मांग की राजनीति के नुक़सान

 


AL-RISALA (Urdu) | March-2011



पिछले सौ सालों के दौरान मुसलमानों ने अलग-अलग देशों में कई राजनीतिक आंदोलन चलाए।


इन तमाम तहरीकों को अगर एक नाम देना होतो वह होगा— 

मांग-आधारित राजनीति, 


यानी अपना हक़ हासिल करने के लिए मांग और विरोध-प्रदर्शन की बुनियाद पर जन-आंदोलन चलानाचाहे वह शांतिपूर्ण हो या हिंसा पर आधारित।

 

इन मांग-आधारित आंदोलनों से मौजूदा ज़माने के मुसलमानों को कोई सकारात्मक फ़ायदा नहीं हुआ। बल्किइसके नतीजे में उन्हें ऐसे नुक़सान उठाने पड़ेजिनकी भरपाई बज़ाहिर (दिखने में) नामुमकिन लगती है।


 

मांग-आधारित राजनीति का फ़ितरत के क़ानून से टकराव 


मांग और विरोध पर आधारित राजनीति फ़ितरत (नेचर) के क़ानून के ख़िलाफ़ है।


क़ुदरत के नियम के मुताबिकइस दुनिया में किसी भी शख़्स या क़ौम को जो कुछ मिलता हैवह सिर्फ़ इस्तेहक़ाक़ (योग्य होने) की बुनियाद पर मिलता है।


सिर्फ़ माँग करनेशिकायत करने या विरोध जताने जैसी तहरीकों के ज़रिए इस दुनिया में किसी को कुछ हासिल नहीं हो सकता। ऐसी तहरीकें सिर्फ़ अपने नुक़सान को बढ़ाने के बराबर होती हैंन कि नुक़सान को दूर करने के।


 

दूसरा बड़ा नुकसान


दूसरा और इससे भी बड़ा नुकसान यह है कि मांग आधारित राजनीति (सियासत) ने मौजूदा ज़माने के मुसलमानों को एक अज़ीम नेमत (वरदान) से महरूम कर दिया है। 


यह नेमत दुआ है— यानी सच्चे दिल, गहरी अंदरूनी तड़प और पूरे धैर्य और लगन के साथ अल्लाह से लगातार मांगना। 


मांग आधारित राजनीति इस क़िस्म की दुआ के लिए एक क़ातिल की हैसियत रखती है।



क़ुरआन में है: "अल्लाह ने किसी के सीने में दो दिल नहीं बनाए" (33:4)। यानी इंसान एक ही वक़्त में दो अलग-अलग रास्तों पर पूरे दिल से नहीं चल सकता। 


जब आप इंसानों को निशाना बनाकर उनके ख़िलाफ़ मांग की तहरीक चलाते हैंतो स्वाभाविक (फ़ितरी) रूप से यह होता है कि आपके अंदर अल्लाह से मांगने की स्परिट (असली भावना) पैदा नहीं होती।


नतीजा यह होता है कि ऐसे इंसानों के पास अल्लाह से मांगने के लिए सिर्फ़ रटे हुए अल्फ़ाज़ (शब्द) बाक़ी रहते हैंऔर रटे हुए अल्फ़ाज़ का नाम दुआ नहीं। 

  

दुआ की असल रूह (spirit) यह है कि इंसान अल्लाह को दाता (giver) की हैसियत से दरयाफ़त करे और पहचाने और फिर दिल की गहराइयों से उसके सामने सच्चा तलबगार (मांगने वाला) बन जाए। 


लेकिन अफ़सोसआज के मुसलमान इस क़िस्म की सच्ची दुआ से महरूम हैं। और इसकी सबसे बड़ी वजह यही मांग की राजनीति है।






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