सूरह: आल-ए-इमरान | 130 – 138

क़ुरआन की आयात पर ग़ौर-ओ-फ़िक्र

सूरह: आल-ए-इमरान | 130 – 138





[3: 130]: ऐ ईमान वालो, सूद कई-कई हिस्सा बढ़ाकर न खाओ और अल्लाह से डरो ताकि तुम कामयाब हो। 


[3: 131]: और डरो उस आग से जो मुंकिरों के लिए तैयार की गई है। 


[3: 132]: और अल्लाह और रसूल की इताअत करो ताकि तुम पर रहम किया जाए। 


[3: 133]: और दौड़ो अपने रब की बख़्शिश की तरफ़ और उस जन्नत की तरफ़ जिसकी वुस्अत  (व्यापकता) आसमान और ज़मीन जैसी है। वह तैयार की गई है अल्लाह से डरने वालों के लिए। 


[3: 134]: जो लोग कि ख़र्च करते हैं फ़राग़त और तंगी में। वे ग़ुस्से को पी जाने वाले हैं और लोगों से दरगुज़र करने वाले हैं। और अल्लाह नेकी करने वालों को दोस्त रखता है। 


[3: 135]: और ऐसे लोग कि जब वे कोई खुली बुराई कर बैठें या अपनी जान पर कोई ज़ुल्म कर डालें तो वे अल्लाह को याद करके अपने गुनाहों की माफ़ी मांगें। अल्लाह के सिवा कौन है जो गुनाहों को माफ़ करे और वे जानते बूझते अपने किए पर इसरार नहीं करते।


[3: 136]: ये लोग हैं कि इनका बदला उनके रब की तरफ़ से मग़्फ़िरत (क्षमा, मुक्ति) है और ऐसे बाग़ हैं जिनके नीचे नहरें बहती होंगी। इनमें वे हमेशा रहेंगे। कैसा अच्छा बदला है काम करने वालों का। 


[3: 137]: तुमसे पहले बहुत-सी मिसालें गुज़र चुकी हैं तो ज़मीन में चल-फिर कर देखो कि क्या अंजाम हुआ झुठलाने वालों का।


[3: 138]: यह बयान है लोगों के लिए और हिदायत व नसीहत है डरने वालों के लिए।



सूरह आल-ए-इमरान की जिन आयात (130–138) पर हम ग़ौर कर रहे हैं, ये मज़मून और क़ुरआन के सारे मज़ामीन जिस तरफ़ रहनुमाई करती है, वो दो चार नुक़ात होते हैं। ये असल में क़ुरआन के पूरे पैग़ाम की बुनियाद को सामने रखती हैं। 

क़ुरआन बार-बार इंसान का ध्यान इन्हीं बुनियादी सच्चाइयों की तरफ़ लौटाता है, ताकि हम भटके नहीं।

 

इनमें सबसे पहला और अहम नुक़्ता तौहीद है—यानी अल्लाह को पहचानना।

 

दूसरा बुनियादी नुक़्ता यह है कि इंसान यह समझ ले कि दुनिया की ज़िंदगी हमेशा रहने वाली नहीं है। यह बस कुछ वक़्त के लिए है। इसके बाद मौत है, और फिर एक दूसरी ज़िंदगी, जहाँ इस दुनिया में किए गए हमारे कामों का हिसाब होगा। वहाँ हमारे अमल, हमारे रवैये, हमारी सोच, तरबियत और तहज़ीब—सबको सामने रखकर एक फ़ैसला किया जाएगा, जिसमें हमें एक अच्छा मक़ाम दिया जाएगा या फिर बुरा और पछतावे का।

   

 

अब सवाल यह है कि तौहीद और आख़िरत जैसी इतनी बड़ी सच्चाइयों को इंसान आख़िर समझे कैसे ।


क्या इंसान सिर्फ़ अपने हासिल किए हुए इल्म के ज़रिये ख़ुदा को पूरी तरह जान (पहचान) सकता है या आख़िरत की हक़ीक़त को समझ सकता है?


हक़ीक़त यह है कि इंसान की अपनी समझ की एक हद है।


इसी कमी को पूरा करने के लिए अल्लाह तआला ने इंसानों की रहनुमाई का ख़ास इंतज़ाम किया। उसने वह्य (revelation) का सिलसिला जारी किया और नबियों को भेजा।

 

जब नबियों के ज़रिये इंसानों की रहनुमाई का सिलसिला क़ायम किया गया, तो यह बात भी साफ़ तौर पर बता दी गई कि उन तक अल्लाह की वह्य (revelation) किस ज़रिये से पहुँचेगी। इसके लिए फ़रिश्तों का ज़िक्र आता है। जो अल्लाह का पैग़ाम नबियों तक पहुँचाते थे।

 

अगर हम ईमान से जुड़ी इन सारी बातों को ध्यान से समझने की कोशिश करें, तो एक बात बहुत साफ़ नज़र आती है कि अल्लाह पर ईमान, आख़िरत पर ईमान, उसके रसूलों पर ईमान, फ़रिश्तों पर ईमान, और किताबों पर ईमान— इन सबका ज़िक्र क़ुरआन में बार-बार, अलग-अलग अंदाज़ में, अलग-अलग मिसालों के साथ आता रहता है। दरअसल, क़ुरआन का पूरा संदेश इन्हीं बुनियादी बातों के इर्द-गिर्द घूमता रहता है।

 

अल्लाह तआला अलग-अलग अंदाज़ और और मिसालों के ज़रिये इन्हें बार-बार सामने रखते हैं, ताकि इंसान यह बात अच्छी तरह से समझ ले कि उसे इस दुनिया में क्यों भेजा गया है और उसे अपनी ज़िंदगी किस सोच, किस रवैये और किस मक़सद के साथ जीनी चाहिए।




