] में दी गई तमसील से ये बात साफ़ होती है कि जो लोग एक दीनार की अमानतदारी अदा
नहीं कर सकते, उनसे
यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वे अल्लाह के दीन जैसी सबसे बड़ी अमानत को बिना
किसी कमी-बेशी के, जैसा वो है, वैसा ही अल्लाह के बंदों तक पंहुचाएंगे?
पैग़म्बर
मुहम्मद (सल्ल०) की ज़िंदगी अमानतदारी
की सबसे बड़ी मिसाल है। उन्होंने अल्लाह के दीन को बिल्कुल वैसा ही लोगों तक
पहुँचाया, जैसा
अल्लाह तआला ने उन पर नाज़िल किया और उन्हें सिखाया था।
यही अस्ल अमानतदारी है — बिना किसी मिलावट, बिना किसी बदलाव और पूरी ईमानदारी के साथ लोगों तक पहुँचाना।
क़ुरआन
की इस [3:75] आयत में
"उम्मी" का ज़िक्र आता है:
“dhalika
bi-annahum qalu laysa alayna fi al-umiyina sabilun wayaquluna ala
al-lahi al-kadhiba wahum ya'lamuna”
“…..वे कहते हैं कि उम्मियीन (ग़ैर-अहले
किताब) के बारे में हम पर कोई इल्ज़ाम नहीं। और वे
अल्लाह के ऊपर झूठ लगाते हैं, हालांकि वे
जानते हैं।” (3:75)
आमतौर पर उम्मी का मतलब “अनपढ़” समझा जाता है, लेकिन गहराई से देखा जाए तो इसका असली मतलब है —
“अस्ल” या “जड़”।
जैसे उम्मुल-किताब का मतलब है "किताब की जड़"।
पैग़म्बर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का
ज़माना आया, तब तक बनी-इस्माईल
(नबी
इस्माईल की संतान) को कोई किताब नहीं मिली थी, इसलिए इन्हें उम्मियीन
(उम्मी) कहा
गया।
उम्मी का एक मतलब यहाँ उन लोगों से है जो अपनी फ़ितरी हालत, यानी असली शऊर और अस्ल (प्राकृतिक स्वभाव) पर क़ायम थे। पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल०) और उनकी जमात अपने फ़ितरत पर क़ायम थी, उम्मीईन थी।
अहले-किताब में
एक नफ़्सियाती पेचीदगी (साइकोलॉजिकल कॉम्प्लेक्स)
यह पैदा हो गई थी कि उन्होंने अपनी शरीअत में यह नियम शामिल कर लिया था कि अमानत अदा करने की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ उनके
अपने गिरोह या क़ौम तक सीमित रहेगा। उम्मियीन (ग़ैर-अहले
किताब) को अमानत अदा
करना उनके लिए ज़रूरी नहीं है, इसमें कोई गुनाह नहीं।
यह उनके नज़रिये का ग़लत पहलू था। उन्होंने अपनी
मनगढ़ंत सोच को अल्लाह की शरीअत का हिस्सा बना लिया, जबकि यह अल्लाह की हिदायत में कभी शामिल नहीं था।
अल्लाह ने कभी नहीं कहा कि अमानत अदा करने की ज़िम्मेदारी
सिर्फ़ अपनी क़ौम या गिरोह तक सीमित होनी चाहिए।
क़ुरआन
में अल्लाह तआला ने स्पष्ट किया कि यह सोच अल्लाह पर झूठ बांधने के बराबर है।
जैसा कि
फ़रमाया –
“wayaquluna ala al-lahi al-kadhiba wahum ya'lamuna”
यानी “और वे अल्लाह के ऊपर झूठ लगाते हैं हालांकि वे जानते हैं।” (क़ुरआन,3:75)
आख़िर इंसान के अंदर इतनी नफ़्सियाती उलझनें और गुमराहियाँ क्यों पैदा हो जाती हैं? इसकी बुनियादी वजह ये है कि इंसान ने ख़ुदा-केंद्रित (God-oriented) ज़िंदगी से मुँह मोड़ लिया है।
