क़ुरआन की आयात पर ग़ौर-ओ-फ़िक्र
सूरह: आल-ए-इमरान || 81– 91
[3: 81]:
और
जब अल्लाह ने पैग़म्बरों का अहद लिया कि जो कुछ मैंने तुम्हें किताब और हिक्मत दी, फिर
तुम्हारे पास पैग़म्बर आए जो सच्चा साबित करे उन पेशेनगोइयों (भविष्यवाणियों) को जो तुम्हारे पास हैं तो तुम उस पर ईमान लाओगे और
उसकी मदद करोगे। अल्लाह ने कहा क्या तुमने इक़रार किया और उस पर मेरा अहद क़ुबूल
किया। उन्होंने कहा हम इक़रार करते हैं। फ़रमाया अब गवाह रहो और मैं भी तुम्हारे साथ
गवाह हूं।
[3: 82]: पस जो शख़्स फिर जाए तो ऐसे ही लोग नाफ़रमान हैं।
[3: 83]: क्या ये लोग अल्लाह के दीन के सिवा कोई और दीन चाहते
हैं। हालांकि उसी के हुक्म में है जो कोई आसमान और ज़मीन में है, ख़ुशी
से या नाख़ुशी से और सब उसी की तरफ़ लौटाए जाऐंगे।
[3: 84]: कहो हम अल्लाह पर ईमान लाए और उस पर जो हमारे ऊपर उतारा
गया है और जो उतारा गया इब्राहीम पर इस्माईल पर इस्हाक़ पर और याक़ूब पर और याक़ूब की
औलाद पर। और जो दिया गया मूसा और ईसा और दूसरे नबियों को उनके रब की तरफ़ से। हम
इनके दर्मियान फ़र्क़ नहीं करते। और हम उसी के फ़रमांबरदार हैं।
[3: 85]: और जो शख़्स इस्लाम के सिवा किसी दूसरे दीन को चाहेगा तो
वह उससे हरगिज़ क़ुबूल नहीं किया जाएगा और वह आख़िरत में नामुरादों में से होगा।
[3: 86]: अल्लाह क्योंकर ऐसे लोगों को हिदायत देगा जो ईमान लोने
के बाद मुंकिर हो गए। हालांकि वे गवाही दे चुके कि यह रसूल बरहक़ है और उनके पास
रोशन निशानियां आ चुकी हैं। और अल्लाह ज़ालिमों को हिदायत नहीं देता।
[3: 87]: ऐसे लोगों की सज़ा यह है कि उन पर अल्लाह की, उसके
फ़रिश्तों की और सारे इंसानों की लानत होगी।
[3: 88]: वे इसमें हमेशा रहेंगे, न
उनका अज़ाब हल्का किया जाएगा और न उन्हें मोहलत दी जाएगी।
[3: 89]: अलबत्ता जो लोग इसके बाद तौबा कर लें और अपनी इस्लाह कर
लें तो बेशक अल्लाह बख़्शने वाला, मेहरबान है।
[3: 90]: बेशक जो लोग ईमान लाने के बाद मुंकिर हो गए फिर क़ुफ्र
में बढ़ते रहे, उनकी तौबा हरगिज़ क़ुबूल न की जाएगी और यही लोग गुमराह
हैं।
[3: 91]: बेशक जिन लोगों ने इंकार किया और इंकार की हालत में मर
गए, अगर वे ज़मीन भर सोना भी फ़िदये में दें तो क़ुबूल नहीं
किया जाएगा। उनके लिए दर्दनाक अज़ाब है और उनका कोई मददगार न होगा।
पिछले मुताले (अध्ययन) में
हमने जाना कि सिर्फ़ अल्लाह को ही अकेला
रब मानकर "रब्बानी" बनना है —
इसका सीधा मतलब यह है कि हमें अपनी हर सोच, हर काम और हर फ़ैसले में अल्लाह की हिदायत को आधार बनाना है। साथ ही, उसकी रुबूबियत (पालनहार होने की शक्ति) और उसकी डिविनिटी (इबादत के लायक़ होने) में, उसे एक और अकेला मानना और किसी को भी उसका साझीदार नहीं ठहराना है। न किसी नबी, न फ़रिश्ते, न किसी इंसान और न ही किसी ताक़त को ।
[देखें : सूरह: आल-ए-इमरान | 64– 71]
ईसा अलैहिस्सलाम के जाने के बाद, सेंट पॉल
ने "तस्लीस" (Trinity) का
अक़ीदा पेश किया, जिसमें ईसा अलैहिस्सलाम और रुहुल-क़ुद्दूस
