AL-RISALA (Urdu) | JUL-2011
अगर
मौजूदा दौर के मुसलमानों के केस को एक लफ़्ज़ में बताना हो, तो वह
लफ़्ज़ शायद इस्लामी रूमानियत (Islamic Romanticism) होगा।
आज के
ज़्यादातर मुसलमान इसी इस्लामी रूमानियत के दायरे में जी रहे हैं।
वे
पुराने दौर की मुस्लिम हस्तियों की कहानियों, करामातों
और चमत्कारों के क़िस्सों, जिहाद के वाक़ियात, और एक
काल्पनिक मेयारी निज़ाम (Ideal System) की कल्पनाओं में खोए हुए हैं।
यही
बातें मौजूदा दौर के मुसलमानों की सोच और ज़हनियत को तय कर रही हैं। उनकी हर
महफ़िल में इस तरह की बातों की चर्चा होती है। हर मुसलमान यह ख़्वाब देखता है कि
बीते हुए गौरवशाली राजनीतिक दौर को कैसे दुबारा वापस लाया जाए।
राजनीतिक रूमानियत की तबाही
इस इस्लामी रूमानियत की सबसे ज़्यादा विनाशकारी मिसाल राजनीतिक रूमानियत है।
मौजूदा
ज़माने के मुस्लिम रहनुमाओं ने बहुत सी राजनीतिक लड़ाइयाँ छेड़ीं। ये लड़ाइयाँ
अलग-अलग देशों में वहाँ की हुकूमत के ख़िलाफ़ लड़ी गईं। इन लड़ाइयों के दौरान
मुसलमानों के बीच अजीबोगरीब क़िस्म की रहस्यमयी कहानियाँ फैलाई जाती रहीं। हर लड़ाई
में किसी न किसी चमत्कारिक फ़तह की दास्तानें फैलाई जाती रहीं, मगर
आख़िर में मालूम हुआ कि हर लड़ाई एकतरफ़ा तौर पर सिर्फ़ मुसलमानों की तबाही पर ख़त्म
होने वाली थी।
इस्लामी रूमानियत का सिलसिला आज भी जारी
यह
इस्लामी रूमानियत आज भी अलग-अलग शक्लों में जारी है, चाहे
वह मुसलमानों की बहुसंख्यक आबादी वाले देशों में हो या उन मुल्कों में, जहाँ
मुसलमान अल्पसंख्यक हैं। इसी रूमानियत को क़ुरआन में अमानी (2:78) कहा
गया है, यानी
ख़ुशफ़हमियाँ (wishful
thinking)।
ख़ुशफ़हमियों का अंजाम
मौजूदा
ज़माने के लगभग तमाम मुसलमानों का ये हाल है कि वे किसी न किसी क़िस्म की ख़ुशफ़हमी में डूबे हुए हैं। इस ख़ुशफ़हमी
भरे मिज़ाज का नतीजा यह हुआ है कि उनके अंदर हक़ीक़त-पसंदाना सोच (सच्चाई को मानने
वाली सोच) ख़त्म
हो गई है।
वे कल्पनाओं (assumptions) में जीते हैं, और कल्पनाओं की दुनिया में अपनी ख़याली दुनिया (imaginary world) बनाते रहते हैं, वे अंधविश्वासी मान्यताओं (superstitious beliefs) को अपना सहारा बनाए हुए हैं।
यह ग़ैर-हक़ीक़त-पसंदाना
मिज़ाज (सच्चाई से मुँह मोड़ने वाला रवैया) दुनिया के लिहाज़ से भी विनाशकारी है और आख़िरत
(परलोक) के लिहाज़ से भी।
Source : AL-RISALA (Urdu) | JUL-2011
