क़ुरआन की आयात पर ग़ौर-ओ-फ़िक्र
सूरह: आल-ए-इमरान || 100 – 103
[3: 100]: ऐ ईमान वालों अगर तुम अहले किताब में से एक गिरोह की बात मान लोगे तो वे तुम्हें ईमान के बाद फिर मुंकिर बना देंगे।
[3: 101]: और तुम किस तरह इंकार करोगे हालांकि तुम्हें अल्लाह की आयतें सुनाई जा रही हैं और तुम्हारे दर्मियान उसका रसूल मौजूद है। और जो शख़्स अल्लाह को मज़बूती से पकड़ेगा तो वह पहुंच गया सीधी राह पर।
[3: 102]: ऐ ईमान वालों, अल्लाह से डरो जैसा कि उससे डरना चाहिए। और तुम्हें मौत न आए मगर इस हाल में कि तुम मुस्लिम हो।
[3: 103]: और सब मिलकर अल्लाह की रस्सी को मज़बूत पकड़ लो और फूट न डालो। और अल्लाह का यह इनाम अपने ऊपर याद रखो कि तुम एक-दूसरे के दुश्मन थे। फिर उसने तुम्हारे दिलों में उल्फ़त डाल दी। पस तुम उसके फ़ज़्ल से भाई-भाई बन गए। और तुम आग के गढ़े के किनारे खड़े थे तो अल्लाह ने तुम्हें उससे बचा लिया। इस तरह अल्लाह तुम्हारे लिए अपनी निशानियां बयान करता है ताकि तुम राह पाओ।
सबसे पहली बात यह है कि जब हम क़ुरआन की इस
आयत पर ग़ौर करते हैं:
ऐ ईमान वालो अगर तुम अहले किताब में से एक गिरोह की बात मान लोगे तो वे तुम्हें ईमान के बाद फिर मुंकिर बना देंगे। [3:100]
[या अय्युहल लज़ीना आमनू! इन तुतीउ फ़रीक़म मिनल लज़ीना ऊतुल किताब
यरुद्दूकुम बअदा ईमानिकुम काफ़िरीन]
तो सबसे पहले हमारा ध्यान इसके पीछे के इतिहास और परिस्थितियों की तरफ जाता है कि आख़िर यह आयत किन हालात में नाज़िल हुई और
इसमें किन लोगों का ज़िक्र है।
क़ुरआन की हर आयत का एक immediate
reference होता है, यानी यह किस ख़ास घटना या हालात में नाज़िल हुई। लेकिन इल्मुल क़ुरआन (क़ुरआन को गहराई से समझने की विद्या) हमें सिखाती है कि आयत भले ही पहले किसी ख़ास
मौक़े के लिए आई हो, लेकिन इसका मफ़्हूम (मतलब) और हिदायत, जामे (बहुत व्यापक) होता है और हर दौर के लिए होता है।
इसलिए, जब हम क़ुरआन की आयात का मुताला (अध्ययन) करते हैं, तो हम सिर्फ़ इसके immediate reference (ऐतिहासिक संदर्भ) तक नहीं रुकते, बल्कि इसका generalization करके देखते हैं कि इन आयात का उस ज़माने में क्या मफ़्हूम था और आज हमारे लिए क्या है।
आज के दौर में इसका सही मायनों में व्यावहारिक अर्थ (री-एप्लिकेशन) ढूँढने और समझने की बात होती है, ताकि हम इसे अपने जीवन
में व्यावहारिक रूप से लागू कर सकें।
आयत का Immediate Reference:
मदीना में ‘औस’ और ‘ख़ज़रज’ नाम के दो क़बीले थे, जो पहले ईसाई थे। बाद में ये दोनों क़बीले पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल०) की दावत से प्रभावित होकर इस्लाम में दाख़िल हो गए।
इस्लाम क़ुबूल करने के बाद, जब ये ईमान वाले बन गए, तो कुछ लोगों या कहें, एक ख़ास गिरोह ने इनके बीच फूट डालने की कोशिश शुरू कर दी।
जैसा कि मौलाना ने तज़कीरुल क़ुरआन की तज़कीर में लिखा है कि औस और ख़ज़रज के बीच पुरानी रंजिशें और झगड़े चलते आ रहे थे। “किताब वालों” के एक गिरोह ने उनके इसी पुराने झगड़ों और दुश्मनी को फिर से उभारकर उन्हें उसी लड़ाई-झगड़े की ओर मोड़ने की कोशिश की। ताकि मुसलमान बनने के बावजूद ये फिर से आपस में लड़ने लगें।
ये मामला आया तो अल्लाह तआला ने फ़ौरन तंबीहन (चेतावनी देकर) उनको बताया कि अगर तुम अहले-किताब के ऐसे गिरोह की बात मान लोगे, तो ये तुम्हें ईमान लाने के बाद फिर मुंकिर बना देंगे।
“और तुम किस तरह इंकार करोगे”
[3: 101]
यानी— तुमलोग तो ईमान ला चुके हो, फिर ऐसा
काम कैसे कर सकते हो जो ईमान के ख़िलाफ़ हो ?