(जिब्रील) को भी अल्लाह के दर्जे में शामिल कर लिया
गया। कुछ लोग मरियम (अलैहस्सलाम) को भी इसमें शामिल करते हैं।
यह एक बड़ी
ग़लतफ़हमी थी, इस सोच को अल्लाह तआला ने क़ुरआन में साफ़ तौर पर रद्द
किया और कहा कि सिर्फ़ अल्लाह को रब मानो और उसकी डिविनिटी (ख़ुदाई) में किसी और को साझी
न बनाओ, न फ़रिश्तों को और न नबियों को।
(विस्तार से पढ़ने के लिए देखें :
ट्रिनिटी को मानने वाले दावा करते हैं कि यह
ईसा अलैहिस्सलाम की सिखाई
हुई बात (तालीम) है, लेकिन किसी भी नाज़िल किताब (आसमानी
किताब) में इसका साफ़ ज़िक्र नहीं मिलता, और न ही
इसके बारे में कोई स्पष्ट और ठोस व्याख्या (तफ़सीर) मौजूद
है। इसलिए क़ुरआन में इस
ग़लतफ़हमी को दूर करने के लिए स्पष्ट दलीलें दी
गई हैं। अब हम
इसी सिलसिले में आगे की आयात का मुताला (अध्ययन) करेंगे, जिसमें बताया गया है कि अल्लाह ने पैग़म्बरों के बारे
में क्या अहद लिया था।
[क़ुरआन 3: 81]: और जब अल्लाह ने पैग़म्बरों का अहद लिया कि जो कुछ मैंने तुम्हें किताब और हिक्मत दी, फिर तुम्हारे पास पैग़म्बर आए जो सच्चा साबित करे उन पेशेनगोइयों (भविष्यवाणियों) को जो तुम्हारे पास हैं तो तुम उस पर ईमान लाओगे और उसकी मदद करोगे। अल्लाह ने कहा क्या तुमने इक़रार किया और उस पर मेरा अहद क़ुबूल किया। उन्होंने कहा हम इक़रार करते हैं। फ़रमाया अब गवाह रहो और मैं भी तुम्हारे साथ गवाह हूं।
यहाँ
एक बात समझना बहुत ज़रूरी है कि जब
लोग इस आयत को पढ़ते हैं, तो अक्सर यह समझ लेते हैं कि अल्लाह ने नबियों से अहद (वादा)
लिया।
लेकिन हक़ीक़त यह है कि यहाँ जो अहद लिया जा रहा है वो बनी इस्राइल (इस्राइल की संतानों) से लिया जा रहा है, और वह भी नबियों के बारे में।
उनसे
यह यह अहद लिया गया कि जब
भी तुम्हारे पास अल्लाह की किताब और हिक्मत पंहुचाई जाएगी और फिर रसूल (पैग़म्बर) आकर उसकी सच्चाई की गवाही देंगे, उसकी
तस्दीक (पुष्टि) करेंगे, तो तुम्हे उस पर ईमान लाना है और फिर उस रसूल की मदद
करनी है, उनका साथ देना है।
यहाँ एक इम्पोर्टेन्ट लर्निंग यह है कि जब रसूल आकर सच
की गवाही दें, तो सिर्फ़ उन पर ईमान लाना ही काफ़ी नहीं है, बल्कि
उनके मिशन में उनका साथ देना भी जरूरी है। यानी, रसूल
के काम (दावत और तबलीग) में उनके साथी और मददगार बनकर उनका साथ देना है।
आयत
में "लतनसुरुन्नहू"
कहा गया है, यानी तुम उस रसूल की मदद करोगे।
रसूल
तो नबूवत और रिसालत के मक़ाम पर होते हैं, यह ऊँचा पद और
दर्जा किसी और को नहीं मिल सकता। लेकिन उम्मत (उनके
मानने वालों) का फ़र्ज़ है कि वे रसूल के कारे-रिसालत (ख़ुदा का पैग़ाम इंसानों तक पहुँचाने) में, उनके अंसार (मददगार)
बनें।
मतलब ये समझ में आया कि रसूल के बाद उम्मत पर दावत का
फ़रीज़ा बिलकुल उसी तरह आ जाता है जिस तरह ईमान लाने का फ़रीज़ा आ जाता है।
[क़ुरआन 3: 84]: कहो हम अल्लाह पर ईमान लाए और उस पर जो हमारे ऊपर उतारा
गया है और जो उतारा गया इब्राहीम पर इस्माईल पर इस्हाक़ पर
