दावत और दा’ई*
Source : AL-RISALA (Urdu) | OCT - 2006
क़ुरआन और हदीस में दावत के लिए दूसरा लफ़्ज़ जो इस्तिमाल हुआ है, वह "शहादत" (गवाही) है।
इसी तरह, दा’ई* और मद’ऊ* के लिए जो दूसरे अलफ़ाज़ इस्तिमाल हुए हैं, वो "शाहिद" (गवाह) और "मशहूद" (जिसे गवाही दी जाए) हैं।
यह बात बड़ी गहरी
और मायनेखेज़ है। अगर इस
पर ठहरकर ग़ौर किया जाए, तो एक अहम हक़ीक़त सामने आती है।
शाहिद का मतलब है—गवाह (witness).
गवाह कौन है ?
गवाह से मुराद वह शख़्स है जिसने ज़ेर-ए-बहस (जिस पर बात हो
रही हो)
वाक़िआ को देखा हो, या उसके बारे में वह इब्तिदाई जानकारी
दे सके।
Witness:
a person who saw, or can give a first-hand account of something.
दावत का मतलब यह है कि ग़ैर-मुस्लिमों तक हक़ का पैग़ाम पहुँचाया जाए। लेकिन जब मुसलमानों को उनकी इस दावती ज़िम्मेदारी की याद दिलाई जाती है, तो अक्सर यह कहा जाता है कि इस सिलसिले में पहला काम ख़ुद मुसलमानों की इस्लाह (सुधार) है। यानी मुस्लिम समाज और मुस्लिम रियासत को सही इस्लामी उसूल पर क़ायम करना।
क्योंकि अगर मुसलमान ख़ुद ही बिगड़े हुए हों, और उनके दरमियान बुराई से पाक (सालेह) समाज और सालेह हुकूमत का निज़ाम क़ायम न हो तो ग़ैर-मुस्लिमों को किस तरह इस्लाम की तरफ़ बुलाया जा सकता है।
लेकिन यह सोच बिल्कुल ग़लत और बेमेल (irrelevant) है।
क्यों ?
इसलिए कि —
इस्लामी दावत का मक़सद लोगों को मुस्लिम समाज या सिस्टम (निज़ाम) की तरफ़ बुलाना नहीं है।
दावत का असल मक़सद लोगों को अल्लाह की तरफ़ बुलाना है।
यानी लोगों को यह
बताना कि हम सब का एक ख़ुदा है। उसने इस दुनिया को एक मक़सद के तहत बनाया है। इसलिए लोगों को ख़ुदा के क्रिएशन प्लान (Creation Plan) से आगाह करना,
लोगों को जन्नत और जहन्नम की ख़बर देना,
और यह बताना कि ख़ुदा एक दिन हम सब को जमा करेगा
और हमारे आमाल (कर्मों) का हिसाब
लेगा, और फिर हमारे रिकार्ड
के मुताबिक़, जन्नत या जहन्नम का
फ़ैसला करेगा।
यानी दावत का असल निशाना यह है कि इंसान को बताया जाए कि—
तुम सिर्फ़ इस “दिखाई देने वाली दुनिया” (seen world) तक महदूद नहीं
हो। इसके आगे एक “न दिखाई देने वाली दुनिया” (unseen world) भी मौजूद है, जो हमेशा रहने वाली
और असली दुनिया है। और
हर इंसान को एक
दिन मरने के
बाद उसी दुनिया में जाना है—जहाँ उसे उसके तक़ाज़ों का सामना करना है।
इस एतबार से देखिए तो दावत के अमल में मुसलमानों के समाज या निज़ाम का सालेह होना या बुरा होना एक बे-तअल्लुक़ (irrelevant) बात है।
इस मामले में अस्ल अहमियत सिर्फ़ दो चीज़ों की है :
1. दलील: दा’ई* के पास ऐसी दलील का सरमाया मौजूद हो जो मद’ऊ* को मुतमइन (संतुष्ट) कर सके।
2. यक़ीन: दा’ई* को ख़ुद सच्चाई की इतनी गहरी मा’रिफ़त (पहचान) हासिल हो कि वह पूरे यक़ीन के साथ उसकी तरफ़ दावत दे सके।
उसका यक़ीन इतना बढ़ा हुआ हो कि जब वह उसके बारे में बोले तो ऐसा महसूस हो कि वह लोगों को किसी ऐसी चीज़ से बा-ख़बर कर रहा है जिसको उसने ख़ुद देखा है ।
दा’ई* जब दूसरों के बीच दावत का काम करता है तो उस वक़्त नुक़्ता-ए-दावत क्या होता है ?
उस वक़्त उसका नुक़्ता-ए-दावत यह
नहीं होता कि — "देखो, हमने अपने
यहाँ एक बेहतरीन निज़ाम-ए-ज़िंदगी बना लिया है, तुम भी वैसा ही
बनाओ।"
बल्कि दा’ई का दावती नुक़्ता सिर्फ़ यह
होता है कि ख़ुदा और
इंसान के बीच रिश्ता
क्या है, और मौत के बाद की ज़िंदगी में इंसान के साथ किया मामला पेश आने वाला है।
इसी को क़ुरआन में इंज़ार (डराना) और तबशीर (ख़ुशख़बरी देना) कहा गया है।
गोया कि इस्लाम में दावत का
असली नुक़्ता उसका फ़िक्री और नज़रियाती पहलू है — न कि कोई सियासी या
समाजी निज़ाम ।
और पैग़म्बर-ए-इस्लाम (सल्ल०) की पूरी ज़िंदगी (सीरत) इसी दावती नुक़्ता-ए-नज़र की गवाही देती है।
दा'ई: ख़ुदा का तख़्लीक़ी मंसूबा (Creation plan of God) से परिचित वह व्यक्ति जो ख़ुदा के पैग़ाम से लोगों को अवगत कराता है।
