क़ुरआन की आयात पर ग़ौर-ओ-फ़िक्र
सूरह: आल-ए-इमरान || 113 – 115
[3: 113]: सब अहले किताब एक जैसे नहीं। इनमें एक गिरोह अहद पर क़ायम है। वे रातों को अल्लाह की आयतें पढ़ते हैं और वे सज्दा करते हैं।
[3: 114]: वे अल्लाह पर और आख़िरत के दिन पर ईमान रखते हैं, और भलाई का हुक्म देते हैं और बुराई से रोकते हैं और नेक कामों में दौड़ते हैं। ये सालेह (नेक) लोग हैं।
[3: 115]: जो नेकी भी वे करेंगे उसकी ना-क़द्री न की जाएगी और अल्लाह परहेज़गारों को ख़ूब जानता है।
सब अहले किताब एक जैसे नहीं। इनमें एक गिरोह अहद पर क़ायम है। वे रातों को अल्लाह की आयतें पढ़ते हैं और वे सज्दा करते हैं। [3: 113]
पहली आयत शुरू होती है ‘लैसू सवाअ़’ के हवाले से कि “सब बराबर
नहीं हैं।”
क़ुरआन पढ़ते वक़्त यह बात समझना बहुत ज़रूरी है कि हर आयात के
साथ उसका एक immediate reference
होता है ।
यानी : वो आयात किसके बारे में है, किस हालात (पस-ए-मंज़र) में उतर रहीं है या बयान हो रही है,
और उसका मफ़हूम (मूल
भाव) क्या है।
जैसे - ये आयात रसूलुल्लाह (सल्ल०) पर नाज़िल
हुईं, और इनमें
उस दौर के यहूदियों का ज़िक्र हो रहा है— लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि यह आयात पूरे
यहूदियों पर नहीं, बल्कि
उनमें से सिर्फ़ कुछ लोगों पर बात कर रही हैं, जो एक ख़ास रवैये पर क़ायम थे।
ये एक पस-ए-मंज़र है जिससे हमें आयात का एक immediate reference मिल रहा है।
जिसको refer करके हम इन आयात को सही तरह से समझना चाहते हैं या समझते हैं।
दूसरी अहम बात यह है कि इन आयात को हम अपनी ज़िंदगी में कैसे
लागू (personalize)
करें—यानी इनसे हम क्या सीखें और ये मेरी अपनी ज़िंदगी से किस
तरह ताल्लुक़ रखती हैं।
क़ुरआन की आयात को पढ़ते वक़्त हमारी असली कोशिश और मक़्सद यही होना चाहिए।
“लैसू सवाअ़” (सब एक जैसे नहीं हैं) की आयत हमें एक बहुत अहम और बुनियादी उसूल सिखाती है।
जब भी किसी क़ौम के बारे में बात की जाए,
तो इस्लाम हमें सिखाता है कि सिर्फ़ उतनी ही बात कही जाए जितनी
सच हो, और सिर्फ़
उन्हीं लोगों के बारे में कही जाए जिन पर वह बात सही मायने में लागू होती है। और जिन
लोगों के अंदर अच्छाई मौजूद हो, उन्हें अलग पहचान दी जाए।
यही इस्लाम का संतुलित, न्यायपूर्ण और इंसाफ़ पर आधारित तरीक़ा है, और यही उसूल आज के मौजूदा दौर में हमारे लिए भी पूरी तरह लागू होता है।
लेकिन आज की हक़ीक़त यह है कि हमारा रवैया इससे बिल्कुल उलट होता जा रहा है।
कहीं एक छोटा-सा वाक़िआ या मसला सामने आ जाए, तो हम उसे फ़ौरन
generalize कर देते हैं
— यानी एक व्यक्ति या कुछ लोगों की ग़लती को पूरी क़ौम या पूरे गिरोह के खाते में डाल
देते हैं। तो यहां हम “लैसू सवाअ़” (सब एक जैसे नहीं हैं) के उसूल को अपनी ज़िंदगी पर लागू कर सकते हैं और यह सीख सकते हैं कि हमलोगों को
ऐसा नहीं करना चाहिए।
मिसाल के तौर पर आज बहुत-से मुसलमान यह सोचने लगे हैं कि पूरी दुनिया इस्लाम के ख़िलाफ़ हो चुकी है, और इसे वे “इस्लामोफ़ोबिया” कहते हैं। इससे यह मतलब उभारने की कोशिश होती है कि पूरी दुनिया के सारे लोग इस्लाम के ख़िलाफ़ नफ़रत उगल रहे हैं, इस्लाम से डर कर ये बता रहे हैं कि इस्लाम एक ख़तरनाक मज़हब है और इस मज़हब को ख़त्म हो जाना चाहिए।
लेकिन यहाँ ठहर कर सोचने की ज़रूरत है कि हक़ीक़त क्या है, और ऐसे हालात में हमें क्या करना चाहिए ?
