Source : AL-RISALA (Urdu) | May -2005
रसूल के सहाबी हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास का एक क़ौल है :
तुम बर्दाश्त के ज़रिये उस शख़्स का मुक़ाबला करो जो तुम्हारे साथ जहालत करे।
यह बात ज़िंदगी के सबसे अहम उसूलों में से एक है।
इसके मुताबिक़, बर्दाश्त भी एक ताक़त है, न लड़ना भी लड़ने की एक कामयाब तदबीर (रणनीति) है।
हर इंसान की ज़िंदगी में ऐसे मौक़े पेश आते हैं जब किसी की बात सुनकर उसे ग़ुस्सा आ जाए। किसी का क़ौल सुन कर वह उत्तेजित हो जाए। किसी की एक नापसंदीदा कार्रवाई पर उसके अंदर बदले की भावना भड़क उठे। किसी की मारपीट या हिंसक रवैये के ख़िलाफ़ उसके मन में भी जवाबी मारपीट और हिंसा का रुझान पैदा जाए।
इस क़िस्म का मौक़ा हर इंसान के लिए बेहद नाज़ुक (संवेदनशील) मौक़ा होता है।ऐसे मौक़े पर हर आदमी भावनाओं में बहकर दूसरे पक्ष से लड़ाई शुरू कर देता है।
लेकिन अगर नतीजे के एतबार से देखा जाये तो ऐसी हर लड़ाई बे-नतीजा अंजाम पर ख़त्म होती है। ऐसी हर लड़ाई हमेशा नुक़्सान को और ज़्यादा बढ़ाने का कारण बनती है।
अगर आदमी उस वक़्त थोड़ा ठहर कर सोचे तो वह कभी भी जवाबी कार्रवाई की ग़लती न करे।
किसी नादान की ज़्यादती (ग़लती और ज़ुल्म) के ख़िलाफ़ जवाबी ज़्यादती करना, असल में ख़ुद अपने आपको भी नादान साबित करना है।
सही तरीक़ा यह है कि जब कोई व्यक्ति नादानी करके आपको भड़काए या उकसाए, तो आप उस जगह से हट जाएँ और थोड़ी देर के लिए अपने ज़ेहन को नकारात्मक प्रभाव से आज़ाद करके नतीजा के बारे में सोचें।
आप ठंडे ज़ेहन के साथ ये ग़ौर करें कि आख़िरी नतीजा के एतबार से क्या बेहतर है — जवाबी कार्रवाई करना या मामले को नज़रअंदाज करके चुप रह जाना।
अगर आप किसी भावना या दबाव
के असर में आए बिना, साफ़ और निष्पक्ष दिमाग़ से सोचें, तो यक़ीनन आप इस राय पर पहुँचेंगे कि उत्तेजना और उकसावे
के मवाक़े पर सबसे ज़्यादा
कामयाब पॉलिसी ये
है कि आप ख़ुद को उत्तेजित होने से बचाएँ। आप जवाबी उत्तेजना के बजाय सब्र और बर्दाश्त
के साथ हालात का मुक़ाबला करें।