और याक़ूब पर और याक़ूब की औलाद पर। और जो दिया गया मूसा और ईसा और दूसरे नबियों
को उनके रब की तरफ़ से। हम इनके दर्मियान फ़र्क़ नहीं करते। और हम उसी के फ़रमांबरदार
हैं।
इस आयत में सबसे पहले अल्लाह पर ईमान लाने की बात कही गई है। इसका मूल मक़सद यह है कि इंसान को 'रब्बानी' बनना है।
आसान भाषा में कहें तो, इसका मतलब यह है कि हम अपनी
ज़िंदगी का सबसे बड़ा लक्ष्य और सबसे बड़ी फ़िक्र (sole concern) सिर्फ़ अल्लाह को बना
लें, और उसकी बताई हुई राह (हिदायत) ही
हमारे लिए सच्चाई का असली स्रोत और आधार हो।
इसके बाद, रसूलों पर नाज़िल की (उतारी) गई वहि (ईश्वर का संदेश), सहीफ़ों और किताबों पर ईमान लाने की हिदायत दी गई है।
यानी
जो कुछ अल्लाह ने अपने तमाम पैग़म्बरों पर उतारा —
जिसे अल्लाह ने इंसानियत की भलाई और रहनुमाई के लिए
भेजा, उन सभी पर ईमान लाना ज़रूरी
है।
इसमें मुहम्मद (सल्ल्ल०), इब्राहीम,
इस्माईल, इस्हाक, याकूब
और उनकी औलाद, मूसा, ईसा और बाक़ी सारे नबियों (अलैहिस्सलाम)
को शामिल किया गया है।
अक्सर
हम लोग इस आयत को पढ़ते वक़्त केवल यही समझ के साथ आगे बढ़ जाते हैं कि इसका सीधा
सा मतलब है - जो कुछ अल्लाह ने अपने तमाम पैग़म्बरों
पर उतारा उस पर ईमान लाना है।
लेकिन असल में यह आयत इससे कहीं आगे की बात कर रही है।
यह हमें एक बहुत बड़े हक़ीक़त से रूबरू कराती है, वह हक़ीक़त यह कि - अल्लाह की रहमत और रहनुमाई (फ़ैज़ान) इंसानी इतिहास में लगातार जारी रही है।
अल्लाह
तआला ने हर ज़माने में, हर क़ौम के लिए, उनकी भाषा और हालात के मुताबिक इंसानियत की भलाई के लिए रहनुमाई (हिदायत)
भेजा। यह कोई एक-बार की घटना नहीं, बल्कि
इंसानियत के लिए उसकी लगातार जारी रहने वाली फ़ैज़ान का सिलसिला है।
मौलाना "तज़किरुल कुरआन" में इस पर बहुत ख़ूबसूरती से रौशनी डालते हैं। वे कहते हैं कि :
अल्लाह का मोमिन बंदा अल्लाह के इस निरंतर प्रवाहित होने वाले फ़ैज़ान
में जीता है। फिर जो शख़्स अपने को ख़ुदपरस्ती और गिरोहपरस्ती के ख़ोल में बंद कर
ले, उसके अंदर अल्लाह का फ़ैज़ान किस रास्ते से दाख़िल होगा। और अल्लाह के फ़ैज़ान से महरूमी के बाद वह क्या चीज़ होगी जो
उसके ईमान की परवरिश करे ?"
तज़किरुल
क़ुरआन में यह
बहुत अहम और गहरी बात है।
अल्लाह
का फ़ैज़ान यानी उसकी रहमत और हिदायत हमेशा से इंसानों पर बरसती आई है — और यह हर
उस इंसान के लिए आज भी खुला है जो इसे हासिल करने की कोशिश करे।
अगर कोई इंसान अल्लाह की दी हुई नेमतों को उसकी ओर से एक अनमोल इनाम समझे, तो वह इस फ़ैज़ान को पाने के लिए ऐसे ही जुट जाएगा जैसे कोई अपनी खोई हुई मीरास (धरोहर) को पाने के लिए बेचैन रहता है। उसे यह महसूस होगा कि यह तो वही चीज़ है जो मुझ तक पहुँचनी चाहिए।
ऐसे इंसान की सोच वही
होगी जो हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) ने
अपनाई थी,
जब उन्होंने कहा :
"ऐ मेरे रब, तू जो चीज़ मेरी तरफ़ उतारे मैं उसका मोहताज हूं।"
(सूरह
अल-क़सस 28:24).
