क़ुरआन की आयात पर ग़ौर-ओ-फ़िक्र
सूरह: आल-ए-इमरान | 144 – 148
[3: 144]: मुहम्मद बस एक रसूल हैं। इनसे पहले भी रसूल गुज़र चुके हैं। फिर क्या अगर
वह मर जाएं या क़त्ल कर दिए जाएं तो तुम उल्टे पैर फिर जाओगे। और जो शख़्स फिर जाए वह
अल्लाह का कुछ नहीं बिगाड़ेगा और अल्लाह शुक्रगुज़ारों को बदला देगा।
[3: 145]: और कोई जान मर नहीं सकती बग़ैर अल्लाह के हुक्म के। अल्लाह का लिखा हुआ
वादा है। और जो शख़्स दुनिया का फ़ायदा चाहता है उसे हम दुनिया में से दे देते हैं और
जो आख़िरत का फ़ायदा चाहता है उसे हम आख़िरत में से दे देते हैं। और शुक्र करने वालों
को हम उनका बदला ज़रूर अता करेंगे।
[3: 146]: और कितने नबी हैं जिनके साथ होकर बहुत से अल्लाह वालों ने जंग की। अल्लाह
की राह में जो मुसीबतें उन पर पड़ीं उनसे न वे पस्तहिम्मत हुए न उन्होंने कमज़ोरी दिखाई।
और न वे दबे। और अल्लाह सब्र करने वालों को दोस्त रखता है।
[3: 147]: उनकी ज़बान से इसके सिवा कुछ और न निकला कि ऐ हमारे रब हमारे गुनाहों को
बख़्श दे और हमारे काम में हमसे जो ज़्यादती हुई उसे माफ़ फ़रमा और हमें साबितक़दम रख और
मुंकिर क़ौम के मुक़ाबले में हमारी मदद फ़रमा।
[3: 148]: पस अल्लाह ने उन्हें दुनिया का बदला भी दिया और आख़िरत का अच्छा बदला भी।
और अल्लाह नेकी करने वालों को दोस्त रखता है।
इन आयात
को पढ़ते हुए एक बहुत अहम सबक़ हमारे सामने आता है, जिसकी
तरफ़ मैं आपका ध्यान दिलाना चाहता हूँ।
क़ुरआन
में कहा गया है:
मुहम्मद
बस एक रसूल हैं। इनसे पहले भी रसूल गुज़र चुके हैं। फिर क्या अगर वह मर जाएं या क़त्ल
कर दिए जाएं तो तुम उल्टे पैर फिर जाओगे। और जो शख़्स फिर जाए वह अल्लाह का कुछ नहीं
बिगाड़ेगा और अल्लाह शुक्रगुज़ारों को बदला देगा। (3:144)
जब इस आयत को पढ़ते हुए मैं “व-मा मुहम्मदुन इल्ला रसूलुन” — “मुहम्मद बस एक रसूल हैं” (3:144) पर पहुँचा, तो मेरी नज़र ख़ास तौर पर “रसूल” के लफ़्ज़ पर ठहर गई।
मैंने वहीं रुककर इस लफ़्ज़ के मफ़्हूम को समझने की
कोशिश की।
आम तौर
पर जब हम “रसूल” कहते हैं, तो हमारे ज़ेहन में तुरंत उसका एक
तयशुदा पारिभाषिक (इस्तिलाही) मतलब सामने आ जाता है—नबी और रसूल का
वही जाना-पहचाना अर्थ, जिसे हम हमेशा से सुनते और समझते
आए हैं।
लेकिन जब मैंने इस पर थोड़ा और ग़ौर किया और सोचा कि अगर “रसूल” के लफ़्ज़ को उसके लुग़वी (डिक्शनरी के) मतलब में समझा जाए—यानी “पैग़ाम पहुँचाने वाला”— तो महसूस हुआ कि बात एक नई गहराई के साथ सामने आ रही है।
इस नज़र से जब मैंने आयत को समझने की कोशिश की, तो इसका दायरा और भी ज़्यादा वसी और विशाल नज़र आया।
