दावत-ए-आम की ज़िम्मेदारी
Source : AL-RISALA (Urdu) | DEC - 2003
बयान किया जाता है कि पिछले prophets ज़्यादातर अपनी-अपनी क़ौमों और इलाक़ों के लिए आए। वो जिस क़ौम में पैदा हुए वही क़ौम उनकी दावत का मैदान होती थी। लेकिन आख़िरी पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) के बाद कोई और पैग़म्बर आने वाला नहीं था, इसलिए उन्हें पूरी दुनिया के लिए दा’ई और मुंजिर (डरानेवाला) बनाकर भेजा गया।
क़ुरआन में कहा गया है :
बड़ी बाबरकत है वह ज़ात जिसने अपने बंदे पर फ़ुरक़ान उतारा ताकि वह जहान वालों के लिए डराने वाला हो ।
(क़ुरआन अल-फ़ुरक़ान, 25:1)
इसीलिए पैग़म्बर-ए-इस्लाम के लिए क़ुरआन
में ये अलफ़ाज़ हैं:
तर्जमा : हमने तुमको तमाम दुनिया वालों के लिए रहमत बना कर भेजा है।
(अल-अम्बिया,
21:107)
यह बात मुसलमानों के लिए फ़ख़्र (घमंड) या बड़ाई की नहीं,
बल्कि एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी की है।
इसका मतलब ये है कि जहाँ दूसरे
पैग़म्बरों के उम्मतों की दावती ज़िम्मेदारी अगर सीमित (मक़ामी) इलाक़ों तक महदूद रहती थी, वहीं उम्मत-ए-मुहम्मदी
की ज़िम्मेदारी पूरी दुनिया तक फैली हुई
है।
उम्मत-ए-मुहम्मदी का उम्मत-ए-मुहम्मदी होना सिर्फ़ उस वक़्त यक़ीनी हो सकता है जब वह पूरी दुनिया के लोगों तक अल्लाह का पैग़ाम पहुँचाने
की अपनी ज़िम्मेदारी निभाए।
अगर यह काम नहीं किया गया, तो
सिर्फ़ नाम से इसका
उम्मत-ए-मुहम्मदी होना भी सवाल के घेरे में आ जाता है। (अल-मायदा, 5: 67)
आगे यह बात भी समझ लेनी चाहिए कि उम्मत की इस दावती ज़िम्मेदारी का मतलब यह नहीं है कि उम्मत के लोग पूरी दुनिया में सिर्फ़ अपने ही मसलों, और हितों को लेकर तहरीकें चलाएं बल्कि उन्हें लाज़िमी तौर पर ग़ैर-मुस्लिम समाज तक अल्लाह का पैग़ाम पहुँचाने की तहरीकें चलाना है।
मुस्लिमवार या मिल्लतवार तहरीकें असल में उम्मत का अंदरूनी मामला है। जबकि ग़ैर-मुस्लिम समाजों तक अल्लाह का पैग़ाम पहुँचाने की तहरीक, ख़ारिजी (बाहरी) माअनों में उम्मत की असली और लाज़िमी ज़िम्मेदारी है।
उलमा-ए-इस्लाम का इस बात पर सहमति है कि दावत के बिना जिहाद नहीं।
मशहूर फ़क़ीह इब्न रुशद ने लिखा है :
“जंग की शर्त मुत्तफ़िक़ा तौर पर (एक मत से) ये है कि उन लोगों तक दावत पहुंच चुकी हो।” (Bidayat al-Mujtahid 1/3̱8̱6̱)
इसका मतलब ये है कि उनसे उस वक़्त तक जंग
जायज़ नहीं जब तक कि उन्हें दावत न पहुँच जाये।
इस मे'यार की रौशनी में देखिए तो मालूम होगा कि पिछले लगभग तीन सौ साल से मुस्लिम रहनुमा जिहाद के नाम पर ग़ैर-क़ौमों से जो लड़ाईयां लड़ रहे हैं उनमें से कोई भी, जिहाद नहीं। और इसकी सादा सी वजह ये है कि ये लड़ाईयां दावत-ओ-तब्लीग़ के बग़ैर लड़ी गईं।