इस दुनिया में आने के बाद इंसानों ने इस दुनिया को किस तरह बरता है, समझा है,  वह किस तरह सोच रहा है, बातों को किस तरह समझ रहा है और उसकी सोच (psychology) किस स्तर तक पहुँच चुकी है—इन तमाम पहलुओं को सामने रखकर क़ुरआन इंसानों के नफ़्सियात (psychology) को संबोधित (एड्रेस) करता है। और यह स्पष्ट करता है कि इंसान जो भी काम करता है या जैसा भी रवैया और व्यवहार अपनाता है, उसके पीछे एक ख़ास तरह की नफ़्सियात (सोच) काम कर रही होती है। इसी सोच (psychology) को क़ुरआन बहुत स्पष्ट और प्रभावशाली तरीक़े से हमारे सामने रख देता है।   

 

उसी मानसिकता (psychology) से जुड़ी एक अहम बात की ओर क़ुरआन यहाँ ध्यान दिलाता है।


[क़ुरआन 3: 130]: ऐ ईमान वालो, सूद कई-कई हिस्सा बढ़ाकर न खाओ और अल्लाह से डरो ताकि तुम कामयाब हो।


यहाँ सूद की मनाही की जो बात कही गई है, इस पर चर्चा के दौरान एक साहब ने सवाल उठाया था कि 

यह बात ख़ास तौर पर ईमान वालों से ही क्यों कही गई है।

 

अल्लाह तआला जब ऐ ईमान वालो” कहकर ख़िताब (एड्रेस) करते हैं, तो इससे मुराद वे लोग हैं, जिन लोगों ने यह समझ लिया है कि अल्लाह ही हमारा रब है—वही पूरी कायनात का मालिक, बनाने वाला और चलाने वाला है। उसी के सामने हमें झुकना चाहिए और उसी से मोहब्बत करनी चाहिए और उसकी अज़मत (महानता) को पहचानने की कोशिश करनी चाहिए। यही ईमान वाले की सोच और उसकी ज़िंदगी का असल मक़सद है।

 

इसलिए ऐसी सोच के साथ जीने वाले लोग यह कैसे गवारा कर सकते हैं कि वे इंसानों के साथ जो मामलात (लेन-देन और रिश्ते) करेंगे, वह शोषण और नाजायज़ फ़ायदे की बुनियाद पर होगा, या एक-दूसरे को नुक़सान पहुँचाने की बुनियाद पर होगा    

 

जो लोग दिल से अल्लाह की रुबूबिय्यत (glory of God) को महसूस करते हैं, उनके लिए यह मुमकिन नहीं कि वे एक तरफ़ अल्लाह की अज़मत (सर्वोच्च महानता) के सामने झुके भी रहें और दूसरी तरफ़ अल्लाह के बंदों के साथ ज़ुल्म और शोषण (इस्तेहसाल) का बर्ताव भी करें। इसी वजह से अल्लाह तआला ने इस हुक्म को ख़ास तौर पर ईमान वालों के सामने रख कर बयान किया है।

 


इस हुक्म का एक ऐतिहासिक पहलू भी सामने आता है।


मदीना के मुसलमानों का यहूदियों से लेन-देन का रिश्ता था । वहाँ सूद का कारोबार ज़्यादातर यहूदी करते थे। मुसलमान भी उसी माहौल में उनसे लेन-देन कर रहे थे।

 

इसी माहौल (context) में अल्लाह तआला ने यह बात बताई कि जिन लोगों से तुम लेन-देन कर रहे हो, उनका हाल यह है कि वे ज़बान से तो ईमान का दावा करते हैं, लेकिन असल में उनकी सोच (psychology) पूरी तरह शोषण (दूसरों को निचोड़ने) वाली सोच हो चुकी है। 

क्या तुम भी वही सोच अपनाना चाहते हो ?


ईमान सिर्फ़ दावा नहीं है, बल्कि एक अलग और बेहतर मानसिकता का नाम है। इसलिए यह बात सीधे तौर पर ईमान वालों से कही गई । 






[क़ुरआन 3: 130]: ऐ ईमान वालो, सूद कई-कई हिस्सा बढ़ाकर न खाओ और अल्लाह से डरो ताकि तुम कामयाब हो। 



क़ुरआन यहाँ ईमान वालों से बात करते हुए सिर्फ़ एक आर्थिक हुक्म नहीं दे रहा, बल्कि उस गहरी नफ़्सियात की तरफ़ ध्यान दिला रहा है जो सूद के पीछे काम करती है। 

आयत में “ला ता’कुलू रिबा” यानी “सूद मत खाओ” कहा गया है। आयत में सूद को खाने से मना किया गया है। 


इस लफ़्ज़ (मत खाओ) पर ग़ौर करने से बात साफ़ हो जाती है कि मसला सिर्फ़ पैसों का नहीं है, बल्कि उस लालची और शोषणकारी सोच (psychology) का है जिसमें इंसान अपने ही जैसे दूसरे इंसानों का शोषण करना ग़लत नहीं समझता, बल्कि उसे सही ठहराने लगता है।  


इसलिए यहाँ सिर्फ़ सूद छोड़ने की बात नहीं है, बल्कि उस पूरी मानसिकता (psychology) को बदलने का हुक्म है जो दूसरों के नुक़सान पर, दूसरों का शोषण (इस्तेहसाल) करके अपना फ़ायदा चाहती है।


इसी ग़लत रवैये की गंभीरता बताने के लिए क़ुरआन में सूद को “दोगुना-कई-कई गुना बढ़ाकर खाने” (अद'आफ़न मुदाअ़फ़तन) के रूप में बयान किया गया है। 


इसका मतलब यह नहीं कि थोड़ा सूद लेना जायज़ है, और सिर्फ़ ज़्यादा सूद से मना किया गया है। यहाँ असल मक़सद सूद की बुराई को ज़ोर देकर सामने रखना है।



हक़ीक़त यह है कि सूद अपने आप में ही ज़ुल्म और नाइंसाफ़ी भरा काम है, और उसे कई-कई गुना बढ़ाकर वसूल करना तो और भी ज़्यादा घिनौना रवैया है। इसलिए अद‘आफ़न मुदाअ़फ़तन को चेतावनी के अंदाज़ में समझना चाहिए—जैसे साफ़ कहा जा रहा हो कि ऐसी शोषणकारी सोच से पूरी तरह बाहर निकल आओ।