अगर
कोई यह समझ ले कि अल्लाह का फ़ैज़ान किसी
ख़ास गिरोह या किसी ख़ास दौर तक सीमित था और अब वह बंद हो चुका है,
तो इसका सीधा मतलब यह है कि उसने ख़ुद
ही अपने लिए अल्लाह की रहमत के
दरवाज़े बंद कर लिए। और
जब कोई इंसान अल्लाह के फ़ैज़ान से दूर हो जाता है, तो
उसके ईमान की परवरिश (विकास) भी
रुक जाती है। मौलाना ने इसी गहरी बात को अपने शब्दों में समझाया है।
इसलिए हमलोगों को यह समझना चाहिए कि अल्लाह ने जो
किताबें नाज़िल की हैं और अम्बिया ने जो बातें बताई हैं— सबमें अल्लाह का फ़ैज़ान (कृपा) छिपा
हुआ है। हमें इन सब में अल्लाह का फ़ैज़ान ढूँढने की ज़रूरत है, क्योंकि
यही वह रूहानी ग़िज़ा है जो हमारे ईमान को पोषण देती है और
उसे मज़बूत करती है।
इसलिए
इंसान को चाहिए कि वह सबसे पहले अल्लाह को अकेला पालनहार मानकर अल्लाह-रुख़ि बन जाए, फिर
उसकी किताबों और उसके रसूलों पर ईमान लाए और उनसे हिदायत
हासिल करे।
** क्यों ?**
क्योंकि
इस्लाम का असल मतलब यही है कि इंसान अपने आप को पूरी तरह अल्लाह के सामने झुका दे।
अपनी इच्छा, अपनी योजना और अपनी चाह को अल्लाह की मर्ज़ी
के मुताबिक बना ले। यही
असल में इस्लाम है, और यही सच्चे मायनों में मुस्लिम होने का मतलब है।
अगर कोई सच में अल्लाह के सामने झुका हुआ है, तो उसने अल्लाह के दीन को अपनाया हुआ है। लेकिन अगर कोई अल्लाह के सामने अपने आपको नहीं झुकाया है, तो चाहे कितना भी ईमान वाला होने का वह दावा करे, अल्लाह के नज़दीक उसका ईमान क़ाबिल-ए-रद्द है वह ईमान वाला नहीं ठहरेगा।
क्योंकि अल्लाह तआला ने तय कर दिया है कि उसका दीन
सिर्फ़ और सिर्फ़ वही दीन होगा जिसमें इंसानों ने अपने आपको अल्लाह के सामने झुका
दिया हो, उसी के फ़ैज़ान में जीने वाला बन
गया हो और उसी की रहमतों (कृपा) पर भरोसा करने वाला हो। यही वे लोग हैं जो असल
मायनों में अल्लाह के दीन पर
हैं।
अल्लाह तआला ने इसकी मिसाल दी कि यह सिर्फ़ इंसान की बात नहीं —
यह काम पूरी कायनात कर रही है, पूरी कायनात पहले से ही इस्लाम की हालत में है — आसमान, ज़मीन, और उसके अंदर मौजूद हर चीज़ अल्लाह के हुक्म के सामने झुकी हुई है। और उसकी ही मर्जी से चल रही है।
[3: 83]: क्या ये लोग अल्लाह के दीन के सिवा कोई और दीन चाहते हैं। हालांकि उसी के हुक्म में है जो कोई आसमान और ज़मीन में है, ख़ुशी से या नाख़ुशी से और सब उसी की तरफ़ लौटाए जाऐंगे।
इस आयत में "मन फ़िस समावाति वल-अर्दि" का
ज़िक्र है, इसका
मतलब यह है कि जो कुछ आसमानों और
ज़मीन में है — और इनके बीच जो कुछ मौजूद है, सब
अल्लाह के बनाए हुए फ़ितरत के क़ानून (Natural
Law)
के अधीन है। चाहे वो इंसान हो, तमाम
मख़्लूक़ात या पूरी कायनात,
हर ज़र्रा और हर निज़ाम — हर चीज़ अल्लाह
के बनाए हुए फ़ितरत के क़ानून में बंधी हुई है और उसकी फ़रमाबरदारी कर रही है।
अल्लाह ने सारी कायनात को अपने फ़ितरी क़ानून (Natural
