क़ुरआन की आयात पर ग़ौर-ओ-फ़िक्र
सूरह: आल-ए-इमरान | 139 – 143
[3: 139]: और हिम्मत न हारो और ग़म न करो, तुम ही ग़ालिब रहोगे अगर तुम मोमिन हो।
[3: 140]: अगर तुम्हें कोई ज़ख़्म पहुंचे तो दुश्मन को भी वैसा ही ज़ख़्म पहुंचा
है। और हम इन दिनों को लोगों के दर्मियान बदलते रहते हैं। ताकि अल्लाह ईमान वालों
को जान ले और तुममें से कुछ लोगों को गवाह बनाए और अल्लाह ज़ालिमों को दोस्त नहीं
रखता।
[3: 141]: और ताकि अल्लाह ईमान वालों को छांट ले और इंकार करने वालों को
मिटा दे।
[3: 142]: क्या तुम ख़्याल करते हो कि तुम जन्नत में दाख़िल हो जाओगे, हालांकि अभी अल्लाह ने तुममें से उन लोगों को जाना
नहीं जिन्होंने जिहाद किया और न उन्हें जो साबितक़दम रहने वाले हैं।
[3: 143]: और तुम मौत की तमन्ना कर रहे थे इससे मिलने से पहले, सो अब तुमने इसे खुली आंखों से देख लिया।
सूरह आल-ए-इमरान की इन आयात का एक ख़ास तारीख़ी पस-मंज़र (historical background) है।
आयात का
सीधा ताल्लुक़ (immediate
reference) उस दौर से है जब रसूलुल्लाह (सल्ल०)
और उनके साथी दीन की राह में लगातार
कोशिश कर रहे थे, और उसी सिलसिले में उन्हें जंग जैसे सख़्त
हालात का सामना करना पड़ा।
यहाँ ख़ास तौर पर दूसरी जंग, जंग-ए-उहद के हवाले से बात चल रही है। और इसी हवाले से अल्लाह तआला मुसलमानों को तसल्ली दे रहे हैं, उनका हौसला बढ़ा रहे हैं और उन्हें सही राह की रहनुमाई दे रहे हैं।
अगर सिर्फ़ आयात को ग़ौर से देखा जाए, तो ऐसा महसूस होता है कि मानो यह बात सिर्फ़ उसी ख़ास दौर के हालात को सामने रखकर कही गई है।
लेकिन जैसा कि एक तय और आम उसूल (क़ायदा
और कुल्लिया) है कि किसी ख़ास घटना या बात से हम अपने लिए सबक़, और लागू होने वाली बात (एप्लीकेशन) निकालते हैं, उसी तरह हमें देखना चाहिए कि
आज के हालात के एतबार से क़ुरआन की आयात, हम पर किस तरह लागू होती है और इनसे हमें
क्या गाइडेंस और
हिदायत मिल रही है।
एक
तरीक़ा यह हो सकता है कि इन आयात को सिर्फ़ रसूलुल्लाह और उनके साथियों (सहाबा) के साथ ख़ास समझ लिया जाए और उन्हीं तक
महदूद मान लिया जाए। तब बात बहुत आसानी
से समझ में आ जाती है कि जब रसूल और उनके साथियों से कहा गया—
“हिम्मत
न हारो और ग़म (हुज़्न) न करो, तुम ही ग़ालिब रहोगे अगर तुम मोमिन हो”
—तो इतिहास (तारीख़) गवाह है कि आख़िरकार ऐसा ही हुआ।
रसूलुल्लाह (सल्ल०) और सहाबा की जमाअत ने अरब
प्रायद्वीप (अरेबियन
पैनिनसुला) में
ग़लबा हासिल कर लिया और “अंतुमुल अ'लौन” (तुम ही ग़ालिब रहोगे)
का वादा पूरा होकर साफ़ तौर पर ज़ाहिर हो गया।
लेकिन
असल सवाल ये है कि क्या हम इन आयात को महज़ तारीख़ (इतिहास)
की एक ख़बर समझें, या फिर इनमें छिपे उस पैग़ाम को समझने की कोशिश करें, जो आज भी उतना ही ताज़ा है, जितना सदियों पहले नाज़िल होने
के वक़्त था।
सोचने वाली बात ये है कि आज के दौर में हम इन आयात से क्या रहनुमाई ले सकते हैं?
किस तरह ये आयात हमारे आज के हालात में हमें सही रास्ता दिखाती हैं ?