इंसान की पैदाइश का अस्ल मक़्सद यह है कि वह अल्लाह के साथ किए
गए अपने 'अहद (इक़रार) को पूरा करे, एक ख़ुदा-रूख़ी (God
oriented) इंसान बने, मुत्तक़ी (तक़वा
वाला) इंसान बने, जो हर मामले में अल्लाह को सामने
रखे और उसकी हिदायत के मुताबिक़ ज़िंदगी गुज़ारे।
जैसा
कि क़ुरआन की आयत [3:76] में
अल्लाह तआला फ़रमाते
हैं:
“बल्कि जो शख़्स अपने 'अहद को पूरा करे और अल्लाह से डरे
तो बेशक अल्लाह ऐसे मुत्तक़ियों को दोस्त रखता है।”
[क़ुरआन, 3:76]
ये 'अहद (इक़रार) वही
है,
जो हर इंसान ने अल्लाह के साथ किया था, जैसा
कि क़ुरआन की इस आयत में बताया गया है:
“और जब
तेरे रब ने बनी आदम की पीठों से उनकी औलाद को निकाला और उन्हें गवाह ठहराया ख़ुद उनके
ऊपर। क्या मैं तुम्हारा रब नहीं हूं। उन्होंने कहा हां, हम इक़रार करते हैं।... [7:172]
यह 'अहद (इक़रार) दरअसल
इंसान और उसके रब के बीच का एक बुनियादी रिश्ता है — यह याद दिलाता है कि इंसान की
असली पहचान एक ख़ुदा-रूख़ी (God-oriented) इंसान की है।
तक़वा
का मतलब है — अल्लाह के लिए सच्ची नीयत (sincerity) रखना और हर वक़्त यह एहसास बनाए रखना (consciousness) कि अल्लाह मुझे देख रहा है ।
तक़वा, इंसान को इतना मोहतात (सजग) और इस
क़ाबिल बनाता है कि वह हर क़दम पर यह सोच सके कि अल्लाह मुझसे क्या चाहता है ? वह हर छोटे-बड़े मामले में, चाहे वह दीनी हो या
दुनियावी, अपने गिरोह की राय से ऊपर उठकर सिर्फ़ अल्लाह की
हिदायत की तरफ़ देखता है।
ऐसा इंसान हर वक़्त यह चाहता है कि उसे हर क़दम पर अल्लाह से
सही रास्ते की रहनुमाई मिले। उसका हर अमल, हर
फ़ैसला, सिर्फ़ अल्लाह की
हिदायत के मुताबिक होता है — यही तक़वा है, यही
ख़ुदा-रुख़ी ज़िंदगी है — और यही वह ज़िंदगी है जो अल्लाह को सबसे ज़्यादा
पसंद है।
जब
इंसान इस रास्ते पर चलता है, तो उसकी ज़िंदगी अल्लाह की
मर्ज़ी के मुताबिक ढल जाती है। इससे वह तमाम गुमराहियों और नफ़्सियाती पेचीदगियों (psychological complexities) से बच जाता है, जो उसे सही रास्ते से भटका सकती हैं।
लेकिन
जब अल्लाह से उनका कनेक्शन टूटता है, उनके अन्दर अल्लाह
का डर और रब्बानियत (अल्लाह से जुड़ी हुई सोच, अल्लाह
की पहचान, अल्लाह की याद और उसकी हिदायत के मुताबिक़ चलने की भावना) नहीं रहती, तो उनकी ज़िंदगी में तरह-तरह की नफ़्सियाती पेचीदगियाँ (psychological
complexities) पैदा
हो जाती हैं। फिर वो ये समझने लगते हैं कि जो लोग उनकी सोच या उनके नज़रिये से अलग हैं, वो सही दीन पर नहीं हैं। धीरे-धीरे वो ये मान बैठते हैं कि जो दीन उसके
बुज़ुर्गों ने या उनके गिरोह ने बना दिया है, वही सही है,
और अब उन्हें अल्लाह की गाइडेंस या अल्लाह के दीन को दोबारा समझने
की कोई ज़रूरत नहीं।
