AL-RISALA (Urdu) | July-2011
मौजूदा
दौर के मुस्लिम रहनुमा हर जगह सियासत के हंगामे बरपा किए हुए हैं। जहाँ भी कुछ
मुसलमान मौजूद हैं, वहाँ
इसकी मिसाल देखी जा सकती है। लेकिन ये तमाम सियासी हंगामे पूरी तरह से बेनतीजा
साबित हो रहे हैं। इसका साझा कारण यह है कि ये सभी मुस्लिम रहनुमा नामुमकिन की
सियासत चला रहे हैं, यानी
एक ऐसी चीज़ के नाम पर सियासत जो सिरे से हासिल ही नहीं की जा सकतीं। ऐसी सियासत का
नतीजा बस यही हो सकता है कि वह अमलन बे-नतीजा हो कर रह जाये।
मौजूदा
ज़माने में इस क़िस्म की सियासत हर मुस्लिम इलाक़े में देखी जा सकती है। मिसाल के
तौर पर:
• फ़िलिस्तीन
पर यहूदी कब्ज़े को ख़त्म करो और वहाँ फिर से अरब हुकूमत क़ायम करो।
• कश्मीर
में यह राजनीति कि वहां से भारत का दबदबा ख़त्म किया जाए और कश्मीर को पाकिस्तान
का हिस्सा क़रार दिया जाये।
• शिनजियांग (चीन) और फिलीपींस जैसे इलाक़ों में यह मांग कि वहाँ दुबारा मुस्लिम शासन क़ायम करो, जैसा कि पहले वहां क़ायम था।
इस
तरह की हर सियासत नामुमकिन की सियासत है। इसका कोई सकारात्मक नतीजा हरगिज़ नहीं
निकल सकता।
नामुमकिन की सियासत के नुकसान
इस
तरह की सियासत का एकमात्र अंजाम ये है कि जो कुछ पहले से हासिल है,
वह भी छिन जाये, और नया कुछ भी हासिल न हो। नामुमकिन की सियासत अक़्ल के
ख़िलाफ़ भी है और इस्लाम के ख़िलाफ़ भी।
सियासत में अक़्ल और इस्लाम की राह
सियासत
के मुआमले में अक़्ल और इस्लाम, दोनों का तकाज़ा सिर्फ़ एक है, वो ये कि इसे नतीजाख़ेज़ होनी चाहिए। जहाँ सकारात्मक नतीजा
मिलने की उम्मीद न हो, वहां
मिले हुए पर क़नाअत (संतोष) करना है, न कि न मिले हुए के लिए लड़ाई छेड़ना।
हक़ीक़त
नामुमकिन
की सियासत हमेशा सिर्फ़ लीडरों के लिए फ़ायदेमंद होती है। यह आम जनता के लिए कभी
फ़ायदेमंद नहीं होती। नामुमकिन की सियासत दरअसल लीडरों के लिए शोषण (exploitation)
की सियासत है और आम जनता के लिए सिर्फ़ नादानी की सियासत।
नामुमकिन
की सियासत के लिए कम से कम जो लफ़्ज़ इस्तेमाल किया जा सकता है,
वह ‘ख़ुदकुशी की सियासत’। ख़ुदकुशी से कम
कोई लफ़्ज़ इस तबाहकुन सियासत को बयान करने के लिए काफ़ी नहीं। मज़ीद ये कि नामुमकिन
की सियासत सिर्फ़ एक फ़र्द की ख़ुदकुशी नहीं है, बल्कि यह पूरी क़ौम की ख़ुदकुशी है।