दरअसल, सूद सिर्फ़ एक आर्थिक गुनाह नहीं, बल्कि एक बेहद बिगड़ी हुई शोषणकारी मानसिकता (psychology) है, जिसे ईमान वालों को हर हाल में छोड़ना है


ला ता'कुलू” (मत खाओ) के शब्दों में यही साफ़ और कड़ी चेतावनी छिपी हुई है।

 

आपसे गुज़ारिश है कि इस आयत को इसी नज़रिए से ध्यान से देखें और उस पर सोच-विचार करें।

 

 

जब हम “ला ता'कुलू” (मत खाओ) के इस पहलू पर ग़ौर करते हैं, तो साफ़ समझ में आता है कि मुसलमानों को एक ख़ास नफ़्सियात (psychology) से बाहर निकालने की बात की जा रही है। उनसे कहा जा रहा है कि अगर तुम इस शोषणकारी सोच से बाहर नहीं निकलोगे, तो फ़लाह (कामयाबी) कैसे मिलेगी। और अगर तुम सचमुच कामयाबी चाहते हो, तो जिस सोच को छोड़ने की हिदायत अल्लाह दे रहा है, उस हिदायत को मज़बूती से पकड़ लो


......और अल्लाह से डरो ताकि तुम कामयाब हो। [क़ुरआन 3: 130]

 

इत्तक़ुल्लाह” यानी अल्लाह से डरोतक़्वा में जो बचने का मफ़्हूम पोशीदा होता है उसको भी ध्यान में रखना चाहिए यानी अल्लाह से तक़्वा इख़्तियार करने का मतलब ये कि इंसान ख़ुद को उन कामों से बचाए, जिनसे अल्लाह ने मना किया है।

 

अगर हम अल्लाह की क़ुर्बत (नज़दीकी) और उसकी मारिफ़त चाहते हैं—क्योंकि हम ईमान वाले हैं— और यही ईमान वाले की ज़िंदगी का मक़सद है—तो इसके लिए हमें अपनी अंदरूनी बुराइयों को दूर करना होगा। इन बुराइयों में एक बड़ी नफ़्सियाती (मानसिक) बुराई यह है कि इंसान दूसरे इंसान का शोषण (exploitation) करे और उससे नाजायज़ फ़ायदा उठाए। यह बेहद ग़लत और बिगड़ी हुई सोच है।


क़ुरआन यहाँ इसी सोच (नफ़्सियात) को बदलने की तरफ़ रहनुमाई कर रहा है। 


इस हुक्म को हमें इसी नज़रिए से समझने की ज़रूरत है, ताकि हम कामयाबी पा सके — दुनिया में भी और आख़िरत में भी।  







[क़ुरआन 3: 131]: और डरो उस आग से जो मुंकिरों के लिए तैयार की गई है। 


 

आयत में उस आग से डरने की बात कही गई है जो इनकार करने वालों के लिए तैयार की गई है।

इस बात को इस नज़रिए से समझाने का मक़सद यह है कि अल्लाह तआला बता रहे हैं कि इंसानों को इस दुनिया में बेवजह नहीं भेजा गया, बल्कि इसलिए भेजा गया है कि वे अपनी सोच-समझ (साइकोलॉजी) की तरबियत करें, अपनी शख़्सियत को सँवारें, अपने नफ़्स को पाक (मुज़क्का) करें और आगे की ज़िंदगी—आख़िरत—के लिए ख़ुद को तैयार करें

 

अगर इंसान ख़ुद को इस तरबियत के बिना छोड़ दे, तो वह अपने आपको उस मक़ाम के क़ाबिल नहीं बना पाता जिसके लिए उसे इस दुनिया में भेजा गया है। ऐसे में वह अपने ही अमल और रवैये से ख़ुद को रिजेक्शन के लिए तैयार कर रहा है।   


आयत वत्तक़ून नारल्लती ऊइद्दत लिल्काफ़िरीन”और डरो उस आग से जो मुंकिरों के लिए तैयार की गई है इसी सच्चाई को बहुत सख़्त और असरदार अंदाज़ में सामने रखती है।

 

वे लोग हैं जिन्होंने अल्लाह को माना ही नहीं, अल्लाह की बातों को मानने से साफ़ इंकार कर दिया। अपने इस रवैये से साफ़ दिखा दिया कि उन्हें आख़िरत की ज़िंदगी में कोई दिलचस्पी नहीं है। ऐसे लोगों का अंजाम भी साफ़ बताया गया है—अल्लाह की रहमत से दूरी और रिजेक्शन, जिसकी मिसाल आग से दी गई है।

 

अब ज़रा ठहर कर हमें यह सोचना चाहिए कि हम किस दिशा में बढ़ रहे हैं—अल्लाह की क़ुरबत (नज़दीकी) की तरफ़ या अपनी ग़लत सोच और रवैये की वजह से रिजेक्शन की तरफ़।


अल्लाह की क़ुरबत की असल जगह आख़िरत की ज़िंदगी है, जहाँ इंसान को वह मक़ाम मिलेगा जिसमें वह अल्लाह के क़रीब होगा। इसलिए हमें ख़ुद को परखना चाहिए कि कहीं हमारी सोच (psychology) हमें उस मक़ाम के क़ाबिल बनाने के बजाय उससे दूर तो नहीं कर रही।

 

इसलिए हमें बिगड़ी हुई मानसिकता से बाहर निकलना है, ताकि फ़लाह और निजात हासिल हो सके। 


अगर हम अल्लाह को पाना चाहते हैं, तो उस सोच को छोड़ना होगा जिसमें इंसान, इंसान का शोषण करता है, और उसकी जगह अल्लाह के बंदों की मदद और भलाई की सोच अपनानी होगी।






इसके बाद की आयत देखें जिसमें एक बहुत अहम बात सामने आ रही है, जिसे समझना हर इंसान के लिए ज़रूरी है।


सच्चाई यह है कि अगर अल्लाह इंसानों पर रहम न करे, तो इंसान का कोई सहारा नहीं।


अब सवाल यह है कि अल्लाह की रहमत हासिल करने का रास्ता क्या हो सकता है?