यही असल सवाल है, और इसी सवाल का जवाब तलाशना हम सबकी ज़रूरत है।
इस पर ग़ौर करने से यह बात समझ में आई कि इंसानी समाज या किसी भी क़ौम की ज़िंदगी में
दो तरह के दौर आते हैं।
एक वो दौर होता है, जब वह ग़ालिब होती है, ताक़तवर होती है और हुकूमत करने के मक़ाम पर फ़ाइज़ होती है।
दूसरी हालत
वो होती है, जब वह कमज़ोर हो जाती है, महकूम
(शासित)
हो
जाती है,
और उस पर दूसरों का ग़लबा हो जाता है।
सवाल
यह है कि जब कोई क़ौम महकूमी और कमज़ोरी (modesty) की हालत में पंहुच जाए, तो उसके साथ क्या परेशानियां आ सकती हैं ?
ग़ौर करने से यह बात समझ में आई कि जब कोई इंसान या क़ौम इस
मुकाम पर पहुंच जाती है, तो उसके अंदर दो तरह की ख़राबियाँ पनपने लगती हैं।
पहली
ख़राबी यह कि वह माज़ी (Past) में जीने लगती है। जो कुछ उससे छिन गया, जो हाथ से निकल
गया, उसका गहरा अफ़सोस और मलाल दिल पर इस क़दर छा जाता है कि
वह आगे की तरफ़ देखना ही भूल जाती है। । इसी मानसिक हालत को हुज़्न (ग़म)
कहा गया है—जो हमेशा गुज़रे हुए वक़्त (past) से जुड़ा होता है।
और दूसरी
ख़राबी यह कि आने वाले हालात का—यानी
भविष्य का—उसके दिल में ऐसा ख़ौफ़ समा जाता है कि हौसले पस्त हो जाते हैं और
हिम्मत जवाब दे जाती है।
जब
इंसान के ज़ेहन पर गहरा अफ़सोस और हुज़्न
(ग़म) छा
जाए कि "हम किस हाल में आ गए, हमारी ताक़त
खत्म हो गई, अब हम कुछ नहीं कर सकते"—तो यही वह मानसिक हालत
है, जिसे पस्त-हिम्मती कहा जाता है, जिसे क़ुरआन ने “हिम्मत
न हारो और ग़म न करो,....” (ला
तहिनू व ला तहज़नू) कहकर रोका है।
यह हिदायत उन दोनों ख़राबियों से बचाने के लिए है, जो मुश्किल हालात में इंसान या पूरी क़ौम को अपनी गिरिफ़्त में ले लेती हैं।
क़ुरआन इस बारे में साफ़ रहनुमाई दे रहा है कि ज़िंदगी
में जब कभी हम ऐसे दौर से गुज़रें, चाहे वह इंफ़िरादी (व्यक्तिगत) हो
या सामूहिक—जहाँ हमसे बहुत कुछ छिन गया हो या हालात सख़्त हो गए हों, तो हमें ग़म (हुज़्न) में डूबकर हिम्मत नहीं हारनी
है।
“अल-आलौन” का मतलब सिर्फ़ ग़लबा हासिल करना नहीं है। इसमें उभर आने का मफ़्हूम है, यानी जब हालात मुश्किल हों, तब भी तुम उभर सकते हो।
अगर
मुश्किल हालात में तुम अपने आपको नेगेटिव
(negative) बना लोगे, पस्त-हिम्मत
हो जाओगे, ग़म और अफ़सोस (हुज़्न) में
डूबे रहोगे, और यह सोच लिया कि "बस, अब कुछ नहीं हो सकता"—तो यह रवैया मोमिनाना सिफ़ात (ख़ूबियों)
के ख़िलाफ़ है।
मोमिन तो वह है जो अल्लाह से पूरी तरह उम्मीद
लगाए रखता है। वह अल्लाह की रहमत से नाउम्मीद और मायूस होना नहीं जानता। हिम्मत
हारना या हुज़्न (ग़म) में डूब जाना उसके
मिज़ाज से बहुत दूर
की बात है।
इसलिए
समझाया गया कि अगर तुम अपनी मोमिनाना सिफ़ात को जगा लो, उन्हें ज़िंदा कर लो, और उन पर अमल करो, तो बहुत
जल्द इन मुश्किल हालात से उभर आओगे।
और
हिम्मत न हारो और ग़म न करो, तुम ही ग़ालिब
रहोगे अगर तुम मोमिन हो। [3: 139]
मोमिनाना
सिफ़ात क्या है ?
