सूरह : आल-ए-इमरान | 1 – 6

 

क़ुरआन की आयात पर ग़ौर-ओ-फ़िक्र


[3: 1]:  अलिफ़० लाम० मीम०।

 

[3: 2]:  अल्लाह उसके सिवा कोई माबूद नहीं, ज़िंदा और सबका थामने वाला।

 

[3: 3]:  उसने तुम पर किताब उतारी हक़ के साथ, सच्चा करने वाली उस चीज़ को जो उसके आगे है और उसने तौरात और इंजील उतारी,

 

[3: 4]:  इससे पहले लोगों की हिदायत के लिए और अल्लाह ने फ़ुरक़ान उतारा। बेशक जिन लोगों ने अल्लाह की निशानियों का इंकार किया उनके लिए सख़्त अज़ाब है और अल्लाह ज़बरदस्त है, बदला लेने वाला है।

 

[3: 5]:  बेशक अल्लाह से कोई चीज़ छुपी हुई नहीं, न ज़मीन में और न आसमान में।

 

[3: 6]:  वही तुम्हारी सूरत बनाता है मां के पेट में जिस तरह चाहता है। उसके सिवा कोई माबूद नहीं वह ज़बरदस्त है, हिक्मत वाला है।

 


सूरह आले-इमरान की शुरुआती आयात (1–6) इंसान को गहरे सोच-विचार के लिए बुलाती हैं। साथ ही, यह अल्लाह की "ज़ात" (हस्ती) और "सिफ़ात" (गुणों) के बारे में असल त’आरुफ़ (सही परिचय) और स्पष्ट मार्गदर्शन (रहनुमाई) प्रदान करती हैं।


आयात शुरू होती है:

अलिफ़० लाम० मीम०, अल्लाह उसके सिवा कोई माबूद नहीं, ज़िंदा और सबका थामने वाला।”  [3:1-2]

 

"अलिफ़० लाम० मीम०, अल्लाहु ला इलाहा इल्ला हुवल हय्युल क़य्यूम"  [3:1-2]

 

यह आयत जिस अहम बात की तरफ़ रहनुमाई करती है, वह यह है कि अल्लाह अपनी ज़ात" और "सिफ़ात" के एतबार से कैसा है इसका असली और सही परिचय, सिर्फ़ वही दे सकता है।

ये बहुत इम्पोर्टेन्ट बात है जो उसे हर इंसानी ता’बीरात (interpretations), अनुमान और कल्पना से अलग करती है।



अल्लाह की "ज़ात" और "सिफ़ात" पर क़ुरआन की वज़ाहत


यह भी समझने की बात है कि अल्लाह की ज़ात और सिफ़ात से जुड़ी जो बातें अल्लाह तआला क़ुरआन में हमारी हिदायत के लिए बता रहें हैं ये उस समय की नई बातें नहीं थीं जिस वक़्त क़ुरआन नाज़िल हो रहा था, उस समय भी दूसरे मज़हबो के दार्शनिक चर्चाओं (फिलॉसफी) में "इलाहियात" (थियोलॉजी) के अंतर्गत अल्लाह की "ज़ात" और "सिफ़ात" पर विचार होता था। लेकिन इन चर्चाओं में इंसानी ता’बीरात (interpretations) और कल्पनाएँ इतनी गहराई तक दाख़िल हो चुकी थीं कि अल्लाह का असल दीन और अल्लाह की हक़ीक़ी “ज़ात" (हस्ती) और "सिफ़ात" (गुणों) धुंधली हो चुकी थीं।

 

उस समय, दीन के नाम पर दीनी तशरीहात (interpretations) को इतना मुक़द्दस (पवित्र) समझ लिया गया था कि उन्हें ही असल मज़हब और दीन समझा जाने लगा। इस तरह अल्लाह का अस्ल दीन और उसकी हक़ीक़ी "ज़ात" पर आधारित शिक्षाएँ विकृत हो (distorted) गईं।


इन विकृतियों (ग़लतफ़हमियों) की सुधार के लिए और अस्ल दीन को फिर से स्पष्ट करने के लिए अल्लाह तआला ने आख़िरी नबी मुहम्मद (सल्ल०) को भेजा और क़ुरआन नाज़िल किया.