अल्लाह की रहमत पाने का एक ही रास्ता है, और वह है—अल्लाह की इताअत की जाए। 

यानी उस हिदायत को मानना जिसे अल्लाह ने अपने रसूल के ज़रिए इंसानों तक पहुँचाई है, और उसके रसूल (सल्ल॰) ने जिस तरह उस हिदायत को अमल की शक्ल दी, जिस रास्ते की रहनुमाई की, उसी रास्ते पर चलना ही अल्लाह की रहमत का हक़दार बनने का ज़रिया है।


इसके उलट, जो इंसान अल्लाह और उसके रसूल की इताअत से मुँह मोड़ ले, तो गोया उसने ख़ुद ही अपने आप को अल्लाह की रहमत से दूर कर लिया।


आख़िरत में जो “रिजेक्शन” का अंजाम है, यानी जहन्नम—वह असल में अल्लाह की रहमत से दूर (महरूम) हो जाने का नतीजा है। जिसे अल्लाह की रहमत नहीं मिली, वही असल में रिजेक्ट हुआ।

 

इसलिए समझने की बात ये है कि कामयाबी सिर्फ़ उसी के लिए है जिसे अल्लाह की रहमत हासिल हो जाए। और अल्लाह की रहमत का हक़दार बनने के लिए ज़रुरी है कि हम अल्लाह की बात माने और अल्लाह की पहचान करवाने वाले अल्लाह के रसूल (सल्ल॰) का अनुसरण करें। तब हमें हिदायत (गाइडेंस) भी मिल जाएगी, और उनके गाइडेंस पर चलने के नतीजे में अल्लाह की रहमत भी इंशा-अल्लाह-ओ-'आला, ज़रूर मुक़द्दर होगी


 

यही वह हक़ीक़त है जिसे अल्लाह तआला ने बहुत साफ़ और वाज़ेह अंदाज़ में हमारे सामने रखा है।


[क़ुरआन 3: 133]: और दौड़ो अपने रब की बख़्शिश की तरफ़ और उस जन्नत की तरफ़ जिसकी वुस्अत  (व्यापकता) आसमान और ज़मीन जैसी है। वह तैयार की गई है अल्लाह से डरने वालों के लिए।

 

अब इसके मुकाबले में इस आयत को देखें


और डरो उस आग से जो मुंकिरों के लिए तैयार की गई है।


वत्तक़ून नारल्लती ऊइद्दत लिल्काफ़िरीन” [क़ुरआन 3: 131]



इन आयात में अल्लाह तआला ने इंसान के सामने दो बिल्कुल साफ़ और खुले रास्ते रख दिए हैं।


एक रास्ता जहन्नम का है—जो उन लोगों के लिए तैयार की गई है जिन्होंने अल्लाह का इंकार किया, जिन्हें न अल्लाह चाहिए और न अल्लाह की क़ुरबत (नज़दीकी)। 


ऐसे लोग जो अल्लाह के क़रीब जाने की कोई ख़्वाहिश ही नहीं रखते, उनका अंजाम जहन्नम बताया गया है।


दूसरा रास्ता जन्नत का है—जो उन लोगों के लिए तैयार की गई है जिन्होंने यह फ़ैसला किया कि वे अल्लाह को पाना चाहते हैं, उसके क़रीब जाना चाहते हैं। 


यही लोग तक़्वा अपनाते हैं—यानी हर वक़्त अपने आप पर नज़र रखते हैं कि कहीं उनका कोई अमल उन्हें अल्लाह से दूर न कर दे।


ऐसे होशियार, सावधान (cautious) और मुख़्लिस सच्चे (सच्चे, शुद्ध) लोगों के लिए अल्लाह ने जन्नत तैयार कर रखी है—ऐसी जन्नत जिसकी वुस्अत (विशालता) आसमान और ज़मीन के बराबर है। वह तैयार की गई है अल्लाह से डरने वालों के लिए — ʿइद्दत लिल-मुत्तक़ीन”

क़ुरआन यहाँ जन्नत का एक छोटा-सा तआरुफ़ यूँ कराता है कि उसकी लम्बाई-चौड़ाई, उसकी कुशादगी, ज़मीन और आसमान जैसी है। इस अंदाज़ से अल्लाह तआला यह समझाना चाहते हैं कि आख़िरत की ज़िन्दगी में वह इंसान को कितना बड़ा और ऊँचा मक़ाम देने वाला है। 

इसी लिए इंसान को हिदायत दी गई कि उसकी दौड़-धूप और कोशिशों की दिशा आख़िरत की तरफ़ होनी चाहिए— ख़ास तौर पर आख़िरत में अल्लाह की मग़्फ़िरत की तरफ़ । ताकि उस मग़्फ़िरत के बाद हमारे ऊपर अल्लाह की रहमत आ जाए और हम अल्लाह के पड़ोस में जगह पा जाएं ।  

 

लेकिन इस मक़ाम तक पहुँचने के लिए मेहनत ज़रूरी है, और यह मेहनत वही लोग कर सकते हैं जो मुत्तक़ी बनते हैं—ईमान वाले, ख़ालिस नीयत के साथ जीने वाले। जो हर उस चीज़ से ख़ुद को बचाते हैं जो उन्हें अल्लाह से दूर कर सकती है। और हमेशा इस एहसास और अंदेशे में जीते हैं कि कहीं वे अल्लाह की रहमत और जन्नत से महरूम न हो जाएँ। 

