क़ुरआन की आयात पर ग़ौर-ओ-फ़िक्र
सूरह: आल-ए-इमरान || 23 – 27
[3: 23]: क्या तुमने उन लोगों को नहीं
देखा जिन्हें अल्लाह की किताब का एक हिस्सा दिया गया था। उन्हें अल्लाह की किताब
की तरफ़ बुलाया जा रहा है कि वह उनके दर्मियान फ़ैसला करे। फिर उनका एक गिरोह मुंह
फेर लेता है बेरुख़ी करते हुए।
[3: 24]: यह इस सबब से कि वे लोग कहते हैं
कि हमें हरगिज़ आग न छुऐगी सिवाए गिने हुए कुछ दिनों के । और उनकी बनाई हुई बातों
ने उन्हें उनके दीन के बारे में धोखे में डाल दिया है।
[3: 25]: फिर उस वक़्त क्या होगा जब हम
उन्हें जमा करेंगे एक दिन जिसके आने में कोई शक नहीं। और हर शख़्स को जो कुछ उसने
किया है, उसका पूरा-पूरा बदला दिया जाएगा और उन पर ज़ुल्म न
किया जाएगा।
[3: 26]: तुम कहो, ऐ
अल्लाह, सल्तनत के मालिक तू जिसे चाहे सल्तनत दे और जिससे
चाहे सल्तनत छीन ले। और तू जिसे चाहे इज़्ज़त दे और जिसे चाहे ज़लील करे। तेरे हाथ
में है सब ख़ूबी। बेशक तू हर चीज़ पर क़ादिर है।
[3: 27]: तू रात को दिन में दाख़िल करता है
और दिन को रात में दाख़िल करता है। और तू बेजान से जानदार को निकालता है और तू
जानदार से बेजान को निकालता है। और तू जिसे चाहता है बेहिसाब रिज़्क़ देता है।
आज की आयत
से जो पहली बात समझ में आती है, वह ये है कि कुछ लोग जो आख़िरत (परलोक) को नहीं
मानते वे अक्सर अल्लाह और अल्लाह की किताब पर भी ईमान नहीं रखते या अगर अल्लाह को
मानते भी हैं, तो आख़िरत का इनकार करते हैं।
लेकिन यहाँ उन लोगों की बातें हो रही है जो अल्लाह को मानते हैं और आख़िरत पर भी ईमान रखते हैं, लेकिन उन लोगों ने आख़िरत के बारे में अपना एक बयानिया (Narrative) तैयार कर लिया है और वो बयानिया उनके अक़ायद (आस्था) का हिस्सा बन गई है।
उस बयानिया के मुताबिक अगर वो
आख़िरत में पकड़े भी गए, तो थोड़े दिनों के लिए आग में रहेंगे
और फिर बाहर निकाल लिए जाएंगे।
इंसानों या
किसी भी जमात की ये सोच अहले-किताब (किताब वालों) से जुड़ी
हुई है लेकिन अब हमलोग भी अहले-किताब हैं इसलिए ये रिफरेन्स हमलोगों पर भी लागू
होती है।
अब हमारे
अंदर भी ये सोच पैदा हो गई है कि हमलोग ज़्यादा दिनों तक जहन्नम में नहीं डाले
जाएंगे और जल्दी ही बाहर निकाल लिए जाएंगे।
जब मैं इस ज़ाविये (angle) से ग़ौर कर रहा था कि ऐसा क्यों हुआ ? तो मुझे अल्लाह की इस आयत के बारे में एक बात खुली जिसमें अल्लाह तआला फ़रमाँ रहे हैं –
[3:
24]: ....और उनकी बनाई हुई बातों ने उन्हें
उनके दीन के बारे में धोखे में डाल दिया है।
यहाँ ये बात समझ में आई कि दीन में दो हिस्से हो जाते हैं।
पहला हिस्सा
— मतन, यानी किताब का असली मूल लेख। यह वह चीज़ है जो सीधे अल्लाह की तरफ़ से आई