मोमिनाना सिफ़ात यह है कि तुम हर बात को
ख़ुदा से जोड़कर
देखना शुरू कर दो।
तुम अल्लाह-रुख़ी
(God-oriented) होकर सोचना शुरू कर दो ।
जब तुम अल्लाह-रुख़ी हो कर सोचना शुरू करोगे तो तुम्हारे
अन्दर से पस्त-हिम्मती भी जाती रहेगी, हुज़्न
(ग़म) भी दूर
हो जाएगा, और तुम मुश्किल हालात से उभर आओगे।
अगर
यही रवैया इज्तिमा'ई (सामूहिक)
तौर पर अपनाया जाए, तो पूरी क़ौम भी मुश्किल दौर से
उभर सकती है। तब कहा जा सकता है कि वह क़ौम “अल-आलौन” की हालत में आ गई—यानी गिरने
के बाद फिर उठ खड़ी हुई।
ग़ौर
करने वाली बात यह है कि सूरह आले-इमरान की आयत 139 में एक बहुत बड़ा और अज़ीम
एप्लीकेशन मौजूद है। यह सिर्फ़ उस वक़्त के जंग के हालात तक सीमित नहीं, जब यह नाज़िल हुई थी—बल्कि आज हमारे लिए भी यह उतनी ही लागू होती है।
अगर तुम्हें कोई ज़ख़्म पहुंचे तो दुश्मन को भी वैसा ही ज़ख़्म पहुंचा है। और हम इन दिनों को लोगों के दर्मियान बदलते रहते हैं। ताकि अल्लाह ईमान वालों को जान ले और तुममें से कुछ लोगों को गवाह बनाए और अल्लाह ज़ालिमों को दोस्त नहीं रखता। [क़ुरआन 3: 140]
दूसरी
अहम बात यह समझाई गई है कि दुनिया में ताक़त (power)
और
ग़लबे का आना-जाना अल्लाह की तय की हुई सुन्नत है। और यही एक तारीख़ी (ऐतिहासिक)
हक़ीक़त भी है।
इंसानों
के बीच हम सत्ता और शक्ति का जो उतार-चढ़ाव देखते हैं, वह यूँ ही नहीं होता। यह अल्लाह के क़ायदे
के मुताबिक़ होता है। उसी ने यह निज़ाम रखा है कि वह कभी सत्ता और ताक़त मोमिनीन को दे देता है और कभी ग़ैर-मोमिनों को। इसी
तरह कभी ज़ख़्म मोमिनीन खाते
हैं और कभी ग़ैर-मोमिनीन
। यह सिलसिला लगातार चलता रहता है।
ज़ख्म
पहुंचने की इस बात को जंग-ए-बद्र और जंग-ए-उहद के हवाले से समझाया जा रहा है।
बद्र
की जंग में इंकार करने वालों के लगभग सत्तर लोग मारे गए थे, जबकि उहद की जंग में मुसलमानों के सत्तर से ज़्यादा लोग शहीद हुए। उहद की
जंग में ज़ख्म मुसलमानों के हिस्से आया।
इन
दोनों घटनाओं से साफ़ हो जाता है कि ज़ख्म लगने और नुक़सान का जो मामला है वह
एकतरफ़ा नहीं है, बल्कि यह दो-तरफ़ा सिलसिला है।
यहाँ अल्लाह तआला हमें एक बहुत बड़ी रहनुमाई दे रहे हैं कि मोमिनों को ऐसी मानसिकता (सोच) से बाहर निकल आना चाहिए कि अगर उन्हें कभी ज़ख़्म लगे या मुश्किल हालात से गुज़रना पड़े, तो इस हालत को ईमान वालों के ख़िलाफ़ समझ लिया जाए या फिर इसे मायूसी की वजह बना लिया जाए।
यह धारणा भी बिलकुल
ग़लत है कि “हम मोमिन हैं, इसलिए हमें कभी ज़ख़्म नहीं पहुंचेगा, हम हमेशा ग़लबा
की हालत में रहेंगे और हर हाल में ऊपर ही रहेंगे।”
अल्लाह
तआला यह बताना चाहते
हैं कि मोमिन होने का मतलब यह नहीं कि इस
दुनिया में सिर्फ़ मोमिनीन
को ही ग़लबा हासिल रहेगा और किसी को मैं इक़्तिदार (हुकूमत) में हिस्सा नहीं दूंगा।
ऐसा
नहीं है।
अल्लाह
तो इक़्तिदार (सत्ता) और ग़लबा के दिनों को
आपस में बदलता रहता है। कभी मोमिनों को देता है, तो कभी
ग़ैर-मोमिनों को। यह अल्लाह के बनाए हुए निज़ाम का हिस्सा है।
