सूरह: आल-ए-इमरान || 116 – 117



क़ुरआन की आयात पर ग़ौर-ओ-फ़िक्र

सूरह: आल-ए-इमरान || 116 – 117




आयात 113 – 115  की अगली कड़ी 




[3: 116]:  बेशक जिन लोगों ने इंकार किया तो अल्लाह के मुक़ाबले में उनके माल और औलाद उनके कुछ काम न आएंगे। और वे लोग दोज़ख़ वाले हैं वे इसमें हमेशा रहेंगे।


[3: 117]:  वे इस दुनिया की ज़िन्दगी में जो कुछ ख़र्च करते हैं उसकी मिसाल उस हवा की सी है जिसमें पाला हो और वह उन लोगों की खेती पर चले जिन्होंने अपने ऊपर ज़ुल्म किया है फिर वह उसको बर्बाद कर दे। अल्लाह ने उन पर ज़ुल्म नहीं किया बल्कि वे ख़ुद अपनी जानों पर ज़ुल्म करते हैं।





बेशक जिन लोगों ने इंकार किया तो अल्लाह के मुक़ाबले में उनके माल और औलाद उनके कुछ काम न आएंगे। और वे लोग दोज़ख़ वाले हैं वे इसमें हमेशा रहेंगे। [3: 116]




पिछली आयत में जिन लोगों का ज़िक्र हुआ: 


मिन अहलिल किताबि उम्मतुन क़ाइमतुन” (3:113)


वे क़्वांटिटी (संख्या) में भले ही बहुत कम थे, लेकिन क़्वालिटी के एतिबार से बहुत ऊँचे दर्जे के थे।


अब यह आयत (3:116) दूसरे गिरोह की ओर ध्यान दिलाती है 


यह वह लोग हैं जो संख्या (क्वांटिटी) में तो बहुत ज़्यादा हैं, लेकिन क़्वालिटी के लिहाज़ से कमज़ोर हैं।

 

अल्लाह तआला ने बताया : 

इन्नल्लज़ीना कफ़रू…” 

(बेशक जिन लोगों ने इनकार किया)


मतलब ये है कि उस दूसरे गिरोह में ऐसे लोग शामिल हैं जिन्होंने सच्चाई को उन चंद सच्चाई-पसंद लोगों की तरह नहीं समझा, 


बल्कि उन्होंने साफ़-साफ़ इनकार का रास्ता चुना। वे लोग गिरोहबंदी, नस्ली अहंकार, और तरह-तरह के पूर्वाग्रहों (biases 'अस्सुब) में मुब्तला हो गए। 

 

और जब कोई गिरोह, 

ख़ासकर अकसरिय्यत (बहुसंख्या) वाला गिरोहइस तरह के 'अस्सुब (biases) का शिकार हो जाता है, तो उसके अंदर एक ख़ास नफ़्सियाती बीमारी पैदा हो जाती है। 


नफ़्सियाती तौर पर उनके अंदर जो सोच पैदा होती है, वह क्या होती है और किस दिशा में जाती है?

 

सबसे पहले उन्हें यह समझ में आता है कि किसी काम को अंजाम देने के लिए दो तरह के संसाधनों (resources) की ज़रूरत है, और वे resources जितने ज़्यादा हों, उतना ही वे अपने आपको मज़बूत समझते हैं।


पहला resource है माल (wealth),

और दूसरा resource है औलाद


यहाँ “औलाद” से मतलब manpower है

 



दुनिया में आमतौर पर manpower और wealth को बहुत बड़ा resource माना जाता है और यह समझा जाता है कि अगर ये दो resources मौजूद हों,  तो हम बड़ा से बड़ा काम कर सकते हैं, और उनका पूरा भरोसा इन ही दो साधनों पर टिक जाता है।

 

जब कोई इंसान अपनी नज़र सिर्फ संसाधनों (resources) पर जमाकर बैठ जाता है, तो इस्लामी नज़रिए से यह कोई साधारण बात नहीं रहती। 


वजह यह है कि जिन resources पर वह भरोसा कर रहा होता है, वे सब मख़्लूक़ हैं—यानी अल्लाह की बनाई हुई चीज़ें—और ये सिर्फ़ अल्लाह की इजाज़त से ही काम आती हैं। 