है और हमेशा सच्ची और सही रहती है।
दूसरा हिस्सा — मतन (किताब का मूल लेख) की समझ से बनने वाली बयानिया (Narratives)।
यानी जब इंसान किताब को पढ़ता है और अपनी समझ से उसे समझने की कोशिश करता है, तो इससे जो बातें सामने आती हैं, वे केवल बयानिया होती हैं।
ये बयानिया कभी सही, कभी ग़लत हो सकती हैं। यानी इनमें ग़लती का इम्कान होता है। इसलिए ये दीन
का असली हिस्सा नहीं बन सकतीं, लेकिन मतन में ग़लत होने की
कोई संभावना नहीं होती, वो हमेशा सच्ची और सही रहती है।
यहाँ एक
बहुत ही इम्पोर्टेन्ट बात है जिसे हमें समझने की ज़रूरत है। वो ये कि बाद के ज़माने
में अहले-किताब के किसी जमात द्वारा बयानिया (Narrative) को ही दीन
का हिस्सा या अक़ीदा समझ लिया जाता है और नतीजा ये होता है कि ये लोग “दीन के बारे
में धोखे का” शिकार हो जाते हैं।
लेकिन जो
लोग किताब के मतन से वाक़िफ़ (परिचित) होते हैं, यानी जो सीधे मूल लेख को पढ़ने और
समझने वाले लोग होते हैं, जब उनके सामने किताब का मतन आता है,
तो वे फ़ौरन पहचान लेते हैं कि यह असली मतन है, ये अल्लाह की तरफ़ से भेजी हुई
किताब है या वो किताब का मतन है। वे उसकी तस्दीक़ करने लगते है।
कुछ लोग यह
सोचते हैं कि अल्लाह तआला के हुक्म पर अमल करने के बाद, वह उन्हें क़ियामत के दिन जन्नत में भेजने के लिए मजबूर है, भले ही उनके कुछ काम ग़लत हों। उनका मानना है कि अगर सज़ा मिली भी, तब भी वह उन्हें कुछ ही दिनों के लिए जहन्नम में डालेगा, उसके बाद फिर जन्नत में भेज देगा.
ऐसी सोच का कारण यह है कि ऐसे लोगों ने अल्लाह की अज़मत और उसकी क़ुदरत (महानता और शक्ति) को सही से समझा नहीं है. इसलिए वे अपने बनाए हुए बयानिया (Narrative) के बुनियाद पर ख़ुद ही अल्लाह के फ़ैसले की कल्पना करना शुरू कर देते हैं कि अल्लाह कैसा फ़ैसला करेगा।
ये एक खतरनाक
मानसिक बीमारी की तरह है जो इंसानों के मन में धीरे-धीरे घर कर जाती है।
क़ुरआन की इस आयत में इसी तरफ़ रहनुमाई की जा रही है और समझाया जा रहा है कि सोचने का ये अंदाज़ बदल लिया जाए। अगर तुमने इस तरह सोचने का अंदाज़ नहीं बदला तो तुम धोखे में पड़ जाओगे और पकड़े जाओगे।
क़ुरआन में
अल्लाह तआला हमें इस ग़लत सोच से निजात दिलाने के लिए बहुत ही बेहतरीन अंदाज़ में
हिदायत दे रहे हैं।
जब हालात ऐसे हो जाएँ कि लोग मतन (किताब का मूल लेख) के हवाले से अपनी बनाई हुई बातें (बयानिया) गढ़ लें, और धीरे-धीरे वही बयानियाँ उनकी सोच पर हावी हो जाएँ, और फिर वे ऐसी सोच में मुब्तला हो जाए कि उनकी नज़र में अल्लाह की अज़मत और जलाल, और उसकी किब्रियाई (महानता,बड़ाई), उसका क़ादिर-ए-मुतलक़ होना (हर काम पर क़ुदरत रखने वाला होना) गोया कि बिलकुल छोटी दिखने लगे, उसे लगने लगे जैसे अल्लाह की शक्ति सीमित है।