इसके बाद मुहम्मद रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने दोनों पक्षों को समझाया, और फिर दोनों पक्ष मान गए।
यही इस आयत का ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और immediate reference है।
अक्सर यह सवाल उठता है कि जब अहले-किताब (यहूदी
और ईसाई) लोगों को
भड़काते हैं, तो हम उनके बारे में नेगेटिव नज़रिया क्यों न रखें?
इस सवाल का जवाब हमें सीधे क़ुरआन
के उस्लूब (तरीक़े) से मिलता है।
क़ुरआन में अल्लाह तआला जो अंदाज़ (उस्लूब) अपनाते हैं, वह इतना सटीक और अर्थपूर्ण होता है कि अगर हम उस पर ग़ौर करें, तो वह हमारे लिए सही डायरेक्शन और हिदायत के लिए काफ़ी हो जाता है।
यहाँ अल्लाह तआला ने यह नहीं कहा कि पूरे अहले-किताब ने, ईमान लाने वालों को भड़काया,
बल्कि बड़ी सटीकता और न्याय के साथ यह कहा कि उन लोगों में से एक गिरोह ने ऐसा काम किया जिन्हें
किताब दी गई थी :
"फ़रीक़म मिनल लज़ीना ऊतुल किताब"
यानी — अहले-किताब में से एक गिरोह। [3: 100]
यहाँ "एक गिरोह" कहकर हमेशा के लिए यह सबक़ (हिदायत) दे दिया कि न्याय और संतुलन
कैसे बनाए रखना है।
यही इस आयत का अस्ल सबक़ (सीख) है, जिसे हमें याद रखना चाहिए।
अगर हम पूरी क़ौम या पूरे अहले-किताब को ही नेगेटिव मान
कर राय बना लें, तो सबसे बड़ा नुक़्सान यह होगा कि फिर भलाई और बातचीत का रास्ता बंद हो जाएगा।
क़ुरआन हमें यही सिखाता है कि
हमें सकारात्मक नज़रिया रखना चाहिए और सिर्फ़ उसी विशेष गिरोह को ज़िम्मेदार ठहराना
चाहिए, जो वास्तव में ग़लत काम कर रहा है। ऐसा करने से नफ़रत
और तनाव का माहौल पैदा होने से बच जाता है।
क़ुरआन के इस अंदाज़ (उस्लूब) को बहुत ज़्यादा अहमियत देने की ज़रूरत है।
हमें गहराई से यह
समझने की कोशिश करनी चाहिए कि क़ुरआन अपने अंदाज़ से हमें क्या सिखा रहा है।
इस आयत में [3:100] ईमान वालों को आगाह किया गया है कि अगर तुमने
अहले-किताब (यहूदी या ईसाई) के एक विशेष समूह की बात मान ली, तो वे
तुम्हें ईमान लाने के बाद फिर इनकार की तरफ़ मोड़ देंगे।
अहले-किताब का एक गिरोह चाहता है कि लोग उनकी बात मान लें और उनकी बातों पर चलें। उनका मक़्सद ये है कि ईमान लाने के बाद जिन लोगों के दिल मिल गए थे, उनके बीच आपसी दुश्मनियाँ फिर से ज़िन्दा हो जाएँ। यानी फूट डालकर नफ़रत और टकराव का माहौल बनाया जाए। इसलिए, यहाँ नफ़रत की जो फ़ज़ा बनने वाली है उसे रोकने की बात बताई गई है।
“ईमान के बाद” —
ईमान का एक अर्थ होता है
"मान लेना", लेकिन इसी के साथ इसका एक और गहरा मतलब
ये है कि जो शख़्स ईमान ले आता है, वह अल्लाह की तरफ़ से अम्न में आ जाता है, गोया
ईमान लाना सिर्फ़ मान लेना नहीं है, बल्कि अल्लाह की अमान (हिफ़ाज़त) में दाख़िल हो जाना है। इसीलिए जो कोई,
अल्लाह,