और ये बदलाव इसलिए होते हैं कि जब कभी ग़ैर-मोमिनों के पास ताक़त (power) और इक़्तिदार आ जाए, ज़माने के हालात बदल जाएँ, तो फिर यहाँ मोमिनीन की आज़माइश होती है। यह देखा जाता है कि मोमिनीन ऐसे हालात में कैसा रोल अदा करते हैं, वे किस तरह अपने आपको मुनज़्ज़म (सुनियोजित) करते हैं ।
मोमिनीन के साथ यह आज़माइश दोनों हालात में है—चाहे ताक़त (power) और इक़्तिदार (हुकूमत) उनके पास हो, या कमज़ोरी और महकूमी का दौर हो।
यह सिलसिला हर हाल में जारी रहता है।
यह सब कुछ इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि अल्लाह की बनाई हुई जन्नत कोई साधारण जगह नहीं है। वह इतनी क़ीमती और शानदार जगह है कि उसमें जगह पाने वाले भी ख़ास होने चाहिए।
अल्लाह तआला छांट-छांटकर उन लोगों को चुनना चाहता है जो असल में जन्नत के लायक हैं
। इसलिए दुनिया में हालात का यह उतार-चढ़ाव चलता रहेगा, ताकि
लोगों की परख हो सके और असली क़ाबिलियत सामने आ जाए।
अल्लाह तआला ने पहले ही बता दिया है कि
यह सब किस मक़्सद के
तहत हो रहा है। अगर इस हक़ीक़त को हम
अच्छी तरह समझ लें और अपने ज़ेहन (psyche) में
बिठा लें कि हर हालत में हमारी आज़माइश चल रही है, तो फिर हम कभी मायूस नहीं होंगे।
चाहे ज़ख्म लगने का मामला हो या लोगों के बीच अय्याम (दिनों) के
बदलते रहने का, चाहे हम
ग़लबा की पोजीशन में हों या महकूमी (शासित
होने) की, चाहे
दबे हुए हालत में हों या उभरे हुए— दोनों ही सूरतों
में हम परखे जा रहे हैं। अल्लाह देख रहा है कि इन
अलग-अलग हालात में हम कैसा रवैया अपनाते हैं, और क्या हम अपने आपको उस अज़ीम जगह (जन्नत) के
लिए क़ाबिल बना रहे हैं या नहीं। यही पूरी बात का निचोड़ है।
इसी
सिलसिले में अल्लाह तआला ने फ़रमाया:
“व
यत्ताखिज़ा मिनकुम शुहदा वल्लाहु ला युहिब्बु अज़-ज़ालिमीन” (3: 140)
— यानी यह इसलिए किया जा रहा है कि तुममें से कुछ को शुहदा के दर्जे के लिए
चुन लिया जाए, और अल्लाह ज़ालिमों से मोहब्बत नहीं करता।
यहाँ एक और बहुत बारीक बात बताई गई है। अगर कभी ग़ैर-मोमिनीन को
ग़लबा, ताक़त या हुकूमत मिल जाए, तो इसका यह मतलब हरगिज़
नहीं कि अल्लाह तआला उनसे मोहब्बत करने लगा है।
ग़लबा मिलना—इस बात की दलील नहीं कि अल्लाह तआला जिस क़ौम से मोहब्बत करता है, उसी को ग़लबा और हुकूमत देता है । अगर ऐसा होता, तो फिर सवाल उठता कि क्या अल्लाह तआला ज़ालिमों से मोहब्बत करता है, कि उनको पावरफुल बना रहा है ?
इसी
पेचीदा और नाज़ुक नुक्ते को अल्लाह तआला ने साफ़ कर दिया :
“वल्लाहु ला युहिब्बु अज़-ज़ालिमीन” — और अल्लाह ज़ालिमों से मोहब्बत नहीं करता। (3:140)
असल
मामला तो दिनों के बदलने और हालात के उतार-चढ़ाव का है, ताकि इन सब के ज़रिये ईमान
वालों को आज़माया जाए, उन्हें छांट-छांटकर चुन लिया जाए जो असल में जन्नत के लायक हैं
।
'शहीद' का असल मतलब क्या है?
“व यत्ताखिज़ा मिनकुम शुहदा ......”
(3: 140)
इस आयत में शुहदा का लफ़्ज़ है, इस पर एक सवाल आया है कि यहाँ
"शहीद" से क्या मुराद है? क्या ये उस
इंसान के लिए है जो गवाही देता है, या फिर उस मुजाहिद के लिए
है जो जंग में शहीद हो जाता है?
