डी-कंडीशनिंग


डी-कंडीशनिंग     


Source : AL-RISALA  (Urdu) |SEPT - 2003


प्याज़ के ऊपर एक के बाद एक कई परतें होती हैं। अगर इन परतों को हटाते जाएँ, तो आख़िर में उसका असली अंदरूनी हिस्सा सामने आ जाएगा जो प्याज़ का अंदरूनी मग़्ज़ (गूदा) है।

यही मामला इंसान का भी है।  

 

इंसान जब पैदा होता है, तो वह शुद्ध प्राकृतिक स्वभाव (फ़ितरत-ए-सहीह) पर होता है। उसकी सोच सीधी और क़ुदरती होती है। उसके बाद माहौल के असर से उसके ऊपर बाहरी सोच और धारणाएँ जमने लगती हैं। यहाँ तक कि इंसान के अंदर का क़ुदरती व्यक्तित्व (फ़ितरी शख़्सियत) पूरी तरह ढक जाता है। 

यहाँ पहुँच कर इंसान तंग-नज़र और पक्षपाती सोच का केस बन जाता है। उसके बाद वह अपनी सारी उम्र इन्हीं जमी हुई धारणाओं के तहत सोचता रहता है और आख़िरकार उसी हालत में दुनिया से चला जाता है।

इसी हक़ीक़त की तरफ़ इशारा करते हुए कहा गया है—

“इंसान जिस चीज़ पर जवान होता है उसी पर वह बूढ़ा होता है।” 

यह हालत इंसान को असलियत के अनुसार सोचने से महरूम कर देती है।

 

इसका इलाज़ सिर्फ़ एक है। 

हर इंसान जब समझदार उम्र को पहुँचे, तो वह गहराई से अपना जायज़ा ले। वह यह देखने की कोशिश करे कि उसकी सोच पर माहौल ने कौन-कौन सी परतें चढ़ा दी हैं। 

वह अपनी कंडीशनिंग की दोबारा डी-कंडीशनिंग करे।  

वह अपनी शख़्सियत (personality) पर चढ़ी हुई ऊपरी परतों को हटाए, यहाँ तक कि उसकी अपनी अस्ल (क़ुदरती) सोच वाली शख़्सियत इस तरह खुल जाए कि वह तंग-नज़री और पक्षपात (त'अस्सुबात) से पाक होकर सोचने लगे। 

यह अपनी बनावटी शख़्सियत (व्यक्तित्व) को दोबारा असली शख़्सियत बनाने का अमल है जो हर इंसान की एक लाज़िमी (बहुत ज़रूरी) ज़रूरत है।

 

अपनी बनी-बनाई सोच को तोड़नायानी अपनी कंडीशनिंग की डी-कंडीशनिंग करने का यह अमल बेहद मुश्किल काम है। 

इसमें आदमी को ख़ुद अपने ही ख़िलाफ़ एक ज़ेहनी मेहनत (intellectual labour) करनी पड़ती है। 

उसे अपनी उसी सोच को, जिससे वह मानूस (आदी) हो चुका है और जिसे वह महबूब (प्रिय) समझता है, उसे ज़ब्ह करना पड़ता है। 

इसमें आदमी को अपने ही बनाए हुए मानसिक ढांचे पर बुलडोज़र चलाना पड़ता है।   

 

यह काम मुश्किल ज़रूर है, मगर यही वह एकमात्र अमल है, जो आदमी को पक्षपात से भरी हुई या हक़ीक़त से दूर सोच से पाक (मुक्त) करने के लिए ज़रूरी है।

यह अमल दरअसल अपने ही सोच का ऑपरेशन करने का अमल है।   

 

यह निःसंदेह बहुत मुश्किल काम है। मगर इस काम के बिना कोई भी इंसान, मिलावट से पाक और हक़ीक़त पर आधारित सोच का मालिक नहीं बन सकता।

इस मामले में कोई भी दूसरी चीज़, ‘सोच की सफ़ाई’ का बदल नहीं हो सकती। 



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