रसूल, किताब और आख़िरत को मान लेता है, वह अल्लाह की तरफ़ से मामून (महफूज़)
हो जाता है और मोमिन कहलाता है।
"मान लेना" का विपरीत शब्द "इनकार करना" है, जो कुफ़्र का हिस्सा है।
यानी, जो
ईमान लाता है, वह
अल्लाह की अमन (सुरक्षा) में
होता है, और
जो इनकार करता है, वह
इससे बाहर चला जाता है।
अब
यहाँ सबसे अहम बात यह है कि अगर कोई इंसान अल्लाह को
मानने और उसके हुक्म को मानने का दावा तो करे, लेकिन फिर
दूसरों की बातों में आकर ऐसे काम करने लगे जिनसे फ़साद फैलता है, तो यह असल में अल्लाह की इताअत (आज्ञापालन)
छोड़ने और उससे इनकार करने के बराबर है।
इसलिए
इस आयत में समझाया गया कि अगर तुम ऐसे लोगों की बात मान लोगे, तो वे तुम्हें
ईमान से वापस कुफ़्र (इनकार) की तरफ़ ले जाएंगे। यानी तुम अल्लाह की दी हुई अमन (सुरक्षा)
की हालत से निकल कर ग़ैर-अमन (अशांति) की
हालत में चले जाओगे।
यह बहुत अहम बात है, जिसे हमें समझने और अपने ज़िन्दगी में अपनाने की ज़रूरत है।
अगली आयत एक चौंकाने वाला सवाल पूछती है:
[3: 101]: और तुम किस तरह इंकार करोगे हालांकि तुम्हें अल्लाह की आयतें सुनाई जा रही हैं और तुम्हारे बीच उसका रसूल मौजूद है।
यह कैसे
मुमकिन है?
यह सवाल हमें जगाने के लिए है।
पैगंबर (सल्ल॰) के ज़माने में औस और ख़ज़रज का जो वाक़िआ पेश आया, उससे हमें एक बुनियादी हिदायत हासिल होती है कि जब भी
इंसान अल्लाह को छोड़ कर किसी इंसानी गिरोह या इंसान को अपना रहनुमा और हादी (रास्ता दिखाने
वाला) बना लेता है, तभी झगड़े, गुमराही और फ़साद की शुरुआत होती
है।
इसलिए, ज़िंदगी में सही
रास्ता पाने के लिए सबसे ज़रूरी बात यह है कि हम हिदायत के असली स्रोत को पहचाने —
हमारा रहनुमा और हादी (रास्ता दिखाने
वाला) सिर्फ़ वही हो सकता है जिसने हमें बनाया है – यानी अल्लाह।
रसूलुल्लाह को इसलिए भेजा गया कि वे इंसानों
का रुख़ अल्लाह की तरफ़ मोड़ें और अल्लाह की किताब के ज़रिए यह स्पष्ट कर दें कि
अगर इंसान को अपनी ज़िंदगी के मामले में, दुनिया और
आख़िरत के बारे में गाइडेंस लेना है, तो उसका रुख़
(झुकाव, ध्यान) हमेशा अल्लाह की तरफ़ होना चाहिए,
क्योंकि अल्लाह की किताब ही वास्तविक हिदायत का स्रोत है।
जो शख़्स इस बात को पकड़ ले कि मैं गाइडेंस
सिर्फ़ अल्लाह के भेजे हुए कलाम से लूँगा - तो वही इंसान सिरात-ए-मुस्तकीम (सीधी राह) पर चलने वाला बन जाता है। लेकिन जब कोई
इंसान, अल्लाह की तरफ़ से आई हुई हिदायत को छोड़कर इंसानों के गढ़े हुए नज़रियों,
नैरेटिव्स या मसाइल (मनगढ़ंत मुद्दों और समस्याओं) को तर्जीह (priority) देना शुरू करे - तो यह वह नाज़ुक मोड़ होता है
जहां से सिरात-ए-मुस्तकीम (सीधी राह) से हटने का
ख़तरा बहुत ज़्यादा बढ़ जाता है।
इसीलिए क़ुरआन में ज़ोर देकर कहा जा रहा है :
ऐ ईमान वालो, अल्लाह से डरो
(सूरह आल-ए-इमरान, 3:102).