इस
आयत में एक गहरी बात छिपी है, जिसे मौलाना ने अपनी तज़्कीर
(तज़्कीरुल-क़ुरआन) में साफ़
तौर पर समझाने की कोशिश की है।
दरअसल बात यह है कि जब ईमान वाले लोग दा'ईयाना* कैफ़ियत के साथ लोगों को अल्लाह और उसके दीन से आगाह (परिचित) करने लगते हैं, उन्हें अल्लाह की तरफ़ बुलाने का काम शुरू करते हैं, लोगों को अल्लाह से जोड़ने और अल्लाह की अज़मत बयान करने में जुट जाते हैं, तो उस वक़्त इस जद्दोजहद में उनके सामने मुश्किलें पेश आती हैं। उस वक़्त वे डटे रहते हैं।
यहाँ
“डटे रहने” के दो पहलू हैं।
पहला
यह कि सब्र के साथ ख़ुद को
मुस्तक़िल-मिज़ाज (अपने
इरादे पर अटल) बनाना कि मैं अल्लाह पर ईमान रखता हूँ, इस बात पर मैं मज़बूती
से क़ायम हूँ, चाहे
हालात जैसे भी हों ।
और दूसरा यह कि लोगों को
अल्लाह
और उसके दीन से आगाह (परिचित) करने के काम में आने वाली रुकावटों को
सहते हुए लगातार जद्दोजहद और भरपूर कोशिश
करता रहे।
जब
कोई मोमिन इस तरह सब्र और इस्तिक़ामत (दृढ़ता)
के साथ अपने मिशन पर क़ायम रहता है, वही
असल में “शुहदा” (शहीद)
बनता है।
अल्लाह तआला आख़िरत के उस मौक़े पर, जब अंजाम तय होगा, ऐसे मोमिन दा'ई* को ख़ास मक़ाम देगा। उसे गवाह बनाकर खड़ा किया जाएगा, कि बताओ फलाँ शख़्स ने दुनिया में क्या किया था—सच्चाई को किस तरह सुना और कैसे ठुकराया ? लोगों को किस तरह समझाया या ख़ुद क्या समझ रहा था ? और आज जो दावे कर रहा है, उसमें कितना सच और कितना झूठ है ।
इसी बात को मौलाना ने अपनी तज़्कीर (तज़्कीरुल-क़ुरआन) में यूँ स्पष्ट किया है :
जिन लोगों ने दुनिया में अल्लाह के दा'इयों * को रद्द कर दिया था, क़यामत के दिन वही उनके सामने होंगे। तब अल्लाह उन्हें अपनी अदालत में गवाह बनाएगा और उनकी गवाही के आधार पर उन लोगों के मुस्तक़िल (चिरस्थायी) अंजाम का फ़ैसला करेगा।
मौलाना
आगे समझाते हैं : मोमिन चाहे अपनी ज़ाती ज़िंदगी (personal life) को
ईमान व इस्लाम पर क़ायम करे या वह दूसरों के सामने ख़ुदा के दीन का गवाह बन कर खड़ा
हो (यानी शहीद
बन कर खड़ा हो), हर हाल में उसे दूसरे की तरफ़ से
मुश्किलात और रुकावटें पेश आती हैं । इन मुश्किलात और रुकावटों का मुक़ाबला करना
जिहाद है और हर हाल में अपने इक़रार (अहद)
पर जमे रहने का नाम सब्र है।
इसी
बात को मौलाना ने आगे चलकर बहुत ही प्रभावशाली ढंग से समझाया है। वे आगे लिखते हैं—
जो लोग इस जिहाद और सब्र का सुबूत दें वही वे लोग हैं जो जन्नत की आबाद-कारी के क़ाबिल ठहरे। साथ ही, इसी से दुनिया की सरबुलंदी का रास्ता खुलता है। ‘जिहाद’ उनके मुसलसल और मुकम्मल अमल की ज़मानत है और ‘सब्र’ इस बात की ज़मानत है कि वे कभी कोई जज़्बाती इक़्दाम (हरकत) नहीं करेंगे ।
और ये
दो बातें जिस समूह में पैदा हो जाएं उसके लिए ख़ुदा की इस दुनिया में कामयाबी उतनी
ही यक़ीनी हो जाती है जितनी मुवाफ़िक़ (उपजाऊ)
ज़मीन में एक बीज का फल देना।
ये बहुत गहरा नुक्ता है जिसे मौलाना ने यहाँ “शुहदा”, “जिहाद” और “सब्र” के अलफ़ाज़ में स्पष्ट
किया है।
अल्लाह
तआला फ़रमाते हैं :
“अगर
तुम्हें कोई ज़ख़्म पहुंचे तो दुश्मन को भी वैसा ही ज़ख़्म पहुंचा है। और हम इन दिनों
को लोगों के दर्मियान बदलते रहते हैं। ताकि अल्लाह ईमान वालों को जान ले......”