लेकिन जब वह इन्हीं पर ऐसा ऐतिमाद (भरोसा) करने लगता है जैसे वही उसके काम बनाने वाले हों, तो वह दरअसल ख़ालिक़ (Creator) की जगह मख़्लूक़ को रख देता है।


यह रविश (attitude) ए‘तिमाद-अलल्लाहयानी अल्लाह पर भरोसा—के बिल्कुल ख़िलाफ़ चली जाती है।

 

क्योंकि अल्लाह पर भरोसा (ए'तिमाद-अलल्लाह) का मतलब यह है कि इंसान संसाधनों (resources) का इस्तेमाल तो करे, लेकिन भरोसा सिर्फ़ अल्लाह पर रखे।

वह संसाधनों का इस्तेमाल करते हुए भी यह समझे कि ये संसाधन तब तक मेरे काम नहीं आ सकते, जब तक अल्लाह न चाह ले।   

 

मिसाल के तौर पर एक किसान को देखिए। वह खेत में बीज डालता है और चाहता है कि उसकी खेती लहलहा उठे। लेकिन हक़ीक़त यह है कि सिर्फ़ बीज डाल देने से फसल नहीं लहलहाती।


फसल को लहलहाने के लिए जो ज़रूरी तापमान चाहिए, वह सिर्फ़ अल्लाह का सूरज देता है। उसे जो हवा और ऑक्सीजन चाहिए, वह अल्लाह ही मुहैया करता है। पानी वही पहुँचाता है, और मिट्टी में उपजाऊपन, नमी व खनिज लवण (Mineral salts), ये सब भी उसी की तरफ़ से प्रदान किए जाते हैं।

 

इन सब कामों में किसान का कोई दख़ल नहीं। न वह सूरज निकालता है, न हवा चलाता है, न पानी पहुँचाता है—यह सब कुछ अल्लाह ही की तरफ़ से होता है।


अब अगर किसान यह समझ ले कि सिर्फ़ उसका बीज डाल देना ही फसल के लहलहाने का असली कारण है, तो यह दरअसल संसाधनों (resources) पर ऐतिमाद (भरोसा) करना हुआ, न कि ख़ुदा पर ऐतिमाद। ऐसी सोच में वह अल्लाह को नज़रअंदाज़ कर रहा है और उसकी जगह किसी दूसरी चीज़ को बिठा रहा है।

 

यह एक ऐसी नफ़्सियात (मानसिकता) है जो धीरे-धीरे इंकार (कुफ़्र) की तरफ़ ले जाती है। 

इसी वजह से अक्सर लोग संसाधनों (resources) पर पूरा-पूरा ए'तिमाद करने लगते हैं। इसी सोच की तरफ़ यहाँ इशारा किया गया है:


इन्नल्लज़ीना कफ़रू लन् तुग़्नि-य अन्हुम अम्वालुहुम वला औलादुहुम।…”


बेशक जिन लोगों ने इनकार किया तो अल्लाह के मुक़ाबले में उनके माल और औलाद उनके कुछ काम न आएँगे। 

(3: 116)


 

यहाँ “ग़नीका लफ़्ज़ आया है, जो मानसिकता और नफ़्सियात की हालत को दर्शाता है।


यहाँ इसका मतलब है: मुझे ज़रूरत नहीं, मैं मोहताज नहीं, मैं बे-नियाज़ (आत्मनिर्भर) हूँ। यानी ऐसा व्यक्ति अपने नफ़्सियात (मानसिकता) के तहत ये समझ रहा है कि अगर माल और औलाद (manpower) जैसे दो बड़े संसाधन मेरे पास मौजूद हैं, तो फिर मैं मोहताज नहीं हूँ—मैं पूरी तरह “ग़नी” हूँ।


लेकिन इस तरह का सोचना हक़ीक़त में बेहद ख़तरनाक है। क्योंकि इसका मतलब यह है कि ख़ुदा को हटाकर, ख़ुदा की पैदा की हुई चीज़ों—resourcesको ही उस जगह बिठा देना है, जहाँ सिर्फ़ ख़ालिक़ (Creator) का हक़ है।