ऐसा महसूस हुआ कि इस आयत में अल्लाह तआला साफ़-साफ़ बता रहे हैं कि मुहम्मद जो एक शख़्स हैं, उनका असल काम अल्लाह का पैग़ाम लोगों तक पहुँचाना है—इसके सिवा और कुछ नहीं।
“व-मा
मुहम्मदुन इल्ला रसूलुन” — “मुहम्मद बस एक रसूल हैं” (3:144)
और
फिर इसी के साथ यह भी बता दिया गया कि आप (सल्ल्ल०)
से पहले भी अल्लाह ने बहुत से लोगों को इसी काम के लिए चुना और भेजा था। वे सब
अल्लाह के रसूल थे और उन
सबका काम, असल
मंसब यही था कि वे अल्लाह का पैग़ाम इंसानों तक पहुँचाएँ ।
चाहे
उन्हें हम इस्तिलाही तौर पर रसूल कहें या नबी, लेकिन लुग़वी (डिक्शनरी
के) माने में वे सब अल्लाह का “पैग़ाम पहुँचाने वाले”
थे।
इस आयत
को पढ़ते हुए ऐसा महसूस हुआ कि यहाँ असल चर्चा “रसूल” की परिभाषा (terminology) या उसकी पारिभाषिक बारीकियों की
नहीं है,
बल्कि असल बात “रिसालत” की है—उस पैग़ाम की,
जो अल्लाह की तरफ़ से इंसानों तक पहुँचता है।
रिसालत
क्या है?
रिसालत
दरअसल ख़ुदा का पैग़ाम इंसानों तक पहुँचाने का काम है। और रसूल का यही काम होता था
कि वह इंसानों के सामने ख़ुदा का त'आरुफ़ (परिचय) पेश
करें। लोगों को बताए कि उन्हें किसने पैदा किया, क्यों
पैदा किया, और इस दुनिया में उनकी ज़िंदगी का असल मक़सद क्या
है। और यह भी बताएं कि
इंसान की ज़िन्दगी सिर्फ़ इस दुनिया तक सीमित नहीं है; मौत के बाद एक और ज़िंदगी है, जहाँ हर इंसान को अपने किए हुए
कामों का पूरा हिसाब देना होगा।
यानी अल्लाह के पूरे “तख़्लीक़ी मंसूबे” (Creation plan of God) को साफ़-साफ़ इंसानों को बताना ही रसूलों का काम था—याद दिलाने की सूरत में भी, और इंज़ार (डराने) की सूरत में भी, हर तरह से ।
लेकिन
यहाँ इंसान की एक नफ़्सियाती (psychological) कमज़ोरी सामने आती है।
जब कोई बड़ी शख़्सियत सामने होती है, तो अक्सर इंसान का ध्यान उसी
पर टिक जाता है। धीरे-धीरे हालत यह हो जाती है कि उस शख़्सियत के साथ जो असल पैग़ाम
आया था, वही पीछे छूटने लगता है और दूसरे दर्जे पर चला जाता है।
नतीजा
यह होता है कि शख़्सियत अहम बन जाती है, और पैग़ाम—जो
असल चीज़ था—सेकेंडरी होकर रह जाता है।
इसी मुक़ाम पर अल्लाह तआला हमारे ज़ेहन को खोलते
हैं और
बताते हैं कि असल तवज्जोह किस चीज़ पर होनी चाहिए। तुम यह देखो कि रसूलों ने जो पैग़ाम दिया है, उस पैग़ाम में तुम्हारे लिए क्या हिदायत है, क्या फ़ायदा
है, और तुम उन बातों से कौन-सी सच्चाई हासिल कर रहे हो।
क्या तुम यह समझ रहे हो कि तुम्हें क्यों पैदा किया गया है?
तुम्हारा पैदा करने वाला कौन है? और क्या
सचमुच
तुम उसे पहचान रहे हो ?