 

यह वाक़िआ अपने आप में एक आईना है। यह हमें उस दौर के मज़हबी हालात का एक मंज़र (दृश्य) दिखाती है जब दीन की सच्चाई इंसानी ता’बीरों (interpretations) और कल्पनाओं के नीचे दब चुकी थी और क़ुरआन का नुज़ूल (आना) उस दबे हुए सच को उजागर करने के लिए हुआ।

 

इसके बाद याद दिलाया जाता है कि अल्लाह तआला ने इंसानों की रहनुमाई के लिए हमेशा किताबें भेजीं—तौरात, इंजील और फिर आख़िरी किताब क़ुरआन। यह सिलसिला इसलिए था ताकि इंसान सच्चाई से भटके नहीं।

क़ुरआन में अल्लाह तआला ने दो अहम बातें साफ़ कर दीं कि :

1. अल्लाह का सच्चा दीन क्या है।

2. और वह कैसे अलग है उस दीन से, जिसे इंसानों ने अपनी कल्पनाओं और व्याख्याओं (तशरीहात) से गढ़ लिया है। 



अल्लाह की "ज़ात" और "सिफ़ात" का सही परिचय:  क़ुरआन का मार्गदर्शन

 

अब सवाल यह है कि अल्लाह की "ज़ात" और "सिफ़ात" को सही मायनों में कैसे समझा जाए?


इसका जवाब क़ुरआन ख़ुद देता है। अल्लाह के बारे में जानने का सही तरीक़ा वही है जो ख़ुद अल्लाह ने क़ुरआन में बयान किया है।

 

क़ुरआन इसी लिए नाज़िल किया गया ताकि अल्लाह तआला ख़ुद अपना त’आरुफ़ (सही परिचय) करा दे कि वह कैसी "हस्ती" है, और उसके सिफ़ात (गुण, विशेषताएँ, attributes) क्या हैं, साथ ही यह भी बताए कि उसकी हस्ती का तअल्लुक़ (संबंध) अपने बंदों और पूरी कायनात की तमाम चीज़ों से किस तरह है।

 

यह सवाल—"अल्लाह और इंसान या फिर अल्लाह और यूनिवर्स का रिश्ता क्या है?"—उस ज़माने में भी फिलॉसफी और थियोलॉजी का एक अहम मसला था। 

लोग अपनी सीमित अक़्ल और सोच से इसका जवाब ढूँढने की कोशिश करते रहे, लेकिन वे सच्चाई तक नहीं पहुँच सके।


फिर जब क़ुरआन आया, तो उसने इस उलझन को साफ़ कर दिया। उसकी हिदायत में जो सबसे नुमाया चीज़ महसूस की जा रही है वो ये कि अल्लाह की हस्ती और दूसरी मौजूदात (पूरे यूनिवर्स की तमाम चीज़ों) के दरमियान जो संबंध है उसको भी अल्लाह ख़ुद बता रहा है, इसे ख़ुदा ने अपनी किताब में इतनी वाजेह (स्पष्ट) सूरत में बता दिया है कि जो कोई सच में जानना चाहे, वह इसे आसानी से जान सकता है।

 


क़ुरआन: सोच की इस्लाह का ज़रिया


हम इंसान अक्सर फ़िलॉसफ़ी और थियोलॉजी की उलझनों में फँस जाते हैं। अलग-अलग व्याख्याएँ और तसरीहात (interpretations) हमें रास्ता दिखाने के बजाय और उलझा देती हैं। लेकिन क़ुरआन इंसान की सोच को सुधारता है और यह सिखाता है कि अगर तुम सच में समझना चाहते हो, तो यह जानने की कोशिश करो कि अल्लाह ख़ुद कैसे समझाना चाहता है।

जब तुम इस तरह अल्लाह के कलाम (क़ुरआन) को समझने की कोशिश करोगे तो अल्लाह को बोलता हुआ पाओगे, अल्लाह को ख़ुद अपना परिचय कराता हुआ पाओगे, वह ये बता रहा होगा कि देखो मेरा तअल्लुक़ मौजूदात (पूरे यूनिवर्स की सभी चीज़ों) के साथ क्या है।

 

यही मामला इंसान की हिदायत (मार्गदर्शन) का भी है।

 

इंसान की हक़ीक़त (असलियत) क्या है और वो कौन सा रवैय्या है जो इंसान की कामयाबी का ज़ामिन (guarantor) है, यह हमेशा से एक अहम सवाल रहा है।


इंसान का वजूद बहुत पेचीदा है— जिसमें मिट्टी का बना जिस्म है, सोचने वाला दिमाग़ है, नफ़्सियाती (psychological) उतार-चढ़ाव हैं और दिल में उठने वाले एहसास भी, सब शामिल हैं—
इन तमाम पहलुओं की वजह से वह ख़ुद अपने लिए सही रवैय्या तय करने में अक्सर असमंजस में खड़ा रहता है। वह समझ नहीं पाता कि कौन सा रास्ता सही है? कौन सा रवैय्या मुझे कामयाबी तक ले जाएगा और किस राह पर चलकर मैं नाकामयाबी से बच सकूँगा?

