सूरह: आल-ए-इमरान | 149 – 153


क़ुरआन की आयात पर ग़ौर-ओ-फ़िक्र

सूरह: आल-ए-इमरान | 149 – 153







[3: 149]: ऐ ईमान वालो अगर तुम मुंकिरों की बात मानोगे तो वे तुम्हें उल्टे पैरों फेर देंगे फिर तुम नाकाम होकर रह जाओगे।


[3: 150]: बल्कि अल्लाह तुम्हारा मददगार है और वह सबसे बेहतर मदद करने वाला है।


[3: 151]: हम मुंकिरों के दिलों में तुम्हारा रौब डाल देंगे क्योंकि उन्होंने ऐसी चीज़ को अल्लाह का शरीक ठहराया जिसके हक़ में अल्लाह ने कोई दलील नहीं उतारी। उनका ठिकाना जहन्नम है और वह बुरी जगह है ज़ालिमों के लिए।


[3: 152]: और अल्लाह ने तुमसे अपने वादे को सच्चा कर दिखाया जबकि तुम उन्हें अल्लाह के हुक्म से क़त्ल कर रहे थे। यहां तक कि जब तुम ख़ुद कमज़ोर पड़ गए और तुमने काम में झगड़ा किया और तुम कहने पर न चले जबकि अल्लाह ने तुम्हें वह चीज़ दिखा दी थी जो कि तुम चाहते थे। तुममें से कुछ दुनिया चाहते थे और तुममें से कुछ आख़िरत चाहते थे। फिर अल्लाह ने तुम्हारा रुख़ उनसे फेर दिया ताकि तुम्हारी आज़माइश करे और अल्लाह ने तुम्हें माफ़ कर दिया और अल्लाह ईमान वालो के हक़ में बड़ा फ़ज़्ल वाला है।


[3: 153]: जब तुम चढ़े जा रहे थे और मुड़कर भी किसी को न देखते थे और रसूल तुम्हें तुम्हारे पीछे से पुकार रहा था। फिर अल्लाह ने तुम्हें ग़म पर ग़म दिया ताकि तुम रंजीदा न हो उस चीज़ पर जो तुम्हारे हाथ से चूक गई और न उस मुसीबत पर जो तुम पर पड़े। और अल्लाह ख़बरदार है जो कुछ तुम करते हो।




आज सूरह आल-ए-इमरान की जिन आयात का हम मुताला (अध्ययन) कर रहे हैं, उनसे जो अहम बातें मुझे समझ में आईं, उनका निचोड़ आपके सामने रख रहा हूँ।


इन आयात की रोशनी में, मौलाना ने अपने तज़्कीर*(तज़्कीरुल क़ुरआन) में एक बहुत गहरी और सोचने वाली बात कही है। उन्होंने लिखा कि दुनिया की ज़िंदगी में “उहुद” का हादसा पेश आना ज़रूरी है— ताकि यह खुल जाए कि कौन अल्लाह पर ए’तिमाद (भरोसा) करने वाला था और कौन फिसल जाने वाला ।


मौलाना ने इस आयात का असली मतलब और अप्लीकेशन समझाते हुए बताया कि इसे अपनी ज़िंदगी में कैसे लागू करना है।


उहुद का वाक़िआ सिर्फ़ रसूल और सहाबा (रसूल के साथियों) के साथ पेश आया, लेकिन अगर ग़ौर से देखा जाए तो उहद का मामला एक ऐसा हादसा है जिसके ज़रिये अल्लाह तआला सहाबा-ए-किराम को आज़मा रहा था तो वही आज़माइश का सिलसिला हर दौर में तमाम मोमिनीन के साथ होना है। इसलिए मौलाना ने लिखा है कि दुनिया की ज़िंदगी दरअसल इसी लिए दी गई है कि मोमिनीन पर “उहुद” जैसी घड़ी ज़रूर आए।


लेकिन यहाँ एक अहम बात समझने की है :