सच यह है कि ऐसी बातें पूरी दुनिया नहीं कर रही है।
यह सोच पूरी दुनिया की नहीं, बल्कि कुछ लोगों, कुछ हल्कों या कुछ लीडरों तक ही सीमित है। पूरी दुनिया पर यह
बात लागू नहीं होती।
यही बारीक लेकिन ज़रूरी फर्क़ क़ुरआन हमें “लैसू सवाअ़” के उसूल
के ज़रिए सिखा रहा है—कि “सब एक जैसे नहीं हैं” और नहीं हो सकते। उनमें अच्छे भी हैं,
और अच्छे लोगों को अलग पहचान दी जानी चाहिए।
इस आयत से हमें यह अहम सीख मिल गई कि किसी भी क़ौम, समुदाय या गिरोह के बारे में हम कैसा नज़रिया अपनाएं।
अगर हम इतिहास पर नज़र डालें, तो पता चलता है कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) के ज़माने
में सभी अहले-किताब (यहूदी और ईसाई) के बारे में कभी यह सोच नहीं बनाई गई कि सारे के सारे दुश्मन
हैं या सभी इस्लाम के इनकारी या मुख़ालिफ़ हैं। ऐसा बिल्कुल नहीं सोचा गया।
इसके बजाय क़ुरआन ने एक संतुलित, न्यायपूर्ण और इंसाफ़ पर आधारित नज़रिया दिया और स्पष्ट किया
कि "ऐसा नहीं है कि वे सब एक जैसे हैं। उनमें से कुछ लोग ऐसे भी हैं,
जो इस तरह सोचते हैं..."
यही सोच हमें आज के दौर में भी अपनाने की ज़रूरत है।
.......इनमें एक गिरोह अहद पर क़ायम है। वे रातों को अल्लाह की आयतें पढ़ते हैं और वे सज्दा करते हैं। [3: 113]
यहाँ जिन “चंद लोगों” की बात हो रही है, उनका ज़िक्र तफ़सीर की किताबों में मिलता है। तफ़सीरी रवायात में यह बात बताई गई है कि “वे कुछ लोग” पाँच यहूदी थे, जिन्होंने अब्दुलाह बिन सलाम की सरदारी में बाद को इस्लाम क़ुबूल कर लिया था। तो ये वो ‘कुछ लोग’ हैं जिनको refer किया जा रहा है।
अगर हम इस बात को ऐसे समझें कि वो चंद लोग सिर्फ़
पांच ही लोग थे, तो यहाँ हमारे लिए एक बहुत बड़ी और ज़बरदस्त सीख छुपी हुई है।
इस्लाम का नज़रिया इतना बारीक और न्यायपूर्ण है
कि वह यह भी मंज़ूर नहीं करता कि अच्छाई पर क़ायम कुछ गिने-चुने लोगों को मेजोरिटी
(majority) के साथ मिलाकर ऐसे पेश कर दिया जाए जैसे सब के सब एक जैसे
हों या सब के सब भटके हुए हैं — जबकि ये पाँच लोग
भटके हुए नहीं है।
इंसाफ़ का तक़ाज़ा यही है कि अच्छे लोगों को अलग
करके पहचाना जाए।
यही क़ुरआन का उसूल है—“लैसू सवाअ़”, यानी सब एक जैसे नहीं हैं।
ये बहुत बड़ी लर्निंग है,
जिसे हमें हमेशा याद रखना चाहिए और अपनी सोच और अपने बर्ताव, दोनों में अपनाना चाहिए।
दूसरी अहम बात क़ुरआन की इस आयत में सामने आती है:
मिन अहलिल किताबि उम्मतुन क़ाइमतुन
(3:113)
इसका मतलब यह है कि
अहले-किताब (यहूदी और ईसाई) में से कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिन्हें उम्मतुन क़ाइमतुन बताया गया है।