इसलिए इंसान को हमेशा एक ऐसी गाइडेंस की ज़रूरत महसूस होती है, जो उसके लिए सहारा बने, उसे सही राह दिखाए और उसकी ज़िंदगी को सँभाले। इसी गाइडेंस की रौशनी में वह अपने रवैय्ये और ज़िंदगी को ठीक कर ले. 

 

मौलाना, तज़कीर-उल-क़ुरआन में, अपने तज़कीर में बताते हैं कि इंसानी रवैये को सही करने और उसे कामयाबी की मंज़िल तक पहुँचाने वाली हस्ती वही हो सकती है, जो पूरी कायनात और उसके तमाम क़वानीन (laws) का गहरा इल्म रखती हो। ऐसी हस्ती ही इंसान को सही राह दिखा सकती है। लेकिन यह काम इंसान के बस का नहीं है कि वह पूरी कायनात के क़वानीन और उनकी बारीकियों को जान सके। इंसानी इतिहास में कोई भी ऐसी हस्ती नहीं हुई है जिसने यूनिवर्स के तमाम क़ायदे और क़वानीन (क़ानूनों) को पूरी तरह समझ लिया हो।


इंसान के लिए सही राह-ए-अमल (ज़िंदगी गुज़ारने का तरीक़ा) का निर्धारण वही कर सकता है जो इंसान को उसकी पैदाइश से लेकर मौत तक जानता हो—बल्कि जो यह भी जानता हो कि इंसान पैदाइश से पहले क्या था और मौत के बाद क्या होगा। यह इल्म, सिर्फ़ और सिर्फ़ अल्लाह के पास है [“वह्दहू ला शरीक"] जो अकेला है, जिसका कोई साझीदार (सहभागी) नहीं। वही है जिसने पूरी कायनात को बनाया, उसके तमाम क़ानून बनाए और उन्हें व्यवस्थित किया। वही कायनात के हर राज़ से पूरी तरह वाक़िफ़ है।   

इसीलिए उसने अपने बारे में फ़रमाया:

अल्लाह, उसके सिवा कोई माबूद नहीं, ज़िंदा और सबका थामने वाला। (क़ुरआन, 3: 2)

 

अल्लाहु ला इलाहा इल्ला हुवल हय्युल क़य्यूम” (क़ुरआन, 3: 2)

 

बेशक अल्लाह से कोई चीज़ छुपी हुई नहीं, न ज़मीन में और न आसमान में। 

(क़ुरआन, 3: 5)

 

इन्न-लल्लाह लायख़्फ़ा 'अलैहि शय'उं फिल-अर्दि वला फ़िस-समा”  (क़ुरआन, 3: 5)

 

अल्लाह पर भरोसा और उसकी हिदायत

इंसान के लिए हक़ीक़तपसंदीयानी सच्चाई को पहचानना और उसी के अनुसार चलना — इसी में है कि वह अपने सीमित दिमाग़ और तजुर्बे पर घमंड न करे, अपने दम पर रास्ता खोजने की कोशिश न करे, बल्कि अल्लाह पर भरोसा करे। क्योंकि सही राह दिखाने का काम इंसान की अक़्ल अकेले नहीं कर सकती। इंसान को अगर मंज़िल तक पहुँचना है, तो उसे अल्लाह की भेजी हुई हिदायत (क़ुरआन) को पूरे यक़ीन के साथ थाम लेना होगा।

 

अल्लाह ने इस हिदायत का ज़िक्र क़ुरआन की आयत में यूँ किया है:


उसने तुम पर किताब उतारी हक़ के साथ, सच्चा करने वाली उस चीज़ को जो उसके आगे है और उसने तौरात और इंजील उतारी, इससे पहले लोगों की हिदायत के लिए और अल्लाह ने फ़ुरक़ान उतारा। 

(क़ुरआन, आल-ए-इमरान 3: 3-4)

 

नज़्ज़ल 'अलैकल किताब बि-ल-हक़, मुसद्दिक़ल लिमा बैन यदयहि, वा अंज़लत-तौरात वल-इंजील मिन क़ब्लु हुदल-लिन्नासि वा अंज़लल फ़ुरक़ान”    

(आल-ए-इमरान 3:3-4

 

यानी, यह वही हिदायत का सिलसिला है जिसे अल्लाह तआला ने पहले तौरात और इंजील की सूरत में नाज़िल किया था और अब इंसानों के लिए फ़ुरक़ान (क़ुरआन) के रूप में उतारा। इस किताब में अल्लाह ने साफ़ कर दिया कि इंसान अपने दम पर सही राह नहीं खोज सकता। वह भटक जाएगा। सही रास्ता मैं बता रहा हूँ , क्योंकि मैं ही अलीम हूँ (सब कुछ जानने वाला),  मैं ही हर हाल से और हर बात से पूरी तरह वाक़िफ़ (ख़बीर) हूँ ।