ऐसे ही मुत्तक़ी (परहेज़गार) लोगों के लिए जन्नत का रास्ता खुलता है। 







[क़ुरआन 3: 134]: जो लोग कि ख़र्च करते हैं फ़राग़त और तंगी में। वे ग़ुस्से को पी जाने वाले हैं और लोगों से दरगुज़र करने वाले हैं। और अल्लाह नेकी करने वालों को दोस्त रखता है। 



 

इस आयत में अल्लाह तआला एक बिल्कुल अलग क़िस्म के इंसानों के बारे में बता रहे हैं, जिनकी नफ़्सियात (psychology) पूरी तरह अलग है। 


ये वे लोग हैं जो हर हाल में ख़र्च करते हैं– चाहे ख़ुशहाली का वक़्त हो या मुश्किलों का दौर।


अल्लज़ीना युनफ़िक़ूना फ़िस्सर्राई वद्दर्राई


यानी जो फ़राग़त में भी, और तंगी में भी ख़र्च करते हैं।

 

ये वे लोग हैं जो अपने ग़ुस्से को पी जाते हैं, लोगों से दरगुज़र करते हैं, और भलाई का रास्ता अपनाते हैं। ऐसे लोगों को अल्लाह दोस्त रखता है।

 

अब अगर इसे पहले बयान की गई शोषणकारी मानसिकता (psychology) के मुक़ाबले में रखकर देखें, तो बात और ज़्यादा साफ़ हो जाती है।

 

पहले क़िस्म के लोग वे थे जो दूसरों को दबाकर, उनका फ़ायदा उठाकर अपने माल को बढ़ाना चाहते हैं। लेकिन यहाँ जिन लोगों का ज़िक्र है, उनकी सोच इससे बिल्कुल उलट है। ये वे लोग हैं जो हर हाल में देने वाले होते हैं—चाहे उनके पास ज़्यादा हो या कम।

 

इन दो क़िस्म के इंसानों में एक बात समान है और एक बड़ा फ़र्क़ भी।

समानता यह कि हर इंसान माल से फ़ायदा उठाना चाहता है—यह इंसानी फ़ितरत है। लेकिन असल फ़र्क़ यह है कि वह फ़ायदा किस दिशा में और किस सोच (psychology) के साथ चाहता है।

 

पहले तरह के लोग, शोषणकारी नफ़्सियात के साथ अपने माल को दूसरों को दबाने और अपना मुनाफ़ा बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करते हैं।

 

लेकिन दूसरी क़िस्म के लोग—यानी ईमान वाले—इस रास्ते पर नहीं चलते। वे अपने माल को दूसरों के शोषण (exploitation) का ज़रिया नहीं बनाते, बल्कि उसे आख़िरत की कामयाबी का साधन समझते हैं।

 

ईमान वाले की ज़िंदगी सिर्फ़ अपने हक़ (rights) की सोच तक सीमित नहीं रहती। वे अपनी ज़िम्मेदारियों (duties) को भी महसूस करते हैं। अल्लाह ने उन्हें जो कुछ दिया है, उसमें वे दूसरों का भी हिस्सा मानते हैं। इसी वजह से वे ज़रूरतमंदों की मदद करते हैं और चाहते हैं कि लोग तंगी और मजबूरी की हालत से बाहर आ जाएं और अल्लाह के तय किए हुए इंसानी मक़सद (Creation plan of God) के मुताबिक़ ज़िंदगी गुज़ारने के क़ाबिल हो जाएं। 

 

यही ज़िम्मेदारी का एहसास और यही सोच ईमान वाले को इन्फ़ाक़ की तरफ़ ले जाती है—यानी माल को अल्लाह की राह में ख़र्च करने की तरफ़।



आमतौर पर लोग समझते हैं कि हमने जो माल खर्च कर दिया उसका कोई फ़ायदा नहीं, कोई बदला या इनसेंटिव (incentive) नहीं । लेकिन अल्लाह तआला साफ़ तौर पर बताते हैं कि ऐसा बिल्कुल नहीं है।   

 

ईमान वालों का नज़रिया ये होगा कि उनके माल खर्च करने का असली बदला उन्हें इस दुनिया में नहीं, बल्कि उस आख़िरत की ज़िन्दगी में मिलेगा जो हमेशा बाक़ी रहने वाली है।


जो लोग इस हकीक़त को मानते हैं, और इस सोच के साथ अल्लाह की राह में ख़र्च रहे हैं, तो ऐसे लोग इन्फ़ाक़ को बहुत बड़ा इन्वेस्टमेंट बना रहे हैं। उन्हें यक़ीन होता है कि अल्लाह तआला आख़िरत में उनके इस ख़र्च को अद‘आफ़न मुदाअ़फ़तन”यानी दोगुना-कई-कई गुना बढ़ाकर लौटाएगा।


 

इसलिए देखिये, यहाँ अल्लाह तआला ने दो बिल्कुल अलग-अलग नफ़्सियात (psychology) को हमारे सामने वाज़ेह (स्पष्ट) कर दिया 


एक वह सोच (psychology) जो बस दुनिया के फ़ायदे तक सिमटी हुई है


और दूसरी वह जो हमेशा बाक़ी रहने वाली आख़िरत की ज़िंदगी को सामने रखकर चलती है। 


और अब उसी सिलसिले में ईमान वालों की अंदरूनी ख़ूबियाँ (सिफ़ात) बयान की जा रही हैं।

 

वल्-काज़िमीनल ग़ैज़ वल्-आफ़ीना ‘अनिन्नास — 


यानी वे ग़ुस्से को पी जाने वाले हैं और लोगों से दरगुज़र करने वाले हैं । [क़ुरआन 3: 134]

 

ग़ुस्से को पी जाना यहाँ इन्फ़ाक़ (ख़र्च करने) के अमल से भी जुड़ा हुआ है।


अक्सर ऐसा होता है कि मदद करते वक़्त, ख़र्च करते वक़्त कभी-कभी साइल (मांगने वाले) के मांगने या उसके अंदाज़ से झुंझलाहट पैदा हो जाती है, लेकिन ईमान वाले लोग उसी पल अपने ग़ुस्से को क़ाबू में कर लेते हैं। वे न सिर्फ़ ग़ुस्सा पी जाते हैं, बल्कि आगे बढ़कर लोगों को माफ़ (दरगुज़र) भी कर देते हैं। तफ़्सीरी रिवायतों में भी इस पहलू की तरफ़ इशारा मिलता है।