उम्मतुन – उम्मत है और उसकी सिफ़त बताई गई है – क़ाइमतुन – ये क़ाइम उम्मत है।
यहाँ ये बात समझ में आ रही है कि अल्लाह तआला ने अहले-किताब में से जिन पांच लोगों या कुछ लोगों को अलग किया (मैं तफ़सीरी हवाले से पांच की बात कर रहा हूँ आप लोगों के समझ के लिए) उनकी एक सिफ़त को बताया जा रहा है कि ये उम्मते-क़ाइमा हैं: यानी ऐसे लोग जो अस्ल दीन (मूल
धर्म) पर मज़बूती के साथ क़ायम हैं।
ग़ौर करने की बात यह है कि सिर्फ़ पाँच इंसानों
को अल्लाह ने “एक उम्मत” क़रार दे दिया। इससे ये बात समझ में आ रही है कि अल्लाह
के नज़दीक भीड़ की कोई अहमियत नहीं—अस्ल चीज़ क़्वालिटी है, न कि क़्वांटिटी।
अगर थोड़े से लोग भी अल्लाह से डरने वाले हों तो वे
भीड़ के मुक़ाबले में अल्लाह की नज़र में ज़्यादा क़ीमती होते हैं।
ऐसे ही क़्वालिटी वाले चंद लोगों को अल्लाह चुन
लेता है और उनके बारे में फ़रमाता है कि ये “उम्मत-ए-क़ाइमा” है। यानी गिनती
में कम होकर भी, अगर लोग अस्ल दीन पर मज़बूती से खड़े हों, तो वे अल्लाह की नज़र में एक पूरी उम्मत का दर्जा
रखते हैं।
यह आयत हमें यह सिखा रही है कि हमें सिर्फ़ भीड़ का
हिस्सा बनकर संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए, बल्कि हमें अपने अंदर ऐसी क़्वालिटी पैदा करने की कोशिश करनी चाहिए जिससे हम अल्लाह की नज़र में चुने हुए
लोगों में शामिल हो सकें। अल्लाह हमें उस उम्मत में शामिल कर ले जैसा उम्मत वह
बनाना चाहता है और जिसे वह अपनी राह पर मज़बूती से क़ायम देखना चाहता है।
अगर हम सिर्फ़ नस्ली पहचान या किसी गिरोह से
जुड़ाव के आधार पर अपने आपको किसी उम्मत का हिस्सा समझ ले, तो यह कोई गारंटी नहीं है। आख़िरत में अल्लाह तआला
यह फ़ैसला सुना सकता है कि तुम उस उम्मत शामिल नहीं हो जिसे मैंने चुना था और जिसे
अपनी राह पर क़ायम माना था। तो ऐसी सूरत में यह हमारे लिए बेहद अफ़सोस और पछतावे
की बात होगी।
उम्मत-ए-क़ाइमा — जिसका ज़िक्र कुरआन में अहले-किताब के कुछ चुनिंदा
लोगों के बारे में immediate
reference तौर पर आया है — अगर हम इसे अपने ऊपर लागू करें और अपनी ज़िंदगी से
जोड़कर समझें, तो इससे ये बात समझ में आएगी कि हमें किस तरह का दीनदार इंसान बनना चाहिए। हमें अपने अंदर कौन-सी ख़ूबियाँ
(क़्वालिटीज़) पैदा करने की कोशिश करनी चाहिए और किन गुणों को मजबूत
करना चाहिए — यही असल सीख है।
इस पूरी बात की जड़ तज़्किया है—यानी अपने भीतर की सफ़ाई और सुधार
का वह अमल, जिसके ज़रिये हमारे अंदर अच्छी ख़ूबियाँ पैदा हो जाए। ये बहुत अहम नुक़्ता है जिसकी तरफ़
मौलाना ने अपने तज़्कीर (तज़्कीरुल-क़ुरआन) में इशारा किया है।