उहद के हादसे से मुराद यह नहीं कि हर किसी के सामने जंग के हालात पैदा हो जाएं। बल्कि इसका मतलब यह लिया जाएगा कि जिंदगी में ऐसे हालात पैदा हो जाएं, जब अल्लाह पर भरोसा क़ायम रखना बहुत मुश्किल हो जाए, और ऐसी जगह ईमान वाले पंहुच जाएं कि थोड़ी सी देर में उनके सामने फिसलन का माहौल पैदा हो जाए।


ऐसी परिस्थितियाँ (सूरत-ए-हाल) अल्लाह तआला एक तय उसूल के तहत, अपने क़ानून के तहत बार-बार मोमिनीन के सामने लाते हैं, ताकि उनकी आज़माइश (परख) हो सके।


असल सवाल यही होता है कि क्या हम सच में अल्लाह पर भरोसा करते हैं या नहीं?


जब कोई उहुद जैसा मुश्किल वक़्त सामने आता है, तो क्या हमारा भरोसा मज़बूत रहता है, या फिर हम फिसल कर उन्हीं लोगों की तरह सोचने लगते हैं जो अल्लाह पर यक़ीन नहीं रखते।


यह बहुत अहम बात है जिसे मौलाना ने अपने तज़्कीर* में समझाया है। और यह हम सबके लिए एक बहुत बड़ी सीख (take away) है। 





ईमान वालों के साथ जो वाक़िआत (घटनाएं) पेश आए— ख़ास तौर पर ग़ज़वा-ए-उहुद के तहत जिनका हम मुताला कर रहे हैं—ये वो वाक़िआत हैं जो मुहम्मद रसूलुल्लाह (सल्ल०) के साथ पेश आईं, और ये घटनाएं तारीख़ (इतिहास) का हिस्सा हैं। लेकिन असल में ये हमें एक बड़ी हक़ीक़त समझाने के लिए हैं।

 

समझने की बात यह है कि तारीख़ यूँ ही नहीं बनती—वह किसी नज़रिये के तहत बनती है।


यानी एक शख़्स दीन की एक सोच (तसव्वुर-ए-दीन) लेकर उठता है, एक नज़रिया लेकर खड़ा होता है। उसके सामने कई अलग-अलग नज़रिये होते हैं, लेकिन वह पूरे यक़ीन के साथ उन सब के मुक़ाबले में अपना नज़रिया पेश करता है और समझाता है कि यह नज़रिया ठोस दलीलों पर आधारित है, कोई अंदाज़ा या बे-बुनियाद बात नहीं, मैं इसके लिए आर्गुमेंट (तर्क) रखता हूँ।    


फिर वह ख़ुद उस नज़रिये पर चलते हुए उसे लोगों तक पहुँचाने की कोशिश करता है—ताकि लोग जानें कि यही सच्चा और भरोसेमंद नज़रिया है, जिसे मानना चाहिए।


इसी कोशिश को हम इस्तिलाही (terminological) ज़बान में ‘दावत’ और ‘दावती जद्दोजहद’ कहते हैं । 


यही वह काम है जो रसूल और उनके सहाबा (साथी) कर रहे थे। उनका असल मिशन यही था कि दीन की जो सोच (नज़रिया) उन्हें मिली है, उसे लोगों तक पहुँचाएँ।


लेकिन इस काम (राह) में हालात की वजह से तरह-तरह के वाक़िआत (घटनाएँ) सामने आते रहे — कभी कोई एक तरह का, कभी कोई दूसरी तरह का, और कभी-कभी आख़िरी हद में नौबत यहाँ तक पहुँची कि जंगें हुई, लड़ाइयाँ हुईं, जिन्हें हम तारीख़ (इतिहास) की किताबों में ग़ज़्वा के नाम से जानते हैं।



लेकिन यहाँ एक बुनियादी बात समझने की है— 

ये जंगें और ये तारीख़ी वाक़िआत (घटनाएँ) असल काम नहीं थे, बल्कि इज़ाफ़ी (अतिरिक्त) थे, जो असल काम—नज़रियाती जद्दोजहद के नतीजे में सामने आए ।     


ईमान वाले अपनी जद्दोजहद में इसी तसव्वुर-ए-दीन (नज़रिया) को थामे हुए चलते हैं। लेकिन कभी-कभी वाक़ि’आत इतने हिला देने वाले पेश आते हैं कि निगाह तसव्वुर-ए-दीन से हटकर वाक़िआत में उलझ जाती है।