लेकिन बात सिर्फ़ इसी एक मौक़े तक सीमित नहीं है। 

यहाँ एक उसूली और नफ़्सियाती (psychological) बात भी है। 


आज की आधुनिक साइकोलॉजी भी इस हक़ीक़त को बताती है कि ग़ुस्से को काबू में रखना, उसे पी जाना, और लोगों को माफ़ करना या नज़रअंदाज़ कर देना इंसान की मानसिक सेहत के लिए बेहद अहम है। 


क़ुरआन इसे “वल-काज़िमीनल ग़ैज़” और “वल-आफ़ीना अनिन-नास” के अल्फ़ाज़ में बयान करता है—यानी ग़ुस्से को पी जाने वाले और लोगों को माफ़ (दरगुज़र) करने वाले।



कॉग्निटिव साइंस—यानी इंसानी दिमाग़ और सोच को समझने वाला मॉडर्न साइंस” बताता है कि आज का इंसान पहले के मुक़ाबले ज़्यादा मानसिक दबाव और डिप्रेशन का शिकार हो रहा है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि लोग शिकायतों, तकलीफ़देह तजुर्बों और अचानक पेश आने वाली बातों को अपने ज़ेहन (दिमाग़) में पकड़े रखते हैं। वे उन्हें छोड़ नहीं पाते, और यही जमा हुआ मानसिक बोझ धीरे-धीरे डिप्रेशन की शक्ल ले लेता है।

 

इस तरह क़ुरआन जो उसूल बता रहा है, वह सिर्फ़ अख़्लाक़ी (morality) नहीं, बल्कि इंसान की मानसिक सेहत (psychological well-being) और अंदरूनी सुकून से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।

 

अल्लाह तआला ने हमारी मानसिक सेहत के लिए जो उसूल बताए हैं, उनमें सबसे बुनियादी उसूल यही है कि हम अपने अंदर उठने वाली नकारात्मक भावनाओं को क़ाबू में रखना सीखे। ग़ुस्सा और शिकायत—दोनों ही ऐसी भावनाएँ हैं जो इंसान को अंदर से नुक़सान पहुँचाती हैं। क़ुरआन ईमान वालों से कहता है कि इन चीज़ों को अपने अंदर जमने न दो।  

 

क्यों ?

 

क्योंकि इंसान को इस दुनिया में बे-मक़सद नहीं भेजा गया है। हमें यहाँ इसलिए भेजा गया है कि हम अपनी सोच को विकसित (develop) करें, अपनी शख़्सियत को मुज़क्का (शुद्ध) और मज़बूत बनाए। अगर कोई इंसान ग़ुस्से और शिकायतों को पकड़े बैठा रहे, तो वह धीरे-धीरे मानसिक बीमारियों का शिकार हो जाएगा। उसकी सोच बीमार हो जाएगी और वह अंदर से टूटने लगेगा।

 

इसी ज़ाविये से जब काज़िमीनल ग़ैज़ और वल-आफ़ीना अनिन-नास” को देखा जाए, तो साफ़ समझ में आता है कि अल्लाह तआला यहाँ इंसान की नफ़्सियात (psychology) को तरबियत देने के लिए, और उसकी भलाई (well-being) के लिए कितने गहरे और असरदार तरीक़े से एड्रेस कर रहे हैं। 


इसलिए इन दो बातों पर ख़ास तवज्जोह देने की ज़रूरत है: ग़ुस्से को क़ाबू में रखना और लोगों को माफ़ कर देना।


और जब हम यह सब अल्लाह की ख़ुशी के लिए, एहसान की रूह के साथ (बिना दिखावे का) करें, तो इसका असर सीधे हमारी नफ़्सियात (psychology) पर पड़ेगा। ऐसे बन्दों से अल्लाह तआला मोहब्बत करता है और उन्हें अपना दोस्त बना लेता है।

इसी हक़ीक़त को आख़िर में इस गहरे जुमले में बयान कर दिया गया है:


वल्लाहु युहिब्बुल मुहसिनीन” — यानी अल्लाह
नेकी करने वालों से मोहब्बत करता है। [क़ुरआन 
3: 134]







[क़ुरआन 3: 135]: और ऐसे लोग कि जब वे कोई खुली बुराई कर बैठें या अपनी जान पर कोई ज़ुल्म कर डालें तो वे अल्लाह को याद करके अपने गुनाहों की माफ़ी मांगें। अल्लाह के सिवा कौन है जो गुनाहों को माफ़ करे और वे जानते बूझते अपने किए पर इसरार नहीं करते। 


[क़ुरआन 3: 136]: ये लोग हैं कि इनका बदला उनके रब की तरफ़ से मग़्फ़िरत (क्षमा, मुक्ति) है और ऐसे बाग़ हैं जिनके नीचे नहरें बहती होंगी। इनमें वे हमेशा रहेंगे। कैसा अच्छा बदला है काम करने वालों का। 



क़ुरआन की इस आयत [3: 135] में एक बहुत अहम नफ़्सियाती (psychological) पहलू को हमारी रहनुमाई के लिए खोला गया है। अगर इस पहलू पर ध्यान दें, तो इंसान की मानसिक सेहत (psychological well-being) का मामला और ज़्यादा साफ़ हो जाता है।

 

जब इंसान से कोई ग़लत काम (फ़हश) हो जाता है, या वो अपनी जान पर कोई ज़ुल्म कर बैठता है, तो आम तौर पर दो तरह के इंसान नज़र आते हैं।


एक वह इंसान होता है जो अपने गुनाह को गुनाह ही नहीं मानता और बिना अफ़सोस उसी रास्ते पर चलता रहता है।

 