उसके बाद यह बात ध्यान देने की है कि अल्लाह तआला
ने अहले-किताब के जिन लोगों को उम्मत-ए-क़ाइमा कहा, उनके
बारे यह भी बताया कि वे उम्मत-ए-क़ाइमा क्यों हैं।
उनकी ख़ूबियाँ ये बताई गई कि ये वो लोग हैं जो
रात के वक़्त अल्लाह की आयात
की तिलावत करते हैं और सज्दा करते हैं।
.....वे रातों को अल्लाह
की आयात पढ़ते हैं और वे
सज्दा करते हैं।
अगर हम इन सिफ़ात (क़्वालिटीज़) पर ग़ौर से सोचे,
तो ये सवाल हमारे ज़ेहन में उभरता
है कि ये लोग रात के वक़्त अल्लाह की आयात की तिलावत क्यों
करते थे ?
और फिर यह भी कि यहाँ “आयात की तिलावत” से मुराद (मतलब) क्या हो सकता है ?
ज़ाहिर है कि वे क़ुरआन की तिलावत तो नहीं कर रहे होंगे, क्योंकि उस वक़्त क़ुरआन तो मुहम्मद रसूलुल्लाह पर नाज़िल हो ही रहा था। तो फिर सवाल पैदा होता है कि आख़िर कौन-सी आयात-ए-इलाही (अल्लाह की निशानियों) को वे पढ़ रहे थे?
अगर हम “तिलावत” (yatloona) को उसके तौसी मफ़हूम (विस्तृत मतलब) में समझें, तो बात साफ़ हो जाती है।
यह लफ़्ज़ असल में अरबी शब्द “तला” से बना है, जिसका बुनियादी मतलब होता है — पीछे चलना, अनुसरण करना या follow करना।
जैसे स्कूल में टीचर समझाने के बाद पूछते थे:
“क्या तुमने मेरी बात follow की?”
इससे यह बात समझ में आती है कि तिलावत सिर्फ़ ज़ुबान से पढ़ लेने का नाम नहीं है।
तिलावत का असल मतलब यह है कि आप ने किसी चीज़ को समझा, उस पर ग़ौर किया, और फिर उसके पीछे चलने लगे — यानी उसे practically follow करने लगे।
इस तरह “आयातिल्लाह की तिलावत” (yatloona
Aayaatil laahi) का मतलब यह हुआ कि आप अल्लाह की निशानियों को
देखकर और सोच-समझकर उन निशानियों के बताए हुए रास्ते को follow कर रहे हैं, उनके पीछे चल पड़े हैं।
इसकी एक शक्ल यह होती है कि आप मल्फ़ूज़ आयात को पढ़ रहे हैं — यानी अल्लाह की वे आयात जो लफ़्ज़ों में मौजूद हैं, जैसे कुरआन।
लेकिन “ग़ैर-मल्फ़ूज़ आयात” — यानी
वे आयात जिन्हें लफ़्ज़ों में बयान नहीं किया गया। ये अल्लाह की वे आयात (निशानियाँ) हैं जो पूरी कायनात में फैली हुई हैं और इतनी ज़्यादा
कि हम इनका पूरा हिसाब भी नहीं लगा सकते।
अब सवाल यह है कि एक बंदा-ए-ख़ुदा जब ग़ैर-मल्फ़ूज़
आयात को पढ़ रहा होगा तो कैसे पढ़ रहा होगा ? यहाँ ये
समझने की बात है।
इसकी एक सूरत ये है कि उनके पास जो किताब है
मल्फ़ूज़ (शब्दों में लिखे) सूरत में, उसको वे पढ़ रहे होंगे, और ये भी तौसी मफ़हूम
(विस्तृत मतलब) में शामिल हो सकता है कि अल्लाह की आयात जो ग़ैर-मल्फ़ूज़ सूरत में हैं उनका भी
मुताला करने वाले लोग थे, यानी वो एक पत्ती की बनावट या किसी दृश्य या क़ुदरत की किसी