और यहीं सबसे बड़ा धोखा होता है—

जब इन्हीं वाक़ि’आत को कसौटी बनाकर कहा जाने लगता है कि "अगर ऐसा हुआ है, तो तुम्हारा तसव्वुर-ए-दीन ही ग़लत है।"

 

जबकि हक़ीक़त यह है कि दीन का तसव्वुर (नज़रिया) अपनी मज़बूत दलीलों पर खड़ा होता है, किसी एक वाक़िये के उतार-चढ़ाव पर नहीं। लेकिन जब कोई बड़ा हादसा पेश आता है और इंसान उससे बुरी तरह हिल जाता है—तो उसी कमज़ोर पल में— वाक़िआ (घटना) को आधार बनाकर सीधे दीन के नज़रिये पर सवाल उठाए जाने लगते हैं।

 

क़ुरआन में अल्लाह तआला इसी रवैये से आगाह करते हुए कहते हैं :

ऐ ईमान वालो अगर तुम मुंकिरों की बात मानोगे तो वे तुम्हें उल्टे पैरों फेर देंगे फिर तुम नाकाम होकर रह जाओगे। (3: 149)


 

लेकिन सवाल यह है कि ईमान वाले, मुंकिरों की बात मानने वाले कैसे बन जाते हैं?

 

ग़ौर करने पर ये बात समझ में आई कि ईमान वाले दरअसल अपने नज़रिये के हामिल होते हैं। उनकी निगाह उसी नज़रिये और उसकी दलीलों पर टिकी होती है।


लेकिन कभी-कभी नज़रियाती जद्दोजहद के नतीजे में सामने आने वाले वाक़िआत (घटनाएँ) ही पूरी तवज्जोह का मरकज़ (केंद्र) बन जाते हैं। और जब नज़रिये को दलील की रोशनी में नहीं, बल्कि इन्हीं वाक़िआत के उतार-चढ़ाव की रोशनी में समझा और परखा जाने लगता है — तो उस वक़्त इंसान के लिए यह ख़तरा बहुत बढ़ जाता है कि वह उन्हीं लोगों की बात मान बैठे, जो सच्चाई का इंकार करने वाले हैं, जो शैतान की रविश पर चलने वाले हैं।  





इस पूरी चर्चा में जो सबसे अहम बात समझ में आई, उसे एक बार फिर साफ़ लफ़्ज़ों में रखता हूँ।

 

एक तरफ़ होता है — दीन का तसव्वुर (नज़रिया) और उसकी दलीलें।


दूसरी तरफ़ होती है — उस तसव्वुर को फैलाने की जद्दोजहद। और उस जद्दोजहद के नतीजे में सामने आने वाले वाक़िआत।

 

मसला तब पैदा होता है जब इन्हीं वाक़िआत को दीन की सच्चाई परखने की असल कसौटी बना लिया जाता है।

 

उहुद इसी की मिसाल है— 

जब मुसलमानों को कुछ नुक़सान उठाना पड़ा तो इंकार करने वालों ने फ़ौरन कहना शुरू कर दिया कि "अगर तुम्हारा दीन सच्चा होता, तुम्हारा ख़ुदा सच्चा होता — तो तुम हारते कैसे ?"


यही इस आयत का शान-ए-नुज़ूल (पस-मंज़र) है जो तफ़सीरों में बयान किया गया है।

 


अगर इस पूरे मामले पर ग़ौर (analysis) किया जाए तो असल बात यह समझ में आती है कि यहाँ सोच की एक बुनियादी ग़लती हुई, वह यह कि घटना से अंदाज़ा लगाकर फ़ैसला सुनाने का तर्क (inductive reasoning) अपनाया गया। एक जंग के नतीजे को आधार बना कर पूरे दीन पर फ़ैसला सुना दिया गया कि "तुम हारे, इसलिए तुम्हारा दीन झूठा है।"


 

जबकि हक़ीक़त यह है कि किसी नज़रिये की सच्चाई एक-दो घटना के नतीजे से नहीं, बल्कि उसकी मज़बूत दलीलों से तय होती है।  