जब
इंसान इस उसूली सदाक़त (अस्ल सच्चाई)
को सचमुच समझ लेता
है,
तो उसे साफ़ नज़र आने लगता है कि उसका एक रब है—अल्लाह—जिसने उसे
पैदा किया है। और वह चाहता है कि इंसान दुनिया में उसके निज़ाम (व्यवस्था)
और नेमतों को देखते हुए, उनसे गुज़र
कर अपने रब को ज़्यादा से ज़्यादा पहचाने और दूसरों को भी उसकी
पहचान (मा’रिफ़त) तक
पहुँचाए।
दीन
का असल मक़सद भी यही है कि इंसान काइनात की चीज़ों में ग़ौर-ओ-फ़िक्र करते हुए ख़ालिक़
(Creator) की मा’रिफ़त (पहचान)
हासिल करे।
आख़िरत
में इंसान का फ़ैसला भी इसी बुनियाद पर होगा कि उसने दुनिया के निज़ाम के तहत ज़िन्दगी गुज़ारते
हुए, काइनात की तख़्लीक़ में, उसकी व्यवस्था में, दुनिया की चीज़ों
में रब की कारीगरी और उसकी अज़मत (महानता)
को देखा या नहीं—यानी उसे
रब की पहचान (मा’रिफ़त)
हासिल हुई या नहीं।
रसूलों
का काम यही था—इंसान की ऐसी तरबियत और तज़्किया
करना
कि इंसान की ज़िंदगी का हर पल अपने रब की याद से जुड़ जाए।
इसलिए
आपने ग़ौर किया
होगा कि रसूलुल्लाह ने हमें ज़िंदगी के छोटे-छोटे मौक़ों के लिए भी दुआएँ सिखाईं—खाने
के वक़्त की दुआ, सोने के वक़्त की दुआ, और नींद से जागने के बाद की दुआ। इस तरह अल्लाह को याद करने की बहुत सी
दुआएँ सिखाईं, ताकि इंसान हर चीज़ के पीछे अपने रब को
पहचाने और उसकी हम्द और शुक्र करता रहे।
असल में
यही हम्द और शुक्र वह चीज़ है जो हमसे आख़िरत में चाही जाएगी—जब जन्नत में एक नई तहज़ीब
और एक नया तमद्दुन क़ायम होगा।
यही
वह उसूली सदाक़त (अस्ल सच्चाई) है
जिसे लेकर रसूल आते हैं और लोगों को समझाते हैं। लेकिन इंसान की एक नफ़्सियाती
कमज़ोरी यह है कि वह असल बात से ज़्यादा उस शख़्सियत को अहम बना लेता है, जो उस उसूली सदाक़त (अल्लाह का पैग़ाम)
को उसके सामने पेश कर रही होती है। वह यह समझने लगता है कि यह उसूली सदाक़त उसी शख़्स
के साथ जुड़ी हुई है और उसी के ताबे (अधीन) है, फिर अगर वह शख़्स
नहीं रहा तो उसूली सदाक़त भी नहीं रही।
क़ुरआन यहाँ इसी नफ़्सियात (सोच) को ठीक कर रहा है।
जंग-ए-उहुद
के मौक़े पर सहाबा-ए-किराम के सामने यही बात आई थी और वहाँ इसी नज़रिये की इस्लाह की
गई थी—और आज हमें भी यही सिखाया जा रहा है कि इन दो चीज़ों में फ़र्क़ करो— एक है उसूली
सदाक़त, और दूसरी है वह शख़्सियत जो उसूली सदाक़त को लोगों तक पहुँचाती
है।
इन
दोनों को एक समझ लेना सही नहीं है। असल अहमियत उसूली सदाक़त (अल्लाह
के पैग़ाम) की है, क्योंकि वही इंसान
को अल्लाह रब्बुल आलमीन से जोड़ती है। और जो शख़्स यह पैग़ाम को लेकर आता है,
उसकी हैसियत उस पैग़ाम के मुक़ाबले में सेकेंडरी दर्जे की होती है।
इसलिए
सवाल उठाया गया :
फिर क्या अगर वह मर जाएं या क़त्ल कर दिए जाएं तो तुम उल्टे पैर फिर जाओगे ? (आले-इमरान: 144)
यानी क्या
तुम उसूली सदाक़त (अस्ल सच्चाई) से भी
मुँह मोड़ लोगे ?