दूसरा इंसान वह होता है जो अपने गुनाह को गुनाह इस तरह समझ लेता है कि उसके अंदर गहरे शर्म और पछतावे की कैफ़ियत पैदा हो जाती है। जिसे आज की साइकोलॉजी sense of guilt कहती है।


इस अपराध-बोध से उसके अन्दर एक तरह की मायूसी (निराशा) पैदा हो जाती है। और मायूसी का पैदा हो जाना कोई मामूली बात नहीं यह इस बात की निशानी है कि इंसान अपने मामले को अल्लाह से जोड़कर नहीं देख पा रहा।

 

लेकिन जब इंसान अल्लाह को याद करता है और अपने हालात को अल्लाह से जोड़कर देखता है, तो उसकी सोच का रुख़ बदल जाता है। उसे अल्लाह की अज़मत (बड़ाई) और उसकी बेइंतिहा रहमत साफ़ नज़र आने लगती है, उस वक़्त वह दिल से कह उठता है—ऐ अल्लाह, मैं तो तेरा कमज़ोर बंदा हूँ, मुझसे ग़लती हो गई। लेकिन तू तो बहुत अज़ीम (बड़ा) और बेहद रहम करने वाला है। तेरी रहमत की कोई हद नहीं, फिर तू क्या मेरे इस छोटे से गुनाह को माफ़ नहीं कर सकता 


यहाँ “याद करना” सिर्फ़ ज़बानी नहीं, बल्कि अपनी सोच और एहसास को बदल लेना है।


इस तरह अल्लाह की तरफ़ लौटने से उसके अंदर की दुनिया (नफ़्सियात) में एक बहुत बड़ा बदलाव होता है। वह गुनाह के बोझ से पैदा होने वाले अपराध-बोध (sense of guilt) और मायूसी (निराशा) से बाहर आ जाता है। उसे अल्लाह की रहमत में पनाह मिल जाती है और उसका ज़ेहन फिर से हल्का, साफ़ और सुकून से भर जाता है।


इसीलिए यह मक़ाम बेहद अहम है। क़ुरआन हमें यही रास्ता दिखाता है कि जब कोई बुरा या फ़हश काम हो जाए, तो मायूस न हों, बल्कि अल्लाह को याद करें और उसके सामने ख़ुद को पूरी ईमानदारी से पेश करें और माफ़ी माँगें। उस एहसास के साथ जो क़ुरआन के इन शब्दों में झलकता है—“अल्लाह के सिवा कौन है जो गुनाहों को माफ़ कर सकता है


यह कोई मामूली जुमला नहीं है। इंसान यह बात तभी कह पाता है जब वह अपने अंदर तक उतरकर अपनी ग़लतियों को पूरी सच्चाई के साथ मान लेता है। उस वक़्त उसे अपने गुनाहों की गंभीरता भी महसूस होती है और अपने रब की अज़मत और बेपनाह रहमत भी साफ़ नज़र आने लगती है। तब वह पूरे यक़ीन के साथ अल्लाह की तरफ़ पलटता है और माफ़ी माँगता है, क्योंकि उसे यह हक़ीक़त समझ में आ जाती है कि अल्लाह के सिवा कोई नहीं जो उसके गुनाहों को माफ़ कर सके।


जब कोई इंसान इस एहसास के साथ अपने रब की शरण में जाता है, तो यह उसकी ज़िंदगी का एक अहम मोड़ बन जाता है। ऐसे लोगों के बारे में अल्लाह तआला फ़रमाते हैं कि उनके लिए मग़्फ़िरत (पूरी क्षमा) है और ऐसी जन्नत जिसमें वे हमेशा रहेंगे।

यह कोई मामूली इनाम नहीं, क़ुरआन इसे अमल करने वालों के लिए बेहतरीन बदला क़रार देता है।


यह पैग़ाम सिर्फ़ मुसलमानों या ईमान वालों तक सीमित नहीं, बल्कि हर उस इंसान के लिए उम्मीद और राहत का पैग़ाम है, जो अपनी ग़लतियों से निकलकर ज़िंदगी की नई शुरुआत करना चाहता है।






[क़ुरआन 3: 137]: तुमसे पहले बहुत-सी मिसालें गुज़र चुकी हैं तो ज़मीन में चल-फिर कर देखो कि क्या अंजाम हुआ झुठलाने वालों का। 


[क़ुरआन 3: 138]: यह बयान है लोगों के लिए और हिदायत व नसीहत है डरने वालों के लिए।




इन आयात के ज़रिए अल्लाह तआला एक बहुत बड़ा और आम क़ानून (क़ायदा-ए-कुल्लिय्या) हमारे सामने रखते हैं।


दुनिया में हमेशा से दो तरह के लोग रहे हैं—


एक वे जो अपने फ़ायदे के लिए इंसानों का शोषण करते रहे, और दूसरे वे जो इंसानों के लिए भलाई, इंसाफ़ और ख़ैर-ख़्वाही का ज़रिया बने।

 

इस आयत से मेरी समझ में यह बात आ रही है कि अल्लाह तआला इंसानों से कह रहे हैं—ज़मीन में चल-फिर कर देखो, इतिहास पर नज़र डालो और पिछली क़ौमों के अंजाम पर ग़ौर करो। तुम्हें साफ़ समझ में आ जाएगा कि जिन लोगों ने सच को झुठलाया, आख़िरत की ज़िन्दगी का इंकार किया और इंसानों के शोषण को अपना तरीक़ा बना लिया, उनका अंजाम क्या हुआ। 


इसी दुनिया में अल्लाह तआला ने उनके साथ जो फ़ैसला किया, वही हमारे लिए सबक़ लेने के लिए काफ़ी है।

 

यही वह मक़ाम है जहाँ अल्लाह तआला अपनी दैनूनत का इज़हार करते हैं।

 

