सच्चाई की तलाश
Source : AL-RISALA (Urdu) | JAN - 2011
एक अंग्रेज़ हक़ीक़त की तलाश में था। इस सिलसिले में उसने बहुत-सी किताबें पढ़ीं। एक किताब में उसने पढ़ा कि सबसे बड़ी इबादत ज़िंदा लोगों की सेवा है। फिर उसे पता चला कि सेवा के सबसे ज़्यादा हक़दार जानवर हैं।
यह बात उसके दिल में ऐसी बैठी कि उसने जानवरों की सेवा करने
का फ़ैसला कर लिया।
आख़िरकार
वह हिंदुस्तान आ गया। अब वह अंग्रेज़ और उसकी बीवी दोनों नई दिल्ली में रहते हैं।
उनके घर के बड़े से
आंगन में दस गधे पल रहे हैं।
दोनों मिलकर उन गधों की देखभाल और सेवा करते
हैं।
हमारे
एक साथी उस अंग्रेज़ को तलाश करते हुए उनके घर पहुंचे। वहां उन्होंने देखा कि वह
अंग्रेज़ बैठा हुआ एक गधे की ड्रेसिंग (ज़ख़्म की मरहम-पट्टी)
कर रहा है। हमारे साथी हिम्मत करके उसके
पास गए।
हमारे साथी के पास क़ुरआन की अंग्रेज़ी अनुवाद की एक कॉपी थी।
हमारे साथी ने उस अंग्रेज़ से कहा:
“क्या मैं आपको यह क़ुरआन दे सकता हूं?”
वह अंग्रेज़ खड़ा हो गया, शुक्रिया अदा करते हुए क़ुरआन
की कॉपी अपने हाथ में ले ली और बोला —
“मैं हमेशा से यह जानना चाहता था कि
सच्चाई का दूसरा नज़रिया (विशिष्ट दृष्टिकोण) क्या है।”
“I always wanted to know another version of truth.”
सच्चाई की तलाश: हर इंसान की कहानी
अगर इस बात को जेनेरलाईज़ किया जाए, तो इसमें ज़्यादातर इंसानों की कहानी छुपी हुई है।
वे लोग जिन्होंने किसी चीज़ को सच्चाई समझकर अपना लिया है, वे सब ग़ैर-मुतमइन (असंतुष्ट) ज़िंदगी गुज़ारते हैं।
वे हमेशा इस एहसास में रहते हैं कि सच्चाई शायद कुछ और है, क्योंकि मौजूदा सच्चाई उनके माइंड को पूरी तरह एड्रेस (संतुष्ट) नहीं कर पा रही है।
असल
बात यह है कि इंसान के अंदर सच्चाई की तलब पहले से ही मौजूद है। इस तलब की वजह से
वह किसी न किसी चीज़ को सच्चाई मानकर उसे ले लेता है, लेकिन
उसके बाद भी उसका
मन हमेशा बेचैनी और
असंतोष के भंवर में घिरा रहता है। वह जाने-अनजाने में (शऊरी या ग़ैर-शऊरी तौर पर) यह
महसूस करता रहता है कि असली सच्चाई शायद कुछ और है — जिसे उसे पाना चाहिए।
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