Law) में बाँध दिया है, और हर
चीज़ उसी के मुताबिक़ अल्लाह की फ़रमाबरदारी में चल रही हैं, चाहे ख़ुशी से या नाख़ुशी से ।
कुछ
मख़्लूक़ात फ़ितरी तौर पर अल्लाह की इताअत करती हैं। इंसान को इससे अलग एक हद तक इख़्तियार (चॉइस की आज़ादी) दिया
गया है कि वह अपने इरादे से अल्लाह की फ़रमाबरदारी करे।
लेकिन
इस इख़्तियार के बावजूद इंसान बहुत से पहलुओं में मजबूर है। जैसे — उसका दिल धड़कता है, साँस चलती है, जिस्म के अंदरूनी अमल लगातार होते
रहते हैं — यह सब इंसान की मरज़ी से नहीं, बल्कि अल्लाह के बनाए हुए फ़ितरी
क़ानून के मुताबिक़ हो रहे हैं।
भले ही इंसान अपने सोचने, समझने और अपनी मर्ज़ी की आज़ादी
का ग़लत इस्तेमाल करके बे-क़ैद ज़िंदगी गुज़ारना चाहे, तब भी उसका पूरा वजूद — चाहे
ना-ख़ुशी से ही सही — अल्लाह के ही फ़ितरी क़ानून (Natural Law) के दायरे में रहता है और उसी के हुक्म पर चला जा रहा है।
[3: 85]: और जो शख़्स इस्लाम के सिवा किसी
दूसरे दीन को चाहेगा तो वह उससे हरगिज़ क़ुबूल नहीं किया जाएगा और वह आख़िरत में
नामुरादों में से होगा।
[3:
86]: अल्लाह
क्योंकर ऐसे लोगों को हिदायत देगा जो ईमान लाने के बाद मुंकिर हो गए। हालांकि वे
गवाही दे चुके कि यह रसूल बरहक़ है और उनके पास रोशन निशानियां आ चुकी हैं। और
अल्लाह ज़ालिमों को हिदायत नहीं देता।
[3: 87]: ऐसे लोगों की सज़ा यह है कि उन पर अल्लाह की, उसके
फ़रिश्तों की और सारे इंसानों की लानत होगी।
[3: 88]: वे इसमें हमेशा रहेंगे, न उनका अज़ाब हल्का किया जाएगा और न उन्हें मोहलत दी
जाएगी।
इन आयात से एक अहम हक़ीक़त सामने आती है कि अल्लाह तआला ने इंसानों के लिए सिर्फ़ एक ही दीन मुक़र्रर किया है—और वह है इस्लाम।
लेकिन
अक्सर लोग इस्लाम को एक इस्तिलाही (terminological) मा'नी में समझते
हैं— जैसे कि इस्लाम कुछ
लोगों के मज़हब या कुछ लोगों के धार्मिक पहचान का नाम
है। इसी ग़लतफ़हमी की वजह से इस्लाम का असल मक़सद और असल हक़ीक़त नज़र से ओझल हो
जाती है।
असल
में, इस्लाम एक व्यापक और बुनियादी सच्चाई है। जिसे हर इंसान की अंतरात्मा
पहचानती है।
इस्लाम
का मतलब है — अपने आपको पूरी तरह अल्लाह के
सामने झुका देना, उसकी फ़रमांबरदारी करना,
और सिर्फ़ उसी को अपना रब और इबादत के
लायक मानना।
क़ुरआन
(7:172) वाज़ेह
करता है कि यह सच्चाई हर इंसान की फ़ितरत (प्रकृति)
में पहले से रख दी गई है —
वही
अल्लाह जिसे इंसान की रूह ने दुनिया में आने से पहले ही पहचाना, और अपना रब माना
था।
जब
इस्लाम को इस सही मायने में समझा जाए, तो यह बात
साफ़ हो जाती है कि दुनिया की हर वह चीज़, जो अल्लाह की
फ़रमांबरदारी में
झुकी हुई है, वह इस्लाम पर है।
अल्लाह तआला ने साफ़ फ़रमाया है कि —
वह केवल वही दीन क़ुबूल करेगा जो बिल्कुल ख़ालिस (शुद्ध)
तौर
पर उसी के लिए हो।