व्यवस्था पर ग़ौर करने से अल्लाह की अज़मत के गीत गाना शुरू कर देते होंगे, वो किसी
बात या चीज़ पर ग़ौर-व-फ़िक्र करते होंगे तो उनके सामने अल्लाह
की रुबूबिय्यत, अल्लाह की अज़मत और बड़ाई झलकती होगी। और ये काम है वो रात के औक़ात
में कर रहे होते होंगे।
दिन के समय इंसान दुनिया के कामों में इतना उलझा रहता है कि गहराई से सोचने या अल्लाह की मल्फ़ूज़ और ग़ैर-मल्फ़ूज़ आयात पर ठहर कर ध्यान देने का मौक़ा नहीं मिल पाता। लेकिन रात के वक़्त, जब इंसान दुनिया की दौड़-भाग से कुछ देर के लिए अलग होता है, तब वह रात का सुकून भरा वक़्त चुनता है — ताकि वह अल्लाह की मल्फ़ूज़ और ग़ैर-मल्फ़ूज़ आयात का तिलावत कर सके, उस पर ग़ौर-ओ-फ़िक्र कर सके और उनसे रहनुमाई ले सके ।
अहले-किताब में कुछ ऐसे लोग भी थे जिन्होंने अपनी ज़िंदगी का रुख़ पूरी तरह अल्लाह की तरफ़ कर लिया था। वे अल्लाह की मा’रिफ़त (पहचान) में जीने वाले बन गए थे, रात के औक़ात में भी वे अल्लाह की निशानियों (आयतों) को पढ़ रहे होते थे, समझ रहे होते थे, चाहे वो लिखी हुई आयात हों, यानी किताब की आयात, या फिर प्रकृति में फैली हुई क़ुदरती निशानियाँ (ग़ैर–मल्फ़ूज़ आयात)।
इस तरह वे अल्लाह की याद और उसकी पहचान (इरफ़ान) में डूबे रहते थे।
जब इंसान इरफ़ान (अल्लाह की पहचान) के इस
मरहले तक पहुँच जाता है, तो उस पर अल्लाह की अज़मत
साफ़-साफ़ खुलने लगती है। अल्लाह की बड़ाई की हैबत उसके दिल पर इतना गहरा असर
डालती है कि वह अपने आप को बेबस पाता है, फिर उसके सामने इसके सिवा कोई चारा नहीं
रह जाता कि वह अल्लाह के सामने ढह जाए, वह सज्दा में गिरकर कहे, “ऐ अल्लाह, तू ही सबसे अज़ीम (बड़ा) है, मैं तो तेरे सामने झुका हुआ एक बंदा हूँ।”
इसी हक़ीक़त को क़ुरआन इन अल्फ़ाज़ में बयान करता
है:
“…..वे रातों को अल्लाह की आयात पढ़ते हैं और वे सज्दा
करते हैं।” (3:113)
यह आयत दरअसल इस बात को बताने के लिए है कि
अहले-किताब के उन चंद लोगों के अंदर कैसी ख़ास क़्वालिटी पैदा हो गई थी।
अब ज़रा हम सब अपने दिल से पूछकर देखें:
क्या अल्लाह ने हमें इस दुनिया में सिर्फ़ लिखी हुई आयात—यानी किताब की आयात—पढ़ने के लिए भेजा है, या फिर उसने पूरी कायनात में फैली अपनी निशानियों (ग़ैर-मल्फ़ूज़ आयात) को भी समझने और उन पर ग़ौर करने के लिए भेजा है।
अगर हम अपने अंदर यह हौसला और सलीक़ा पैदा कर लें कि लिखी हुई आयात के साथ-साथ कायनात में फैली अल्लाह की आयात (निशानियों) पर भी ग़ौर करें, उन्हें समझने की कोशिश करें और अल्लाह की अज़मत (बे-इंतिहा और बे-मिसाल महानता) को पहचानना शुरू कर दें, तो यक़ीनन हमारे दिलो-दिमाग़ पर इसका असर पड़ने लगेगा। फिर