अगर
ऐसा होता है, तो इसका मतलब साफ़ है कि तुमने उसूली सदाक़त को
नहीं, बल्कि शख़्सियत को अव्वलिय्यत (प्राथमिकता) दे दी
है।
यहाँ
दो बातें हैं।
इंसान
को उसूली सदाक़त (अल्लाह
का पैग़ाम) भी
मिली हुई है और उसे समझाने वाली शख़्सियत (रसूल)
भी । लेकिन शख़्सियत के बारे में ख़ुदा का क़ानून यही
रहा है कि कोई भी इंसान इस दुनिया में हमेशा बाक़ी नहीं रहता। हर शख़्स को एक न
एक दिन मौत आनी ही है। फिर चाहे वो कोई भी हो।
इसलिए
समझने वाली बात यह है कि शख़्सियत
के एतबार से हम किसी शख़्स को खो सकते हैं, लेकिन उसूली सदाक़त के मामले में ऐसा नहीं होता। अगर एक बार हमने उसूली सदाक़त को हासिल कर लिया, समझ लिया, और अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बना लिया, तो वह हमारे
पास रहती है, भले ही उसे समझाने वाली शख़्सियत हमारे बीच न
रहे।
असल में ये दो अलग-अलग बातें हैं, लेकिन इंसान अक्सर यहीं ग़लती कर बैठता है कि वह इन दोनों को आपस में मिला
देता है। इसलिए अल्लाह तआला यहाँ हमारी सोच की इस ग़लती को ठीक करते हुए समझाते हैं
कि इन दोनों में फ़र्क़ को समझ लो।
आम तौर पर इंसान की नफ़्सियाती कमज़ोरी यह होती है कि जो चीज़ उससे छिन जाती है, वह उसी के बारे में सोचता रहता है। लेकिन अगर इंसान उस चीज़ को लेकर सोचे जो उसे मिली हुई है, तो उसके अंदर शुक्र का मिज़ाज पैदा हो जाएगा।
इसी
लिए आगे कहा गया—
“और अल्लाह शुक्रगुज़ारों को बदला देगा।” (3: 144)
यहाँ
सवाल उठता है कि अचानक शुक्रगुज़ारों की बात क्यों आ गई, जबकि चर्चा तो यह हो रही थी कि अगर रसूल मर जाएँ या क़त्ल कर दिए जाएँ तो
क्या तुम उल्टे पैर फिर जाओगे ।
और अगर फिर जाओगे तो तुम अल्लाह का कुछ नुक़सान नहीं करोगे ।
तो सवाल उठता है कि आख़िर यहाँ शुक्र का मतलब क्या है?
