भौगोलिक इत्तेफ़ाक़ या ख़ुदाई फ़ैसला

 


भौगोलिक इत्तेफ़ाक़ या 

ख़ुदाई फ़ैसला  


Source : AL-RISALA (Urdu) | MAY-2011


हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) के ज़माने में बनी इस्राइल मिस्र में आबाद थे। वे साल 1447 ईसा पूर्व में हज़रत मूसा की अगुवाई में मिस्र से निकले और सीनाई के रेगिस्तान (Sinai) में पहुँचकर वहाँ बस गए। उस वक़्त उनकी कुल आबादी लगभग 20 लाख थी। उस दौर में वहाँ रेगिस्तान और पहाड़ों के सिवा कुछ भी नहीं था।

अल्लाह तआला ने बनी इस्राइल की रोज़ी-रोटी का एक ख़ास इंतिज़ाम किया, जिसे "मन्न और सलवा" (सूरह अल-बक़रह, आयत 57) कहा जाता है। 

बनी इस्राइल से यह कहा गया था कि वे रोज़ी-रोटी के इस खास इंतज़ाम पर अल्लाह का शुक्र अदा करें और अपने आप को पूरी तरह दीन की ख़िदमत में लगा दें।

  

अल्लाह का यही ख़ास इंतिज़ाम मौजूदा ज़माने में बनू-इस्माईल (उम्मत-ए-मुहम्मदी) के लिए एक नए रूप में किया गया है। 

अरब दुनिया, जिसे मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) कहा जाता है, उसकी ज़मीन के नीचे दुनिया के करीब 80 प्रतिशत तेल के भंडार मौजूद हैं। 

यह कोई साधारण बात नहीं 

विशेषज्ञ (माहिरीन) इसे "भौगोलिक इत्तेफ़ाक़" (Geographical Accident) कहते हैं, यानी ज़मीन की बनावट का एक इत्तेफ़ाक़। लेकिन असल में यह कोई भौगोलिक इत्तेफ़ाक़ नहीं है, बल्कि अल्लाह के तय किए हुए फ़ैसले का नतीजा है।

 

यह ख़ुदाई इंतिज़ाम इसलिए किया गया है ताकि औद्योगिक (industrial) युग में उम्मत-ए-मुहम्मदी रोज़ी-रोटी और आर्थिक चिंताओं से बेफ़िक्र होकर अपने दीनी रोल को अदा कर सके। 

इस दीनी रोल के दो पहलू हैं — 

एक है दीन की हिफ़ाज़त, और दूसरा है दावत-इल-अल्लाह, यानी लोगों तक अल्लाह का पैग़ाम पंहुचाने का काम लगातार जारी रखना। असल में उम्मते-मुहम्मदी को तेल की ये दौलत दीन की हिफ़ाज़त और दावत-इल-अल्लाह के इसी काम के लिए दी गई है।    

 

इस मामले में उम्मते-मुहम्मदी से जो चाहा गया है, वह यह है कि वह अपनी ज़ात के लिए उस दौलत में से सिर्फ़ ज़रूरत के बक़द्र लें और बाक़ी सारी दौलत दीन की हिफ़ाज़त और दावत-इल-अल्लाह के काम में इस्तेमाल करें। 

"मन्न और सलवा" के ख़ुदाई इंतिज़ाम के ज़रीये उम्मत-ए-मूसा से जो काम चाहा गया था, वही काम अब तेल के इंतिज़ाम के ज़रीये उम्मत-ए-मुहम्मदी से चाहा गया है।

हालाँकि दोनों इंतिज़ाम ज़ाहिरी तौर पर अलग दिखाई देते हैं, लेकिन ज़िम्मेदारी के लिहाज़ से दोनों में कोई फ़र्क़ नहीं।



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