अगर तुम सच में अपने ईमान को लेकर संजीदा हो, जैसा कि एक ईमान वाले को होना चाहिए तो अल्लाह के बारे में पूरी तरह से
सीरियस हो जाओ।
"अल्लाह से डरना" असल में यह है कि
इंसान अल्लाह के बारे में बेहद मोहतात (सावधान) हो जाए। वह
हर वक़्त सोचे कि मैं अपने गाइडेंस के लिए किसकी तरफ़ देख रहा हूँ ?
जिसने मुझे बनाया है, वही मेरे दिल को,
मेरी हर सांस को, और मेरे पूरे “अंदरूनी सिस्टम” (अन्फ़ुस) को कंट्रोल कर रहा है— मेरा सबकुछ उसी की हिकमत
और ताक़त से चल रहा है। वही उसको गाइड कर रहा है।
जब वही मेरी “अंदरूनी ज़िंदगी” का पूरा संचालन कर रहा है, तो फिर मैं उसके सिवा
अपनी “बाहरी ज़िंदगी” के गाइडेंस के लिए रहनुमाई किससे ले सकता हूँ ?
यही "ittaqū-llāha"
(अल्लाह से डरो – 3:102) का असल
मफ़हूम है—
यानी अल्लाह के बारे में इतनी गहरी संजीदगी (Seriousness) पैदा कर लेना कि गाइडेंस का कोई और स्रोत नज़र ही न आए।
जब इंसान अपने हर फ़ैसले और हर अमल में सच्चे दिल से अल्लाह की तरफ़ रुख़ करे — उसकी हिदायत को सबसे ऊपर रखे और अपना ध्यान पूरी तरह उसी की ओर केंद्रित कर दे, सिर्फ़ उसी से रहनुमाई मांगे, और उससे डरते हुए हिदायत पाने की तड़प पैदा कर ले—तो यही “हक्का तुक़ातिही” (जैसा कि उससे डरना चाहिए, 3: 102) का असल मफ़हूम (मतलब) है।
लेकिन अगर हम यह नहीं करते — हम अल्लाह के बारे में उतने संजीदा नहीं होते जितना कि होना चाहिए,
तो इसका मतलब है कि हम “हक्का
तुक़ातिही” का हक़ अदा नहीं कर सके।
अल्लाह से डरने का मतलब कोई साधारण डर नहीं है। बल्कि यह एक गहरी चेतना और श'ऊरी एहसास (Consciousness) है जो इंसान के पूरे वजूद में समा जाता है — इंसान हर पल यह महसूस करता है कि वह अल्लाह की क़ुदरत (ताक़त और पूरा कंट्रोल), रहमत और अज़मत (दया,मेहरबानी और महानता) के सामने बिल्कुल मोहताज और बेबस है — वह अपने दम पर कुछ भी नहीं कर सकता।
जब यह शु'ऊर (समझ-बूझ) दिल और
दिमाग़ पर इस तरह छा जाती है, तो इंसान को समझ
में आने लगता है कि मेरी कोई ताक़त या हैसियत नहीं, मैं तो कुछ भी नहीं हूँ — सब
कुछ सिर्फ़ और सिर्फ़ अल्लाह के नियंत्रण (कंट्रोल) में चल रही है।
यही
वह गहरा एहसास है जो उसे विनम्र बना देता है। यही एहसास उसके दिल में अल्लाह की
बेपनाह मोहब्बत जगा देता है, और इसी मोहब्बत के साए में
वह अपने हर मामलात को सुधारने की कोशिश करता है और हर छोटे-बड़े फ़ैसले में सिर्फ़
अल्लाह से ही रहनुमाई मांगता है।
यही "अल्लाह को मज़बूती से पकड़ना" है — जैसा कि कुरआन में
आया है:
“और जो शख़्स अल्लाह को मज़बूती से पकड़ेगा तो वह पहुंच गया
सीधी राह पर”
[3: 101]