शुक्र के पहलु में ये बात है कि हम
दो चीज़ें पाए हुए हैं—
एक उसूली सदाक़त, यानी बुनियादी सच्चाई; और दूसरी, वह शख़्सियत जो यह सच्चाई लेकर आई।
अगर किसी वक़्त शख़्सियत हमसे जुदा हो जाए और हम बस उसी खोई
हुई चीज़ के बारे में सोचते रहें, तो हमारे अंदर शुक्र की कैफ़ियत पैदा
नहीं होगी। लेकिन
अगर हम यह सोचें कि जो असल चीज़ है—उसूली सदाक़त— जो हमसे छीनी नहीं गई है, तब दिल में शिकायत नहीं, बल्कि शुक्र का
ज़ज्बा पैदा होगा
।
यानी
शुक्र यह है कि हम यह पहचानें कि हमें क्या मिला है—और वह अब भी हमारे पास है।
यही वह बड़ी बात है जो मुझे यहाँ समझ में आई है कि अगर “रसूल” शब्द को सिर्फ़ उसके इस्तिलाही मतलब तक सीमित न रखें, बल्कि उसके लुग़वी मतलब — यानी पैग़ाम पहुँचाने वाले — के तौर पर भी अगर समझा जाए, तो हमारी समझ का दायरा कहीं ज़्यादा खुल जाता है। तब साफ़ नज़र आता है कि असल अहमियत पैग़ाम की है— असल चीज़ सदाक़त है, जो उसूली (अस्ल) है और उसी को सबसे ज़्यादा अहमियत देने की ज़रूरत है।
और कोई जान मर नहीं सकती बग़ैर अल्लाह के हुक्म के। अल्लाह का लिखा हुआ वादा है। और जो शख़्स दुनिया का फ़ायदा चाहता है उसे हम दुनिया में से दे देते हैं और जो आख़िरत का फ़ायदा चाहता है उसे हम आख़िरत में से दे देते हैं। और शुक्र करने वालों को हम उनका बदला ज़रूर अता करेंगे। (3: 145)
इस
आयत में अल्लाह तआला एक अहम हक़ीक़त समझा रहे हैं कि मौत का मामला पूरी तरह
अल्लाह के हुक्म के अधीन है। किसी को भी अल्लाह के हुक्म के बिना मौत नहीं आ
सकती। यह अल्लाह का लिखा हुआ वादा है।
यह
बात हर कोई जानता है कि एक दिन उसे मरना है। लेकिन सवाल यह है कि इस हक़ीक़त को समझ
लेने के बाद एक मोमिन को क्या करना चाहिए।
एक मोमिन के लिए सही सोच यह है कि अल्लाह कभी भी उसकी रूह क़ब्ज़ कर सकता है, इसलिए वह इस हक़ीक़त को याद रखे और उस पैग़ाम को सामने रखकर ज़िंदगी गुज़ारे, जिसके साथ रसूल दुनिया में आए थे।
वह पैग़ाम यह था
कि इंसान इस दुनिया में मरने के बाद आख़िरत में दोबारा उठाया जाएगा और
उसके दुनिया के आमाल के हिसाब से उसे जज़ा या सज़ा दी जाएगी।
रसूल आख़िरत की याद दिलाने आते थे और बताते थे कि असल ज़िंदगी तो आख़िरत की ज़िंदगी है।
इसलिए अगर किसी को मौत से डर लगता है तो उसे दुनिया के नुक़्सान से नहीं, बल्कि आख़िरत के हवाले से डरना चाहिए—कि कहीं मेरा हिसाब ख़राब न हो जाए।
और इसी के साथ अल्लाह तआला साफ़ कर देते हैं :
“जो शख़्स दुनिया का फ़ायदा चाहता है उसे हम
दुनिया में से दे देते हैं और जो आख़िरत का फ़ायदा चाहता है उसे हम आख़िरत में से दे देते
हैं। और शुक्र करने वालों को हम उनका बदला ज़रूर अता करेंगे।” (3: 145)
फिर
वही बात दोहराई गई— “शुक्र करने वालों को हम उनका बदला ज़रूर अता करेंगे।”
