तज़्किया
Source : AL-RISALA (Hindi) | JULY - 1991
क़ुरआन
में पैग़म्बर
के दो ख़ास काम बताए गए हैं —
किताब की तालीम और
तज़्किया।
(क़ुरआन 2:129, 3:164)
किताब की तालीम का मतलब क़ुरआन की शिक्षा
है। यानी ख़ुदा’ई कलाम (ईश-वाणी) को फ़रिश्ते से लेकर इंसानों तक पँहुचाना।
दूसरा काम है —'तज़्किया'।
तज़्किया से मतलब वही चीज़ है जिसे आज की भाषा
में ‘एजुकेट’ करना या
जागरूक बनाना कहा जाता है। इसका मक़सद लोगों की सोच को रब्बानी सोच में बदलना है।
उनका मानसिक सुधार करके उन्हें इस क़ाबिल बनाना कि वे वैसा ही सोचें जिस तरह रब चाहता है कि सोचा जाए। और इस तरह फ़ैसला करें जिस तरह रब चाहता है कि फ़ैसला किया जाए।
मौजूदा ज़माने में जितने भी मुस्लिम सुधारक उठे‚ उनमें आम तौर पर यह
बुनियादी कमी नज़र आती है कि उन्होंने अपने काम की शुरुआत ‘तज़्किया’ से नहीं की।
लगभग सभी का यह हाल हुआ कि मुसलमानों के कुछ हालात उनके सामने आए और उनको देखकर वे पुरजोश हो कर उठ खड़े हुए। ज़ेहन (रब्बानी सोच) बनाए बग़ैर उन्होने अमली काम शुरू कर दिया।
किसी ने अंग्रेज़ी हुकूमत से बिगड़ कर आज़ादी के जिहाद का नारा लगाया।
कोई, पश्चिमी सभ्यता का ज़ोर देख कर मैदान में कूद पड़ा।
किसी को ‘श्रदानन्द’ के क़त्ल के बाद पैदा होने वाले हालात ने इस्लाम का मुजाहिद बना दिया।
कोई आर्य समाज के 'शुद्धि आंदोलन' (हिंदू धर्म में वापसी) से बेचैन होकर सरगर्म हो गया।
किसी को मुस्लिम ख़िलाफ़त के पतन ने, जान देने के लिए प्रेरित कर दिया। वग़ैरह।
यह सब, काम करने का ग़ैर–पैग़म्बराना तरीक़ा
है।
काम का पैग़म्बराना तरीक़ा यह है कि उसको
‘तज़्किया’ से शुरू किया जाए न कि सीधे क़दम उठा लिया जाए।
तज़्किया का एक मतलब यह है कि लोगों को दीन
का सही इल्म हासिल हो जाए। वे जान लें कि
इस्लाम के नज़रिए से कैसे सोचना और चीज़ों को कैसे देखना है।
उनके अन्दर यह सलाहियत पैदा हो जाए कि वे
ग़ैर–इस्लामी नज़रिये के मुक़ाबले में इस्लामी नज़रिये को पहचान सकें।
वह हर अलग-अलग क़िस्म के हालात में यह फ़ैसला
कर सकें कि किस वक़्त उन्हें क्या करना है और किस वक़्त उन्हें क्या नहीं करना।
तज़्किया का दूसरा पहलू है यह है कि लोगों के अन्दर ज़माने को परखने–पहचानने
की सलाहियत पैदा हो जाए।
वे जान लें कि दुनिया किन हालात से गुज़र रही है, और इन हालात में दीन को किस तरह ज़िंदगी में उतारा जा सकता है।
इसी विषय पर अगला लेख :
क़ुरआन 2:129 :
ऐ हमारे रब और इनमें इन्हीं में का एक रसूल उठा जो इन्हें तेरी आयतें सुनाये और इन्हें किताब और हिकमत की तालीम दे और इनका तज़्किया (शुद्धीकरण) करे। बेशक तू ज़बरदस्त है हिक्मत वाला है।
क़ुरआन 2:164 :
अल्लाह ने ईमान वालों पर एहसान किया कि उनमें उन्हीं में से एक रसूल भेजा जो उन्हें अल्लाह की आयतें सुनाता है और उन्हें पाक करता है और उन्हें किताब व हिक्मत (तत्वदर्शिता) की तालीम देता है। बेशक ये इससे पहले खुली हुई गुमराही में थे।
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