तबाहकुन ग़लतफ़हमी
Source : AL-RISALA (Urdu) | NOV - 2009
अब्बासी दौर में मुसलमानों के अंदर दीनी ज़वाल आया—यानी दीन की रूह और असल मक़सद में कमी आ गई।
उस ज़माने में मुसलमानों का यह हाल हो गया कि कुछ रस्मी आ'माल (कामों) और ख़ास तरह के बाहरी पहनावे व रंग-ढंग (वज़-ए-क़तअ) को दीनदारी का असली पहचान समझ लिया गया।
इसी दौर में क़िस्से सुनाने वाले लोग (क़ुस्सास) भी सामने आए। वे इन रस्मी आ'माल (कामों) के छिपे हुए और रहस्यमय फ़ायदों के बारे में ख़ुद की गढ़ी हुई कहानियाँ लोगों को सुनाने लगे।
नतीजा यह हुआ कि लोग इन रस्मी दीनदारी को असली दीन समझकर उस
पर और भी ज़्यादा पुख़्ता होते गए।
धीरे-धीरे अपने अंदर झाँकने और ख़ुद की जांच-पड़ताल (मुहासबा) करने का जज़्बा कमज़ोर पड़ता गया और आख़िरकार लगभग ख़त्म हो गया।
मौजूदा ज़माने में यही ख़राबी और ज़्यादा बढ़कर सामने आई है।
मौजूदा ज़माने के मुसलमानों ने इन रस्मी आ'माल को ही दीनदारी समझ लिया है।
फिर से उनके बीच ऐसी शख़्सियतें और ऐसी जमाअतें पैदा हुई हैं, जो इन रस्मी अमल के फ़ायदों (फ़ज़ाइल) के बारे में लोगों को अजीबो-ग़रीब रहस्यमयी (mysterious) क़िस्म के क़िस्से-कहानियाँ सुना रही हैं।
इस तरह ये लोग मुसलमानों के अंदर अपनी जांच-पड़ताल (मुहासबा) और सुधार का मिज़ाज तो पैदा नहीं करते, बल्कि इसके उलट फ़ज़ीलत की कहानियों के ज़रिये उनके अंदर यह झूठा यक़ीन पैदा कर रहे हैं कि तुम्हारी रस्मी दीनदारी ही असल दीनदारी है, और इसी के ज़रिये तुम अल्लाह की मदद हासिल कर लोगे और आख़िरकार जन्नत तक पहुँच जाओगे ।
यह बेशक गुमराही है।
जो लोग इस गुमराही से बेख़बर हैं, वह अंधेपन के शिकार हैं। और जो लोग इस सच्चाई को जानते हुए भी चुप हैं, वह हदीस के शब्दों में "गूंगे शैतान" बने हुए हैं।
आज के दौर में उम्मत की सुधार का सबसे बड़ा काम यही है कि मुसलमानों को इस तबाह कर देने वाली ग़लतफ़हमी से बाहर निकाला जाए।
पिछली उम्मतों का सबक़
पिछली उम्मतें जिस बिगाड़ का शिकार हुईं, उस बिगाड़ को क़ुरआन में "अमानी" (सूरह अल-बक़रा: 78) कहा गया है।
'अमानी' का मतलब
है "ख़ुश-फ़हमी" (झूठी
उम्मीदें)—यानी कुछ रस्मी आ'माल करना और उस पर बड़े-बड़े इनाम मिलने की उम्मीद क़ायम कर
लेना।
यही पिछली उम्मतों का बिगाड़ था, और हदीस की भविष्यवाणी के मुताबिक़, आख़िरी ज़माने में मुसलमान भी इसी बीमारी के शिकार होंगे।
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