यहां वही पहलू है जो पहले समझाया गया था—हमने आख़िरत के हवाले से जो सदाक़त (सच्चाई) पाई हुई है, अगर उसे अपने ज़ेहन में याद रखें, और उसी के मुताबिक़ ज़िंदगी गुज़ारें, तो यह शुक्र का पहलू है और बहुत अहम है।
और कितने नबी हैं जिनके साथ होकर बहुत से अल्लाह वालों ने जंग की। अल्लाह की राह में जो मुसीबतें उन पर पड़ीं उनसे न वे पस्तहिम्मत हुए न उन्होंने कमज़ोरी दिखाई। और न वे दबे। और अल्लाह सब्र करने वालों को दोस्त रखता है। (3: 146)
क़ुरआन
की यह आयत बताती है कि पहले भी बहुत से
नबी ऐसे गुज़रे हैं जिनके साथ बड़ी तादाद में रब्बानी लोग खड़े रहे। ये वे लोग थे जो
अल्लाह की मा’रिफ़त (पहचान) में जीने वाले थे । उन्होंने नबियों के साथ
मिलकर दीन की राह में जंग की और आख़िरी हद तक कोशिश की।
ये वे
लोग थे जो मुश्किल से मुश्किल हालात में भी नबी का साथ नहीं छोड़े। जब मुसीबतें आईं, जान का ख़तरा सामने आया, तब भी पीछे नहीं हटे। उन्होंने
न कमज़ोरी दिखाई, न पस्त-हिम्मत हुए और न दबे।
वे किसलिए
नबियों के साथ इस तरह डटे रहे, जमे रहे? आख़िरी दर्जे तक, जान की बाज़ी लगा देने तक रसूल
का साथ, पैग़ाम
लाने वाले का साथ नहीं छोड़े।
इसकी
वजह यह थी कि वे ख़ुद उसूली सदाक़त (असल सच्चाई)
को समझ कर उस पर क़ायम हो चुके थे। रब्बानी मिज़ाज उनके अंदर पैदा हो चुका था।
जब
इंसान के अंदर ऐसी रब्बानी सोच पैदा हो जाती है, तो
उसके दिल से पस्त-हिम्मती और दब जाने की कमज़ोरी निकल जाती है।
और सबसे बड़ी बात यह होती है कि वे सब्र और मज़बूती के साथ जमे रहने वाले (मुस्तक़िल-मिज़ाज) हो जाते हैं। यही वे लोग हैं जिनसे अल्लाह मोहब्बत करता है।
कुरआन की अगली आयत (3: 147) में उन्ही लोगों के बारे में बताया गया है :
“उनकी ज़बान से इसके सिवा कुछ और न निकला कि —
ऐ हमारे रब! हमारे गुनाहों को बख़्श दे और हमारे काम में हमसे जो ज़्यादती हुई उसे
माफ़ फ़रमा, और हमें साबितक़दम
रख और इंकार करने वाली क़ौम के मुक़ाबले में हमारी मदद फ़रमा।” (3:147)
ज़रा
सोचिए,
ये किन लोगों की तस्वीर है?
ये वो
लोग हैं जिन्होंने अल्लाह को सचमुच पहचान लिया था।
जब कोई शख़्स अल्लाह को इस दर्जे में पहचान
लेता है, तो फिर
वह पैग़ाम लाने वाले का साथ आख़िरी हद तक देता है। उसका मक़सद सिर्फ़ साथ देना ही नहीं
रहता, बल्कि उस पैग़ाम को दुनिया तक पहुँचाना बन जाता है—चाहे
इसके लिए जान की बाज़ी ही क्यों न लगानी पड़े।
ऐसे
लोग मुश्किलों से टूटते नहीं। न वे पस्त-हिम्मत होते हैं, न कमज़ोरी दिखाते हैं और न किसी दबाव में झुकते हैं। वे सब्र और दृढ़ता के
साथ डटे रहते हैं।
असल
में ये रब्बानी लोग होते हैं। इनका फ़ैसला हालात देखकर नहीं होता, बल्कि ख़ुदा को देखकर होता है।
जब
इंसान सिर्फ़ हालात को देखता है, तो डर और कमज़ोरी पैदा
होती है, दबाव महसूस होता है। लेकिन जब इंसान अल्लाह को देखता है—यानी उसे उसकी