बेशक अल्लाह से कोई चीज़ छुपी हुई नहीं, न ज़मीन में और न आसमान में।  

(क़ुरआन, आल-ए-इमरान 3: 5)

 

इन्न-लल्लाह लायख़्फ़ा 'अलैहि शय'उं फिल-अर्दि वला फ़िस-समा”

(क़ुरआन, आल-ए-इमरान 3: 5)

 

इसके बावजूद, जो लोग अल्लाह की आयतों का इंकार करते हैं उनके लिए सख़्त अज़ाब है, जैसा अल्लाह ने फ़रमाया: 

इन्नल-लज़ीना कफ़रू बि-आयातिल्लाहि लहुम अज़ाबुन शदीद, वल्लाहु अज़ीज़ुन जुंतिक़ाम”


"बेशक जिन लोगों ने अल्लाह की निशानियों का इंकार किया उनके लिए सख़्त अज़ाब है और अल्लाह ज़बरदस्त है, बदला लेने वाला है।" 

(क़ुरआन, 3: 4)

 Note: ये क़ुरआन मुताल'अ के मीटिंग में एक दा'ई के बयान का सारांश है.



 

तज़्कीरुल-क़ुरआन : तज़्कीर | 3 : 1 – 6

 

कायनात का ख़ालिक़ व मालिक कोई मशीनी ख़ुदा नहीं बल्कि एक ज़िंदा और बाशुऊर ख़ुदा है। उसने हर ज़माने में इंसान के लिए रहनुमाई भेजी । इन्हीं में से वे किताबें थीं जो तौरात व इंजील की सूरत में पिछले नबियों पर उतारी गईं। मगर इंसान हमेशा यह करता रहा कि उसने अपनी तावील व तशरीह से ख़ुदा की तालीमात को तरह-तरह के मअना पहनाए और ख़ुदा के एक दीन को कई दीन बना डाला। आख़िर अल्लाह ने अपने तैशुदा मंसूबे के मुताबिक़ आख़िरी किताब (क़ुरआन) उतारी जो इंसानों के लिए सही हिदायतनामा भी है और इसी के साथ वह कसौटी भी जिससे हक़ और बातिल के दर्मियान फ़ैसला किया जा सके।

 

क़ुरआन बताता है कि अल्लाह का सच्चा दीन क्या है और वह दीन कौन-सा है जो लोगों ने अपनी ख़ुद की गढ़ी हुई तशरीहात (व्याख्याओं) के ज़रिए बना रखा है। अब जो लोग ख़ुदा की किताब को न मानें या अपनी राए और ताबीरों के तहत गढ़े हुए दीन को न छोड़े वे सख़्त सज़ा के मुस्तहिक़ हैं। ये वे लोग हैं जिन्हें ख़ुदा ने आंख दी मगर रोशनी आ जाने के बावजूद उन्होंने नहीं देखा। जिन्हें ख़ुदा ने अक़्ल दी मगर दलील आ जाने के बाद भी उन्होंने न समझा। अपनी झूठी बड़ाई की ख़ातिर वे हक़ के आगे झुकने पर तैयार न हुए। 


अल्लाह अपनी ज़ात व सिफ़ात के एतबार से कैसा है, इसका हक़ीक़ी तआरुफ़ ख़ुद वही करा सकता है। उसकी हस्ती का दूसरी मौजूदात से क्या तअल्लुक़ है, इसे भी वह ख़ुद ही सही तौर पर बता सकता है। ख़ुदा ने अपनी किताब में इसे इतनी वाज़ेह सूरत में बता दिया है कि जो शख़्स जानना चाहे वह ज़रूर जान लेगा। 

यही मुआमला इंसान के लिए हिदायतनामा मुक़र्रर करने का है। 

इंसान की हक़ीक़त क्या है और वह कौन-सा रवैया है जो इंसान की कामयाबी का ज़ामिन है, इसे बताने के लिए पूरी कायनात का इल्म दरकार है। 

इंसान के लिए सही रवैया वही हो सकता है जो बाक़ी कायनात से हमआहंग (अंतरंग) हो और दुनिया के वसीअतर (व्यापक) निज़ाम से पूरी तरह मुताबिक़त रखता हो। इंसान के लिए सही राहेअमल का निर्धारण वही कर सकता है जो न सिर्फ़ इंसान को जन्म से मौत तक जानता हो बल्कि उसे यह भी मालूम हो कि जन्म से पहले क्या है और मौत के बाद क्या। ऐसी हस्ती ख़ुदा के सिवा कोई दूसरी नहीं हो सकती। 

इंसान के लिए हक़ीक़तपसंदी यह है कि इस मुआमले में वह ख़ुदा पर भरोसा करे और उसकी तरफ़ से आई हुई हिदायत को पूरे यक़ीन के साथ पकड़ ले ।

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