जैसे, शाह वलीउल्लाह देहलवी की (indirectly) जंग मराठों से, शहीदैन की जंग सिखों से, उलमा-ए-हिंद की जंग अंग्रेज़ों से, अरबों की जंग
इसराईलियों से, पाकिस्तानियों और कश्मीरियों की जंग हिंदूओं से, फ़िलपाइनी मुसलमानों की जंग वहां के ईसाईयों से, चेचन मुसलमानों की जंग रूसियों से, वग़ैरा।
ये और आज के दौर की दूसरी लड़ाइयाँ जो मुस्लिम रहनुमा लड़ते रहे हैं या अब भी लड़ रहे हैं, उनमें से कोई भी अल्लाह की राह में जिहाद (जिहाद-फ़ी-सबीलिल्लाह) नहीं। क्योंकि ये लड़ाईयां दावत-ओ-तब्लीग़ की बुनियादी शर्त के बग़ैर शुरू कर दी गईं।
यही वजह है कि मौजूदा ज़माने की ये तमाम लड़ाइयाँ हब्त-ए-आ'माल (मेहनत और क़ुर्बानियों का बेकार चले जाने) का शिकार हो गईं। मुसलमानों की एकतरफ़ा तबाही के सिवा उनका और कोई नतीजा हासिल नहीं हुआ।
किसी ग़ैर-मुस्लिम क़ौम के ख़िलाफ़ जिहाद (लड़ाई के अर्थ में) शुरू करने के लिए यह वजह काफ़ी नहीं है कि उसने मुसलमानों को इलाक़े, सत्ता या संपत्ति (मिल्क-ओ-माल) से जुड़ा कोई नुक़्सान पहुँचाया हो। ऐसे मामलों के हल के लिए शान्तिपूर्ण उपाय है न कि हिंसक टकराव।
ग़ैर-मुस्लिमों के मामले में मुसलमानों की सबसे पहली और आख़िरी ज़िम्मेदारी दावत और पैग़ाम पहुँचाने की है।
जहाँ तक जिहाद का सवाल है—लड़ाई के अर्थ में—तो वह सिर्फ़
कुछ बहुत ख़ास और तय शर्तों पर ही जायज़ है, और मौजूदा दौर में ये शर्तें किसी भी
जगह के मुसलमानों के हक़ में मौजूद नहीं।
किसी क़ौम के
ख़िलाफ़ दावत दिए बिना जिहाद छेड़ना
निहायत संगीन ज़िम्मेदारी है।
हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम ने सिर्फ़ इतना किया था कि दावत का काम पूरा करने से पहले ही उन्होंने
अपनी मद’ऊ*
क़ौम से अलग होने (हिजरत) का मामला किया।
अब वे लोग जिन्होंने सिरे से दावत का अमल ही न
किया हो और फिर सिर्फ़ दुनियावी झगड़ों
की वजह से अपनी
मद’ऊ क़ौम के ख़िलाफ़ हथियार उठाकर जंग छेड़ दें, उनका मामला हज़रत यूनुस के मुक़ाबले में अल्लाह की नज़र में कितना ज़्यादा संगीन
होगा, इसकी कल्पना भी इंसान के रोंगटे खड़े
कर देने के लिए काफ़ी है।
[क़ुरआन अल-मायदा, 5: 67]: ऐ पैग़म्बर, जो कुछ तुम्हारे ऊपर तुम्हारे रब की तरफ़ से उतरा है उसे पहुंचा दो। और अगर तुमने ऐसा न किया तो तुमने अल्लाह के पैग़ाम को नहीं पहुंचाया। और अल्लाह तुम्हें लोगों से बचाएगा। अल्लाह यक़ीनन मुंकिर लोगों को राह नहीं देता।
दा'ई : ख़ुदा का तख़्लीक़ी मंसूबा (Creation plan of God) से परिचित वह व्यक्ति जो ख़ुदा के पैग़ाम से लोगों को अवगत कराता है।
मद'ऊ: वह व्यक्ति जिसे ख़ुदा के पैग़ाम से अवगत कराना है या अवगत कराया जाता है।
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