अगर कोई इंसान अल्लाह के अलावा किसी और के आगे अपने आपको समर्पित कर दिया है या किसी और को इबादत के लायक
मानता है,
तो उसका यह दीन अल्लाह क़ुबूल नहीं करेगा। क़ुरआन
में अल्लाह तआला का फ़रमान है:
"जो शख़्स इस्लाम के सिवा किसी दूसरे दीन को चाहेगा तो वह
उससे हरगिज़ क़ुबूल नहीं किया जाएगा"।
(3:85)
इस
आयत का सार यह है कि —
"इस्लाम" इंसान का वह फ़ितरी (natural) रास्ता
है जो उसे उसके असली मालिक की ओर ले जाता है।
इसलिए जो कोई भी अपनी फ़ितरत के ख़िलाफ़ जाकर, स्वाभाविक दीन को छोड़कर किसी और रास्ते (दीन) को अपनाता है, तो अल्लाह उसका दीन हरगिज़ क़ुबूल नहीं करेगा ।
अल्लाह
तआला ने स्पष्ट कर दिया है कि वह सिर्फ़ अपने बताए हुए दीन को क़ुबूल करेगा, न कि इंसानों द्वारा गढ़े हुए रास्तों (दीन)
को।
यही
वजह है कि फिक़्ही बहसों में जब यह सवाल उठाया जाता है कि कौन जन्नत में जाएगा और
कौन जहन्नम में, तो यह सवाल महज़ एक इस्तिलाही (terminological) बहस
बनकर रह जाती है। अगर इस मसले को इस
मूल
नज़रिए से समझ लिया जाए, तो इस सवाल की कोई हक़ीक़त बाक़ी नहीं रहती।
एक
अहम बात यह है कि अल्लाह तआला ने जो दीन इंसानों के लिए मुक़र्रर किया, वह सिर्फ़ किसी ख़ास क़ौम या किसी ख़ास दौर के लोगों तक सीमित नहीं है। या
सिर्फ़ उन लोगों के लिए नहीं है, जिन्हें आज हम
"मुसलमान" कहते हैं या जो उम्मत-ए-मुहम्मदी में शामिल हैं।
बल्कि
यह दीन शुरू से ही तमाम
इंसानों के लिए है — तमाम अंबिया (नबी), आदम (अ०) से
लेकर मुहम्मद (सल्ल०) तक, सभी इसी दीन-ए-इस्लाम पर थे, क्योंकि उन्होंने अपने आपको पूरी तरह अल्लाह के हवाले कर दिया था।
लेकिन जो कोई भी अपनी बनाई हुई ताबीरों (व्याख्याओं) या
इंसानी दलीलों के आधार पर अल्लाह के अलावा किसी और के सामने झुकता
है, उसे अपना सरपरस्त (संरक्षक एवं सहायक) बनाता
है,
तो अल्लाह उसे अपना दीन नहीं मानेगा। ऐसे लोग आख़िरत में घाटे
में होंगे, क्योंकि उन्होंने अल्लाह के दीन की जगह इंसानों के बनाए हुए रास्तों
को अपनाया।
[3: 85]: और जो शख़्स इस्लाम के सिवा किसी दूसरे दीन को चाहेगा तो
वह उससे हरगिज़ क़ुबूल नहीं किया जाएगा और वह आख़िरत में नामुरादों में से होगा।
ऐसा क्यों होगा?
इसका
जवाब बहुत स्पष्ट है।
सोचिए, अगर कोई क़ौम, जो
ईमान ला चुकी हो, जिसने रसूल को रसूल माना हो, और जो
यह गवाही दे रही हो कि वे सच और हक़ पर हैं— उनके
पास अल्लाह की आयतें (निशानियाँ) और
किताब भी मौजूद है, जो सही रास्ता दिखाती है, अगर वही क़ौम रसूल को
ही अपना ख़ुदा बना ले, या अल्लाह के सिवा उसकी मख़्लूक़ात (सृष्टि, creatures) के
सामने अपने आपको सुपुर्द कर दे, तो यह दरअसल अल्लाह और उसकी
मख़्लूक़ दोनों को उनके असली मक़ाम से हटा देना है।
ऐसे
लोग खुद ही उस सीधे रास्ते (दीन-ए-हक़)
से हट जाते हैं जिसे अल्लाह ने उनके सामने वाज़ेह कर दिया था। फिर यह कैसे मुमकिन
है कि अल्लाह उन्हें हिदायत पर क़ायम रखे?
