महरूमी के बाद भी



महरूमी के बाद भी   


Source : AL-RISALA  (Urdu) | MAY - 2011


632 ईस्वी में मदीना में पैग़म्बर-ए-इस्लाम (सल्ल०) की वफ़ात (मौत) हुई। यह एक बेहद नाज़ुक पल था। 

यह सहाबा (रसूल के साथियों) के लिए एक सख़्त सदमे की हैसियत रखता था। 

उस वक़्त रसूल के सहाबी (साथी) अबू बक्र सिद्दीक़ ने एक मिसाल क़ायम की।

वह रसूलुल्लाह के हुजरे (कमरे) में आए। उन्होंने आप के चेहरे से चादर उठाकर आप को देखा और कहा: 

"जो शख़्स मुहम्मद की इबादत करता था, तो मुहम्मद पर मौत आ चुकी। और जो शख़्स अल्लाह की इबादत करता था, तो अल्लाह ज़िंदा है, उस पर कभी मौत आने वाली नहीं।”

(सहीह अल-बुख़ारी, हदीस नं०: 3667) 

यह रसूलुल्लाह (सल्ल०) के एक साथी (सहाबी) की मिसाल है, जो इस क़िस्म की हर घटना के लिए एक नमूना की हैसियत रखती है। 

मिसाल के तौर पर, एक शख़्स को अपने बेटे से बहुत गहरा दिली लगाव है।
नौजवानी की उम्र में बेटे की मौत हो जाती है। उसका दिल इस हादसे से बेक़ाबू हो जाता है।

ऐसे शख़्स को चाहिए कि वह रसूलुल्लाह के सहाबी की मिसाल को अपने लिए एक नमूना बनाए, और अपने आप से कहे:

अगर तुम अपने बेटे की परस्तिश (इबादत) करते थे, तो जान लो कि तुम्हारा बेटा मर गया। और अगर तुम अल्लाह की परस्तिश करने वाले हो, तो तुमको जानना चाहिए कि अल्लाह ज़िंदा है, उस पर कभी मौत आने वाली नहीं।


इंसानों की दो क़िस्में हैं — 

एक वे जो ख़ुदा को सामने रखकर जीते हैं, और दूसरे वे जिनकी ज़िन्दगी का केंद्र ख़ुदा के सिवा कुछ और होता है। 

जो शख़्स ख़ुदा के सिवा किसी और चीज़ को अपनी सबसे बड़ी फ़िक्र और सहारा बनाए हुए हो, जो ख़ुदा के सिवा किसी और चीज़ से दिली लगाव रखता हो, वह उस चीज़ के खोने पर सख़्त परेशान हो जाएगा। उसको ऐसा महसूस होगा जैसे कि उसकी दुनिया ख़त्म हो गई। उससे वह चीज़ छिन गई, जिसके सहारे पर वह जी रहा था।   

हक़ीक़त में ऐसे लोग ख़ुदा को न मानने वालों (मुंकिर) में से हैं, भले ही वे अपनी ज़बान से ख़ुदा को मानने के अल्फ़ाज़ बोलते हों। ऐसे लोगों को आख़िरत में ख़ुदा का क़ुर्ब (निकटता) हासिल होने वाला नहीं।   

इससे अलग, वह इंसान है जो अपनी ज़िंदगी ख़ुदावंद-ए-ज़ुलजलाल में जीता हो— यानी जो अपनी ज़िंदगी अल्लाह को सामने रखकर जीता हो, जिसने ख़ुदा को अपना सब कुछ बना रखा हो, जिसकी सोच और जिसके जज़्बात उसी एक ख़ुदा से जुड़ हो गए हों। ऐसा इंसान जब किसी चीज़ को खोता है, तो वह ख़ुदा को और ज़्यादा याद करने लगता है। 

हर महरूमी (नुक़सान) उसके लिए अल्लाह के साथ और गहरे रिश्ते का कारण बन जाती है।



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