 

अल्लाह-तआला ने बिल्कुल स्पष्ट कर दिया कि अल्लाह के सिवा कोई भी चीज़ किसी को उसकी मोहताजी से नहीं बचा सकती।


 

यहाँ भले ही आख़िरत के संदर्भ में बात हो रही है, लेकिन जब हम इसे अपनी ज़िंदगी पर लागू करके देखते हैं, तो यह एक बुनियादी हक़ीक़त को खोल देती है।


यहां से हम ये बात सीख रहे हैं कि चाहे हमारे पास कितनी ही औलाद (manpower) क्यों न हो, कितना भी माल और वेल्थ क्यों न हो, तब भी हक़ीक़त में हम मजबूर हैं, मोहताज हैं, और अल्लाह की मदद के बिना एक क़दम भी आगे नहीं बढ़ सकते।

 

ईमान की असल पहचान यही नफ़्सियात है कि इंसान हर हाल में अपने आपको अल्लाह का मोहताज समझे। अगर यह एहसास हमारे अंदर विकसित ही न हो, तो फिर हम ईमान वाले नहीं रहते बल्कि धीरे-धीरे कुफ़्र वाली नफ़्सियात (इंकार की मानसिकता) की तरफ़ बढ़ने लगते हैं, जहाँ भरोसा अल्लाह पर नहीं बल्कि संसाधनों (resources) पर टिक जाता है।

 

इसलिए अपने ईमान और कुफ़्र के पैमाने पर हमें इस आयत को अपने ऊपर लागू करके देखना है, हमें ख़ुद से यह सवाल करना है कि हमारी ज़िंदगी में वह कौन-सी चीज़ है जिसके बारे में हम यह गुमान पाल रहे हैं कि अब हम “ग़नी” हो गए, अब हमें किसी की ज़रूरत नहीं रही।

 

इसलिए ऐसी हर सोच, हर सहारे और हर उस भ्रम को— जो हमें यह झूठा एहसास कराए कि हम अपने बल पर चल रहे हैं—उसे फ़ौरन अपने गर्दन से उतार फेंक दें, और इसकी जगह अल्लाह पर पूरा ए'तिमाद करके इन बातों को सोचना शुरू कर दें। 





अगली आयत : 


वे इस दुनिया की ज़िन्दगी में जो कुछ ख़र्च करते हैं उसकी मिसाल उस हवा की सी है जिसमें पाला हो और वह उन लोगों की खेती पर चले जिन्होंने अपने ऊपर ज़ुल्म किया है फिर वह उसको बर्बाद कर दे। अल्लाह ने उन पर ज़ुल्म नहीं किया बल्कि वे ख़ुद अपनी जानों पर ज़ुल्म करते हैं। [3: 117]



इस आयत में अल्लाह तआला ने उन लोगों की मिसाल दी है जो दुनिया की ज़िंदगी में तो ख़र्च करते हैं — चाहे वह अपनी दुनिया सँवारने के लिए हो या भलाई और ख़ैरात के नाम पर—लेकिन उनका यह सारा ख़र्च आख़िरत के लिहाज़ से बे-नतीजा हो कर रह जाता है।


उनकी हालत उस किसान की तरह बताई गई है जिसकी खेती देखने में पूरी तरह तैयार और हरी-भरी हो, मगर अचानक उस पर पाले वाली ठंडी हवा चल जाए और पूरी फसल बर्बाद हो जाए।

 

यह एक बहुत गहरी और असरदार मिसाल है, जो बिना ज़्यादा कुछ कहे पूरी बात समझा देती है।

 

यह बात एक मशहूर हदीस से बिल्कुल साफ़ हो जाती है कि “दुनिया आख़िरत की खेती है।” 

यानी हर इंसान अपनी पूरी ज़िंदगी में जो कुछ भी करता है, वह दरअसल आख़िरत के लिए अपना एक खेत तैयार कर रहा होता है। इस दुनिया में वह जिस तरह का बीज बोएगा, आख़िरत में उसे वैसी ही फसल मिलेगी।  

 