ऐसा वक़्त आएगा—और बार-बार आएगा—कि अल्लाह की अज़मत का एहसास हमारे दिलो-दिमाग़ पर इतनी गहराई से छा जाएगा कि
उसके सामने ढह जाने के सिवा हमारे पास कोई और रास्ता नहीं रहेगा।
उस वक़्त हम ख़ुद-ब-ख़ुद यह कह उठेंगे—
“ऐ अल्लाह! तू ही सबसे बड़ा है। मैं तेरे सामने अपने आपको ज़लील (छोटे दर्जे का) करता हूँ। अपनी नाक और पेशानी और सब कुछ तेरे
सामने रख देता हूँ।”
अगली आयत :
वे अल्लाह पर और आख़िरत के दिन पर ईमान रखते हैं, और भलाई का हुक्म देते हैं और बुराई से रोकते हैं और नेक कामों में दौड़ते हैं। ये सालेह (नेक) लोग हैं।
[3: 114]
सूरह आले-इमरान की इस आयत (114) में अहले-किताब के उन कुछ लोगों की और अहम ख़ूबियाँ बताई गई हैं।
सबसे पहली बात यह बताई गई है कि वे
अल्लाह पर और आख़िरत के दिन पर ईमान रखते हैं।
क़ुरआन में इस बात को बहुत ज़्यादा अहमियत दी गई
है।
पूरे इंसान को पैदा करने का जो सबसे अहम
नुक़्ता है वह यही है कि इस दुनिया में इंसान की ज़िन्दगी बहुत थोड़े दिनों की है।
इंसानों को इस दुनिया में इसलिए भेजा गया
है कि वे इस सीमित ज़िंदगी में अपने आप को इस तरह तैयार करें कि मरने के बाद मिलने वाली हमेशा की ज़िंदगी के लिए वे पूरी तरह योग्य (deserving) क़रार दे दिए जाएं।
अब ज़ाहिर सी बात है कि ईमान लाना इस बात
का तक़ाज़ा करता है कि - मैं अल्लाह को मानता हूँ, उसे पहचानता हूँ, और उसकी पहचान (इरफ़ान) के अमल में रहना चाहता हूँ तो क्या इस दुनिया की
60–70 या 100 साल की सीमित ज़िंदगी
अल्लाह के इरफ़ान (पहचान) के लिए काफ़ी हो
सकती है?
धीरे-धीरे हमें यह एहसास होने लगेगा कि अल्लाह की पहचान (इरफ़ान) और उसकी अज़मत (बे-इंतिहा और बे-मिसाल महानता) को समझने के लिए इस दुनिया की मेरी ज़िन्दगी बहुत छोटी है।
यहीं से दिल के अंदर यह चाह पैदा होने लगेगी कि काश मुझे तो ऐसी ज़िंदगी मिले
जो बिना रुके चले, जो हमेशा रहने वाली हो, जो कभी ख़त्म न हो।
और जब अल्लाह की पहचान, उसकी अज़मत, उसकी हिक्मत और
उसकी रुबूबिय्यत (परवरिश करने वाली सत्ता) का एहसास हमारे दिल में गहराई से उतर जाता है, तो उसी वक़्त यह यक़ीन भी पैदा हो हो जाता है कि मेरा रब सिर्फ़ इस दुनिया को और यहाँ की छोटी सी
ज़िंदगी को आख़िरी मंज़िल नहीं बना सकता। यक़ीनन वह मुझे मौत देगा और फिर आख़िरत में एक ऐसी हमेशा रहने वाली ज़िंदगी देगा, जहाँ मैं अपने ईमान
और अल्लाह की मा’रिफ़त (पहचान) की बात को बहुत ऊँचे और बेहतर दर्जे पर अंजाम दे सकूँगा।