अल्लाह
ऐसे ज़ालिम लोगों को हिदायत नहीं देता, और ज़ालिम वह है जो चीज़ों को उसके असली
मक़ाम से हटा देता है, और अल्लाह के बराबर दूसरों को
ठहराना इसकी सबसे बड़ी मिसाल है।
क़ुरआन
में अल्लाह तआला ने साफ़ फ़रमाया —
अल्लाह क्योंकर ऐसे लोगों को हिदायत देगा जो ईमान लाने
के बाद मुंकिर हो गए। हालांकि वे गवाही दे चुके कि यह रसूल बरहक़ है और उनके पास
रोशन निशानियां आ चुकी हैं। और अल्लाह ज़ालिमों को हिदायत नहीं देता। [क़ुरआन
3: 86]
ऐसे
लोगों के बारे में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है कि क़यामत के दिन उन पर अल्लाह की, उसके
फ़रिश्तों की और सारे इंसानों की लानत होगी।
लानत का मतलब है — अल्लाह की रहमत (दया
और कृपा) से दूर कर दिया जाना।
और
रहमत से दूरी का सीधा मतलब है जन्नत से वंचित रह जाना।
क़यामत के दिन अगर अल्लाह तआला किसी को अपनी रहमत से हमेशा
के लिए दूर कर दे, तो यह दरअसल उसे जन्नत से दूर
कर देना है।
क़ुरआन में आगे फ़रमाया गया —
"ख़ालिदीना फ़ीहा"
यानी, वे हमेशा के लिए उसी हालत में रहेंगे।
यहाँ जहन्नम के अलफ़ाज़ नहीं है लेकिन "ख़ालिदीना फ़ीहा" लानत के बाद जोड़ा गया, इसका मतलब ये हुआ कि जब अल्लाह तआला किसी को अपनी रहमत से हमेशा के लिए दूर कर देगा तो उसका ठिकाना जहन्नम होगा। इसके अलावा, यह भी बताया गया कि न उनका अज़ाब हल्का किया जाएगा और न उन्हें मोहलत दी जाएगी।
तौबा का मौक़ा :
[3: 89]: अलबत्ता जो लोग इसके बाद तौबा कर लें और अपनी इस्लाह कर
लें तो बेशक अल्लाह बख़्शने वाला,
मेहरबान है।
लेकिन जो लोग इन बातों को समझ गए और फिर उन्होंने ग़लती
या गुमराही के बाद तौबा कर लिया और
अपनी इस्लाह (सुधार) कर ली, यानी उन्होंने अपने क़ौल के मुताबिक अपने अमल को कर लिया तो अल्लाह तआला
बेशक बड़ा ग़फ़ूरुर्रहीम (बख़्शने वाला और
मेहरबान) है।
लेकिन जो लोग ईमान के बाद कुफ़्र में बढ़ते रहे, उनकी
तौबा हरगिज़ क़ुबूल न की जाएगी और यही लोग गुमराह हैं। ऐसे लोग आख़िरत में किसी भी तरह से अपने आप को नहीं बचा
पाएंगे, चाहे वे पूरी ज़मीन भर सोना भी फ़िदया में देना चाहेंगे
तो भी उनको दर्दनाक अज़ाब से रिहाई नहीं मिलेगी है और न ही वहां उनका कोई
सिफारिशी और मददगार होगा ।
[3: 90]: बेशक जो लोग ईमान लाने के बाद मुंकिर हो गए फिर क़ुफ्र में बढ़ते रहे, उनकी तौबा हरगिज़ क़ुबूल न की जाएगी और यही लोग गुमराह हैं।
[3: 91]: बेशक जिन लोगों ने इंकार किया और इंकार की हालत में मर गए, अगर वे ज़मीन भर सोना भी फ़िदये में दें तो क़ुबूल नहीं किया जाएगा। उनके लिए दर्दनाक अज़ाब है और उनका कोई मददगार न होगा।
सबसे अहम बात:
ईमान की राह पर चलने के लिए सबसे ज़रूरी है कि हम अपने आपको ख़ुदा-रूख़ि (God oriented) बनाएं। अल्लाह के नबियों पर ईमान लाए, अल्लाह की किताब को पढ़े, समझें, दूसरों को बताएं और ख़ुद उस पर अमल करें।
यही
वो काम हैं जो हमलोगों को ईमान की तरफ
ले जाने वाली हैं।
लेकिन अगर हमलोगों ने ईमान लाने के बाद अल्लाह के अलावा उसकी बनाई हुई मख़्लूक़ात — चाहे वह कोई
इंसान हो, कोई चीज़ हो या शक्तियाँ, उनके सामने अपने आपको सुपुर्द करने का काम शुरू कर
दिया, तो यह अल्लाह के नज़दीक कुफ़्र (इनकार) कहलाएगा, और अल्लाह तआला इसकी सख़्त सज़ा देने वाला है।
एक और अहम बात यह है कि हक़ (सच्चाई) को अल्लाह की निस्बत से पहचानना है, न कि किसी गिरोह, जमाअत या समूह की नज़र से।
अगर हम हक़ को गिरोह की
सोच के हिसाब से देखेंगे, तो अल्लाह के नज़दीक हम ईमान
वालों में नहीं गिने जाएंगे।
अगर इंसान यह ग़लती करे कि वह अपने आपको गिरोह, मसलक या ख़ुद-परस्ती के दायरे में बंद कर ले, तो वह
ख़ुद ही अल्लाह के फ़ैज़ान (रहमत)
को अपने ऊपर आने से रोक
देता है। और जब उस तक अल्लाह का
फ़ैज़ान न पहुँचे, तो उसका ईमान कैसे बढ़ेगा?