इसी इशारे के तहत यह बताया गया है कि लोग दुनिया की ज़िन्दगी में जो कुछ भी ख़र्च कर रहे हैं—चाहे वह समय हो, माल हो या मेहनत—वह दरअसल अपनी उसी खेती में ख़र्च कर रहे हैं। और वे यह उम्मीद रखते हैं कि इसका पूरा फल उन्हें ज़रूर मिल जाएगा।  

 

लेकिन इसी दुनिया में इंसान अपनी आँखों से यह भी देखता है कि कभी कोई खेत बहुत हरा-भरा और लहलहाता हुआ नज़र आता है, लेकिन फिर अचानक पड़ने वाला पाला उसकी सारी हरियाली जला देता है। एक ही झटके में किसान की पूरी मेहनत बेकार हो जाती है।


क़ुरआन इसी मंज़र को सामने रखकर समझाता है कि यही हालत उन आमाल (कर्मों) की होती है, जिनमें अपने नफ़्स पर ज़ुल्म करना शामिल हो ।

 

इस मिसाल से इंसानों को यह बात गहराई से समझ लेनी चाहिए कि जब वह आख़िरत में अपनी इसी दुनिया की बोई हुई फसल काटने के लिए खड़ा होगा, तो उसे पता चलेगा कि उसकी खेती पूरी तरह जल चुकी है और वहाँ कोई फसल बची ही नहीं है। उस वक़्त वह अपने आप को पूरी तरह तबाह और खाली हाथ पाएगा।

यह उन लोगों की मिसाल है जिन्होंने अपने ही नफ़्स पर ज़ुल्म किया। 

 

अब सवाल यह है कि अपने नफ़्स पर ज़ुल्म करने का मतलब क्या है ?


 

अपने नफ़्स पर ज़ुल्म करने का मतलब यह है कि इंसान अल्लाह को वह हक़ीक़ी मक़ाम न दे जो असल में उसी का है, और उसकी जगह दूसरी चीज़ों को उस मक़ाम पर बैठा दे। जबकि इंसान की फ़ितरत में अल्लाह की पहचान ‘रब की हैसियत से’ पहले से ही मौजूद है (क़ुरआन 7:172)  


जब इंसान इस मक़ाम पर दूसरी चीज़ों को बैठा देता है, तो वह ऐसे रास्ते पर चल पड़ता है जो उसकी असल फ़ितरत (nature)जिस पर अल्लाह ने उसे पैदा किया है—के ख़िलाफ़ होता है। 

  

इसका नतीजा यह निकलता है कि वह अपने ही सोचने-समझने की ताक़त, अपनी अक़्ल (Intellect) और अपनी पूरी मनोवैज्ञानिक बनावट (Psychological composition) के साथ नाइंसाफ़ी करने लगता है।


इस तरह इंसान अल्लाह की बनाई हुई फ़ितरत से टकराकर, उसके ख़िलाफ़ जाकर ख़ुद अपना ही नुक़्सान कर बैठता है। और यही अपने नफ़्स पर किया गया सबसे बड़ा ज़ुल्म है।


 

तो ये कुछ अहम बातें थीं, जिन्हें थोड़े विस्तार से समझने और आपके सामने रखने की कोशिश की। और इन आयात के हर हिस्से को अलग-अलग करके यह देखा गया कि हम इनमें से अपने लिए क्या सीख ले सकते हैं और उन्हें अपनी ज़िंदगी पर कैसे लागू कर सकते हैं।

 

इन आयात को पढ़ते वक़्त हमें यह ग़लतफ़हमी नहीं पालनी चाहिए कि इनमें सिर्फ़ पुराने ज़माने के यहूदियों के किसी ख़ास गिरोह का ज़िक्र है और इसका हमसे कोई ताल्लुक़ नहीं।


हक़ीक़त यह है कि इनमें हर दौर के इंसानों के लिए रहनुमाई मौजूद है। 

ये आयात हमें बताती हैं कि आज की दुनिया में हमें किस सोच को अपनाना चाहिए, किस रास्ते पर चलना चाहिए, और आख़िरत की कामयाबी के लिए कैसी तैयारी करना ज़रूरी है।