इसीलिए अल्लाह पर ईमान के साथ आख़िरत पर ईमान अपने-आप शामिल हो जाता है, क्योंकि ये दो ऐसी बातें हैं जो एक-दूसरे के बिना पूरी नहीं होतीं।
अल्लाह की पहचान
इंसान के भीतर हमेशा रहने वाली ज़िंदगी की चाह पैदा करती है, और यही चाह, आख़िरत — यानी दूसरी और हमेशा की ज़िंदगी की एक
बुनियादी तलब बन जाती है। यही वजह है कि इसे ईमान का हिस्सा माना गया है।
मौलाना ने अपने तज़्कीर (तज़्कीरुल-क़ुरआन) में इस बात को अहद के मायने में लिया है — यानी अल्लाह से किया गया वादा।
ईमान लाना असल में यह वादा है कि
“ऐ अल्लाह! तू जो ज़िम्मेदारी मुझे देगा, मैं उसे पूरा करूँगा।”
इस अहद का मतलब यह भी है कि इंसान अपनी
असली तैयारी इस दुनिया के लिए नहीं, बल्कि उस दूसरी ज़िंदगी के लिए करे जो हमेशा रहने वाली है।
इसीलिए ईमान का यह अहद (वादा) कई अहम ज़िम्मेदारियाँ लिए होता है:
अल्लाह को याद रखना, उसकी इबादत करना, आख़िरत को सामने रखकर ज़िंदगी गुज़ारना, लोगों को भलाई की तरफ़ बुलाना, बुराई से रोकने की कोशिश करना, और उन कामों में आगे बढ़ना जो अल्लाह को पसंद
हैं।
जब वह देखता है कि लोग भलाई पर (मा‘रूफ़ात) पर ठीक से अमल
नहीं कर रहे हैं, तो वह मजबूर होता
है कि वह नसीहत करे, और जब वह बुराई को देखता है, तो उसे रोकने की
ज़िम्मेदारी महसूस करता है।
ये अमल वह इसलिए करता है ताकि लोगों में
यह समझ बने कि आख़िरत की ज़िंदगी की तैयारी इसी दुनिया के अच्छे कामों से होती है।
इसलिए, वह अल्लाह और
आख़िरत पर ईमान रखते हुए हमेशा तीन काम करता रहता है:
पहली, वह भलाई का हुक्म देता है
(यअमुरू-न बिल्मअ‘रूफ़)।
दूसरी, वह बुराई से रोकने की कोशिश करता है (यन्हौ-न अनि ल-मुंकर)।
और तीसरी, जहाँ भी कोई भलाई का काम नज़र आए, वह उसे करने के लिए दौड़ पड़ता है (युसारिअू-न फ़ि ल-ख़ैरात)।
क़ुरआन इसी को इन शब्दों में बयान करता है:
अगर “युसारिअू-न फ़िल-ख़ैरात” को immediate reference में देखा जाए, तो अहले-किताब में जो चंद लोग थे उन्होंने जब रसूलुल्लाह को देखा तो तुरंत पहचान लिया
कि ये अल्लाह के सच्चे रसूल हैं।
इसलिए उन्होंने दूसरों की परवाह नहीं की
बल्कि इस ख़ैर के काम में ख़ुद सबसे पहले आगे बढ़े और अल्लाह के रसूल पर ईमान ले
आए।
“युसारिअू-न फ़िल-ख़ैरात” का immediate reference हालाँकि उन्हीं पाँच लोगों के बारे में है जो अब्दुल्लाह बिन सलाम की सरदारी में आए थे,
लेकिन इस आयत का पैग़ाम सिर्फ़ उन्हीं तक महदूद (सीमित) नहीं है— इसमें हमारे लिए भी एक
अहम सीख रखी गई है।