उस वक़्त
फ़ौरन तौबा करने और अल्लाह तआला के इस गाइडेंस के तहत सोच बदलने की ज़रूरत है।
ऐ अल्लाह, सल्तनत के मालिक तू जिसे चाहे सल्तनत दे और जिससे चाहे सल्तनत छीन ले। और
तू जिसे चाहे इज़्ज़त दे और जिसे चाहे ज़लील करे। तेरे हाथ में है सब ख़ूबी । बेशक तू
हर चीज़ पर क़ादिर है।
[आल-ए-इमरान, 3: 26]
ये एक अहम
हिदायत है कि हमें अपनी सोच को हमेशा अल्लाह की अज़मत (महानता) और शक्ति
पर केंद्रित रखना चाहिए और अपने आपको इस ग़लतफ़हमी से बचाना चाहिए कि हम अपने दिमाग़
या कामों से अल्लाह की योजना और उसके फ़ैसलों को बदल सकते हैं।
क़ुरआन की इन आयात से मेरा दूसरा सबक़ (take away) ये है:
हमलोग आम तौर पर ज़िंदगी के वाक़ियात को बायनरी (binary) यानी दो extremities के नुक़्ता-ए-नज़र से देखते हैं,
यानी जब किसी शख़्स के पास ताक़त, दौलत या सेहत होती है तो उसे हम अल्लाह की तरफ़ से इनाम समझते हैं, और जब ये चीज़ें छीन ली जाती हैं तो उसे अल्लाह की तरफ़ से अज़ाब या सज़ा
समझ लिया जाता है।
अल्लाह की तरफ़ से मुल्क का अता करना या इक़्तिदार का मिलना इज़्ज़त की अलामत समझ लेते है और मुल्क का छिन जाना बेइज़्ज़ती की अलामत।
इसी तरह, पैसा होना, सेहतमंद होना अच्छा समझा
जाता है और इसका न होना सज़ा के तौर पर देखा जाता है।
इंसानी समाज
हमेशा इसी बाइनरी सोच में फंसा रहता है।
लेकिन इन आयात को पढ़ते वक़्त मुझे एक बात समझ में आई जिसमें अल्लाह तआला फ़रमा रहे हैं -
bi-ya-di-kal-Khayr [3: 26]
अल्लाह के
हाथ में है तमाम भलाई
इसका मतलब
यह है कि अल्लाह जो कुछ कर रहा है, चाहे वो हमें अच्छा लगे या बुरा,
दरअसल उसके पीछे कोई न कोई भलाई (ख़ैर) ज़रूर छुपी
है।
ख़ुलासा ये
है कि हमें वाक़ियात को दो extremities के नुक़्ता-ए-नज़र से नहीं देखना
चाहिए, बल्कि ये समझना चाहिए कि अल्लाह की हर कार्रवाई में
कोई न कोई भलाई ज़रूर छुपी होती है।
अगर इस आयत
को इस तरह समझ लिया जाए तो हमारी सोच और नुक़्ता-ए-नज़र में एक बड़ी तबदीली आ सकती
है।
जब हम ये मान लेते हैं कि हमारे साथ जो कुछ हो रहा है, चाहे वह मिलने का मामला हो या खोने का, वह सब अल्लाह की तरफ़ से है और सबमें उसकी कोई हिकमत और भलाई मौजूद है, तो हम मायूसी से बच जाते हैं और हमारे अन्दर एक सकारात्मक सोच आ जाती है, क्योंकि इस आयत से हमें पता होता है कि हर हाल में अल्लाह की भलाई (ख़ैर) इसमें मौजूद है।
और जब हम
दुनिया के मामलात में इस हक़ीक़त को समझ लेंगे, तो आख़िरत के मामले में भी हम अल्लाह
की अज़मत और उसकी बड़ाई को और ज़्यादा गहराई से देखने वाले बन जाएँगे। इससे हम