Note: क़ुरआन मुताला पर एक दा’ई के बयान का सारांश। 



तज़्कीरुल-क़ुरआन | तज़्कीर  


नेकियों में सबक़त (कल्याण कार्यों में स्पर्धा) से मुराद इस आयत में अहले-किताब मोमिनों का यह अमल है कि मुहम्मद (सल्ल०) की ज़बान से जब ख़ुदाई सच्चाई का एलान हुआ तो उन्होंने फ़ौरन उसे पहचान लिया और उसकी तरफ़ आजिज़ाना दौड़ पड़े । 


उस वक़्त एक तरफ़ हज़रत मूसा का दीन था जो तारीख़ी अज़्मत और रिवायती तक़द्दुस (पावनता) के ज़ोर पर क़ायम था। 

दूसरी तरफ मुहम्मद (सल्ल०) का दीन था जिसकी पुश्त पर अभी तक सिर्फ़ दलील की ताक़त थी, तारीख़ी अज़्मत और रिवायती तक़द्दुस का वज़न अभी तक उसके साथ शामिल नहीं हुआ था ।

 

अपने दीन और वक़्त के नबी के दीन में यह फ़र्क़ वक़्त के नबी के दीन को मानने में ज़बरदस्त रुकावट था । मगर वे इस रुकावट को पार करने में कामयाब हो गए और बढ़कर वक़्त के नबी के दीन को मान लिया ।


माल व औलाद की मुहब्बत आदमी को क़ुर्बानी वाले दीन पर आने नहीं देती । अलबत्ता नुमाइशी क़िस्म के आमाल का मुज़ाहिरा करके वह समझता है कि वह ख़ुदा के दीन पर क़ायम है ।

मगर जिस तरह सख़्त ठंडी हवा अचानक पूरी खेती को बर्बाद कर देती है इसी तरह क़ियामत का तूफ़ान उनके नुमाइशी आमाल को बेक़ीमत करके रख देगा ।


 

यहूद में सिर्फ़ कुछ लोग थे जो मुहम्मद (सल्ल०) पर ईमान लाए थे । ‘उम्मते क़ायमा’ की हैसियत से उनका मुस्तक़िल ज़िक्र करना ज़ाहिर करता है कि चंद आदमी अगर अल्लाह से डरने वाले हों तो वे भीड़ के मुक़ाबले में अल्लाह की नज़र में ज़्यादा कीमती होते हैं ।

 

नजात के लिए सिर्फ़ यह काफ़ी नहीं कि किसी पैग़म्बर के नाम पर जो नस्ली उम्मत बन गयी है आदमी उस उम्मत में शामिल रहे। बल्कि अस्ल ज़रूरत यह है कि वह अहद का पाबंद बने।

 

अहद से मुराद ईमान है।

ईमान बंदे और ख़ुदा के दर्मियान एक अहद है ।


ईमान लाकर बंदा अपने आपको इसका पाबंद करता है कि वह अपने आपको पूरी तरह अल्लाह का वफ़ादार और इताअतगुज़ार बनाएगा ।

दूसरे लफ़्ज़ों में गिरोही निस्बत नहीं बल्कि ज़ाती अमल वह चीज़ है जो किसी आदमी को ख़ुदा की रहमत और बख़्शिश का मुस्तहिक़ बनाती है ।

 

इस अहद में तमाम ईमानी ज़िम्मेदारियां शामिल है । तंहाइयों में अल्लाह की याद, अल्लाह की इबादतगुज़ारी, आख़िरत को सामने रख कर ज़िंदगी गुज़ारना, अपने आसपास जो अफ़राद हों उन्हें भलाई पर लाने की कोशिश करना, जो अफ़राद बुराई करें उन्हें बुराई से हटाने में पूरा ज़ोर लगा देना, ख़ुदा की पसंद के कामों में दौड़ कर हिस्सा लेना ।

 

जो लोग ऐसा करें वही रब्बानी अहद पर पूरे उतरे । वे ख़ुदा के मक़बूल बंदे हैं । उनका अमल ख़ुदा के इल्म में है, वह उन्हें उनके अमल का बदला देगा और फ़ैसले के दिन उनकी पूरी क़द्रदानी फ़रमाएगा ।




और  पढ़ें →






Post a Comment

Previous Post Next Post