सच्चा मोमिन वही होता है जो हक़ को सिर्फ़ और सिर्फ़ अल्लाह की निस्बत से पहचानता है, चाहे वह कहीं से भी आए।
यही वह अहम पैग़ाम है जो इन आयात (क़ुरआन 3:81-91) से हमें समझ में आती है।
Note: क़ुरआन मुताला पर एक दा’ई के बयान का सारांश।
तज़्कीरुल-क़ुरआन | तज़्कीर
अल्लाह को पाना एक अबदी (शाश्वत) हक़ीक़त को पाना है, यह पूरी कायनात का हमसफ़र बनना है।
जो लोग इस तरह अल्लाह को पा लें वे हर
क़िस्म के तअस्सुबात (विद्वेषों) से ऊपर उठ जाते हैं। वे हक़ को हर हाल में
पहचान लेते हैं चाहे उसका पैग़ाम ‘इस्राईली पैग़म्बर’ की ज़बान से बुलंद हो या
‘ईस्माईली पैग़म्बर’ की ज़बान से।
मगर जो लोग गिरोहपरस्ती की सतह पर जी रहे हों, हक़ उन्हें हक़ की सूरत में सिर्फ़ उस वक़्त नज़र आता है जबकि वह उनके अपने गिरोह के किसी फ़र्द की तरफ़ से आए ।
अल्लाह अगर उनके गिरोह से बाहर किसी शख़्स को
अपने पैग़ाम की पैग़ामरसानी के लिए उठाए तो ऐसा पैग़ाम उनके ज़ेहन का जुज़ नहीं
बनता। यहां तक कि उस वक़्त भी नहीं जबकि उनका दिल उसके हक़ व सदाक़त होने की गवाही
दे रहा हो।
ऐसे लोग चाहे अपने को मानने वालों में शुमार
करें मगर अल्लाह के यहां इनका नाम न मानने वालों में लिखा जाता है। क्योंकि
उन्होंने हक़ को अपने गिरोह की निस्बत से जाना न कि अल्लाह की निस्बत से ।
ऐसे हक़ का इक़रार न करना जिसके हक़ होने पर
आदमी के दिल ने गवाही दी हो अल्लाह के नज़दीक बदतरीन जुर्म है। ऐसे लोग आख़िरत
में इतने ज़लील होंगे कि अल्लाह और उसकी तमाम मख़्लूक़ात उन पर लानत करेगी।
अपने से बाहर ज़ाहिर होने वाले हक़ का एतराफ़ न
करना बज़ाहिर अपने ईमान को बचाना है। मगर हक़ीक़त में यह अपने ईमान को बर्बाद करना
है।
अल्लाह का मोमिन बंदा अल्लाह के मुसलसल
फ़ैज़ान में जीता है। फिर जो शख़्स अपने को ख़ुदपरस्ती और गिरोहपरस्ती के ख़ोल में
बंद कर ले उसके अंदर अल्लाह का फ़ैज़ान किस रास्ते से दाख़िल होगा। और अल्लाह के
फ़ैज़ान से महरूमी के बाद वह क्या चीज़ होगी जो उसके ईमान की परवरिश करे।
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