अपने मन के बने-बनाए बयानिये (Narratives) पर धोखा खाने की ग़लती से बच जाएंगे।
Note: क़ुरआन मुताला पर एक दा’ई के बयान का सारांश।
अल्लाह की
हिदायत एक ही हिदायत है जो विभिन्न क़ौमों की भाषा में उनके पैग़म्बरों पर उतारी
जाती रही है। वही क़ुरआन के रूप में मुहम्मद (सल्ल०) पर उतारी
गई है।
इस एकरूपता की वजह से आसमानी किताबों को जानने और मानने वालों के लिए कुरआन की दावत को पहचानना मुश्किल नहीं।
क़ुरआन की
दावत और पिछली आसमानी तालीमात में अगर कुछ फ़र्क़ है तो सिर्फ़ यह कि क़ुरआन की
दावत उनकी अपनी मिलावटों से दीन को पाक कर रही है । इसके बावजूद क्यों ऐसा है कि
बहुत से लोग क़ुरआन की दावत का इंकार कर रहे हैं ।
इसकी वजह यह
है कि क़ुरआन की दावत को वे अपने लिए कोई संजीदा मुआमला नहीं समझते। अपने
स्वनिर्मित अक़ीदों (आस्था, विश्वास) की बुनियाद
पर उन्होंने अपने को जहन्नम की आग से महफ़ूज़ मान लिया है। अपनी इस नफ़्सियात के
तहत वे समझते हैं कि अगर वे इस हक़ को न स्वीकारें तो इससे उनकी नजात (मुक्ति) ख़तरे में
पड़ने वाली नहीं।
मगर जब
ख़ुदा के इंसाफ़ का तराज़ू खड़ा होगा उस वक़्त उन्हें मालूम होगा कि वे महज़
ख़ुशख़्यालियों के अंधेरे में पड़े हुए थे ।
हर क़िस्म की
इज़्ज़त व ताक़त अल्लाह के इख़्तियार में है । वक़्त के बड़े जिसे बेहक़ीक़त समझ लें, ख़ुदा चाहे तो उसी के हक़ में इज़्ज़त व सरबुलंदी का फ़ैसला कर दे। इल्म
की गद्दियों पर बैठने वाले जिसके बारे में जहल (अज्ञान) का फ़तवा
दें, ख़ुदा चाहे तो उसी के ज़रिए इल्म का चश्मा (स्रोत) जारी कर
दे।
ख़ुदा की नज़र में अगर कोई इज़्ज़त व ताक़त का मुस्तहिक़ हो सकता है तो वह जो इसे ख़ालिस ख़ुदा की चीज़ समझे और ख़ुदा की नज़र में इसका सबसे ज़्यादा ग़ैर-मुस्तहिक अगर कोई है तो वह जो इसे अपनी ज़ाती मिल्कियत समझता हो ।
ख़ुदा
वसीअतर कायनात में रोज़ाना बहुत बड़े पैमाने पर यह करिश्मा दिखा रहा है कि वह
तारीकी (अंधकार) को रोशनी के ऊपर ओढ़ा देता है और रोशनी को तारीकी के
ऊपर डाल देता है।
वह मुर्दा
अनासिर (तत्वों) से ज़िंदगी वजूद में लाता है और ज़िंदा चीज़ों को
मुर्दा अनासिर में तब्दील करता है। ख़ुदा की यही क़ुदरत अगर इतिहास में ज़ाहिर हो
तो इसमें तअज्जुब की क्या बात है।
जो लोग हक़
के नाम पर नाहक़ का कारोबार कर रहे हों वे हमेशा सच्ची हक़ की दावत के मुख़ालिफ़ हो
जाते हैं। ऐसे दाअी को बेघर किया जाता है। उसके आर्थिक साधन बर्बाद किए जाते हैं।
मगर ऐसा शख़्स प्रत्यक्ष रूप से अल्लाह की सरपरस्ती में होता है। वह उसके लिए ख़ुसूसी रिज़्क़ का इंतज़ाम करता है। दूसरों को उनकी मआशी (आर्थिक) मेहनत के हिसाब से रिज़्क़ दिया जाता है और ऐसे शख़्स को बेहिसाब।