क़ुदरत और हिकमत के साथ पहचानता है—तो मुश्किल आते ही घबराने के बजाय अल्लाह की
तरफ़ रुजू करता है और दुआ में लग जाता है।
वह कहता है:
ऐ हमारे रब! हमारे गुनाहों को बख़्श दे।
हमारे
काम में हमसे जो ज़्यादती और ग़लतियाँ हुई हैं उसे माफ़ कर
दे।
और जो
उसूली सदाक़त (अल्लाह
का पैग़ाम) हमें मिली है उसे
दुनिया तक पहुँचाने में हमें साबितक़दम रख । और जो लोग हमारे ख़िलाफ़ हालात बना
रहे हैं,
उनके मुक़ाबले में हमारी मदद फ़रमा।
तो जब
कोई बंदा सचमुच रब्बानी शख़्सियत (अल्लाह को सामने रखकर
चलने वाला बंदा) बन जाता है—यानी वह उसूली सदाक़त को समझकर उसे अपनी
ज़िंदगी का हिस्सा बना लेता है—तो उसकी सोच बदल जाती है। वह दुनिया की हर चीज़ में
अपने रब की निशानियाँ देखने लगता है और समझता है कि अल्लाह ने किस तरह हक़ की बात
उस तक पहुँचाई है।
जब
इंसान इस दर्जे तक पहुँच जाता है, तो क़ुरआन की भाषा में वह मोहसिन
बन जाता है—यानी एहसान के दर्जे वाला इंसान। एहसान का मतलब यह है कि इंसान अल्लाह
की बंदगी इस तरह करे मानो वह उसे देख रहा हो।
ऐसे
मोहसिनीन के बारे में क़ुरआन कहता है—
“वल्लाहु युहिब्बुल मुह्सिनीन” (3:148)
यानी जो
लोग इस एहसास के साथ ज़िंदगी गुज़ारते हैं और हर काम में अल्लाह को सामने रखकर
चलते हैं,
ऐसे मोहसिनीन (एहसान वालों)
से अल्लाह बहुत मोहब्बत करता है।
और यह
मोहब्बत सिर्फ़ आख़िरत के लिए सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया
में भी अल्लाह उन्हें अपनी मदद और इनाम से नवाज़ता है।
तो ये सारी बातें हैं जिसे उसूली सदाक़त के तहत समझी जा सकती हैं।
हालाँकि ये बातें जंग-ए-उहुद से जुड़ी हुई नज़र आ रही हैं, लेकिन गहराई से देखें, तो यह सिर्फ़ इतिहास का एक वाक़िआ नहीं है—आज
भी ये
हमारे लिए उतनी ही रिलेवेंट और उतना ही अहम है जितना उस वक़्त था।
क्योंकि
एक रसूल ने हमें ये पैग़ाम
पहुंचा दी है कि—हम
अल्लाह के पैग़ाम को पूरी दुनिया के इंसानों तक पहुँचाएँ—ख़ुदा की बातों को उसके बंदों
तक पहुँचाएँ। और इस राह में जो मुश्किलें पेश आएंगी, उनका आख़िरी
दर्जा यह हो सकता है कि जान की बाज़ी लग जाए।
उस वक़्त भी अगर कोई इंसान अपने आप में रब्बानी शख़्सियत होने का नमूना पेश करे—न वह डर से टूटे, न पस्त-हिम्मत हो, न कमज़ोरी दिखाए। बल्कि हर हाल में, हर वक़्त अल्लाह की मदद का उम्मीदवार बना रहे, और अल्लाह से अपने गुनाहों की माफ़ी मांगता रहे। और अगर अपनी कोशिशों में या स्ट्रैटेजिक मूवमेंट (रणनीतिक क़दम) में कोई चूक (लग़्ज़िश) हो जाए, तो उसके लिए भी माफ़ी मांगता रहे—"व इस्राफ़ना फ़ी अम्रिना"— यानी हमारे काम में जो हमसे ज़्यादती (इस्राफ़) हुई है उसे भी माफ़ कर दे।
तो जब
कोई बंदा इस तरह अल्लाह से लिपट जाए—हर हालात में, हर कमज़ोरी
में, हर चूक में बस उसी की तरफ़ रुजू रहे, तो क़ुरआन के मुताबिक
