वुज़ू और क़ुरआन


वुज़ू और क़ुरआन    


Source : AL-RISALA (Urdu) | May -2011


आम तौर पर यह समझा जाता है कि क़ुरआन को छूने के लिए वुज़ू में होना ज़रूरी है। लेकिन यह मसअला क़ुरआन की किसी आयत या हदीस की रिवायत से साबित नहीं होता। इस मसले के पक्ष में शरी’अत का कोई सीधा और स्पष्ट आदेश मौजूद नहीं। 

इस सिलसिले में जो हवाले (Ref.) दिए जाते हैं, वे सब के सब अनुमान और अंदाज़े पर आधारित हैं, न कि किसी खुली, स्पष्ट दलील पर।

 

हक़ीक़त यह है कि क़ुरआन को छूने के लिए वुज़ू की शर्त लगाना, क़ुरआन के एहतिराम (सम्मान) में ग़ुलू (हद से आगे बढ़ जाने) की वजह से है, जबकि दीन-ए-इस्लाम में किसी भी चीज़ में ग़ुलू (अति) की कोई जगह नहीं, जैसा कि हदीस में आया है: 

"ला ग़ुलू फ़िल-इस्लाम"

(इस्लाम में अति नहीं)। 

 

इस दृष्टिकोण के समर्थन में क़ुरआन की सूरह अल-वाक़िआ की यह आयत पेश की जाती है:

तर्जमा : यह एक इज़्ज़त वाला क़ुरआन हैएक मक़नून (महफ़ूज़) किताब में। इसे वही छूते हैं जो पाक बनाए गए हैं। यह रब्बुल आलमीन (सारे जहान के रब) की तरफ़ से उतारा गया है। (56: 77-80)

"इन्नहु ल क़ुरआनुन करीम, फी किताबिम मक्नून, ला यमस्सुहु इल्लल मुतह्हरून। तंज़ीलुम मिन रब्बिल आलमीन।" 

 

क़ुरआन की इस आयत का वुज़ू के मसले से कोई ताल्लुक़ नहीं। 

इस आयत में सिर्फ़ यह बताया गया है कि क़ुरआन की तनज़ील (उतारने) का अमल फ़रिश्तों के ज़रिये होता है, और फ़रिश्ते एक ऐसी मख़लूक़ (सृष्टि) हैं जिन्हें अल्लाह ने पैदाइशी तौर पर ताहिर (पाक) बनाया है। 

इस आयत में जो लफ़्ज़ इस्तेमाल किया गया है, वह "मुतह्हर" है, न कि "मुतवज़्ज़ा" (वुज़ू वाला), यानी पाकीज़ा न कि वुज़ू वाला।

 

"मुतह्हर" (पाकीज़ा) का लफ़्ज़ क़ुरआन में दूसरी जगह जन्नत की बीवियों (अज़वाज-ए-जन्नत) के लिए आया है (2:25)वहाँ भी इसका मतलब यह नहीं कि यह बीवियाँ हमेशा वुज़ू की हालत में होंगी, बल्कि इसका मतलब यह है कि अल्लाह ने उन्हें पैदाइशी तौर पर पाकीज़ा और ताहिर बनाया होगा (अल-तफ़सीर अल-मज़हरी, 1/40)।  

 

क़ुरआन के अल्फ़ाज़ के मुताबिक़, क़ुरआन को वही मख़लूक़ (सृष्टि) छूती है जो अपनी तख़लीक़ (सृजन) के एतबार से पाकीज़ा है, यानी जिसे ख़ालिक़ (रचयिता) ने पैदाइशी तौर पर पाक बनाया है। यह मख़लूक़ निःसंदेह फ़रिश्ते हैं। वह क़ुरआन को अल्लाह से लेते हैं और पैग़म्बर तक पहुँचाते हैं।

क़ुरआन के अलफ़ाज़ से यह नहीं निकलता कि क़ुरआन को अल्लाह से लेने से पहले फ़रिश्ते वुज़ू कर लेते हैं। फ़रिश्ते अपनी अस्ल तख़लीक़ (मूल रचना) के एतबार से ही मुकम्मल तौर पर पाकीज़ा हैं।

 

इस सिलसिले में दूसरी दलील हज़रत उमर बिन अल-ख़त्ताब (रज़ि) के इस्लाम क़बूल करने वाली मशहूर घटना से दी जाती है, जो रिवायतों (रिपोर्ट) में मौजूद है।

यह एक लंबी रिवायत है। इसका एक हिस्सा यह है :    

उमर बिन अल-ख़त्ताब को पता चला कि उनकी बहन फ़ातिमा और उनके शौहर सईद बिन ज़ैद ने इस्लाम क़बूल कर लिया है। उस वक़्त तक उमर बिन अल-ख़त्ताब इस्लाम में दाख़िल नहीं हुए थे। उमर बिन अल-ख़त्ताब अपनी बहन के घर गए और दोनों को इतना मारा कि वे लहू-लुहान हो गए।