इसी तरफ़ अल्लाह तआला हमलोगों की रहनुमाई फ़रमा रहे हैं।





इंकार करने वालों का तरीक़ा और सही सोच

 

अक्सर इंकार करने वालों का तरीक़ा यह होता है कि वे किसी एक घटना को देखकर पूरे नज़रिये पर फ़ैसला सुना देते हैं। वे नज़रिया को उसकी ठोस दलीलों की रोशनी में नहीं परखते, बल्कि हालात के उतार-चढ़ाव को कसौटी बना लेते हैं। 

अहम बात यह है कि अल्लाह तआला ने "ऐ ईमान वालों" (3: 149) कहकर ख़िताब (बातचीत) किया । 


इसका मतलब यह याद दिलाना है कि तुम तसव्वुर-ए-दीन (दीन का नज़रिया) को मानने वाले हो और इसे मानने के लिए तुम्हारे पास ठोस दलीलें मौजूद हैं, बुरहान है — यानी निश्चित सबूत है जिसके बाद शक की कोई गुंजाइश नहीं।

 

इसलिए सही तरीक़ा यह है कि नज़रिया को उसकी दलीलों की रोशनी में परखा जाए। अगर कोई, तसव्वुर-ए-दीन को ग़लत साबित करना चाहता है — तो उसे उन्हीं दलीलों के मुक़ाबले में मज़बूत दलील पेश करनी चाहिए कि ये तसव्वुर-ए-दीन इस दलील से ग़लत है। महज़ किसी एक घटना के नतीजे को आधार बनाकर फ़ैसला सुनाना सही तरीक़ा नहीं है।

 

इसलिए क़ुरआन में साफ़ आगाह किया गया :

....अगर तुम मुंकिरों की बात मानोगे तो वे तुम्हें उल्टे पैरों फेर देंगे फिर तुम नाकाम होकर रह जाओगे। (3: 149)

 

यानी अगर तुमने दलीलों की पकड़ छोड़ दी और वाक़िआत के उतार-चढ़ाव में बह गए—तो मुंकिर तुम्हें तुम्हारे दीन से फेर देंगे, और तुम नाकाम होकर रह जाओगे।







इस पूरे मामले में एक बहुत बड़ी बात सामने आती है कि वाक़िआत को नज़रिया (तसव्वुर-ए-दीन) की कसौटी कभी नहीं बनाया जा सकता। साथ ही, दिल को मज़बूत करने वाली सच्चाई भी सामने आती है कि जो कुछ भी होता है, जैसे भी हालात बनते हैं, सब अल्लाह के हुक्म से होता है।


क़ुरआन इसी हक़ीक़त को यूँ बयान करता है:


अल्लाह ही तुम्हारा मालिक है, और वही सबसे बेहतर मददगार है। (3:150)


बलि अल्लाहु मौलाकुम व हुवा ख़ैरु अन-नासिरीन”


इस तरह तवज्जोह दिला दी गई कि किसी भी हालत में तुम्हारा आका, तुम्हारा मालिक जिसके तहत यह पूरा तसव्वुर-ए-दीन (दीन की सोच) बना है,  वह सिर्फ़ और सिर्फ़ अल्लाह है और वही सबसे बेहतर मददगार है।


फिर आगे की आयत में बात को और खोल दिया गया —


हम मुंकिरों के दिलों में तुम्हारा रौब डाल देंगे क्योंकि उन्होंने ऐसी चीज़ को अल्लाह का शरीक ठहराया जिसके हक़ में अल्लाह ने कोई दलील नहीं उतारी। 

(3: 151)


यानी ये लोग शिर्क (अल्लाह के साथ दूसरे को साझी ठहराने) की बात कहते हैं, लेकिन उनके पास इसकी कोई दलील नहीं। वे बे-दलील लोग हैं। और बे-दलील होना ही उनकी सबसे बड़ी कमज़ोरी है।


और यहीं असल बात सामने आती है — कि शिर्क का तसव्वुर (सोच) हो या तौहीद का—दोनों को दलीलों की बुनियाद पर ही परखा जाएगा।


शिर्क की सोच (तसव्वुर) के पास कोई दलील नहीं, जबकि तौहीद की सोच के पास दलील मौजूद है। यही असल फ़र्क़ है। 


इसलिए दलील का जवाब दलील से दिया जाएगा—किसी घटना को पकड़कर कोई नतीजा नहीं निकाला जाएगा। 




  

एक साहब का सवाल था — शिर्क की दलील और तौहीद की दलील को समझाएं।



तौहीद का नज़रिया ठोस दलीलों पर खड़ा है। अल्लाह को क्यों माना जाए — इसके लिए क़ुरआन में दलील पर दलील मौजूद है।



कुरआन बार-बार पूछता है—जब तुम मुसीबत में होते हो तो किसे पुकारते हो?

