तज़्किया की हक़ीक़त

 


तज़्किया की हक़ीक़त  


Source : AL-RISALA  (Urdu) | AUG - 2010



पैग़म्बर के फ़राइज़ (अनिवार्य कर्तव्यों) में से एक फ़रीज़ा वह है जिसके लिए क़ुरआन में “तज़्किया” (अल-बक़रह:129)1 का लफ़्ज़ आया है।


हर ईमान वाले व्यक्ति के लिए ज़रूरी है कि वह अपना तज़्किया करे।

तज़्किया के बग़ैर वो ऊँची शख़्सियत (श्रेष्ठ व्यक्तित्व) नहीं बनती जिसको क़ुरआन में रब्बानी शख़्सियत (आल-ए-इमरान:79) कहा गया है।

 

हक़ीक़त यह है कि तज़्किया ही किसी इंसान के लिए जन्नत में दाख़िले का ज़रिया बनेगा

(ता-हा:76)2 

 


तज़्किया का लफ़्ज़ी मतलब है “निखरना” या “विकसित होना” (to flourish).

इसे एक पेड़ की मिसाल से समझ सकते हैं:


पेड़, एक बीज के बढ़ने का नतीजा होता है।

एक बीज सही माहौल पाकर बढ़ना शुरू होता है, यहाँ तक कि वह एक हरा-भरा पेड़ बन जाता है।

 

इसी तरह, इंसान की शख़्सियत (व्यक्तित्व) भी तज़्किया की प्रक्रिया से गुजरकर एक विकसित शख़्सियत बन जाती है।


इस नज़रिए से, तज़्किया को रूहानी विकास या मानसिक विकास भी कहा जा सकता है।

 


अल्लाह तआला ने हर इंसान को बहुत-सी क़ाबिलियत और गुणों (potentials) के साथ पैदा किया है। इन छिपी हुई क्षमताओं (potentials) को विकसित करके, उन्हें जिंदगी में लाने का नाम “तज़्किया” है।

 

जब कोई इंसान ईमान लाता है, तो दरअसल वह अपने तज़्किया के सफ़र का आग़ाज़ करता हैयहाँ तक कि धीरे-धीरे वह एक मुज़क्क़ा इंसान, यानी रूहानी और सोच के स्तर पर एक विकसित व्यक्तित्व (developed personality) बन जाता है।


यही वह इंसान है जिसे आख़िरत की हमेशा रहने वाली जन्नत में दाख़िला मिलेगा।

 


तज़्किया किसी रहस्यमय चीज़ का नाम नहीं। तज़्किया का ज़रिया मेडिटेशन (meditation) भी नहीं है, बल्कि तज़्किया का ज़रिया गहराई से सोचने-समझने (contemplation) की प्रक्रिया है।


अपनी ज़ात (स्वयं) और कायनात के बारे में गहराई से सोच-विचार करना, और इस सोच से मा'रिफ़त — यानी अल्लाह की पहचान और समझ की मानसिक या बौद्धिक खुराक हासिल करना।


यही वह अमल (process) है जो इंसान के भीतर एक विकसित व्यक्तित्व (developed personality) को आकार देती है।

 

तज़्किया कोई रहस्यमय या अनजानी चीज़ नहीं, यह एक मालूम हक़ीक़त है। यह तज़्किया आदमी अपनी ख़ुद की कोशिश से हासिल करता है, किसी कल्पित (मफ़रूज़ा) बुज़ुर्ग की रहस्यमय कृपा (फ़ैज़) से इसका कोई वास्ता नहीं।




1 क़ुरआन 2: 129 : (तर्जमा)

ऐ हमारे रब और इनमें इन्हीं में का एक रसूल उठा जो इन्हें तेरी आयतें सुनाये और इन्हें किताब और हिकमत की तालीम दे और इनका तज़्किया करे। बेशक तू ज़बरदस्त है हिक्मत वाला है।


2 क़ुरआन 20: 76 (तर्जमा)

उनके लिए हमेशा रहने वाले बाग़ हैं जिनके नीचे नहरें जारी होंगी। वे उनमें हमेशा रहेंगे। और यह बदला है उस शख़्स का जो तज़्किया (स्वयं को विकसित) करे



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