ख़ून देखकर उमर बिन अल-ख़त्ताब के अंदर नदामत (पछतावा) पैदा हुई। उन्होंने अपनी बहन से कहा कि मुझे वह क़ुरआन दिखाओ जो मुहम्मद (सल्ल०) पर उतारा गया है।

इसके बाद रिवायत (रिपोर्ट) के अल्फ़ाज़ इस तरह हैं: 

(तर्जुमा) : "फ़ातिमा ने कहा: ऐ मेरे भाई, तुम अपने शिर्क की वजह से नजिस (अशुद्ध) हो, और क़ुरआन को सिर्फ़ पाकीज़ा लोग ही छूते हैं। चुनाँचे हज़रत उमर (रज़ि.) उठे और ग़ुस्ल (स्नान)  किया, फिर फ़ातिमा ने उन्हें सहीफ़ा (क़ुरआन का हिस्सा) दिया।"

(अस-सीरतुन नबविय्या लि-इब्ने कसीर, 2/35)

 

इस रिवायत से यह मसअला साबित नहीं होता कि क़ुरआन को छूने से पहले वुज़ू करना ज़रूरी है। इस रिवायत से अगर कोई चीज़ निकलती है, तो वह यह है कि क़ुरआन को छूने से पहले ग़ुस्ल (स्नान) करना ज़रूरी है। 

ऐसी हालत में जो लोग इस दलील को पेश करते हैं, उन्हें यह कहना चाहिए कि क़ुरआन को छूने से पहले ग़ुस्ल करो, ग़ुस्ल के बिना क़ुरआन छूना जायज़ नहीं। 

इसके अलावा, इस रिवायत के मुताबिक, फ़ातिमा (रज़ि) ने उमर के हाथ में क़ुरआन का सहीफ़ा उस वक़्त दिया जब कि वह अभी शिर्क पर क़ायम होने की वजह से नजिस (अशुद्ध) थे।

 

यह एक हक़ीक़त है कि शिर्क का ख़ात्मा ग़ुस्ल से नहीं होता, बल्कि तौबा और कलिमा-ए-शहादत (ईमान की गवाही) से होता है। 

ऐसी हालत में इस वाक़िआ (घटना) से वुज़ू का मसअला निकालना पूरी तरह एक ग़ैर-मुताल्लिक़ (irrelevant) बात की हैसियत रखता है। 

 

हज़रत उमर बिन अल-ख़त्ताब का एक और वाक़ि’आ रिवायतों में इस तरह आया है: 

उमर एक बार एक जमात के साथ थे जो एक सहीफ़ा (क़ुरआन का हिस्सा) के ज़रिये क़ुरआन पढ़ रहे थे। इस दौरान उमर क़ज़ा-ए हाजत  (पेशाब करने) के लिए गए, फिर वे वापस आए और उन्होंने दुबारा क़ुरआन पढ़ना शुरू किया। तभी एक शख़्स ने उनसे कहा कि आप क़ुरआन पढ़ रहे हैं, हालाँकि आप बा-वुज़ू नहीं हैं।

इस पर उमर ने कहा: (तर्जुमा) : " यह मसअला तुम्हें किसने बताया, क्या मुसैलिमा कज़्ज़ाब ने?"   


इसी तरह से हज़रत अली बिन अबी तालिब के बारे में भी रिवायत में आया है कि वह सहीफ़ा को लेकर क़ुरआन पढ़ते थे, हालाँकि वे बा-वुज़ू नहीं होते थे।  

(मुवत्ता इमाम मालिक, शरह अल्लामा अब्दुल हई लखनवी, किताब-अल-तहारत, बाब-अल-रजुल यमस्सुल-क़ुरआन व हुवा जुनुब अव अल-ग़ैर वुज़ू, 2/83)   



हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ि०) का यह वाक़ि’आ बताता है कि सहाबा-ए-रसूल के ज़माने में इस मामले में क्या मिज़ाज (रुख़) पाया जाता था। 

उस ज़माने में लोगों का सारा ध्यान पूरी तरह क़ुरआन के 'आनी (अर्थ) पर केंद्रित होता था, न कि ज़ाहिरी (बाहरी) मसलों पर।  

 

यह मसअला कि वुज़ू के बिना क़ुरआन छूना जायज़ नहीं, यह दरअसल दौर-ए-सहाबा के बाद, उस ज़माने में पैदा हुआ जब लोग दीन की बाहरी चीज़ों (ज़वाहिर) को ज़्यादा अहमियत देने लगे और दीन की रूह और असल मक़सद पीठ-पीछे चला गया। 

बाद के ज़माने में यह रुझान सिर्फ़ क़ुरआन ही के साथ पेश नहीं आया, बल्कि दीन के हर मामले में पैदा हो गया।  

 

यह वही चीज़ है जिसे “ध्यान का रुख़ बदल जाना” (shift of emphasis) कहा जाता है।

वुज़ू के बिना क़ुरआन न छूने का मसअला दरअसल इसी बाद के दौर की एक बाहरी औपचारिकता (ज़ाहिरा/बाहरी चीज़) है। यह क़ुरआन और हदीस की सीधी, स्पष्ट बातों से निकला हुआ कोई हुक्म नहीं।  



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