और
इसी सिलसिले में आगे फ़रमाया गया है:
“क्या
तुम ख़्याल करते हो कि तुम जन्नत में दाख़िल हो जाओगे, हालांकि
अभी अल्लाह ने तुममें से उन लोगों को जाना नहीं जिन्होंने जिहाद किया और न उन्हें
जो साबितक़दम रहने वाले हैं।”
इन आयात
में अल्लाह तआला एक अहम हकीकत समझा रहे हैं:
“ताकि अल्लाह ईमान वालों को जान ले…”
यानी
ईमान सिर्फ़ ज़बानी दावा नहीं है। अल्लाह
तआला ईमान वालों को ऐसे हालात से गुज़ारता है, जहाँ उसका असली ईमान सामने आ जाए।
इसी बात को मौलाना ने अपनी तज़्कीर (तज़्कीरुल-क़ुरआन) के शुरुआती जुमले में यूँ बयान किया है—
“ईमान लाना गोया अल्लाह के लिए जीने और
अल्लाह के लिए मरने का इक़रार करना है।”
ज़रा इस जुमले पर ग़ौर कीजिए। यह अपने आप में कितना गहरा और बलीग़ है।
अगर आप तज़्कीर को ग़ौर से पढ़ें तो अंदाज़ा होता है कि मौलाना किस गहराई से
ईमान को समझाना चाहते हैं कि आख़िर ईमान लाना है क्या?
गोया कि अल्लाह के लिए जीने और अल्लाह के लिए मरने का
इक़रार करना, यही है ईमान की असल कैफ़ियत । और इसी के इर्द-गिर्द ये
सारी बातें घूमती हैं।
जब
कोई शख़्स इस दर्जे पर पहुँच जाता है, तो उसकी सोच
बदल जाती है। उसका नज़रिया बदल जाता है। इस मुक़ाम पर उसके लिए न ग़म है न अफ़सोस (हुज़्न), न
ख़ौफ़ है न पस्त-हिम्मती । उसके लिए
कोई ज़ख्म ऐसा
नहीं जो उसे पस्त-हिम्मत कर दे। उसके लिए कोई हालात बड़ी नहीं—चाहे वह तकलीफ़
के हों या महरूमियत (वंचित हो जाने) के।
ऐसा
इंसान सच्चाई को सिर्फ़ अपने तक महदूद नहीं रखता। वह अपने ईमान के ज़रिये दूसरों तक हक़ की बात
पहुँचाता है, और हक़ की गवाही देने
वाला बन जाता है—इसी मायने में वह “शहीद” है, यानी
हक़ का गवाह।
फिर उसकी ज़िंदगी एक मुसलसल इम्तिहान बन जाती है। हर हाल में उसका ईमान परखा जाता है—आसानी में भी और सख़्ती में भी —ताकि अल्लाह तआला उसे जांच कर, उसके ईमान को परखकर उसे जन्नत में दाखिल कर दे।
यह जन्नत उसे इसलिए मिलेगी कि उसने जिहाद को अपना रास्ता बनाया—जिहाद यहाँ लड़ाई नहीं, बल्कि लगातार सही काम करते रहना है।
उसने सब्र को अपना हथियार बनाया—सब्र यानी पस्त-हिम्मती या बुजदिली नहीं, बल्कि भावनाओं
(ज़ज्बात) में बहकर ग़लत क़दम न उठाना।
यही
वे बुनियादी बातें हैं जिन्हें मौलाना ने यहाँ बताने की कोशिश की है।
इस
तरह इन आयात का पैग़ाम साफ़ है: जन्नत उन लोगों के लिए है जो इम्तिहानों से
गुज़रकर अपने ईमान को सच्चा साबित करते हैं—जो जिहाद (लगातार
सही अमल) और सब्र (साबितक़दमी)
को अपनी ज़िंदगी का रास्ता बना लेते हैं।
अल्लाह की अदालत: दुनिया में भी और आख़िरत में भी
अल्लाह
तआला फ़रमाते हैं :
“और ताकि अल्लाह ईमान वालों को छांट ले और इंकार करने वालों को मिटा दे।”
“व-लियु-मह्हिसा
अल्लाहु अल्लज़ीना आमनू व यमहक़ा अल-काफ़िरीन”
इन आयात पर ग़ौर करते हुए एक और बात मेरे ज़ेहन में आई, जो आज मेरे लिए अहम “टेक अवे” रही।
हम जानते हैं कि अल्लाह तआला आख़िरत में अपनी मुकम्मल अदालत क़ायम करेगा, जहाँ हर इंसान के आख़िरी अंजाम का फ़ैसला होगा।
लेकिन
सवाल यह है कि क्या अल्लाह अपनी अदालत
सिर्फ़ आख़िरत में ही क़ायम करेगा ? या वह इस दुनिया में भी अपनी अदालत क़ायम करता है ? यह एक सवाल था जो मेरे जेहन में उठा।
तो इस सवाल का जवाब हमें उसी सबक़ में मिल गया जिसे हम पढ़ रहे थे।
उसमें बार-बार यह
समझाया गया कि मोमिनीन कौन हैं, मोमिनाना सिफ़ात (ख़ूबियाँ)
क्या है, और उनकी ज़िंदगी में आज़माइश की क्या अहमियत है।
और
फिर उसी के ज़ैल-में ये बात साफ़ हो गई कि अल्लाह
तआला दुनिया में ही लगातार लोगों की छंटाई कर रहा है। वह शुहदा (गवाहों)
को इसलिए चुन रहा है, ताकि आख़िरत
के
अंजाम-दिही के मौक़े पर जब उसकी अदालत क़ायम होगी, तो इन्हीं की गवाही की बुनियाद
पर कुछ लोगों के आख़िरी अंजाम के फ़ैसले
सुनाए ।
तो
सवाल यह है कि जब अल्लाह तआला आख़िरत में लोगों के आख़िरी अंजाम का फ़ैसला सुनाने वाला है, तो क्या उसकी अदालत दुनिया में भी किसी दर्जे में काम कर रही है?