 

आसमान और ज़मीन को किसने पैदा किया


क्या तुम्हारे ठहराए हुए शरीक (अल्लाह का साझीदार) कुछ पैदा कर सकते हैं


ये तमाम दलीलें हैं जो अल्लाह तआला ने क़ुरआन में तौहीद के लिए दी हैं।

 

अब दूसरी तरफ़ देखिए—शिर्क यानी अल्लाह तआला के साथ किसी को शरीक ठहराने के पक्ष में कोई दलील नहीं। 


आसमान और ज़मीन को जिसने पैदा किया, क्या उसने कहा है कि मेरी इबादत के साथ-साथ फलाँ की इबादत करो ? 

तो किस दलील की बुनियाद पर उन शरीकों की इबादत की जाएगी ?  


क्या उन शरीकों के पास कोई इख्तियार है 

क्या वे नफ़ा और नुक़सान के मालिक हैं


कौन सी दलील है जिसके बुनियाद पर उनको माना जाएगा?


इसलिए क़ुरआन कहता है:


उन्होंने ऐसी चीज़ को अल्लाह का शरीक ठहराया जिसके हक़ में अल्लाह ने कोई दलील नहीं उतारी। (3: 151)


लेकिन यहाँ असल बात यह है — कि तौहीद के नज़रिये के पक्ष में इतनी मज़बूत दलीलें होने के बावजूद अगर कोई वाक़िआ पेश आए और मुसलमान मायूस होकर कहने लगें कि "अल्लाह ने मदद नहीं की, इसलिए यह दीन ही ग़लत है"— 


तो यही वो रास्ता है जो कुफ़्र (इंकार) की तरफ़ ले जाता है। और ख़ास तौर से कुफ़्र के तरीक़े वाले इसी तरफ़ तवज्जोह दिलाते हैं।


इसलिए ईमान वालों को साफ़ तौर पर आगाह किया गया—इस तरह की सोच में पड़कर कुफ़्र की तरफ़ न लौट जाना।



जब तौहीद के पक्ष में इतनी मज़बूत दलीलें और पक्का बुरहान मौजूद हो — और फिर भी कोई इन्हें छोड़कर वाक़िआत (घटनाओं) के उतार-चढ़ाव में बह जाए, तो यह सबसे बड़ी महरूमी है। इससे वे अपना ही नुक़सान करेंगे।  


यही वह नुक्ता है जो मेरे लिए सबसे अहम रहा—दलीलें होते हुए भी अगर इंसान उन पर क़ायम न रहे, तो इससे बड़ी महरूमी कोई और नहीं।







उसके बाद आगे की आयत में अल्लाह तआला फ़रमाते हैं —


[3: 152]: और अल्लाह ने तुमसे अपने वादे को सच्चा कर दिखाया जबकि तुम उन्हें अल्लाह के हुक्म से क़त्ल कर रहे थे। यहां तक कि जब तुम ख़ुद कमज़ोर पड़ गए और तुमने काम में झगड़ा किया और तुम कहने पर न चले जबकि अल्लाह ने तुम्हें वह चीज़ दिखा दी थी जो कि तुम चाहते थे। तुममें से कुछ दुनिया चाहते थे और तुममें से कुछ आख़िरत चाहते थे। फिर अल्लाह ने तुम्हारा रुख़ उनसे फेर दिया ताकि तुम्हारी आज़माइश करे और अल्लाह ने तुम्हें माफ़ कर दिया और अल्लाह ईमान वालो के हक़ में बड़ा फ़ज़्ल वाला है।



 

