मद'ऊ, न
कि दुश्मन
"क्या हम
इंसानों को दुश्मन मानकर अपनी असली लड़ाई भूल रहे हैं? क़ुरआन हमें
बताता है कि हमारा दुश्मन कौन है और हमारी ज़िम्मेदारी क्या है। पढ़ें, और सोचें कि सही रास्ता क्या है!"
Source: AL-RISALA (Urdu) | AUG – 2007
मौजूदा ज़माने में लगभग तमाम मुसलमान, ग़ैर-मुस्लिम क़ौमों को या तो अपना दुश्मन समझते हैं या अपना मुक़ाबला करने वाला। उनमें से एक तबक़ा उन क़ौमों के ख़िलाफ़ हथियारबंद जंग छेड़े हुए है, और दूसरा तबक़ा उनके बारे में नफ़रत और मन में नकारात्मक भावनाएं पाले हुए है।
यह सोच और व्यवहार पूरी तरह इस्लामी तालीम के ख़िलाफ़ है।
इस क़िस्म की तमाम कार्रवाइयाँ न तो इस्लामी जिहाद हैं और न ही इस्लामी ग़ैरत (दीन की जिम्मेदारी)। बल्कि ये इस्लाम के नाम पर सिर्फ़ ग़ैर-इस्लामी (इस्लाम की तालीम के ख़िलाफ़) कार्यों का हिस्सा हैं, इसके सिवा और कुछ नहीं।
क़ुरआन की रौशनी-में देखा जाए तो हमारा दुश्मन कोई इंसानी क़ौम नहीं, बल्कि सिर्फ़ शैतान है, जिसे क़ुरआन में “ताग़ूत” कहा गया है। हमारी लड़ाई सिर्फ़ शैतान से है, किसी और से नहीं।
आज़माइश (इम्तिहान) के मक़सद से अल्लाह तआला ने इंसान के अंदर तरह-तरह के जज़्बात रखे हैं—जैसे ग़ुस्सा, बदला लेने की भावना वग़ैरह।
शैतान इन्हीं जज़्बात (भावनाओं) को ग़लत रुख़ देकर हमें सही रास्ते से हटाने की कोशिश करता है। यही वे मौक़े हैं जब कि हमें शैतान से लड़ना है।
शैतान इंसान के सामने
बुराई को इस तरह सजाकर पेश करता है कि वह उसे अच्छी लगने लगे (सूरह अल-हिज्र 15:39)1। शैतान की तज़ईन (सजावट और बहकावे) से बचने ही का नाम तज़्किया (आत्मशुद्धि) है, और जो लोग इस एतिबार से अपना तज़्किया करें, वही वह
लोग हैं जिनको जन्नत में दाख़िला मिलेगा (सूरह ताहा 20:76)2 ।
शैतान के ख़िलाफ़ इंसान की लड़ाई सिर्फ़ मन और सोच (नफ़्सियात) की सतह
पर होती है, हिंसा और हथियार की सतह पर नहीं।
जहाँ तक इंसान का मामला है, क़ुरआन साफ़ तौर पर बताता है कि हर इंसान हमारा "मद’ऊ"3 है। वह हमारा प्रतिद्वंद्वी (मुक़ाबला करने वाला) या दुश्मन नहीं।
इंसान के साथ हमारा रिश्ता "दा'ई"4 और "मद’ऊ" का है, दुश्मन या मुक़ाबला करने वाले का नहीं।
इसलिए इंसान के प्रति हमारी ज़िम्मेदारी यह है कि हम उन्हें शांतिपूर्ण तरीक़े से अल्लाह का पैग़ाम पहुँचाएं।
लेकिन लोगों तक अल्लाह का पैग़ाम पहुँचाने का काम सिर्फ़ वही लोग कर सकते हैं जिनके दिल नफ़रत और दुश्मनी के जज़्बात से पूरी तरह खाली हों। नफ़रत और दावत दोनों एक ही दिल में जमा नहीं हो सकते।
आज के दौर में मुसलमान, इंसानों के ख़िलाफ़ अपनी ताक़त बर्बाद कर रहे हैं, जो पूरी तरह अल्लाह की मंशा के ख़िलाफ़ है।
मुसलमानों पर लाज़िम (फ़र्ज़) है कि वो अपने इस रुजहान (प्रवृत्ति) को बदलें और अपनी सारी ताक़त दा'वत-ए-इलल्लाह (अल्लाह का पैग़ाम पंहुचाने) के काम में लगाएँ।
यही उनके लिए नजात (बचाव) और कामयाबी का एकमात्र रास्ता है।
1. [क़ुरआन सूरह अल-हिज्र 15:39] :
इब्लीस ने कहा, ऐ मेरे रब, जैसे तूने मुझे गुमराह किया है इसी तरह मैं ज़मीन में उनके लिए मुज़य्यन (दिलकशी) करूंगा और सबको गुमराह कर दूंगा।
2. [क़ुरआन सूरह ताहा 20:76] :
उनके लिए हमेशा रहने वाले बाग़ हैं जिनके नीचे नहरें जारी होंगी। वे उनमें हमेशा रहेंगे। और यह बदला है उस शख़्स का जो पाकीज़गी इख़्तियार (तज़्किया) करे।
3. मद'ऊ: वह व्यक्ति जिसे ख़ुदा के पैग़ाम से अवगत कराना है या अवगत कराया जाता है।
4. दा'ई: ख़ुदा का तख़्लीक़ी मंसूबा (Creation plan of God) से परिचित वह व्यक्ति जो ख़ुदा के पैग़ाम से लोगों को अवगत कराता है।
5. [क़ुरआन अल-मायदा 5: 67] :
ऐ पैग़म्बर, जो कुछ तुम्हारे ऊपर तुम्हारे रब की तरफ़ से उतरा है उसे पहुंचा दो। और अगर तुमने ऐसा न किया तो तुमने अल्लाह के पैग़ाम को नहीं पहुंचाया। और अल्लाह तुम्हें लोगों से बचाएगा। अल्लाह यक़ीनन मुंकिर लोगों को राह नहीं देता।
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