इंटेलेक्चुअल पार्टनर


इंटेलेक्चुअल पार्टनर     


Source : AL-RISALA  (Urdu) | DEC - 2007


इंसान जब पैदा होता है तो वह कच्चे लोहे (iron ore) की तरह होता है। ये फ़ितरत की तरफ़ से जन्मा इंसान है। इसके बाद का सारा काम इंसान को ख़ुद करना है।  

 

फ़ितरत, कच्चा लोहा पैदा करती है। सके बाद इस लोहे को स्टील में बदलना या किसी मशीन का रूप देना, यह इंसान का अपना काम है

 

ख़ुद को बेहतर बनाने (self-improvement) के इस नेचुरल प्रोसेस में सबसे अहम भूमिका सोच और समझ को बेहतर बनाने (intellectual development) की होती है।


 

अपनी शख़्सियत (personality) को सँवारने के लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी यह है कि हर आदमी अपने ज़ेहन (दिमाग़) को विकसित ज़ेहन बनाए।

वह अपनी सोच और समझ-बूझ (शु’ऊर) को जागरूक रखकर अपने दिमाग़ की ताक़त को लगातार बेहतर बनाए।


 

इस प्रोसेस में बुनियादी तौर पर तीन चीज़ों की ज़रूरत है :  

 

1. अध्ययन, यानी पढ़ना-समझना;

2. मुशाहिदा, यानी गहराई से सोचना;

3. और दूसरे इंसानों से विचारों का आदान-प्रदान (intellectual exchange)। 

 

अध्ययन का सबसे बड़ा ज़रिया किताबें हैं, और ठीक इसी तरह गहराई से सोचने के लिए नेचर (nature) सबसे बड़ा ज़रिया है। लेकिन अपनी सोच को आगे बढ़ाने और विचारों को साझा करने के लिए ज़रूरी है कि इंसान के अंदर दूसरों से सीखने की लगन और खुला मिज़ाज हो। वह हर किसी से कुछ न कुछ सीखने की प्रक्रिया (learning process) को लगातार जारी रखे।   

 

लर्निंग प्रोसेस (सीखने) के इसी सिलसिले में हर मर्द के लिए उसकी बीवी, और हर बीवी के लिए उसका शौहर — सबसे क़रीबी इंटेलेक्चुअल पार्टनर की हैसियत रखते हैं। 

इस नज़र से देखें तो शादीशुदा ज़िंदगी इस एतबार से एक बेहतरीन मौक़ा की हैसियत रखती है, जहाँ दोनों मिलकर अपनी सोच और समझ को आगे बढ़ा सकते हैं।

शादीशुदा ज़िंदगी की सूरत में हर औरत और हर मर्द अपने लिए सबसे क़रीबी इंटेलेक्चुअल पार्टनर पा लेते हैं, जिसके साथ वे अपनी सोच और समझ को लगातार बेहतर बनाने का सिलसिला बिना रुके जारी रखें।   

 

सोच और समझ का बढ़ना (intellectual development) हर औरत और हर मर्द की बुनियादी ज़रूरत है। शादीशुदा ज़िंदगी की सूरत में दोनों ऐसे इंटेलेक्चुअल पार्टनर को पा लेते हैं जो हमेशा उनके साथ मौजूद होता है।

 

सोच और समझ को बेहतर बनाने (ज़ेहनी तरक़्क़ी) के इस प्रोसेस को कामयाबी के साथ जारी रखने की सिर्फ़ एक ही शर्त है—कि दोनों इसकी अहमियत को समझें और इसे अपनी ज़िंदगी की सबसे पहली प्राथमिकता बनाकर रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बना लें।   



और  पढ़ें →


Post a Comment

Previous Post Next Post