दैनूनत का मतलब है कि अल्लाह तआला मालिकि-यौमिद्दीन है—यानी क़यामत के दिन (जज़ा/बदले और इंसाफ़ के दिन) का मालिक है। लेकिन अल्लाह तआला सिर्फ़ क़यामत के दिन ही इंसाफ़ नहीं करेंगे, बल्कि इस दुनिया में भी अपने इंसाफ़ और आख़िरत के बड़े फ़ैसले (जज़ा और सज़ा) की एक छोटी सी झलक दिखा देते हैं, ताकि इंसान सबक़ ले सके।

 

अल्लाह तआला फ़रमाते हैं: 


फ़सीरू फ़िल-अर्ज़ि फ़नज़ुरू कैफ़ा काना आक़िबतुल-मुक़ज़्ज़िबीन”


यानी - ज़मीन में चल-फिर कर देखो कि क्या अंजाम हुआ झुठलाने वालों का।

 

इसके बाद अल्लाह तआला फ़रमाते हैं:


हाज़ा बयानुल-लिन्नासि, वहुदं व मौइज़तुल-लिल-मुत्तक़ीन”


यानी - यह बयान है लोगों के लिए और हिदायत व नसीहत है डरने वालों के लिए। [क़ुरआन 3: 138]

 

मतलब यह कि जो बातें बताई जा रही हैं, वे किसी उलझी हुई पहेली की तरह नहीं हैं। इन्हें इस तरह साफ़-साफ़ रखा गया है कि हर इंसान समझ सकता है।

 

यह बयान सभी इंसानों के लिए है, लेकिन जो लोग गंभीर और समझदार (संजीदा) हैं—अपने अंजाम को लेकर फ़िक्रमंद रहते हैं, अपने आपको अल्लाह की रहमत के क़ाबिल बनाना चाहते हैं, अपनी सोच और समझ (psychology & intellect) को सही दिशा देना चाहते हैं—जो मुत्तक़ी हैं—ऐसे लोगों के लिए इन बातों में हिदायत भी है और नसीहत (हितकारी सीख) भी।

 

अगर हम सच में मोहतात (Cautious) है और अपने अंजाम को लेकर फ़िक्रमंद है, तो इन आयात से रहनुमाई ले सकते हैं और अपनी ज़िंदगी को बेहतर बना सकते हैं।


Note: क़ुरआन मुताला पर एक दा’ई के बयान का सारांश। 





तज़्कीरुल-क़ुरआन | तज़्कीर  


सूदी कारोबार दौलतपरस्ती की आख़िरी बदतरीन शक्ल है। 


जो शख़्स दौलतपरस्ती में मुब्तला हो वह रात-दिन इसी फ़िक्र में रहता है कि किस तरह उसकी दौलत दोगुना और चौगुना हो।

वह दुनिया का माल हासिल करने की तरफ़ दौड़ने लगता है । हालांकि सही बात यह है कि आदमी आख़िरत की जन्नत की तरफ़ दौड़े और अल्लाह की रहमत और नुसरत (मदद) का ज़्यादा से ज़्यादा ख़्वाहिशमंद हो।


आदमी अपना माल इसलिए बढ़ाना चाहता है कि दुनिया में इज़्ज़त हासिल हो, दुनिया में उसके लिए शानदार ज़िंदगी की ज़मानत हो जाए।

मगर मौजूदा दुनिया की इज़्ज़त व कामयाबी की कोई हक़ीक़त नहीं। अस्ल अहमियत की चीज़ जन्नत है जिसकी ख़ुशियां और लज़्ज़तें बे-हिसाब हैं।


अक़्लमंद वह है जो इस जन्नत की तरफ़ दौड़े । 

जन्नत की तरफ़ दौड़ना यह है कि आदमी अपने माल को ज़्यादा से ज़्यादा अल्लाह की राह में दे।


दुनियावी कामयाबी का ज़रिया ‘माल’ को बढ़ाना है और आख़िरत की कामयाबी को हासिल करने का ज़रिया माल को ‘घटाना’ है ।


पहली क़िस्म के लोगों का सरमाया (पूंजी) अगर माल की मुहब्बत है तो दूसरे लोगों का सरमाया अल्लाह और रसूल की मुहब्बत ।


पहली क़िस्म के लोगों को अगर दुनिया के नफ़े का शौक़ होता है तो दूसरी क़िस्म के लोगों को आख़िरत के नफ़े का ।


पहली क़िस्म के लोगों को दुनिया के नुक़्सान का डर लगा रहता है और दूसरी क़िस्म के लोगों को आख़िरत के नुक़्सान का ।


जो लोग अल्लाह से डरते हैं उनके अंदर ‘एहसान’ का मिज़ाज पैदा हो जाता है । यानी जो काम करें इस तरह करें कि वह अल्लाह की नज़र में ज़्यादा से ज़्यादा पसंदीदा क़रार पाए । 

वे आज़ाद ज़िंदगी के बजाए पाबंद ज़िंदगी गुज़ारते हैं। 

ख़ुदा के दीन की ज़रूरत को वे अपनी ज़रूरत बना लेते हैं और इसके लिए हर हाल में ख़र्च करते हैं चाहे उनके पास कम हो या ज़्यादा ।

 

उन्हें जब किसी पर ग़ुस्सा आ जाए तो वे उसे अंदर ही अंदर बर्दाश्त कर लेते हैं । किसी से शिकायत हो तो उससे बदला लेने के बजाए उसे माफ़ कर देते हैं ।

 

ग़लतियां उनसे भी होती हैं मगर वे वक़्ती होती हैं। ग़लती के बाद वे फ़ौरन चौंक पड़ते हैं और दुबारा अल्लाह की तरफ़ मुतवज्जह हो जाते हैं। वे बेताब होकर अल्लाह को पुकारने लगते हैं कि वह उन्हें माफ़ कर दे और उन पर अपनी रहमतों का पर्दा डाल दे ।

 

क़ुरआन में जो बात लफ़्ज़ी तौर पर बताई गई है वह तारीख़ में अमल की ज़बान में मौजूद है । मगर नसीहत वही पकड़ते हैं जो नसीहत की तलब रखते हों । 




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