इस तरह वे धीरे-धीरे बेईमानी, ग़ैर-अमानतदारी और दूसरी कई नकारात्मक सोचों में फँसते चले जाते हैं. इसकी वजह यह होती है कि वे उस सही रास्ते से भटक जाते हैं, जिसे अल्लाह ने इंसान के लिए शुरू से तय किया था।
अगर इंसान अपने हर काम में अल्लाह की हिदायत को ध्यान में रखे, तो वह इन तमाम नफ़्सियाती पेचीदगियों और बुराइयों से बचा रह सकता है।
Note: क़ुरआन मुताला पर एक दा’ई के बयान का सारांश।
एक गिरोह जिसमें अंबिया और सुलहा (महापुरुष) पैदा हुए हों, जिसके
दर्मियान अर्से तक दीन का चर्चा रहे,
अक्सर वह इस ग़लतफ़हमी में पड़ जाता है कि वह और हक़ दोनों
एक हैं ।
वह हिदायत को एक गिरोही चीज़ समझ लेता है न कि एक उसूली चीज़,
यहूद का मुआमला यही था ।
उनका ज़ेहन,
तारीख़ी रिवायतों के असर से यह बन गया था कि जो हमारे गिरोह
में है वह हिदायत पर है और जो हमारे गिरोह से बाहर है वह हिदायत से ख़ाली है ।
जो लोग हक़ को इस तरह गिरोही चीज़ समझ लें वे ऐसी सदाक़त
(सच्चाई) को मानने के लिए तैयार नहीं होते जो उनके गिरोह के बाहर ज़ाहिर हुई हो ।
वे भूल जाते हैं कि हक़ वह है जो अल्लाह की तरफ़ से आए न कि
वह जो किसी शख़्स या गिरोह की तरफ़ से मिले ।
वे अगरचे ख़ुदा के दीन का नाम लेते हैं मगर उनका दीन हक़ीक़त
में गिरोहपरस्ती होता है न कि ख़ुदापरस्ती ।
उनका यह मिज़ाज उनकी आंख पर ऐसा पर्दा डाल देता है कि अपने
गिरोह से बाहर किसी का फ़ज़्ल व कमाल उन्हें दिखाई नहीं देता । खुली-खुली दलीलें सामने
आने के बाद भी वे उसे शुबह (शक) की नज़र से देखते हैं ।
वे अपने हलक़े से बाहर उठने वाली हक़ की दावत के शदीद मुख़ालिफ़
बन जाते हैं ।
दोअमली का तरीक़ा अपना कर वे उसे ख़त्म करने की कोशिश करते
हैं ।
बेबुनियाद बातें मशहूर करके वे लोगों को उसकी सदाक़त के बारे में मुशतबह (भ्रमित) करते हैं ।
शरीअते ख़ुदावंदी के सरासर ख़िलाफ़ वे इसे अपने लिए जाइज़
कर लेते हैं कि वे अख़्लाक़ के दो मेयार बनाएं, एक ग़ैरों
के लिए और दूसरा अपने गिरोह के लिए ।
किसी को अपने दीन की नुमाइंदगी के लिए क़ुबूल करना अल्लाह
की ख़ुसूसी रहमत है । इसका फ़ैसला गिरोही बुनियाद पर नहीं होता । यह सआदत उसे मिलती
है जिसे अल्लाह अपने इल्म के मुताबिक़ पसंद करे।
और अल्लाह उस शख़्स को पसंद करता है जो अल्लाह के साथ अपने
को इस तरह वाबस्ता कर ले कि वह उसका निगरां (संरक्षक) बन जाए, जिससे
वह डरे, वह उसका आक़ा बन जाए जिसके साथ किए हुए इताअत के अहद को वह
कभी नज़रअंदाज़ न कर सके ।
अल्लाह के मक़बूल बंदे वे हैं जो अमानत को पूरा करने वाले हों और अहद (वचन) के पाबंद हों । ऐसे ही लोगों पर अल्लाह की रहमतें उतरती हैं ।
इसके बरअक्स जो लोग अमानत की अदायगी के मुआमले में बेपरवाह हों और अहद को पूरा करने में हस्सास न रहें वे अल्लाह के यहां बेक़ीमत हैं । ऐसे लोग अल्लाह की रहमतों और नुसरतों (मदद) से दूर कर दिए जाते हैं ।
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