यही बात “अल-अ’लौन” के अल्फ़ाज़ में बयान की गई
है।
मतलब यह कि जब ईमान वालों की सिफ़ात (ख़ूबियाँ)
इस दर्जे पर पहुँच जाए कि वे हर बात को ख़ुदा की निस्बत
से (जोड़कर) देखना शुरू कर दें, अल्लाह-रुख़ी (God-oriented) होकर
सोचना शुरू कर दें, उनका ईमान पुख़्ता हो जाए, साथ ही वे अल्लाह के दीन को अपनी जान और माल से, अपनी
पूरी क़ुर्बानी के साथ फैलाने के लिए खड़े हो जाएँ,
और
इस राह में लगातार कोशिश करते
रहें; उनके
सामने कोई भी मुश्किल पेश आएं तो
पस्त-हिम्मत न हों, इस
राह में अगर कोई चीज़ छिन जाए तो उसके
पीछे अफ़सोस में न डूबें
।
जब वे
इस मोमिनाना किरदार के हामिल हो जाते हैं, तो अल्लाह का फ़ैसला ज़ाहिर होता है। यानी
अल्लाह की अदालत दुनिया में क़ायम हो
जाती है। और फिर अल्लाह तआला मुनकिरीन को मिटा देता है और मोमिनीन को “अल-अ’लौन” बना देता है— यानी उन्हें ग़लबा और सरबुलंदी
अता कर देता है।
आज के मुताले से मेरा टेकअवे
आज के मुताले से मेरा निजी निष्कर्ष यह रहा कि मोमिनाना सिफ़ात में, अल्लाह से क़रीब होने की सिफ़ात में, सबसे पहली बात यह है कि “ईमान लाने” को हम अल्लाह के लिए जीने और अल्लाह के लिए मरने का इक़रार समझें।
और जब हम इसके लिए तैयार हैं, तो निश्चित रूप से (लाज़िमन) हमारे अंदर ये बात आ जाएगी कि हमारे अन्दर कभी पस्त-हिम्मती पैदा नहीं होगी। कोई चीज़ छिन जाए तो उसका मलाल (अफ़सोस) भी नहीं होगा।
फिर
चाहे हम ग़लबा (ताक़त) की हालत में हों या
महकूमी (कमज़ोरी) की, हर हालात को अल्लाह की तरफ़ से आज़माइश समझेंगे। और उसी के दीन के लिए ईमान
वाले बन कर खड़े रहेंगे।
हम
सब्र से काम लेंगे और किसी के ख़िलाफ़ जज़्बात में आकर कोई क़दम नहीं उठाएँगे।
अल्लाह
के दीन को हमने जिस तरह समझा, अल्लाह को जिस तरह पहचाना, तौहीद को जिस तरह समझा
उसी तरह, अल्लाह के पैग़ाम को दूसरे बंदों तक पंहुचाते रहेंगे । इस राह में जो कुछ
भी गुज़रना है गुज़रेगा।
उसके
बाद जब अल्लाह हमें जाँच लेगा, तो वह उम्मत को ज़रूर ग़लबा
अता करेगा। दुनिया में भी उभार (सरबुलंदी)
देगा और आख़िरत में गवाह बना कर खड़ा कर देगा।
Note: क़ुरआन मुताला पर एक दा’ई के बयान का सारांश।
तज़्कीरुल-क़ुरआन | तज़्कीर
ईमान लाना गोया अल्लाह के लिए जीने और अल्लाह के लिए मरने का
इक़रार करना है । जो लोग इस तरह मोमिन बनें उनके लिए अल्लाह का वादा है कि वे
उन्हें दुनिया में ग़लबा और आख़िरत में जन्नत देगा । और उन्हें यह अहमतरीन एज़ाज़
अता करेगा कि जिन लोगों ने दुनिया में उन्हें रद्द कर दिया था उनके ऊपर उन्हें
अपनी अदालत में गवाह बनाए और उनकी गवाही की बुनियाद पर उनके मुस्तक़िल अंजाम का
फ़ैसला करे ।
मगर यह मक़ाम महज़ लफ़ज़ी इक़रार से नहीं मिल जाता । इसके लिए ज़रूरी
है कि आदमी सब्र और जिहाद की सतह पर अपने सच्चे मोमिन होने का सुबूत दे ।