इस आयत में एक बहुत गहरी हक़ीक़त मुझे समझ में आई, उसे मैं आपके सामने रखता हूँ :

 

अल्लाह तआला ने तो अपना वादा पूरा कर दिया था उसी वक़्त जब मुसलमान जंग में हावी हो रहे थे। लेकिन जीत की इसी राह में उनकी अंदरूनी कमज़ोरियाँ उभरने लगीं।


पहले हिम्मत में कमी आई।


फिर किसी अम्र (काम करने की हिदायत) में आपस में इख़्तिलाफ़ (मतभेद) और बहस शुरू हो गई और आख़िर में बात नाफ़रमानी तक पहुँच गई।


और उन में से कुछ लोगों की निगाह दुनिया की चाहत पर टिक गई और हुक्म को नज़र-अंदाज़ कर दिया गया।

 

उहुद का यही वाक़िया है—जीत के बीच में यह सब हुआ। और अल्लाह ने यह सब करवाया ताकि उनकी आज़माइश हो जाए। फिर अल्लाह ने अपने फ़ज़्ल से माफ़ भी कर दिया।

 

लेकिन यह घटना हर उस इंसान के लिए सबक़ है जो सोचता है कि जीत ही सच्चाई की दलील है—असल में जीत के दौरान भी आज़माइश चलती रहती है। 



  

जब मैंने इस पूरे मामले पर थोड़ा गहराई से ग़ौर किया, तो एक अहम बात सामने आई।


अक्सर ऐसा होता है कि जब किसी इंसानी जमात पर मुश्किल हालात आते हैं, तो उनके अंदर तीन मराहिल (stages) आते हैं।

 

मुश्किल हालात में उनके अंदर पस्त-हिम्मती पैदा होती है।


फिर जब हिम्मत टूटती है तो किसी मामले में आपस में झगड़ा (निज़ा') और इख़्तिलाफ़ शुरू हो जाता है। 


और आख़िर में बात नाफ़रमानी तक पहुँच जाती है।


उहुद के वाक़िये में भी यही क्रम (stages) साफ़ नज़र आता है।

 

उहद के जंग से पहले ही यह सिलसिला शुरू हो गया था — जब यह फ़ैसला होना था कि मदीने में रहकर लड़ा जाए या बाहर निकलकर।


यह महज़ एक रणनीति (strategy) का मसला था कि इन हालात से कैसे निपटा जाए। तो ईमान वालों में से कुछ लोगों की राय थी कि बाहर न निकला जाए — बल्कि मदीने के अंदर रहकर मुक़ाबला किया जाए।

 

आख़िरकार मदीने से बाहर निकल कर जंग करने का फ़ैसला हुआ, और मुहम्मद रसूलुल्लाह (सल्ल्ल०) ने उस फ़ैसले के साथ हामी भर दी।


लेकिन इस फ़ैसले के बाद इख़्तिलाफ़ (मतभेद) और गहरे हो गए। नतीजा यह हुआ कि करीब तीन सौ लोग बीच रास्ते से ही मदीना वापस लौट गए और इस तरह खुलकर नाफ़रमानी सामने आ गई ।


 

अगर इस पूरे वाक़िये को ध्यान से देखा जाए, तो एक साफ़ सिलसिला नज़र आता है—


पहले हिम्मत में कमी आई, फिर आपसी इख़्तिलाफ़ बढ़े, और आख़िर में बात नाफ़रमानी तक पहुँच गई।



यह सिर्फ़ एक तारीख़ी वाक़िआ (ऐतिहासिक घटना) नहीं है, बल्कि हर दौर के इमानी और दावती जमात के लिए अहम सबक़ है।


मुश्किल हालात आते ही ऐसे तीनों मराहिल उभर सकते हैं—इसलिए इनसे होशियार रहना हर उस जमात के लिए जरूरी है जो किसी बड़े मक़सद पर खड़ी हो।

 


इस पूरी घटना में हमारे लिए सबक़ यह है कि हालात चाहे जितने भी सख्त हों, पस्त-हिम्मत नहीं होना है। 

