गिरोही हिदायत
Source : AL-RISALA (Urdu) | MAR - 2011
क़ुरआन की सूरह अल-बक़रह में हिदायत दी गई है:
और कहते हैं कि यहूदी या ईसाई बन जाओ तो हिदायत पाओगे। कहो कि नहीं, बल्कि हम तो पैरवी करते हैं इब्राहीम के दीन की जो अल्लाह की तरफ़ यकसू (एकाग्रचित्त) था और वह शरीक करने वालों में न था। (2:135)
व-क़ालू कूनू हूदन् औ नसारा तह्तदू, कुल बल मिल्लता इब्राहीमा हनीफ़न, व-मा काना मिनल-मुशरिकीन (2:135)
क़ुरआन की इस आयत में बताया गया है कि कोई उम्मत जब अपने ज़वाल (de-generation) के दौर में पहुँच जाती है, तो उसका हाल क्या होता है।
ऐसी उम्मत हिदायत (guidance) को गिरोह (community) से जोड़ देती है, न कि उसूली तालीमात (अस्ल शिक्षाओं) से ।
यहूदियों
और ईसाइयों का भी
यही हाल उनके ज़वाल (दीन के रूह में आई गिरावट) के दौर में हुआ।
उन्होंने गिरोह को दीन के हम-मा'नी (बराबर) समझ लिया। उनका अक़ीदा यह बन गया कि वे ही नजात पाए हुए लोग हैं, और सही रास्ते (हिदायत) पर होने की कसौटी बस यह है कि आदमी उनके गिरोह से जुड़ा रहे।
और कहते हैं कि यहूदी या ईसाई बन जाओ तो हिदायत पाओगे। कहो
कि नहीं, बल्कि हम
तो पैरवी करते हैं इब्राहीम के दीन की जो अल्लाह की तरफ़ यकसू (एकाग्रचित्त) था और
वह शरीक करने वालों में न था। (2:135)
इस आयत में “मिल्लत-ए-इब्राहीम” से मुराद, दीन-ए-इब्राहीम है। यानी यहाँ तुलना गिरोह (community) की हिदायत और उसूली हिदायत (अस्ल हिदायत) के बीच की गई है।
इस उसूल का संबंध सिर्फ़ पुरानी उम्मतों – यहूदी और ईसाई से नहीं है, बल्कि बाद की उम्मत, यानी मुस्लिम उम्मत भी बराबरी से इसकी मुख़ातिब (संबोधित) है। ये बात मुस्लिम उम्मत पर भी उसी तरह लागू होती है।
मुस्लिम उम्मत अगर जान-बूझकर या बिना सोचे-समझे यह समझ ले कि
मुसलमान और इस्लाम दोनों एक ही हैं, और यह अ़कीदा (विश्वास) बना ले कि सिर्फ़ गिरोही
एतिबार से जो लोग मुस्लिम जमाअत में शामिल हैं,
वे अपने आप हिदायत (सही
रास्ते) पर हैं और उनके लिए नजात
पक्की है, तो यह
अ़कीदा भी उतना ही ग़लत होगा
जितना कि यहूदियों और ईसाइयों का अ़कीदा।
अल्लाह
का दीन हमेशा उसूल (मूल आधार) पर
क़ायम होता है—अल्लाह से शदीद मुहब्बत और अल्लाह से शदीद ख़ौफ़।
जो लोग अपनी ज़िंदगी में इस उसूल (बुनियादी बात) को पूरी तरह अपनाते हैं, वही अल्लाह के यहाँ हिदायत पाए हुए माने जाएंगे । किसी ख़ास नस्ल या सांस्कृतिक गिरोह से जुड़े होना इस बात का सुबूत नहीं कि इंसान हिदायत (सही राह) पर है।
हिदायत का यही पैमाना (criterion) गुज़रे दौर के लिए भी है, और हिदायत का यही पैमाना आज के लिए भी ।
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