वह सीख यह है कि जब कहीं से सच्चाई और हक़ बात मिल रही हो, तो हमें यह नहीं देखना चाहिए कि हमारा समाज, हमारा परिवार या हमारा गिरोह उसे मान रहा है या नहीं। असली सवाल यह होना चाहिए कि क्या वह बात सच में हक़ है या नहीं। और अगर वह हक़ बात है, तो इसमें देर नहीं करनी चाहिए—बल्कि तुरंत उसकी तरफ़ बढ़ जाना चाहिए और हक़ (सच्चाई) को क़ुबूल कर लेना चाहिए।
क्योंकि सच्चाई को क़ुबूल
करना दरअसल अल्लाह की बात को मानना है, और सच्चाई को ठुकराना गोया (मानो) अल्लाह की बात को ठुकराना है।
तो एक ईमान वाला इस बात को कैसे गवारा कर सकता है कि वह हक़ को
पहचानने के बावजूद उसे न माने और इस तरह ख़ुदा की नाफ़रमानी
करने वाला बन जाए ।
इन आयात को इस पहलू से भी समझा जा सकता है, जैसा कि मौलाना ने अपने तज़्कीर (तज़्कीरुल-क़ुरआन) में बताया है।
अगली आयत :
जो नेकी भी वे करेंगे उसकी ना-क़द्री न की जाएगी और अल्लाह परहेज़गारों को ख़ूब जानता है। [3: 115]
इस आयात में बताया गया है कि ऐसे लोग जो भी भलाई करेंगे, अल्लाह त'आला उनके किसी भी नेक काम की ना-क़द्री नहीं करेगा।
यह बात इसलिए अहम है कि इन आयात को पढ़ते वक़्त ऐसा लगता है
कि ये पाँच लोग जो अभी अल्लाह के रसूल के पास आ कर ईमान नहीं लाए हैं, लेकिन फिर भी उनकी अच्छी सिफ़ात (ख़ूबियाँ) बयान की जा रही हैं कि ये रसूल को अभी नहीं माने हुए हैं
तब भी, अगर ये भलाई का काम कर रहे हैं तो अल्लाह त’आला उनकी इन सिफ़ात की वजह से जो इनमें पहले से
है, इनके किसी भी ख़ैर
(भलाई) के काम की ना-क़द्री नहीं करेगा क्योंकि अल्लाह त’आला तक़वा वालों (परहेज़गारों) को अच्छी तरह जानता
है।
इससे हमें यह समझने की ज़रूरत है कि हम
अक्सर ऐसी बहसों में उलझे रहते हैं कि अल्लाह किसी को क़ुबूल करेगा या नहीं।
समझने की असल बात यह है कि अल्लाह के नज़दीक कौन इंसान उसे पहचानने वाला (आरिफ़) बंदा बनकर खड़ा है, किसके दिल में सच्चाई की तलाश, अल्लाह का डर और अल्लाह के सामने ढह जाने वाली विनम्रता मौजूद है—यह सब अल्लाह ही बेहतर जानता है।
ऐसे लोगों के अच्छे काम को जब अल्लाह-तआला ख़ुद ज़ाया
नहीं करने वाला है, तो हमें भी किसी के बारे में जल्दी-से फ़ैसला सुना देने से परहेज़ करना चाहिए ।
हमारी एक बड़ी कमज़ोरी यह है कि हम फ़ौरन कह देते हैं —“इसका कुछ नहीं होने वाला”, “अल्लाह इसे जहन्नम में ही डालेगा।”
जबकि यह ख़ुदा का मामला है, ख़ुदा का ही डोमेन (ज्ञान-क्षेत्र) है कि वह किसके साथ
क्या करेगा। और अल्लाह तआला ने अपने कलाम में बिल्कुल साफ़ तौर पर बता दिया है कि जो
कोई भी नेक काम करेगा, अल्लाह उसके अच्छे
काम की ना-क़द्री नहीं करता।
और जो लोग तक़वा वाले (परहेज़गार) हैं, जो सच्चाई की तलाश
में लगे हुए हैं— अल्लाह उन्हें अच्छी तरह पहचानता है और उनके हाल से पूरी तरह बा-ख़बर है।