वह मोहसिन बन जाता है। और अल्लाह का वादा है कि ऐसे मोहसिनीन (एहसान
वालों) को वह दुनिया में भी इनाम देगा और आख़िरत में भी उनके लिए बड़ा
अज्र रखेगा।
Note: क़ुरआन मुताला पर एक दा’ई के बयान का सारांश।
तज़्कीरुल-क़ुरआन | तज़्कीर
उहुद की जंग में यह ख़बर मशहूर हो गई कि मुहम्मद
(सल्ल०) शहीद हो गए । उस वक़्त कुछ मुसलमानों में पस्तहिम्मती
पैदा हो गई। मगर अल्लाह के हक़ीक़ी बंदे वे हैं जिनकी दीनदारी किसी शख़्स के ऊपर क़ायम
न हो।
अल्लाह को वह दीनदारी मत्लूब है जबकि बंदा अपनी
सारी रूह और सारी जान के साथ सिर्फ़ एक अल्लाह के साथ जुड़ जाए।
मोमिन वह है जो इस्लाम को उसकी उसूली सदाक़त की
बुनियाद पर पकड़े न कि किसी शख़्सियत के सहारे की बिना पर।
जो शख़्स इस तरह इस्लाम को पाता है उसके लिए इस्लाम
एक ऐसी नेमत बन जाता है जिसके लिए उसकी रूह के अंदर शुक्र का दरिया बहने लगे । वह दुनिया
के बजाए आख़िरत को सब कुछ समझने लगता है । ज़िंदगी उसके लिए एक ऐसी नापायदार चीज़ बन
जाती है जो किसी भी लम्हे मौत से दोचार होने वाली हो । वह कायनात को एक ऐसे ख़ुदाई कारख़ाने
की हैसियत से देख लेता है जहां हर वाक़या ख़ुदा के इज़्न के तहत हो रहा है । जहां देने
वाला भी वही है और छीनने वाला भी वही है ।
ऐसे ही लोग अल्लाह की राह के सच्चे मुसाफ़िर हैं
। अल्लाह अगर चाहता है तो दुनिया की इज़्ज़त व इक़्तेदार (सत्ता) भी उन्हें दे देता है और आख़िरत के अज़ीम और अबदी
(चिरस्थाई) इनामात तो सिर्फ़ इन्हीं के लिए हैं ।
ताहम यह दर्जा किसी को सिर्फ़ उस वक़्त मिलता है
जबकि वह हर क़िस्म के इम्तेहान में पूरा उतरे । उसके ज़ाहिरी सहारे खो जाएं तब भी वह
अल्लाह पर अपनी नज़रें जमाए रहे । जान का ख़तरा भी उसे पस्तहिम्मत न कर सके । दुनिया
बर्बाद हो रही हो तब भी वह पीछे न हटे । उसके सामने कोई नुक़्सान आए तो उसे वह अपनी
कोताही का नतीजा समझ कर अल्लाह से माफ़ी मांगे । कोई फ़ायदा मिले तो उसे ख़ुदा का इनाम
समझ कर शुक्र अदा करे ।
मोमिन का यह इम्तेहान जो हर रोज़ लिया जा रहा है
कभी उन हिला देने वाले मक़ामात तक भी पहुंच जाता है जहां ज़िंदगी की बाज़ी लगी हुई हो
।
ऐसे मौक़ों पर भी जब आदमी बुज़दिली न दिखाए, न वह बेयक़ीनी में मुब्तिला हो और न किसी हाल में दीन के दुश्मनों के सामने
हार मानने के लिए तैयार हो, तो गोया वह इम्तेहान
की आख़िरी जांच में भी पूरा उतरा।
ऐसे ही लोगों के लिए हर क़िस्म की सरफ़राजियां हैं
। तारीख़ में वही लोग सबसे ज़्यादा क़ीमती हैं जिन्होंने इस तरह अल्लाह को पाया हो और
अपने आपको इस तरह अल्लाह के मंसूबे में शामिल कर दिया हो ।
नाज़ुक मौक़ों पर अहले ईमान का आपस में मुत्तहिद रहना और सब्र के साथ हक़ पर जमे रहना वे चीज़ें हैं जो अहले ईमान को अल्लाह की नुसरत का मुस्तहिक़ बनाती हैं।
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