यानी जो इंसान अल्लाह की हिदायत (गाइडेंस) को सबसे ऊपर रखे और हर हाल में उसी को मज़बूती से थामे रहे, वही सही रास्ते पर है। यही असल में एक सच्चे मुसलमान की पहचान है ।
मुसलमान होने का मतलब सिर्फ़ इतना नहीं कि हम अल्लाह को मान लें, बल्कि अल्लाह को मज़बूती से पकड़ लेना है। अपने पूरे शु'ऊर (समझ-बूझ) और पूरे वजूद के साथ अल्लाह के सामने ख़ुद को बिछा
देना है, यही सिरात-ए-मुस्तक़ीम (सीधा रास्ता) की असली कुंजी है।
इस बुनियादी हक़ीक़त को समझाते हुए क़ुरआन में कहा गया:
"और तुम्हें मौत न आए मगर इस हाल में कि तुम मुस्लिम हो" (3:102)
यानी हमारी जिंदगी का आख़िरी पल भी इसी हालत
में गुजरे कि हम पूरी तरह अल्लाह के सामने झुके हुए हों, उसकी मर्जी के सामने अपनी सभी इच्छाओं को क़ुर्बान कर चुके हो।
यही वह मिसाली (बेहतरीन और आदर्श) हालत है जिसमें हमें मर के जाना है अल्लाह के पास।
यही "हक्का तुक़ातिही" (जैसा कि डरना चाहिए।) की मिस्दाक़ (गवाही, शहादत) है।
यही वह हालत है जो हिदायत के मामले में हमारे अन्दर मोहतात (बहुत सोच कर निर्णय लेने वाला) रवैया पैदा करता है. लेकिन कई बार लोग अपनी बातें अल्लाह की हिदायत में मिलाकर पेश कर देते हैं, जिससे भटकने का ख़तरा पैदा हो जाता है।
इसलिए अल्लाह तआला हमें एक बेहद अहम हिदायत दे रहे हैं :
और सब मिलकर अल्लाह की रस्सी को मज़बूत पकड़ लो
और फूट न डालो।
(सूरह आल-ए-इमरान, 103)
यहाँ "अल्लाह की रस्सी" (हब्लिल्लाह) को मज़बूत पकड़ लो के दो गहरे मायने हैं:
1. क़ुरआन को अपना रहनुमा बना लो।
2. पूरे इखलास के साथ, ख़ालिस तौहीद को अपने लिए पकड़ लो।
यानी अपना पूरा ध्यान और रुख़ सिर्फ़ अल्लाह की तरफ़ कर लो। और यह काम सब मिल कर करो, यानी क़ौम का एक भी फर्द
अल्लाह के ख़ालिस तसव्वुर से खाली न हो।
जब इंसान इस दर्जे तक पंहुचता है तो अल्लाह
तआला उनके दिलों में मेल पैदा कर देता है, जैसा कि औस और ख़ज़रज कबीलों की
मिसाल में हुआ।
"और अल्लाह का यह इनाम अपने ऊपर याद रखो कि तुम एक-दूसरे के दुश्मन थे। फिर उसने तुम्हारे दिलों में उल्फ़त डाल दी। पस तुम उसके फ़ज़्ल से भाई-भाई बन गए।" [3:103]
इसी के साथ एक और नेअमत का ज़िक्र किया गया है
:
"और तुम आग के गढ़े के किनारे खड़े थे तो अल्लाह ने तुम्हें उससे बचा लिया। इस तरह अल्लाह तुम्हारे लिए अपनी निशानियां बयान करता है ताकि तुम राह पाओ।" [3:103]
इस तरह अल्लाह अपनी निशानियाँ बयान करता है, वह बार-बार अपनी आयतों को समझाता है, इसलिए—"ताकि हम हिदायत (राह) पा लें"
"ला'अल्लकुम तहतादून"
यानी अल्लाह की हिदायत ही सब का असली बुनियाद और असली pillar है।
Note: क़ुरआन मुताला पर एक दा’ई के बयान का सारांश।
तज़्कीरुल-क़ुरआन | तज़्कीर