यह पहली शर्त है।


दूसरी यह कि इख्तिलाफ़ात (मतभेद) होंगे, लेकिन इख्तिलाफ़ के बावजूद भी मुत्तहिद (एकजुट) रहना है। अगर किसी मामले में, फ़ैसले पर मतभेद हो भी जाए, तब भी बिखरना नहीं है ।


और तीसरी सबसे अहम बात — नाफ़रमानी से हर हाल में बचना है।



Note: क़ुरआन मुताला पर एक दा’ई के बयान का सारांश। 






तज़्कीरुल-क़ुरआन | तज़्कीर  


उहुद की जंग में वक़्ती शिकस्त से, विरोधियों को मौक़ा मिला।


उन्होंने कहना शुरू किया कि पैग़म्बर और उनके साथियों का मुआमला कोई ख़ुदाई मुआमला नहीं है । कुछ लोग महज़ बचकाने जोश के तहत उठ खड़े हुए हैं और अपने जोश की सज़ा भुगत रहे हैं । अगर यह ख़ुदाई मुआमला होता तो उन्हें अपने दुश्मनों के मुक़ाबले में शिकस्त क्यों होती ।


मगर इस तरह के वाक़ेयात चाहे बज़ाहिर मुसलमानों की ग़लती से पेश आएं, वे हर हाल में ख़ुदा का इम्तेहान होते हैं ।

 

दुनिया की ज़िंदगी में ‘उहुद’ का हादसा पेश आना ज़रूरी है ताकि यह खुल जाए कि कौन अल्लाह पर एतमाद करने वाला था और कौन फिसल जाने वाला ।


इस क़िस्म के वाक़ेयात मोमिन के लिए दोतरफ़ा आज़माइश होते हैं— एक यह कि वह लोगों की मुख़ालिफ़ाना बातों से मुतअस्सिर (प्रभावित) न हो । दूसरे यह कि वह वक़्ती तकलीफ़ से घबरा न जाए । और हर हाल में साबितक़दम रहे ।

 

मुश्किल अवसरों पर अहले ईमान अगर जमे रह जाएं तो बहुत जल्द ऐसा होता है कि ख़ुदा की रोब की मदद नाज़िल होती है ।

 

जो शख़्स या गिरोह अल्लाह के सच्चे दीन के सिवा किसी और चीज़ के ऊपर खड़ा हुआ है वह हक्क़ीक़त में बे-बुनियाद ज़मीन पर खड़ा हुआ है । क्योंकि अल्लाह की उतारी हुई सच्चाई के सिवा इस दुनिया में कोई और हक़ीक़ी बुनियाद नहीं । 


इसलिए जब कोई अल्लाह के दीन के ऊपर खड़ा हो और दृढ़ता का सुबूत दे तो जल्द ही ऐसा होता है कि अहले बातिल (असत्यवादियों) में बिखराव शुरू हो जाता है। 


दलीलों के एतबार से उनका बेबुनियाद होना उनके लोगों में बे-यक़ीनी की कैफ़ियत पैदा कर देता है। वे अपने को कम और अहले ईमान को ज़्यादा देखने लगते हैं । उनकी ज़ेहनी शिकस्त अंततः अमली शिकस्त तक पहुंचती है । वे अहले हक़ के मुक़ाबले में नाकाम व नामुराद होकर रह जाते हैं ।

 

मुसलमानों के लिए शिकस्त और कमज़ोरी का सबब हमेशा एक होता है। 

और वह है तनाज़ो फ़िल अम्र। 


यानी राय के इख़्तेलाफ़ के सबब अलग-अलग हो जाना । 


इंसानों के दर्मियान इत्तेफ़ाक़ कभी इस मअना में नहीं हो सकता कि सबकी राय बिल्कुल एक हो जाए । इसलिए किसी गिरोह में इत्तेहाद की सूरत सिर्फ़ यह है कि राय में भिन्नता के बावजूद अमल में एकरूपता हो । 


जब तक किसी गिरोह में यह बुलंदनज़री पाई जाएगी तो वह मुत्तहिद और इसके नतीजे में ताक़तवर रहेगा । 


और जब राय में विभेद करके लोग अलग-अलग होने लगें तो इसके बाद लाज़िमन कमज़ोरी और इसके नतीजे में शिकस्त होगी ।





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