हक़ की तलाश
Source : AL-RISALA (Urdu) | March -2011
अमेरिकी पत्रकार एल्विन टॉफ़लर (Alvin Toffler) की एक बहुत मशहूर किताब है — “फ़्यूचर शॉक (Future Shock).”
यह किताब 1970 में पहली बार छपी थी, और तब से अब तक इसकी 50 लाख से भी ज़्यादा प्रतियाँ दुनिया भर में बिक चुकी हैं। साथ ही, इसका अनुवाद दुनिया की कई भाषाओं में हो चुका है।
अपनी किताब में टॉफ़लर ने एक सेमिनार का वाक़ि'आ लिखा है।
सेमिनार चल रहा था। उस सेमिनार में
किनारे की सीट पर एक आदमी बैठा हुआ था। जब सभी लोग अपनी-अपनी बातें कह चुके, तो आख़िर में वह
आदमी खड़ा हुआ और बोला:
“मेरा नाम चार्ल्स
स्टेन है।
मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी सुई बनाने
की एक फ़ैक्ट्री में काम करते हुए गुज़ारी है।
अब मेरी उम्र 77 साल है।
मैं वह चीज़ हासिल करना चाहता हूं, जो मैं अपनी जवानी
में नहीं पा सका।
मैं भविष्य के बारे में जानना
चाहता हूँ।
मैं एक शिक्षित इंसान की हैसियत से मरना चाहता हूं।”
My name is Charles Stein. I am a needle worker all my life. I am seventy-seven years old, and I want to get what I did not get in my youth. I want to know about the future. I want to die an educated man.
(page 427)
गहराई के साथ ग़ौर कीजिए तो उस आदमी की बात सादा तौर पर सिर्फ़ “एजुकेशन” की नहीं थी। मसला असल में मा'रिफ़त या हक़ीक़त की समझ-बूझ का था। दूसरे शब्दों में, वह अपनी असलियत (true or innate nature) के नज़रिए से यह कह रहा था कि "मैं एक साहिब-ए-मा'रिफ़त इंसान (realized man) की हैसियत से मरना चाहता हूँ।"
यही हर इंसान की अंदरूनी हालत (नफ़्सियात) है। हर इंसान इसी सोच (नफ़्सियात) में जी रहा है कि वह असल सच्चाई को
नहीं समझ सका। मतलब,
हर इंसान इस तलाश में है कि वह ये जान सके कि सच्चाई क्या है।
हर इंसान मा'रिफ़त (हक़ीक़त की समझ) की तलाश में है।
ख़ुश-क़िस्मत इंसान वही है जो मा'रिफ़त को पा ले। और
जब उस पर मौत आए, तो इस हाल में आए कि वह एक साहिब-ए-मा'रिफ़त, यानी रब को पहचानने वाला इंसान बन चुका हो।