मोमिन चाहे अपनी ज़ाती ज़िंदगी को ईमान व इस्लाम पर क़ायम करे या वह
दूसरों के सामने ख़ुदा के दीन का गवाह बन कर खड़ा हो, हर हाल में उसे दूसरे की तरफ़ से मुश्किलात और
रुकावटें पेश आती हैं । इन मुश्किलात और रुकावटों का मुक़ाबला करना जिहाद है और हर
हाल में अपने इक़रार पर जमे रहने का नाम सब्र ।
जो लोग इस जिहाद और सब्र का सुबूत दें वही वे लोग हैं जो जन्नत की आबादकारी के क़ाबिल ठहरे । साथ ही, इसी से दुनिया की सरबुलंदी का रास्ता खुलता है ।
‘जिहाद’ उनके मुसलसल और मुकम्मल अमल की ज़मानत और ‘सब्र इस बात की ज़मानत है कि वे कभी कोई जज़्बाती इक़दाम नहीं करेंगे ।
और ये दो बातें जिस गिरोह में पैदा हो जाएं उसके लिए ख़ुदा
की इस दुनिया में कामयाबी उतनी ही यक़ीनी हो जाती है जितनी मुवाफ़िक़ ज़मीन में एक
बीज का बारआवर होना ।
एक शख़्स अल्लाह के रास्ते पर चलने का इरादा करता है तो दूसरों की तरफ़ से तरह-तरह के मसाइल पेश आते हैं । ये मसाइल कभी उसे बेयक़ीनी की कैफ़ियत में मुब्तला करते हैं कभी मस्लेहतपरस्ती का सबक़ देते हैं। कभी उसके अंदर नकारात्मक मानसिकता उभारते हैं कभी ख़ुदा के ख़ालिस दीन के मुक़ाबले में ऐसे अवामी दीन का नुस्ख़ा बताते हैं जो लोगों के लिए क़ाबिले क़ुबूल हो।
यही मौजूदा दुनिया में आदमी का इम्तेहान है।
इन अवसरों पर आदमी जो प्रतिक्रिया ज़ाहिर करे उससे मालूम होता है
कि वह अपने ईमान के इक़रार में सच्चा था या झूठा । अगर उसका अमल उसके ईमान के दावे
के मुताबिक़ हो तो वह सच्चा है और अगर इसके ख़िलाफ़ हो तो झूठा ।
शहीद (अल्लाह का गवाह) बनना इस सफ़र की आख़िरी इंतहा है ।
अल्लाह का एक बंदा लोगों के दर्मियान हक़ का दाअी (आहवानकर्ता) बन कर खड़ा हुआ
। उसका हाल यह था कि वह जिस चीज़ की तरफ़ बुला रहा था, ख़ुद उस पर पूरी तरह क़ायम था । लोगों ने उसे हक़ीर
(तुच्छ) समझा मगर उसने किसी की परवाह नहीं की । उस पर मुश्किलात आईं मगर
वह उसे अपने मक़ाम से हटाने में कामयाब न हो सकीं । वह न कमज़ोर पड़ा और न मनफ़ी
नफ़्सियात (नकारात्मक मानसिकता) का शिकार हुआ । यहां तक कि उसके जान व माल की बाज़ी लग गई फिर भी
वह अपने दावती मौक़िफ़ से न हटा ।
यह इम्तेहान हद दर्जा तूफ़ानी इम्तेहान है । मगर इससे गुज़रने के बाद ही वह इंसान बनता है जिसे अल्लाह अपने बंदों के ऊपर अपना गवाह क़रार दे ।
आदमी
जब हर क़िस्म के हालात के बावजूद अपने दावती अमल पर क़ायम रहता है तो वह अपने
पैग़ाम के हक़ में अपने यक़ीन का सुबूत देता है । साथ ही यह कि वह जिस बात की ख़बर
दे रहा है वह एक हद दर्जा संजीदा मुआमला है न कि कोई सरसरी मुआमला ।
दा'ई*: ईश्वर की सृजन योजना (Creation plan of God) से परिचित वह व्यक्ति जो ईश्वर के संदेश से लोगों को अवगत कराता है।
मद'ऊ*: वह व्यक्ति जिसे ईश्वर के संदेश से अवगत कराना है या अवगत कराया जाता है।
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