दुनिया आज़माइश की जगह है । यहां हर वक़्त यह
ख़तरा है कि शैतान आदमी के ईमान को उचक ले जाए और फ़रिश्ते उसकी रूह इस हाल में
क़ब्ज़ करें कि वह ईमान से ख़ाली हो । इसलिए ज़रूरी है कि आदमी हर वक़्त बा-होश रहे, वह अपने आप पर निगरां बन जाए ।
ईमान से दूर होने की एक सूरत वह है जबकि दीन
के अजज़ा (अंगों) में तब्दीली करके अहम को ग़ैर-अहम और
ग़ैर-अहम को अहम बना दिया जाए ।
दीन की अस्ल रस्सी तक़वा है । यानी अल्लाह से
डरना और मरते दम तक अपने हर मुआमले में वही रवैया अपनाना जो अल्लाह के सामने
जवाबदही के तसव्वुर (धारणा) से बनता हो, यही सिराते मुस्तक़ीम (सीधा-सच्चा रास्ता, सन्मार्ग) है ।
इससे हटना यह है कि ‘तक़वा’ के बजाए, किसी और चीज़ को दीन का मदार समझ लिया जाए और उस पर इस तरह ज़ोर दिया जाए
जिस तरह ख़ुदा के ख़ौफ़ और आख़िरत की फ़िक्र पर दिया जाता है ।
जब भी दीन में इस क़िस्म की तब्दीली की जाती है
तो इसका लाज़िमी नतीजा यह होता है कि मिल्लत के दर्मियान इख़्तेलाफ़ (मतभेद) पड़ जाता है । कोई एक ज़िमनी (उप, पूरक) चीज़ पर ज़ोर देता है कोई दूसरी ज़िमनी चीज़
पर, और इस तरह मिल्लत फ़िरके-फ़िरके में बंट कर रह
जाती है ।
ऊपर वर्णित पहले से एक अल्लाह तवज्जो का
मर्कज़ बनता है और दूसरे से विविध मसाइल तवज्जोह के मर्कज़ बन जाते हैं ।
जब दीन में सारा ज़ोर और ताकीद तक़वा (अल्लाह से डरना) पर दिया जाए तो इससे आपस में इत्तेहाद वजूद
में आता है और जब इसके सिवा दूसरी चीज़ों पर ज़ोर दिया जाने लगे तो इससे आपसी
इख़्तेलाफ़ (मतभेद) की वह बुराई पैदा होती है जो लोगों को जहन्नम
के किनारे पहुंचा देती है ।
किसी गिरोह के अंदर इख़्तेलाफ़ दुनिया में भी
अज़ाब है और आख़िरत में भी अज़ाब ।
इस्लाम से पहले मदीने में दो क़बीले थे । औस
और ख़ज़रज ये दोनों अरब क़बीले थे मगर वे आपस में लड़ते रहते थे । इन आपसी
लड़ाइयों ने उन्हें कमज़ोर कर दिया था । जब वे इस्लाम के दायरे में दाख़िल हुए तो
उनकी लड़ाइयां ख़त्म हो गईं, वे भाई-भाई
की तरह मिलकर रहने लगे ।
इसकी वजह यह है कि ग़ैर-इस्लाम में हर आदमी
अपना वफ़ादार रहता है और इस्लाम में सिर्फ़ एक अल्लाह का ।
जिस समाज में लोग अपने या अपने गिरोह के
वफ़ादार हों वहां क़ुदरती तौर पर कई वफ़ादारियां वजूद में आती हैं । और कई
वफ़ादारियों के अमली नतीजे ही का नाम इख़्तेलाफ़ और टकराव है ।
इसके बरअक्स जिस समाज में तमाम लोग एक ख़ुदा
के वफ़ादार बन जाएं वहां सबका रुख़ एक मर्कज़ की तरफ़ हो जाता है, सब एक रस्सी से बंध जाते हैं । इस तरह आपसी इख़्तेलाफ़ और टकराव के असबाब
अपने आप ही ख़त्म हो जाते हैं ।
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